लेखक परिचय

लोकेन्द्र सिंह राजपूत

लोकेन्द्र सिंह राजपूत

युवा साहित्यकार लोकेन्द्र सिंह माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में पदस्थ हैं। वे स्वदेश ग्वालियर, दैनिक भास्कर, पत्रिका और नईदुनिया जैसे प्रतिष्ठित संस्थान में अपनी सेवाएं दे चुके हैं। देशभर के समाचार पत्र-पत्रिकाओं में समसाययिक विषयों पर आलेख, कहानी, कविता और यात्रा वृतांत प्रकाशित। उनके राजनीतिक आलेखों का संग्रह 'देश कठपुतलियों के हाथ में' प्रकाशित हो चुका है।

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– लोकेन्द्र सिंह

माननीय न्यायालय में एक बार फिर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की तुष्टीकरण की नीति का सच सामने आ गया। ममता बनर्जी समाज को धर्म के नाम पर बाँट कर राजनीति करने वाले उन लोगों/दलों में शामिल हैं, जो अपने व्यवहार और राजनीतिक निर्णयों से घोर सांप्रदायिक हैं लेकिन, तब भी तथाकथित ‘सेकुलर जमात’ की झंडाबरदार हैं। मुहर्रम का जुलूस निकालने के लिए दुर्गा प्रतिमा विसर्जन पर प्रतिबंध लगाना, क्या यह सांप्रदायिक निर्णय नहीं था? क्या तृणमूल कांग्रेस सरकार के इस फैसले में तुष्टीकरण और वोटबैंक की बदबू नहीं आती? क्या यह स्पष्टतौर पर दो समुदायों को दुश्मन बनाने वाला फैसला नहीं था? यकीनन उत्तर है- हाँ। न्यायालय में भी यही सिद्ध हुआ है। दुर्गा प्रतिमा विसर्जन पर प्रतिबंध के निर्णय के विरुद्ध सुनवाई करते हुए कलकत्ता न्यायालय ने ममता सरकार को जो आईना दिखाया है, उसमें उनकी राजनीति की असल तस्वीर बहुत स्पष्ट नजर आ रही है। न्यायालय ने ममता सरकार को कठघरे में खड़ा करते हुए एक गंभीर प्रश्न पूछा -‘सौहार्द खतरे में होने की आशंका जता कर क्या सांप्रदायिक विभेद पैदा नहीं किया जा रहा है?’ इस प्रश्न का जो उत्तर है, वह सब जानते हैं। सरकार भी जानती है,लेकिन उसका उत्तर देने की ताकत उसमें नहीं है। न्यायालय के मात्र इसी प्रश्न ने ममता सरकार की समूची राजनीति को उधेड़ कर रख दिया।

      कलकत्ता उच्च न्यायालय ने जो प्रश्न उठाया है, सामान्य समाज की चिंता भी वही है। पश्चिम बंगाल में ही नहीं, अपितु देश के अन्य हिस्सों में भी ममता सरकार का निर्णय चर्चा का विषय बना हुआ था। जब भारत के अन्य राज्यों में दुर्गा प्रतिमा विसर्जन और मुहर्रम एक साथ मनाए जा सकते हैं, तब पश्चिम बंगाल में दुर्गा विसर्जन पर प्रतिबंध लगाने की आवश्यकता क्यों पड़ी? इसी मुद्दे पर पिछले वर्ष भी न्यायालय में ममता बनर्जी को सबक मिला था। पिछले वर्ष भी उन्होंने ऐसा ही तुगलकी फरमान जारी कर दुर्गा प्रतिमा विसर्जन पर प्रतिबंध लगाया था। हिंदू समाज ने तब भी न्यायालय की शरण ली और न्याय प्राप्त किया था। कोई भी निष्ठावान और निष्पक्ष राजनेता एक ही भूल बार-बार नहीं दोहराता है। किंतु, जिसके मन में कपट हो, जिसकी नीति ही ‘फूट डालो और शासन करो’ पर आधारित हो, वह भला कहाँ और किस न्यायालय के सबक को याद रखता है। ममता बनर्जी को हिंदुओं की चिंता नहीं है, क्योंकि वह वोटबैंक नहीं है। एक लोककल्याणकारी सरकार के निर्वाचन का जब अवसर आता है, तब हिंदू जाति, व्यक्ति, पसंद और पार्टी के नाम पर बँट जाता है। बहुसंख्यक होकर भी वह ऐसी सरकार नहीं चुन पाता, जो ‘सबका विकास-सबका साथ’ की अवधारणा पर काम करे। पश्चिम बंगाल में 27 प्रतिशत से अधिक मुसलमान हैं। बांग्लादेश से आए अवैध घुसपैठिये भी सबसे अधिक पश्चिम बंगाल में ही हैं। ममता बनर्जी इन्हीं मुसलमानों के एकजुट वोट के आधार पर पश्चिम बंगाल की राजनीति में अपना सिक्का चला रही हैं। एक आंकड़े के अनुसार पिछले चुनाव में ममता बनर्जी को जितना वोट मिला, उसमें लगभग 51 प्रतिशत वोट मुस्लिम समाज का है। ममता बनर्जी अपने इस वोटबैंक को खुश करने के लिए ही हिंदू समाज को चोट पहुँचा रही हैं। इसीलिए उन्हें पिछले वर्ष का न्यायालय का सबक याद नहीं रहा। दुर्गा प्रतिमा विसर्जन पर उन्हें जो संदेश देना था, वह दे चुकीं।

ममता बनर्जी को यह समझना चाहिए कि वह जिस प्रकार की विस्फोटक राजनीति कर रही हैं, उससे उन्हें तात्कालिक राजनीतिक लाभ तो मिल सकता है। किंतु, इसका जो सामाजिक नुकसान होगा, वह सबके लिए घातक और दीर्घगामी होगा। आज जो आग सुलगाई जा रही है, वह सबको जला कर भस्म कर देगी, बंगाल की पहचान को भी। दुर्गा पूजा पश्चिम बंगाल का सबसे बड़ा त्योहार है। यह समूचे बंगाल की सांस्कृतिक पहचान भी है। सत्ता की ताकत के बल पर दुर्गा पूजा में बाधा उत्पन्न करना पश्चिम बंगाल की पहचान और संस्कृति को चोट पहुँचाना है। यह संविधान के विरुद्ध भी है। संविधान ने प्रत्येक व्यक्ति को अपनी संस्कृति और धर्म का पालन करने का मौलिक अधिकार प्रदान किया है। न्यायालय ने इस संदर्भ में टिप्पणी भी की है कि आप अपनी आशंका के आधार पर किसी के मौलिक अधिकार को नहीं छीन सकते। आखिर सरकार ने यह कैसे तय कर लिया कि विसर्जन और मुहर्रम साथ होने से कानून व्यवस्था बिगड़ेगी और उसका एक ही उपाय है कि विसर्जन पर प्रतिबंद लगा दिया जाए? इस संदर्भ ने न्यायालय ने उचित ही कहा है कि प्रशासन ने अपनी दुर्बलता छिपाने के लिए विसर्जन पर रोक लगाई है। हालाँकि, वास्तविकता सिर्फ इतनी नहीं है कि प्रशासन कमजोर है। यह बात सही है कि पश्चिम बंगाल में सांप्रदायिक और कट्टरवादी ताकतों के सामने प्रशासन ने पूरी तरह से घुटने टेक दिए हैं। पिछले कुछ वर्षों में वहाँ जिस तरह से सांप्रदायिक घटनाएं घटी हैं, वह सब इस बात की गवाही देती हैं।

‘सोनार बांग्ला’ को ‘बर्बाद बांग्ला’ बनाने की ओर तेजी से अग्रसर ममता बनर्जी को चाहिए कि देश राष्ट्रीय पार्टी कांग्रेस की दुर्गति से सबक ले। कांग्रेस के सिकुडऩे में बहुत हद तक उसकी तुष्टीकरण की राजनीति ही प्रमुख कारण है। यह स्वयं कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मूल्याकंन के बाद स्वीकार करते हैं। किसी भी सरकार की जिम्मेदारी होती है कि सबको समान अवसर उपलब्ध कराए जाएं। किसी के प्रति विशेष प्रेम प्रकट करना और किसी का तिरस्कार करना, एक निष्पक्ष सरकार की पहचान नहीं है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में पक्षपाती सरकार को सत्ता में रहने का कोई हक नहीं। इस पूरे मामले में सरकार कोई ठोस पक्ष नहीं रख सकी है। वह एक ही बात बार-बार रट रही है कि सांप्रदायिक सौहार्द बिगडऩे की आशंका थी। यदि सरकार को किसी प्रकार से सांप्रदायिक सौहार्द बिगडऩे की आशंका थी, तब वह पुलिस प्रशासन को चौकस कर सकती थी। विसर्जन और मुहर्रम के जुलूस के दौरान अधिक पुलिस बल तैनात करके भी स्थितियों को बिगडऩे से रोका जा सकता था। यदि राज्य को अपने पुलिस बल पर भरोसा नहीं था, तब केंद्र से सुरक्षा बल की माँग की जा सकती थी। अन्य अवसरों पर भी यही उपाय किया जाता है। दुर्गा प्रतिमा विसर्जन पर प्रतिबंध लगाना कतई इसका समाधान नहीं था। इस प्रकार सरकार ने समाज में अच्छा संदेश नहीं दिया। सरकार के इस निर्णय से कहीं न कहीं दो समुदायों के मन में विभेद की बात आई है। लोकतंत्र में इस प्रकार के तानाशाही निर्णयों के लिए किंचित भी जगह नहीं होनी चाहिए। उम्मीद है कि एक ही गलती के लिए दूसरी बार न्यायालय से फटकार के बाद ममता सरकार कोई सबक लेगी। सबको एक दृष्टि से देखा जाएगा और सबको समान अवसर उपलब्ध कराया जाएगा। हालाँकि, न्यायालय के निर्णय के बाद उनके जिस प्रकार के वक्तव्य आए हैं, उन्हें सुनकर उनसे ऐसी उम्मीद करना निरर्थक है।

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