स्वच्छ भारत अभियान की ऐसी – तैसी

भारत के थूकप्रेमी बंधु – बांधव स्वच्छता अभियान की ऐसी – तैसी कर रहे हैं I इनके लिए देश एक थूकदान है और येलोग देशरत्न I थूकना इनका मौलिक अधिकार है, कोई इन्हें रोक नहीं सकता I यहाँ थूको, वहाँ थूको, जहाँ मन तहाँ थूको I भला थूकने से तुम्हें कौन रोक सकता है ! तुम्हारा आविर्भाव केवल थूकने के लिए हुआ है, इसलिए अनवरत थूकते रहो I थूकना तुम्हारा परम लक्ष्य है, इसलिए थूको I पान खाओ और थूको I तम्बाकू खाओ और थूको I गुटका खाओ और थूको I तुम्हारे थूकने से लाखों लोगों को रोजगार मिला है, लाखों लोगों का घर चलता है, लाखों लोगों को दो वक्त की रोटी नसीब होती है I इसलिए हे थूकनंदन ! तुम बिना ब्रेक के थूको I हजारों गुटका और पान – तम्बाकू के कारखाने तुम्हारे थूकने के कारण ही आबाद हैं I इसलिए हे थूकरत्न ! थूकते रहो I स्वच्छ भारत अभियान तुम्हारा क्या कर लेगा ? थूकना ही तुम्हारी नियति और नियत है I इसलिए हे थूकावातार ! तुम 24 X 7 थूको I अहर्निशं थूकामहे I पूरा देश तुम्हारे लिए थूकदान – पीकदान है I इसलिए यत्र तत्र सर्वत्र जहाँ चाहो वहाँ थूको I तुम आज़ाद देश के परम आज़ाद नागरिक हो I थूकने, अपानवायु का परित्याग करने और गंदगी फ़ैलाने के लिए ही इस वसुधा पर तुम्हारा अवतरण हुआ है I हे थूकनंदन ! इस धरा – धाम पर तुम्हारा आविर्भाव इसीलिए तो हुआ है कि थूक, खंखार और अपने मल – मूत्र से धरती को कृतार्थ करते रहो I हे थूक शिरोमणि ! तुम निरंतर थूको I थूकना तुम्हारा मौलिक अधिकार है और उसे साफ करना सफाईकर्मियों का मौलिक कर्तव्य I हे थूकप्रिय ! तुम्हारी जय हो I हे थूकावातार ! कोई भी मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री और उसका स्वच्छता अभियान तुम्हारा क्या बिगाड़ लेगा ?? भले ही पीठ पीछे लोग तुम पर थू – थू करें, पर सामने तुमको कोई कुछ नहीं कह सकता क्योंकि कहनेवाला तुमसे अपनी थूकम फजीहत क्यों कराएगा ? हे थूकावातार ! तुम्हारी सदा जय हो I थूकना तुम्हारी गौरवशाली परम्परा है, तुम्हारे दादाजी थूकते थे, तुम्हारे पिताजी थूकते थे, तुम थूकते हो और आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि तुम्हारे बच्चे भी इस गौरवशाली परम्परा को आगे बढ़ाएंगे I मैंने एक थूकप्रेमी भाई से पूछा – “भाई थूकप्रेमी ! लिफ्ट या सीढियों को थूक – पीक से बचाने के लिए चतुर सुजान लोग वहाँ भगवानों और देवी – देवताओं के चित्र अंकित करा देते हैं, लेकिन उन चित्रों पर भी तुम लोग पान – पीक से अपनी कला चित्रित कर देते हो I क्या तुम लोग नास्तिक हो ?” मेरी मूर्खता को सुन थूकनंदन ने जीवन रहस्य का बोध कराते हुए कहा – “हमलोग दूसरे लोगों से अधिक आस्तिक हैं, दूसरे लोगों से अधिक पूजा – पाठ, हवन, यज्ञ करते हैं, लेकिन हम अपने मौलिक अधिकारों के प्रति सदा सतर्क रहते हैं I लिफ्ट या सीढियों को थूक – पीक से बचाने के लिए चतुर लोग वहाँ देवी – देवताओं के चित्र अंकित कर हमारे मौलिक अधिकारों को कुचलने का प्रयास करते हैं I इसलिए हम उनका विरोध करने के लिए थूकते हैं I विरोध प्रदर्शन का यह देशी तरीका है I विरोध करने के लिए हम लिफ्ट या सीढियों पर लगे भगवान के चित्रों पर पीक – बलगम का फुहारा छोड़ते हैं I यह पीक – बलगम नहीं है, बल्कि हमारे विरोध प्रदर्शन का एक सुसभ्य तरीका है I थूकना हमारा मौलिक अधिकार है और इस अधिकार का हनन हम कभी बर्दाश्त नहीं कर सकते I” मेरा ज्ञान चक्षु खुल चुका था, मैं निरुत्तर हो गया I मैंने उस थूकप्रेमी को कुरेदते हुए पूछा – “ऐसा देखा जाता है कि आपलोग पीकदान में न थूककर इधर- उधर, साफ़ – सफ़ेद दीवारों, सडकों और धुले हुए फर्श पर थूकते हैं ?” उसने मेरी बातों का जो जवाब दिया उसे सुनकर मेरी छाती गर्व से चौड़ी ही गई I थूक रत्न ने कहा – “सफ़ेद दीवारों, सडकों और साफ़ फर्श पर थूकने में जिस ब्रह्मानंद सहोदर की प्राप्ति होती है वह अन्यत्र थूकने से दुर्लभ है I साफ – सुथरे स्थानों पर थूकने से जो परम आनंद की प्राप्ति होती है उसे शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता, उस आनंद की कल्पना सामान्य लोग नहीं कर सकते I जिस दिन हम साफ़ – सफ़ेद दीवारों, सडकों और धुले हुए फर्श पर थूकते हैं उस दिन ऐसा लगता है कि हमने कुछ सार्थक कार्य किया है, हमने देश के लिए थूका है, हमारा थूक राष्ट्र के काम आया I कल्पना करें कि यदि हम थूकें नहीं तो ये सफाईकर्मी बेरोजगार हो जाएँगे I हमारे थूकने के कारण ही इन्हें काम मिला है, हजारों सफाईकर्मियों को नौकरी मिली है I इस प्रकार हमारा थूकना एक राष्ट्रीय कर्म है I” मैं थूकप्रेमी की कल्पनाशीलता और देशभक्ति को देखकर देशानुराग से भाव विह्वल था I कैसी रचनात्मक प्रतिभा ! कैसा देशप्रेम ! वास्तव में सच्चे देशप्रेमी तो ऐसे ही प्रतिभा पुत्र हैं I मेरे गाँव के एक बनारस चाचा थे I उनका मुख पान से हमेशा लाल रहता तथा उनके मुख में सदा – सर्वदा पान की पीक भरी रहती थी I इसलिए वे अक्सर इशारे में बात किया करते थे I एक बार वे बस से पटना जा रहे थे I बस के अंदर बैठने की जगह होने के बावजूद वे बस की छत पर बैठे थे और उनका मुख पान की पीक से भरा हुआ था I उन्होंने मुख की पीक को हवा में इस प्रकार उछाला जैसे भारत का प्रक्षेपास्त्र हो I चाचा के मौखिक प्रक्षेपास्त्र ने बस की छत पर बैठे यात्रियों को लाल कर दिया I परिणामतः उन लोगों ने बनारस चाचा को कूटकर लाल कर दिया I उसी दिन चाचा ने अपने जीवन में पान न खाने का संकल्प लिया I वे अत्यंत उन्नत किस्म के पान कलाकार थे I पान पीक से वे सफ़ेद दीवारों पर ऐसे चित्र उकेर देते थे जिसे देख दर्शक अपने दांतों से ऊँगली दबा लेते थे I थूकप्रेमियों में बड़े – बड़े कलाकार हुए हैं I ये थूकप्रेमी पान पीक से दीवारों पर ऐसे अद्भुत चित्र बनाते हैं जिन्हें देखकर बड़े – बड़े कला – साधक भी दंग रह जाते हैं I इनको तो कला का सर्वोच्च पुरस्कार मिलना चाहिए था, परंतु यह आर्यावर्त का दुर्भाग्य है कि इनकी कला – साधना का उचित मूल्यांकन नहीं किया जा रहा है I थूकप्रेमियों को निराश होने की आवश्यकता नहीं है I सबके दिन फिरते हैं तो कभी न कभी थूकनंदनों के दिन भी फिरेंगे, उनकी गली में भी बहार आएगी, उनके मन – मयूर भी ता ता थैया करेंगे I किसी दिन ऐसा कोई प्रधानमंत्री अवश्य आएगा जो गंदगी, अशुचिता, अस्वच्छता को प्रोत्साहित कर देश में नारकीय शासनतंत्र स्थापित करेगा तथा सभी थूकप्रेमी बंधु – बांधवों को अस्वच्छ शासन का भागीदार बनाएगा I उस दिन का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं I

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