मानव धर्म और मनुस्मृति

राकेश कुमार आर्य

वैदिक धर्म में मनुस्मृति का विशेष और सम्मानजनक स्थान है । भारतीय साहित्य में मनुस्मृति का मनु संहिता , मानव धर्मशास्त्र, मानव शास्त्र जैसे कई नामों से भी उल्लेख किया गया है । यह प्राचीन काल से ही हमारे भारतीय साहित्य में सबसे अधिक चर्चित धर्मशास्त्र के रूप में मान्यता प्राप्त ग्रंथ रहा है । वास्तव में जितनी भी स्मृतियां प्राचीन काल में भारतवर्ष में लिखी गईं उन सब में ऊंचा स्थान मनुस्मृति का है । यही कारण है कि वैदिक विद्वानों ने अपने द्वारा लिखित अनेकों ग्रंथों में मनुस्मृति द्वारा प्रतिपादित मानव धर्म का स्थान – स्थान पर उल्लेख कर इस ग्रंथ की प्रमाणिकता को स्वीकार किया है। मनुस्मृति को शंकराचार्य और शबर स्वामी जैसे अनेकों दार्शनिक विद्वानों ने भी प्रमाण के रूप में अपने ग्रंथों में उद्धृत किया है । आर्य समाज के प्रवर्तक महर्षि दयानंद ने भी महर्षि मनु को अपने अमर ग्रन्थ सत्यार्थ प्रकाश व अन्य ग्रंथों में बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान दिया है।
मनुस्मृति वास्तव में एक विधानात्मक शास्त्र है। इसमें मानव समाज के लिए वर्णाश्रम व्यवस्था को तो स्पष्ट किया ही गया है , साथ ही व्यक्ति और समाज के लिए हितकारी धर्म , नैतिक कर्तव्य व मर्यादाओं और उन आचरणों का उल्लेख भी किया गया है ,जिससे सामाजिक ,राष्ट्रीय और वैश्विक व्यवस्था को मर्यादित व संतुलित रखने और बनाने में सहायता मिल सकती है।
मनुस्मृति के बारे में यह सत्य है कि आज के जितने भर भी कानून संसार के देशों में चल रहे हैं , उन सबको इसी ग्रंथ से प्रेरणा मिलती है । चाहे आज के कानूनों को लोगों ने कहीं से भी ले लिया हो, परंतु मूल सबका इसी मनुस्मृति से निकला हुआ दिखाई पड़ता है। इसके उपरांत भी कानून की स्थिति अपने आप में इतनी उत्कृष्ट नहीं है , जितनी मनु के द्वारा प्रतिपादित किए गए विधान की है । हमारा मानना है कि वर्तमान कानून अपने आप में नकारात्मक प्रक्रिया का नाम है , जबकि विधान से भरपूर मनुस्मृति की व्यवस्था विधेयात्मक अर्थात सृजनात्मकता से भरी हुई है।
भारतवर्ष में वैदिक विद्वानों की मान्यता है कि यह स्मृति स्वायंभुव मनु के द्वारा रचित है , न कि प्राचनेस या वैवस्वत मनु के द्वारा रची गई है । मनुस्मृति से हमें यह भी पता चलता है कि स्वायंभुव मनु के मूल शास्त्र का आश्रय लेकर भृगु ऋषि ने भार्गवीया मनुस्मृति की रचना की थी । 
भारत के कई ऐसे धर्मशास्त्र या धर्म ग्रंथ हैं , जिनकी मान्यता आज भी विदेशों में है । उनमें से एक मनुस्मृति भी है । जिसको आधार बनाकर न केवल भारत वर्ष में अपितु भारतवर्ष के बाहर विदेशों में भी न्याय निर्णय होते रहे हैं । इसका अभिप्राय है कि मनुस्मृति में प्रतिपादित न्यायिक सिद्धांतों को लोगों ने आदर्श के रूप में लिया और यह अनुभव किया कि उनके आधार पर हम न्याय निर्णय करने में सक्षम और सफल हो सकते हैं। 
आर्यावर्तकालीन भारत वर्ष में मनुस्मृति के आधार पर जब शासन कार्य होता था और न्याय निर्णय दिए जाते थे तो उस समय निसंदेह यह धर्मशास्त्र हमारे लिए संविधान का कार्य करता था । आज जब आर्यावर्त की सीमाएं सिमटकर बहुत छोटी हो गई हैं , तब विदेशों में जहां – जहां भी मनुस्मृति के आधार पर शासन चलता हुआ दिखाई देता है , या शासन पर मनुस्मृति की छाप दिखाई देती है तो समझना चाहिए कि यह वही देश हैं जो कभी आर्यावर्त्त के अंग हुआ करते थे। 
मनुस्मृति में चारों वर्णों के धर्मों का सविस्तार उल्लेख किया गया है। इसके अतिरिक्त चारों आश्रमों , सोलह संस्कारों तथा सृष्टि उत्पत्ति के प्रकरण सहित राज्य की व्यवस्था , राजा के कर्तव्य , विभिन्न प्रकार के विवादों में न्याय निर्णय करने के विधान , सेना का प्रबंध आदि उन सभी विषयों पर प्रकाश डाला गया है जो कि मानवमात्र के जीवन में प्रतिदिन घटित होते हुए देखे जाते हैं या जिनका मानव जीवन से सीधा संबंध है । इस प्रकार मनुस्मृति हमारे जीवन के प्रत्येक क्षेत्र को प्रभावित करने वाला ग्रंथ है । इस ग्रंथ के माध्यम से राजकीय व्यवस्था तो विकसित और मर्यादित होती ही है , साथ ही सामाजिक व्यवस्था भी सुव्यवस्थित रहकर मानव जीवन और अन्य प्राणियों के जीवन को भी सुरक्षा और संरक्षा प्रदान करती है।
मनु महाराज वेदों के प्रकांड विद्वान थे । अतः उन्होंने जो कुछ भी अपनी मनुस्मृति में प्रतिपादित किया , वह वेद विरुद्ध नहीं हो सकता । वेदों के विषय में यह भी सर्वमान्य सत्य है कि वेद सृष्टि के नियमों के अनुसार व्यवस्था प्रतिपादित करने वाले ग्रंथ हैं । इससे स्पष्ट हो जाता है कि मनु महाराज ने जो कुछ भी अपने मनुस्मृति नामक ग्रंथ में प्रतिपादित किया , वह भी सृष्टि नियमों के विपरीत न होकर उनके अनुकूल ही होना चाहिए। यदि वेदों को हमारे विद्वानों ने सृष्टि का आदि ग्रंथ स्वीकार किया है तो मनुस्मृति को भी सृष्टि का आदि संविधान कहकर इसी सम्मानपूर्ण श्रेणी में रखकर उसका भी सम्मान किया गया है । इसके साथ-साथ मनु महाराज को आदि संविधान निर्माता कहकर उन्हें भी सम्मानित किया गया है । वास्तव में मनुस्मृति में मनु महाराज ने जिस प्रकार के ज्ञान गाम्भीर्य का परिचय दिया है , उसके दृष्टिगत यदि उन्हें सृष्टि का आदि संविधान निर्माता कहा जाता है , तो इसमें कोई अतिशयोक्ति भी नहीं है । 
वैज्ञानिकों का और विद्वानों का मानना है कि भूमंडल पर मिलने वाला चींटी नामक प्राणी भी अपने यहां पर एक सामाजिक व्यवस्था बनाकर रहता है । जिसमें उसका एक राजा या रानी भी होती है । इसके अतिरिक्त कुछ बौद्धिक नेतृत्व देने वाले लोग तो कुछ क्षत्रिय सैनिक ऐसे होते हैं जो आपत्ति के समय चीटियों के समूह की सुरक्षा करने में काम आते हैं । साथ ही कुछ ऐसे कर्मचारी भी होते हैं जो दूरदराज के क्षेत्रों से भोजन आदि का संग्रह करने का कार्य करते हैं। कुल मिलाकर वहां पर भी मनुस्मृति की व्यवस्था अर्थात वर्ण व्यवस्था लागू है। यही हम मधुमक्खियों के भीतर भी देखते हैं । अब जो लोग मनु की वर्ण व्यवस्था का मानव समाज में विरोध करते हैं , उन्हें यह बात बहुत सम्भव है कि गले से नहीं उतर पाएगी कि मनु की राजव्यवस्था और सामाजिक वर्ण व्यवस्था तो अन्य प्राणियों के समूहों में भी पाई जाती है । ऐसे में मनु महाराज कितने बड़े मनोवैज्ञानिक और विद्वान रहे होंगे , जिन्होंने अन्य प्राणियों के समूहों को ही देखा समझा और परखा होगा । अतः आज आवश्यकता इस बात की है कि जो लोग मनु महाराज की या उनकी मनुस्मृति की आलोचना करते हैं उन्हें मनुष्य के मौलिक स्वभाव की ही नहीं ,अपितु अन्य प्राणियों के भी मौलिक स्वभाव की और समूह में रहकर अपनी व्यवस्था बनाने की भावना का परीक्षण अवश्य करना चाहिए। 
यह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य है कि भारत जैसे देश में मनुस्मृति को एक विवादित ग्रंथ बना कर रख दिया गया है । जबकि विदेशों में आज भी इस ग्रंथ पर लोग शोधपूर्ण कार्य कर रहे हैं । भारत में लोकतंत्र का धर्मनिरपेक्षता का स्वरूप इस ग्रंथ की प्रमाणिकता को स्वीकृति प्रदान करने में आड़े आया है । मनुस्मृति की बहुत ही पंथनिरपेक्ष भावनाओं को भी पंथसापेक्ष या संप्रदायसापेक्ष सिद्ध करने का अनुचित ,अतार्किक और अप्राकृतिक कृत्य किया गया है । जिससे मनुस्मृति को अपयश का भागी होना पड़ा है । जबकि इस ग्रंथ की वैज्ञानिकता को स्वीकृति प्रदान करने की आवश्यकता आज के समय में थी । हम यह भी स्वीकार करते हैं कि इस ग्रंथ के नाम पर कुछ लोगों ने अपनी दुकानदारी चलाने के लिए इसके स्वरूप को विकृत करने में भी कमी नहीं छोड़ी है । जिससे इस ग्रंथ को उस तथाकथित ब्राह्मणवादी व्यवस्था का शिकार होना पड़ा जिसने अपने निहित स्वार्थों में इसकी व्याख्या अपने – अपने समय में की और इसमें मनमाने ढंग से प्रक्षिप्त श्लोकों को डाल दिया। यदि इन श्लोकों को निकाल कर इस ग्रंथ को इस देश की राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्था के लिए धर्मग्रंथ घोषित किया जाए तो यह कार्य सचमुच बहुत ही महान होगा। इस दिशा में महर्षि दयानंद और आर्य समाज ने बहुत ही प्रशंसनीय कार्य किया है ।

भारत से बाहर प्रभाव

एन्टॉनी रीड  कहते हैं कि बर्मा, थाइलैण्ड, कम्बोडिया, जावा-बाली आदि में धर्मशास्त्रों और प्रमुखतः मनुस्मृति, का बड़ा आदर रहा है । इन देशों ने मनुस्मृति जैसे ग्रंथों को अपने लिए न केवल स्वीकार किया , अपितु इसके द्वारा बनाये गये विधान को सृष्टि नियमों के अनुकूल पाकर , उसे मानव जीवन को सहज और सरल रूप में जीने का एक प्रमाणिक ग्रंथ भी स्वीकार किया । विदेशों में राजनीतिक व्यवस्था को मर्यादित और संतुलित करने के लिए इस ग्रंथ को विशेष रुप से प्रशंसनीय ग्रंथ माना गया । जिसमें राजा को उसका धर्म समझा कर यह बताया गया है कि वह अमुक – अमुक कार्यों को करने के लिए बाध्य हैं । साथ ही उसकी योग्यता भी इस ग्रंथ के माध्यम से निर्धारित की गई है , जिसके अनुसार कोई नीच प्रवृत्ति का व्यक्ति या धर्म शास्त्रों का न जानने वाला व्यक्ति देश का राजा नहीं हो सकता । मनुस्मृति ने राजा उसी व्यक्ति को स्वीकार किया है जो धर्म के प्रति आस्थावान हो और प्रजावात्सल्य की भावना जिसके अंदर कूट-कूट कर भरी हो , जो न्यायपूर्ण बुद्धि रखता हो और जिसके हृदय में सर्व सम्प्रदाय समभाव का भाव स्वाभाविक रूप से निवास करता हो ।
बाइबल इन इण्डिया’ नामक ग्रन्थ में लुई जैकोलिऑट लिखते हैं:—-
मनुस्मृति ही वह आधारशिला है जिसके ऊपर मिस्र, परसिया, ग्रेसियन और रोमन कानूनी संहिताओं का निर्माण हुआ। आज भी यूरोप में मनु के प्रभाव का अनुभव किया जा सकता है । अतः स्पष्ट हो जाता है कि विदेशों में जो देश आज अपने आप को बहुत आगे बढ़ा हुआ मानते हैं , उनकी उन्नति के मूल में मनुस्मृति की विधेयात्मक शक्तियों का प्रभाव खड़ा है । उन्होंने मनुस्मृति को बहुत प्राचीनकाल में समझा , पढ़ा और उसके अनुसार अपने यहां के शासन के नियमों को बनाने का कार्य किया । यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि आज हम उनकी ओर देखते हैं और यह सोचते हैं कि जैसे हमको भी राज्य व्यवस्था या सामाजिक व्यवस्था देने का बौद्धिक कौशल इन्हीं लोगों ने सिखाया है ।

मनुस्मृति के प्रणेता एवं काल

मनु सृष्टि के पहले मनुष्य हैं । हमारे विद्वानों का मानना है कि धरती पर आने वाले मनुष्य उसी एक पिता मनु की संतानें हैं । मनु से ही मनुष्य शब्द बना है ,और मनु से ही इंग्लिश का मैन शब्द बना है । इसी शब्द को हिब्रू और अरबी में आदम कहा जाता है अर्थात जब हिब्रू और अरबी में बाबा आदम की बात कही जाती है तो वह यही मनु ही थे , जिनकी संतान को आगे चलकर आदमी कहा जाने लगा ।
मनुस्मृति को आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद जी महाराज ने सृष्टि के प्रारंभ में ही निर्मित हुआ ग्रंथ माना है । जिससे आज 2019 में मनुस्मृति को एक अरब 96 करोड़ 8 लाख 53 हजार 120 वर्ष हो चुके हैं । ऋषि दयानंद सत्यार्थ प्रकाश के एकादश समुल्लास के पृष्ठ 187 पर कहते हैं कि यह मनुस्मृति जो सृष्टि के आदि में हुई है । 
वर्तमान सृष्टि का सातवां मन्वंतर चल रहा है । जिसे वैवस्वत मन्वंतर का नाम दिया जाता है । इससे पहले 6 मन्वंतर हो चुके हैं । ऐसी सूचना हमें ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका से महर्षि दयानंद के माध्यम से मिलती है । स्वामी दयानंद जी ने बताया है कि एक मन्वंतर में 71 चतुर्युगी होती हैं । एक चतुर्युगी में सतयुग , त्रेता , द्वापर और कलयुग होते हैं । सतयुग में 17 लाख 28 हजार वर्ष , त्रेतायुग में 12 लाख 96 हजार वर्ष , द्वापरयुग में 8 लाख 64 हजार वर्ष और कलयुग में 4 लाख 32 हजार वर्ष होते हैं । चारों युगों में कुल 4320000 वर्ष होते हैं । ऐसी 71 चतुर्युगी बीत जाने के पश्चात एक मन्वंतर की अवधि पूर्ण होती है । 
हम इस बहस में नहीं पड़ते कि मनुस्मृति को बने कितना समय हो चुका है , परंतु फिर भी हमारी मान्यता है कि इस संबंध में महर्षि दयानंद जो कुछ कह रहे हैं , उससे हम सहमत हैं । इतने दीर्घकाल से मनुस्मृति न केवल भारत का अपितु समस्त संसार का मार्गदर्शन करती आ रही है । संसार के किसी भी देश का इतिहास इतना पुराना नहीं है जितना पुराना भारतवर्ष का इतिहास है ।अतः बात स्पष्ट हो जाती है कि भारत के इस महामनीषी मनु के द्वारा प्रदत्त धर्मशास्त्र मनुस्मृति से कभी न कभी समस्त संसार ही लाभान्वित हुआ है। यह मानव समाज को शासित और अनुशासित करने का सबसे प्राचीन ग्रंथ है।

मनुस्मृति की संरचना एवं विषय वस्तु

संसार के इस आदि संविधान मनुस्मृति में मनु महाराज ने कुल 12 अध्याय समाविष्ट किए हैं । जिनमें सृष्टि की उत्पत्ति, संस्कार, नित्य और नैमित्तिक कर्म, आश्रमधर्म, वर्णधर्म, राजधर्म व प्रायश्चित आदि विषयों का उल्लेख है। इन अध्यायों के नाम इस प्रकार हैं—(1 ) सृष्टि उत्पत्ति एवं धर्म उत्पत्ति विषय , (2 ) संस्कार एवं ब्रह्मचर्य आश्रम विषय, व्रतचर्या, उपचार ,(3 ) समावर्तन ,विवाह एवं पंचयज्ञ विधान , (4) गृहस्थ के अंतर्गत आजीविका एवं व्रत विषय ,(5) भक्ष्याभक्ष्य, शौच, अशुद्धि, स्त्रीधर्म , (6) गृहस्थाश्रम, वानप्रस्थ, मोक्ष, संन्यास ,( 7 राजधर्म , ( 8) कार्यविनिर्णय, साक्षिप्रश्नविधा , (9 ) राजधर्म के अंतर्गत व्यवहार निर्णय ,(10) चार वर्ण धर्म के अंतर्गत वैश्य शूद्र के धर्म एवं चारों वर्णों के धर्म का उपसंहार (11) प्रायश्चित्त ,(12) संसारगति, कर्म, कर्मगुणदोष, देशजाति, कुलधर्म, निश्रेयस।
जन्म के आधार पर जाति और वर्ण की व्यवस्था पर सबसे पहली चोट मनुस्मृति में ही की गई है । (श्लोक-12/109, 12/114, 9/335, 10/65, 2/103, 2/155-58, 2/168, 2/148, 2/28)। 
मनु महाराज पर जातिवादी व्यवस्था को स्थापित करने का सबसे भारी आरोप लगाया जाता है। वास्तव में महर्षि मनु पर इस प्रकार लगाया जाने वाला आरोप ऐसे लोगों के द्वारा लगाया जाता है जो स्वयं न तो संस्कृत जानते हैं और न ही संस्कृत की व्याकरण को जानते हैं । इतना ही नहीं उनमें से कई ऐसे भी होते हैं जिन्होंने मनुस्मृति को कभी ध्यानपूर्वक पढ़ा भी नहीं है।
शिक्षा को हमारे प्राचीन ऋषियों ने मनुष्य जीवन की उन्नति के लिए अनिवार्य माना है , इसलिए शिक्षा को भी मनुस्मृति में उचित और सम्मान पूर्ण स्थान दिया गया। यही कारण है कि सबके लिए शिक्षा अनिवार्य करते हुए सबसे शिक्षा ग्रहण करने की आवश्यकता भी इस पावन ग्रंथ में समझी गई है । (श्लोक- 2/198-215)। 
कुछ लोगों ने प्रक्षिप्त श्लोकों को लेकर मनुस्मृति पर आरोप लगाया है कि इसमें नारियों का अपमान करने के श्लोक अंकित हैं , जबकि वास्तविकता यह है कि मनु महाराज नारी जाति के प्रति बहुत ही सम्मानपूर्ण भाव रखते थे। वे न केवल नारी को सृष्टि संचालन के लिए आवश्यक मानते थे , अपितु सामाजिक व्यवस्था को उसी के माध्यम से चलाने के भी समर्थक थे ।उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा है कि जहाँ नारियों का सम्मान होता है वहां देवताओं का वास होता है । यही कारण है कि मनु महाराज ने मनुस्मृति में स्त्रियों की पूजा करने अर्थात् उन्हें अधिकाधिक सम्मान देने, उन्हें कभी शोक न देने, उन्हें हमेशा प्रसन्न रखने और संपत्ति का विशेष अधिकार देने जैसी बातें भी हैं (श्लोक-3/56-62, 9/192-200)। राजधर्म का उल्लेख करते हुए मनु महाराज ने स्पष्ट किया है कि राजा को अपनी प्रजा के प्रति प्रजावात्सल्य का भाव रखना चाहिए । वह ऐसा कुछ भी ना करे जिससे जनता उसे अस्वीकार करे या अपने ऊपर अत्याचार समझे । यही कारण है कि मनु का राजा प्रजा के हितचिंतन में संलग्न रहने वाला राजा है । उसमें अधिनायकता का भाव कभी भी विकसित हो ही नहीं सकता । उसका स्वेच्छाचारी ,निरंकुश और तानाशाह होना तो कदापि संभव नहीं है ।राजा से कहा गया है कि वह प्रजा से बलात कुछ न कराए (8/168)। प्रजा की इच्छा के विपरीत यदि उससे कुछ कराया जाता है तो यह भी प्रजा पर किया गया राजा का एक अत्याचार होता है । अतःराजा ऐसा हो जिसके साथ प्रजा प्रसन्नतापूर्ण व्यवहार करे । मनुस्मृति के अनुसार राजा वहीं उत्तम होता है ,जिसके रहते हुए उसकी प्रजा निर्भयता अनुभव करे । (8/303)। सब सब के साथ प्रेमपूर्ण व्यवहार करें और किसी भी स्थिति में कहीं पर भी हिंसा का खेल ना हो ,यह भी मनुस्मृति सामाजिक व्यवस्था के लिए अनिवार्य मानती है । (4/164)।

मनुस्मृति में धर्म 

आजकल धर्म को लेकर लोग बहुत भ्रांतियां हैं ।धर्म को वास्तव में न समझने की भूल हमारे वामपंथी विचारकों ने की है । उन्होंने इसे अफीम तक की संज्ञा दे डाली है ।परंतु यदि हम मनुस्मृति के अनुसार धर्म पर चिंतन करें तो पता चलता है कि धर्म के 10 लक्षण बताए गए हैं , जिनमें समस्त मानवीय व्यवहार सम्मिलित हो जाता है , यदि उन 10 लक्षणों को अपनाकर मानव अपने जीवन व्यवहार की मर्यादा स्थापित करे तो निश्चय ही संसार में शांति स्थापित हो सकती है । उस वैश्विक शांति के परिवेश में समस्त मानव समुदाय अपनी वास्तविक शारीरिक , सामाजिक और आत्मिक उन्नति कर सकता है। यही कारण है कि धर्म के 10 लक्षण करते हुए मनु महाराज ने मनुस्मृति में स्पष्ट किया है कि धैर्य, क्षमा, संयम, चोरी न करना, स्वच्छता, इन्द्रियों को वश में रखना, बुद्धि, विद्या, सत्य और क्रोध न करना (अक्रोध) – यह धर्म के 10 लक्षण है ।
नास्य छिद्रं परो विद्याच्छिद्रं विद्यात्परस्य तु।गूहेत्कूर्म इवांगानि रक्षेद्विवरमात्मन: ॥वकवच्चिन्तयेदर्थान् सिंहवच्च पराक्रमेत्।वृकवच्चावलुम्पेत शशवच्च विनिष्पतेत् ॥
अर्थ – कोई शत्रु अपने छिद्र (निर्बलता) को न जान सके और स्वयं शत्रु के छिद्रों को जानता रहे, जैसे कछुआ अपने अंगों को गुप्त रखता है, वैसे ही शत्रु के प्रवेश करने के छिद्र को गुप्त रक्खे। जैसे बगुला ध्यानमग्न होकर मछली पकड़ने को ताकता है, वैसे अर्थसंग्रह का विचार किया करे, शस्त्र और बल की वृद्धि करके शत्रु को जीतने के लिए सिंह के समान पराक्रम करे। चीते के समान छिप कर शत्रुओं को पकड़े और समीप से आये बलवान शत्रुओं से शश (खरगोश) के समान दूर भाग जाये और बाद में उनको छल से पकड़े।
नोच्छिष्ठं कस्यचिद्दद्यान्नाद्याचैव तथान्तरा।न चैवात्यशनं कुर्यान्न चोच्छिष्ट: क्वचिद् व्रजेत् ॥
अर्थ – न किसी को अपना जूठा पदार्थ दे और न किसी के भोजन के बीच आप खावे, न अधिक भोजन करे और न भोजन किये पश्चात हाथ-मुंह धोये बिना कहीं इधर-उधर जाये।
तैलक्षौमे चिताधूमे मिथुने क्षौरकर्मणि।तावद्भवति चांडालः यावद् स्नानं न समाचरेत् ॥
अर्थ – तेल-मालिश के उपरान्त, चिता के धूंऐं में रहने के बाद, मिथुन (संभोग) के बाद और केश-मुण्डन के पश्चात – व्यक्ति तब तक चांडाल (अपवित्र) रहता है जब तक स्नान नहीं कर लेता – अर्थात इन कामों के उपरांत नहाना आवश्यक है।
अनुमंता विशसिता निहन्ता क्रयविक्रयी।संस्कर्त्ता चोपहर्त्ता च खादकश्चेति घातका: ॥
अर्थ – अनुमति (= मारने की आज्ञा) देने, मांस के काटने, पशु आदि के मारने, उनको मारने के लिए लेने और बेचने, मांस के पकाने, परोसने और खाने वाले – ये आठों प्रकार के मनुष्य घातक, हिंसक अर्थात् ये सब एक समान पापी हैं।
इस प्रकार की उत्कृष्ट मानवीय सामाजिक व्यवस्था करने वाली मनुस्मृति को जिन लोगों ने भ्रांतिवश आज के समय के लिए अनुपयोगी सिद्ध करने का प्रयास किया है , उन्होंने सचमुच मनुस्मृति का गहन अध्ययन नहीं किया है। उन्होंने एकांगी और कही सुनी बातों को आधार बनाकर इस पवित्र ग्रंथ को अपयश का भागी बनाने में अपना सहयोग दिया है ।अच्छा होगा कि मनुस्मृति को गहनता से पढ़ा व समझा जाए । अगले अध्यायों में हम मनुस्मृति के उस सामाजिक चिंतन और दृष्टिकोण का विशद विवेचन करेंगे जिनको आधार बनाकर आज की सारी सामाजिक व्यवस्था का कायापलट हो सकता है । साथ ही जो लोग मनुस्मृति पर अनावश्यक आरोप प्रत्यारोप लगाते करते रहते हैं उनके ऐसे अतार्किक प्रश्नों या भ्रांतियों का निवारण करने का प्रयास करेंगे। 

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