महाराष्ट्र में चल रहा सुरासुर संग्राम

महाराष्ट्र में सरकार किसकी हो ?- इस पर अभी स्थिति स्पष्ट नहीं है। राजनीतिक विश्लेषक अनुमान लगा रहे हैं कि महाराष्ट्र में भाजपा एनसीपी की सरकार भी बन सकती है और शिवसेना , कांग्रेस और राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी की सरकार भी बन सकती है । तीसरा विकल्प इन राजनीतिक विश्लेषकों की दृष्टि में यह भी है कि भाजपा और कुछ निर्दलीय सदस्य मिलकर भी सरकार बनाने की पहल कर सकते हैं। जिन्हें शिवसेना का एक धड़ा टूटकर अपना सहयोग दे सकता है। चौथा विकल्प है कि भाजपा और शिवसेना मिलकर केंद्रीय मंत्री आठवले के सूत्र पर कार्य करते हुए भाजपा 3 वर्ष के लिए और शिवसेना 2 वर्ष के लिए मुख्यमंत्री पद पर सहमति बना लें और इस आधार पर सरकार बनाने की दिशा में आगे बढ़ जाएं ।
हमारा मानना है कि महाराष्ट्र में यदि भाजपा एनसीपी की सरकार बनती है तो यह संविधान की मूल भावना के विरुद्ध तो होगा ही साथ ही महाराष्ट्र के मतदाताओं के साथ भी विश्वासघात होगा । इसी प्रकार शिवसेना राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी और कांग्रेस की सरकार का अस्तित्व में आना भी महाराष्ट्र के लोगों के साथ विश्वासघात की श्रेणी में ही रखा जाएगा । हमारे ऐसा कहने का अभिप्राय केवल यह है कि चुनाव पूर्व गठबंधन ही संवैधानिक और वैधानिक हैं । उनकी नैतिकता पर किसी प्रकार का प्रश्न नहीं उठाया जा सकता । क्योंकि जब मतदाताओं को यह स्थिति स्पष्ट हो कि वह किस पार्टी या गठबंधन को सरकार बनाने के लिए अपना मतदान कर रहे हैं तभी उसे संवैधानिक , वैधानिक और पूर्णत: नैतिक कहा जा सकता है । यदि ‘ सिरों की गिनती ‘ को पूरा करने के लिए ‘ हॉर्स ट्रेडिंग ‘ के माध्यम से कोई भी पार्टी कहीं पर भी किसी भी प्रकार से सरकार बनाती है या बनाने में सफल होती है तो वह असंवैधानिक , अवैधानिक और अनैतिक प्रक्रिया है , जिसे मतदाताओं की अनुमति प्राप्त नहीं है।
यद्यपि इसके उपरांत भी स्वतंत्र भारत में ऐसे अनेकों अवसर आए हैं जब प्रदेशों में ही नहीं बल्कि केंद्र में भी ‘हॉर्स ट्रेडिंग ‘ के माध्यम से सरकारें बनाई गई हैं और मतदाताओं की भावनाओं का अपमान करते हुए संविधान की धज्जियां उड़ाने का काम राजनीतिक पार्टियों ने किया है ।
इस संदर्भ में हमें बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर जी के जीवन से भी कुछ शिक्षा लेनी चाहिए । उन्हें कुछ लोगों ने उनके जीवनकाल में ही भारतीय संविधान का निर्माता कहकर पुकारना आरंभ कर दिया था । जिससे वह स्वयं भी आहत होते थे। उन्होंने 2 सितंबर 1953 को राज्यसभा में कहा था – ” श्रीमान जी ! मेरे मित्र मुझसे कहते हैं कि मैंने संविधान बनाया है , पर मैं यह कहने के लिए पूरी तरह तैयार हूं कि इसे जलाने वाला पहला व्यक्ति मैं ही होऊंगा । मुझे इसकी आवश्यकता नहीं है। यह किसी के लिए भी अच्छा नहीं है । ” इसका अभिप्राय है कि बाबासाहेब संविधान की प्रक्रिया , नीति और उसे लागू करने वाले लोगों और उनकी व्यवस्था से असहमत और असंतुष्ट थे ।
डॉक्टर अंबेडकर अपने जीवनकाल में ही यह बड़ी गहराई से अनुभव करने लगे थे कि भारत का संविधान जिन आशा और अपेक्षाओं से बनाया गया था , उन पर खरा न उतरकर कहीं विपरीत दिशा में जा रहा है । स्पष्ट था कि संविधान को विपरीत दिशा देने वाले व्यवस्था में बैठे वही लोग थे जो संविधान की शपथ लेकर संविधान के अनुसार देश को चलाने का वचन देश के लोगों को देकर भी संविधान के विपरीत आचरण करते हुए संविधान की धज्जियां उड़ाने लगे थे।
इस स्थिति से बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर खिन्न और क्षुब्ध थे । उन्होंने अपनी खिन्नता को 19 मार्च 1955 को उस समय व्यक्त किया जब राज्यसभा सदस्य डॉ अनूपसिंह ने डॉक्टर भीमराव अंबेडकर के उक्त कथन को एक बार फिर सदन में उठाया । चौथे संवैधानिक संशोधन पर चर्चा के समय उन्होंने डॉ अंबेडकर को स्मरण कराया कि आपने संविधान को जलाने की बात कही थी। ऐसा आपने क्यों कहा था ? कृपया इसका उत्तर दीजिए ।
इस पर बाबा साहेब डॉक्टर भीमराव अंबेडकर जी ने कहा था :- ” मेरे मित्र ने कहा है कि मैंने कहा था कि मैं संविधान जलाना चाहता हूं । पिछली बार मैंने जल्दी में इसका कारण नहीं बताया था । आज जब मेरे मित्र ने मुझे अवसर दिया है तो मुझे इसका कारण बताना ही चाहिए । कारण यह है कि हमने भगवान के रहने के लिए एक मंदिर बनाया था , पर इससे पहले कि भगवान इसमें आकर रहते एक राक्षस आकर उसमें रहने लगा । अब उस मंदिर को तोड़ देने के अतिरिक्त चारा ही क्या है ? हमने इसे असुरों के रहने के लिए तो बनाया नहीं था , हमने इसे देवताओं के लिए बनाया था , इसलिए मैंने कहा था कि मैं इसे जलाना चाहता हूं ।”
जो लोग जनादेश का अपने अनुकूल अर्थ करते हैं या उसकी व्याख्या करते हैं और उसे तोड़ मरोड़कर किसी भी प्रकार से अपने लिए सरकार बनाने का एक उचित और अनुकूल अवसर के रूप में प्रतिस्थापित करते हैं , वही लोग संविधान की मूल भावना के विपरीत आचरण करने के कारण ‘ राक्षस ‘ हैं । संभवतः डॉ आंबेडकर यही बताना चाहते थे कि संवैधानिक प्रावधानों का पूर्ण निष्ठा और ईमानदारी के साथ पालन होना चाहिए और जनादेश को अपने लिए ‘ ब्रह्मवाक्य ‘ मानकर स्वीकार करना चाहिए । इसके लिए बहुत आवश्यक है कि चुनाव पूर्व बने गठबंधन ही सरकार बनाने के लिए उचित और संवैधानिक माने जाने चाहिए । यदि कोई भी पार्टी अपनी सरकार बनाने के लिए चुनाव पूर्व गठबंधन को तोड़कर नए गठबंधन का सृजन कर नए ढंग से कहीं पर भी सरकार बनाती है तो उसे अलोकतांत्रिक और जनादेश के विपरीत मानते हुए सरकार बनाने के लिए अनुमति नहीं दी जानी चाहिए ।
अभी तक भारत के सभी राजनीतिक दल संविधान की मूल भावना का अपमान करते हुए न्यूनाधिक इसी ‘ राक्षसवृत्ति ‘ का परिचय देते रहे हैं । अब समय आ गया है कि भारत के लोकतंत्र रूपी मंदिर में देवता को ही स्थापित किया जाए अर्थात उस जनभावना का आदर करने के लिए सभी राजनीतिक दल संकल्पित हों जिसके अनुसार किसी पार्टी विशेष या गठबंधन विशेष को लोगों ने अपनी सरकार बनाने के लिए आदेशित किया है । यदि बहुत ईमानदारी के साथ आकलन किया जाए तो महाराष्ट्र की जनता ने फडणवीस के नेतृत्व में पुनः आस्था व्यक्त की है । ‘ सिरों की गिनती ‘ का खेल बिगड़ा नहीं है और ना ही जनता ने बिगाड़ा है अपितु उसे बिगाड़ने का काम किया जा रहा है । इस समय शिवसेना को अपने भीतर के ‘ राक्षस ‘ को मारने का काम करना चाहिए । दूसरे , यदि भाजपा ने चुनाव पूर्व शिवसेना को यह वचन दिया था कि वह ढाई वर्ष उसका मुख्यमंत्री स्वीकार करेगी तो इस पार्टी को भी अपनी राजनीतिक शिष्टता और ईमानदारी का परिचय देते हुए अपने वचन का पालन करना चाहिए । साथ ही केंद्र सरकार को इस समय यह कानून देश में स्थापित करना चाहिए कि किसी भी प्रदेश में या केंद्र में सरकार बनाने के लिए चुनाव पूर्व गठबंधन को ही प्राथमिकता दी जाएगी । यदि ऐसा कानून बनता है तो इसके दूरगामी परिणाम होंगे । इसका लाभ सभी राजनीतिक दलों को मिलेगा और भविष्य में कभी जनादेश के विरुद्ध राजनीतिक दलों को षड्यंत्र रचने का अवसर भी नहीं मिलेगा ।समय और परिस्थितियों के तकाजे को अब हमें और अधिक नहीं झेलना चाहिए ।
अब स्थिति स्पष्ट होनी चाहिए कि देश के लोकतंत्र रूपी मंदिर में ‘ राक्षस ‘ बैठेगा या फिर ‘ देवता ‘ ? हमने धारा 370 को 72 वर्ष झेला है , न्यूनाधिक इतने ही समय तक हमने राम मंदिर के लिए चलने वाले मुकदमे को देखा है , अब हमें इतने ही समय से चली आ रही ‘ सुरासुर संग्राम ‘ की इस प्रवृत्ति के विषय में भी स्पष्ट कर देना चाहिए कि इस युद्ध में सुर जीत रहे हैं या फिर असुर ? प्रधानमंत्री मोदी जी के ‘ स्वच्छता अभियान ‘ को तभी पूर्ण समझा जाएगा जब भविष्य के लिए यह स्थिति स्पष्ट हो जाए कि देश के लोकतंत्र रूपी मंदिर में सदा ही और निर्णायक रूप से केवल और केवल देवता ही बैठेगा राक्षस नहीं।

डॉ राकेश कुमार आर्य

Leave a Reply

%d bloggers like this: