“मनुष्य वही है जो सदा सत्य का आचरण करता है”

मनमोहन कुमार आर्य

मनुष्य क्या वास्तव में मनुष्य है? यह प्रश्न इसलिये करना पड़ रहा है कि किसी देश व समाज के जो नियम होते हैं, उनका वर्तमान समय में पालन देखने को नहीं मिल रहा है। वैदिक शिक्षा है कि मनुष्य को सत्य बोलना चाहिये तथा असत्य नहीं बोलना चाहिये। सत्य बोलना धर्म के 10 लक्षणों में से एक लक्षण है। आज के युग में यदि किसी शिक्षित व्यक्ति से प्रश्न किया जाये कि क्या वह शपथपूर्वक कह सकता है कि वह असत्य नहीं बोलता तो इसका वह या तो उत्तर नहीं देगा और यदि देगा तो उस पर विश्वास करना कठिन होगा। आजकल जिससे भी बात करें वह सीधी सरल बातें करने के स्थान पर उलझाने वाली बाते करते है जिससे उनका मनोरथ सफल हो सके। टीवी पर होने वाली राजनीतिक बहसों में भी बातों को सीधे तरीके से न कर घुमा फिराकर कहा जाता है। वेद ईश्वरीय ज्ञान है। वेदों में अनेक मंत्रों में ईश्वर की आज्ञा है मनुष्य को सत्य का आचरण करना चाहिये। सत्य को सबसे बडे़ पुण्य व असत्य को पाप की संज्ञा दी गई है। कुछ पंक्तियां बचपन से सुनते आ रहे हैं जिसमें कहा जाता है सच बराबर तप नहीं झूठ बराबर पाप जाके हृदय सांच है ताके हृदय आप इसका कभी खण्डन हमें किसी विद्वान से सुनने को नहीं मिला। हम समझते हैं कि इस वाक्य व वचनों में सत्य की मात्रा विद्यमान है। योग में पांच यमों में भी सत्य को अहिंसा के बाद स्थान दिया गया है। ईश्वर का सबसे महत्वपूर्ण एक नाम सच्चिदानन्दस्वरुप है जिसका अर्थ है कि ईश्वर सत्य, चित्त एवं आनन्द स्वरूप वाला है। आत्मा की बात करें तो आत्मा को भी सत्य व चित्त स्वरूप व गुणों वाला माना जाता है और वस्तुतः ऐसा ही है भी। जब आत्मा सत्य है तो क्या मनुष्य शरीर में उसे सत्य न बोलने की छूट हो सकती है। सत्य बोलना मनुष्य का स्वभाव है। अज्ञानी व अशिक्षित मनुष्यों व बच्चों को सत्य बोलते ही पाया जाता है। असत्य व झूठ बोलने के लिये मनुष्य को अपने किसी स्वार्थ व लोभ के लिये बोलना पड़ता है। लोभ को पाप का कारण बताया जाता है। लोभी मनुष्य सत्य व असत्य का ध्यान नहीं रखता। उसे तो येन केन प्रकारेण अपनी इच्छित वस्तु को प्राप्त करना होता है। सरकार कहती है रिश्वत लेना अपराध है। कुछ विभाग ऐसे होते हैं जहां खुलकर रिश्वत का चलन होता है। यदि कोई न देना चाहे तो उसका काम नहीं होता। यदि वह शिकायत भी करे तो कई बारे उसे लेने के देने पड़ जाते हैं। हमने एक बार एक आर्य विद्वान से सुना था कि रिश्वत लेना अपराध व पाप है इसलिये हम रिश्वत नहीं लेते। परन्तु रिश्वत देना कई बार हमारी मजबूरी होती है। उन्होंने उदाहरण दिया था कि हमें यात्रा पर कहीं दूर जाना है। रेलवे का आरक्षण सुलभ नहीं है। यदि ऐसी स्थिति में रिश्वत देने से टिकट या यात्रा करने की सुविधा मिल जाये तो हमारी मजबूरी होती है। यदि रिश्वत नहीं देंगे तो हम जा नहीं सकेंगे। जाना कई बार आवश्यक होता है। अतः उन्होंने कहा था कि हम रिश्वत नहीं लेते व लेंगे यह हमारा नियम है, परन्तु रिश्वत नहीं देंगे यह देश, काल और परिस्थिति पर निर्भर करता है। हमें लगता है कि आजकल बहुत से धार्मिक लोग भी ऐसा ही करते हैं।

 

सत्य का पालन हम इसलिये करते हैं कि हम चाहते हैं कि दूसरे व्यक्ति हमारे साथ सत्य का व्यवहार करें। कोई हमसे असत्य व झूठ का व्यवहार करे, इसे हम पसन्द नहीं करते। अतः यह नियम निश्चित होता है कि जब हम दूसरों से सत्य व्यवहार की अपेक्षा रखते हैं और दूसरे भी हमसे सत्य व्यवहार की अपेक्षा रखते हैं तो सभी को सत्य ही बोलना व करना चाहिये। सत्य का आचरण करने से मनुष्य को भविष्य में लाभ ही होता है। हम संसार को देखें तो पाते हैं कि सूर्य अपने सभी नियमों का विगत 1.96 अरब वर्षो से पालन कर रहा है। पृथिवी व चन्द्र सहित सभी लोक लोकान्तर गति व परिभ्रमण के नियमों का पालन कर रहे हैं। इसी कारण इस संसार की प्रलय नहीं हो रही है। यदि हमारे सौर मण्डल का एक ग्रह या उपग्रह भी अपने नियमों का अतिक्रमण कर दे तो निश्चित ही पृथिवी पर जीवन समाप्त हो सकता है। ऐसा होगा नहीं क्योंकि यह सब पदार्थ मनुष्यों की तरह से चेतन व ज्ञानवान् नहीं है अपितु यह जड़ है और जड़ में परमात्मा ने जो नियम बना दिये हैं वह उन्हीं का प्रत्येक क्षण पालन करते हैं। इसी प्रकार वनस्पति जगत व सृष्टि के अन्य सभी पदार्थ अपने अपने नियमों का पालन करते हैं। पशु व पक्षी जो कि बुद्धि की दृष्टि से मनुष्य की तुलना में अल्प हैं, जिनके पास अपनी मनुष्य जैसी कोई भाषा भी नहीं है, वह एक दूसरे से हमारी तरह से बातें नहीं कर सकते, परन्तु वह भी प्रकृति के नियमों का पालन करते हैं तो हमें आश्चर्य होता है। अतः विचार करने पर यही निश्चित होता है कि मनुष्यों को भी सत्याचरण व सत्य व्यवहार करना ही चाहिये। इससे उन्हें लाभ अवश्य होता है।

 

सत्य के पालन से मनुष्य को क्या लाभ होते हैं और क्या हानियां होती हैं, इस पर भी विचार करना उचित है। यदि हम सत्य बोलते हैं तो दूसरे हमारा विश्वास करते हैं। हम किसी से जो कह देते हैं उसे विश्वास हो जाता है कि वह व्यक्ति असत्य नहीं बोलता है। उसने जो कहा है वह सत्य कहा है। यदि हम असत्य बोले तो दूसरे हमारा विश्वास करना छोड़ देते हैं और हमारी सत्य बातों को भी असत्य मानते हैं। इससे यही सिद्ध होता है कि यदि समाज में रहना है और दूसरों से व्यवहार करना है तो सत्य के आश्रय से ही जीवन व्यतीत किया जा सकता है।

 

आजकल मनुष्यों में आपसी विवाद होते रहते हैं। यदा-कदा विवाद होने पर एक पक्ष न्यायालय में चला जाता है। वहां साक्षी देने वाले लोगों के बयान होते हैं। उन्हें शपथ पत्र देना होता है जिसमें कहा जाता है कि उसने जो कहा है वह सब उसके ज्ञान व विश्वास के आधार पर सत्य है। कोई तथ्य झुपाया नहीं गया है। ईश्वर उसकी रक्षा व सहायता करे। देश के सभी लोगों के लिये वाद का निर्णय करने के लिये यह नियम बनाया गया है। न्यायालय में भी कई बार लोग झूठ बोलते हैं इसलिये शपथपत्र पर भी पूर्ण विश्वास नहीं किया जाता और अधिवक्ता साक्षियों व वादि-प्रतिवादी से बहस कर सत्य का पता लगाते हैं। इससे जो तथ्य स्पष्ट होते हैं उसके आधार पर सत्य के पक्ष में न्याय व निर्णय किया जाता है। इससे भी सिद्ध होता है कि देश, समाज व न्यायालय में भी सत्य की ही प्रतिष्ठा होती है।

 

वैदिक धर्म में कहा गया है कि सत्य की ही सदैव विजय होती है असत्य की नहीं। भारत सरकार का यह ध्येय वाक्य है। झूठ बोलकर और दलीलें देने से असत्य को सत्य सिद्ध नहीं किया जा सकता। सत्य सत्य रहता है और असत्य असत्य ही रहता है। स्वामी दयानन्द जी ने अपने पत्रों में एक स्थान पर लिखा है कि वह किसी परिस्थिति में भी असत्य से समझौता नहीं कर सकते। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार वर्षा ऋतु में बादल सूर्य को ढक लेते हैं परन्तु यह दीर्घकालिक न होकर अल्पकालिक ही होता है। कुछ ही देर बाद सूर्य पुनः चमकने लगता है और बादल छंट जाते हैं। मनुष्य को भी दृष्टान्त के अनुसार दुःख व कष्टों को अस्थाई मानना चाहिये। सत्य का सूर्य ईश्वर है जो हर क्षण व हर पल उदय रहता है। वह धार्मिक व सत्याचरण करने वाले मनुष्यों के दुःखों को दूर करता है और असत्य बोलने वालों को दण्ड स्वरूप उनके असत्याचरण के अनुरूप दण्ड देता है। कर्मफल सिद्धान्त की यदि चर्चा करें तो यह तथ्य सामने आता है कि सत्याचरण व धर्माचरण करने वाले मनुष्य को सुख मिलता है। परजन्म में भी उसकी उन्नति होती है व वह सुख पाता है। इसके विपरीत असत्याचरण व अधर्माचरण करने वाला मनुष्य इस जन्म में भी दुःखी देखा जाता है परजन्म में भी परमात्मा उसके कर्मों के अनुसार उसे दुःख रूपी दण्ड भुगाते हैं।

 

ऋषि दयानन्द ने समस्त वेद व वैदिक साहित्य का अध्ययन किया था। उन्होंने सभी शास्त्रों का मन्थन व विश्लेषण कर सत्य को प्राप्त किया था। वह सच्चे योगी भी थे और साधना से उन्होंने योग के लक्ष्य समाधि अवस्था में ईश्वर साक्षात्कार को भी प्राप्त किया था। उन्होंने आर्यसमाज के दस नियम बनायें हैं जो सभी सत्य पर आधारित हैं। आर्यसमाज के चौथे व पांचवें नियम में वह कहते हैं कि सत्य के ग्रहण करने और असत्य के छोड़ने में सबको उद्यत रहना चाहिये। सब काम धर्मानुसार अर्थात् सत्य और असत्य का विचार करके करने चाहिएं। इन दो नियमों में वह अपने सभी अनुयायियों को सत्य को ग्रहण करने, असत्य को छोड़ने और सब काम सत्य और असत्य का विचार कर, जो सत्य हों, उन्हें करने की प्रेरणा कर रहे हैं। उन दोनें नियमों का पालन करने से ही मनुष्य धार्मिक होता है अन्यथा नहीं। मनुष्य की परिभाषा है कि ‘मनुष्य उसी को कहना (अर्थात् मनुष्य वही होता है) जो मननशील होकर स्वात्वत् अन्यों के सुख-दुःख और हानि-लाभ को समझे। अन्यायकारी बलवान् से भी न डरे और धर्मात्मा निर्बल से भी डरता रहे। इतना ही नहीं किन्तु अपने सर्व सामर्थ्य से धर्मात्माओं कि चाहे वे महा अनाथ, निर्बल और गुणरहित क्यों न हों, उन की रक्षा, उन्नति, प्रियाचरण और अधर्मी चाहे चक्रवर्त्ती सनाथ, महाबलवान् और गुणवान् भी हों तथापि उसका (व उनका) नाश, अवनति और अप्रियाचरण सदा किया करे अर्थात् जहां तक हो सके वहां तक अन्यायकारियों के बल की हानि और न्यायकारियों (जो सत्य का आचरण करते हैं) के बल की उन्नति सर्वथा किया करे। इस काम में चाहे उस (मनुष्य) को कितना ही दारुण दुःख प्राप्त हो, चाहे प्राण भी भले ही जावें परन्तु इस मनुष्यपनरूप (सत्य के पालनरुप) धर्म से पृथक कभी न होवे।’

 

सत्य और विद्या ही मनुष्य की उन्नति का कारण है। विद्या भी सत्य ज्ञान को कहते हैं। अतः मनुष्य वही है जो सत्य का पालन व आचरण करता है। जो ऐसा नहीं करता वह मनुष्य-वेश व शरीर में मनुष्य नहीं अपितु पापी, दुष्ट, अनार्य, राक्षस, समाजद्रोही आदि होता है। इसी के साथ लेख को विराम देते हैं।

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