लेखक परिचय

डॉ. कुलदीप चन्‍द अग्निहोत्री

डॉ. कुलदीप चन्‍द अग्निहोत्री

यायावर प्रकृति के डॉ. अग्निहोत्री अनेक देशों की यात्रा कर चुके हैं। उनकी लगभग 15 पुस्‍तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। पेशे से शिक्षक, कर्म से समाजसेवी और उपक्रम से पत्रकार अग्निहोत्रीजी हिमाचल प्रदेश विश्‍वविद्यालय में निदेशक भी रहे। आपातकाल में जेल में रहे। भारत-तिब्‍बत सहयोग मंच के राष्‍ट्रीय संयोजक के नाते तिब्‍बत समस्‍या का गंभीर अध्‍ययन। कुछ समय तक हिंदी दैनिक जनसत्‍ता से भी जुडे रहे। संप्रति देश की प्रसिद्ध संवाद समिति हिंदुस्‍थान समाचार से जुडे हुए हैं।

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डा० कुलदीप चन्द अग्निहोत्री

यह कथा अढाई हज़ार साल से भी पुरानी है । यह महात्मा बुद्ध के काल की कथा है ।  बकुला का मूल नाम क्या था , इसके बारे में बता पाना तो कठिन है । बौद्ध जगत में वे बकुला के नाम से ही प्रसिद्ध हैं । उनके नाम को लेकर एक कथा प्रचलित है । कहा जाता है कि बकुला प्रार्थना और ध्यान साधना में मग्न रहते थे । उन्होंने सभी सांसारिक सम्पत्तियों और एषनाओं का त्याग कर दिया था । वे सोने और बिछाने के लिए अब केवल पकुला घास का ही प्रयोग करते थे । पकुला का प्रयोग करने के कारण वे धीरे धीरे सामान्य जन में बकुल या बकुला के नाम से ही जाने जाने लगे ।
लेकिन  उनके नाम के सम्बंध में ही प्रचलित एक दूसरी कथा ज़्यादा रुचिकर है । आज से लगभग 2500 वर्ष पहले कौशाम्बी नगर में एक साधन सम्पन्न ब्राह्मण दम्पति के घर  एक बालक ने जन्म लिया । एक दिन धाय बालक को नहलाने के लिए यमुना में ले गई । नहलाते समय बालक धाय के हाथ से फिसल गया और यमुना की लहरों में बह गया । वहाँ एक बड़ी मछली ने उसे निगल लिया । स्वभाविक ही माता पिता इससे बहुत दुखी हुए । परन्तु अब किया ही क्या जा सकता था ? कुछ दूर जाकर वह मछली एक मछुआरे के जाल में फँस गई । मछली इतनी भारी थी कि किसी आम आदमी में इसका दाम चुकाने की हिम्मत कहाँ ! मछुआरे ने मछली नगर में आकर एक धनाड्य ब्राह्मण व्यापारी को बेच दी । जब रसोईघर में पाचक ने मछली को चीरा तो उसमें से एक जीवित बालक निकल आया । व्यापारी दम्पत्ति संतानहीन था । उसने बालक का लालन पालन पुत्रवत शुरु कर दिया । जैसे ही बालक के जीवित होने का समाचार फैला तो बालक के असली माता पिता को भी इसकी ख़बर हुई । उन्होंने बच्चे को लेने के लिए राजा के पास फ़रियाद की । राजा ने सारा माजरा सुन कर निर्णय किया कि बालक पर दोनों परिवारों का समान अधिकार रहेगा । दोनों परिवारों का अधिकार हो जाने के कारण बालक द्विकुल कहलाया । द्विकुल यानि दो क़ुलों का बालक । इससे ही उसका बकुला नाम प्रसिद्ध हो गया ।
बकुला दोनों परिवारों के लाड़ प्यार में पलने लगा । उसे जीवन के सारे सुख प्राप्त थे । उसने सब प्रकार की विद्याओं का अर्जन किया । समय आने पर उसका विवाह हुआ । बकुला का जीवन रथ सामान्य प्रकार से आगे बढ़ रहा था ।  बकुला अपने क्षेत्र में विलक्षण प्रतिभा के स्वामी माने जाते थे । उनकी आयु भी अस्सी साल की हो गई थी । परन्तु उनका स्वास्थ्य चमत्कारी था । अब वे संसार से उपराम रहने लगे थे । पर्वतों व अरण्यों में घूमते रहते थे । उन्हीं दिनों कपिलवस्तु के सिद्धार्थ , जो अपनी साधना और तपस्या के कारण अब बुद्ध के नाम से प्रसिद्ध हो गए थे , की ख्याति चारों ओर फैल रही थी । बुद्ध के उपदेशों ओर उनके बचनों को लेकर स्थान स्थान पर चर्चा होने लगी थी । इस परिपक्व आयु में बकुला की रुचि शाक्यमुनि बुद्ध के बचनों की ओर हुई । एक बार बकुला पर्वत पर बैठे थे । नीचे से भगवान बुद्ध जा रहे थे ।शाक्यमुनि को देख कर उनके मन में उनसे मिलने की तीव्र इच्छा जागृत हुई । लेकिन यदि वे सामान्य मार्ग से नीचे उतरना शुरु करते तो शाक्यमुनि बुद्ध तब तक  बहुत दूर जा चुके होते क्योंकि रास्ता लम्बा था । बुद्ध से मिलने की तीव्र इच्छा के चलते बकुला ने पर्वत शिखर से छलाँग लगा दी और बुद्ध के सामने जा पहुँचे । बुद्ध ने बकुला को अपने संघ में दीक्षित कर लिया ।  भिक्षु , बकुला की विलक्षण प्रतिभा से आश्चर्यचकित थे । बकुला को अपने पिछले अनेक जन्मों की कथा स्मरण थी । स्वास्थ्य तो उनका किसी युवा को भी मात करता था । उनकी तर्क शक्ति सभी को अभिभूत करती थी । बुद्ध शाक्यमुनि ने अपने अनेकों शिष्यों में से कुछ विशिष्ट शिष्यों का चयन किया था।  संघ में दीक्षित होने के आठ दिन बाद ही शाक्यमुनि ने बकुला को अपने इन चुने गए शिष्यों में शामिल कर लिया । इनकी संख्या सोलह थी । ये सभी सोलह शिष्य स्थविर या अर्हत कहलाए । संस्कृत में इन्हें अरिहंत भी कहा गया । इस प्रकार बकुला संघ में दीक्षित होते ही भगवान बुद्ध के षोडश अरिहंत समुदाय का हिस्सा बने ।
और फिर एक दिन शाक्यमुनि बुद्ध ने यह संसार छोड़ने का निर्णय कर लिया । उनके परिनिर्वाण का समय आ पहुँचा था । भगवान बुद्ध का अंतिम समय आया तो ये सभी सोलह स्थविर उनके पास उपस्थित थे । उन्होंने बुद्ध शाक्यमुनि के सम्मुख  प्रतिज्ञा की कि ,”हम धर्म की रक्षा के लिए तब तक संसार नहीं त्यागेंगे जब तक लोग आपकी शिक्षाओं से लाभान्वित होकर दुखों से मुक्ति प्राप्त नहीं कर लेते । हम तब तक इस संसार में ही धर्म का प्रचार करते रहेंगे जब तक आप बुद्ध मैत्रेय के रुप में पुनः संसार में नहीं आ जाते ।” ये सभी अरिहंत योग्यतम माने गए थे । ये निर्वाण के रास्ते पर जा सकते थे । आवागमन के बन्धन से ये मुक्त थे । लेकिन इन्होंने बहुजन सुखाय बहुजन हिताय इस का त्याग किया । धर्म की रक्षा हेतु इस मृत्युलोक में ही बने रहने का यह भीषण संकल्प लेने वाले इन सोलह स्थविरों में से एक स्थविर बकुल या बकुला भी थे । बौद्ध भित्ति चित्रों में बकुला अपने हाथ में भूरे रंग का नेवला थामे हुए हैं जो मणि माणिक्य उगल रहा है ।
भगवान बुद्ध के परिनिर्वाण के बाद अर्हत बकुला उत्तर दिशा यानि उत्तरकुरु की ओर बुद्ध बचनों का प्रचार करने के लिए निकले । सभी प्राणियों के प्रति करूणा, प्यार और दया का भाव रखना , छह परामिता की प्राप्ति , शून्यता का ज्ञान , पाँच इन्द्रियों पर नियंत्रण । इस प्रकार अस्सी साल तक वे बुद्ध बचनों का प्रचार करते रहे । परन्तु जैसा कि कहा गया है जो भी व्यक्ति इस संसार में शरीर धारण करता है , उसके शरीर का एक दिन नाश होना निश्चित है । समय आने पर इन अर्हतों के शरीर का भी नाश हुआ । लेकिन अपनी प्रतिज्ञा के अनुरूप नए शरीर में वे फिर फिर वापिस आने या अवतार धारण करने लगे । अर्हत बकुला ने भी यही किया । कहा जाता है कि देहान्त के अस्सी साल बाद बकुला ने इस संसार में फिर अवतार धारण किया । अभी तक अर्हेत बकुला के बीस अवतार हो चुके हैं । सत्रहवें , अठारहवें , उन्नीसवें और बीसवें बकुला लद्दाख में ही पैदा हुए ।
जिन कशुक बकुला की हम यहाँ चर्चा कर रहे हैं वे उन्नीसवें कशुक बकुला थे । वे लोक सभा के दो बार सदस्य रहे , जम्मू कश्मीर विधान सभा के सदस्य रहे । वहीं मंत्री भी रहे । और सबसे अन्त में मंगोलिया में भारत के राजदूत रहे ।
मंगोलिया हमारा भोगौलिक पड़ोसी नहीं लेकिन वह हमारा सांस्कृतिक पड़ोसी है । उसके साथ भारत के प्राचीन काल से सांस्कृतिक सम्बंध रहे है । आधुनिक काल में भी ये सम्बंध प्रगाढ होते रहे । जिन दिनों चीन पूरे मंगोलिया को निगलने का प्रयास कर रहा था और मंगोलिया अपनी रक्षा का प्रयास कर रहा था , उन्हीं दिनों उसने अपने इन प्रयासों में रूस के साम्यवादी शासन की सहायता ली । यद्यपि यह प्रयास आकाश से गिरकर खजूर में लटकने जैसा था लेकिन उन परिस्थितियों में शायद और कोई विकल्प नहीं था । इन्नर मंगोलिया चीन के पंजे में आ चुका था । आऊट्र मंगोलिया ने विद्रोह करके 1924 में ही वहाँ साम्यवादी सरकार स्थापित कर ली , इसलिए उसे रूस का समर्थन प्राप्त हो गया । द्वितीय विश्व युद्ध के बाद उभरे सोवियत ब्लाक ने आऊटर मंगोलिया को मान्यता देकर उसे चीन की गिद्ध दृष्टि से बचा लिया ।  सोवियत  ब्लाक के बाहर भारत पहला देश था जिसने  मंगोलिया जन गणतंत्र को राजनैतिक मान्यता दी और उसके साथ दौत्य सम्बंध स्थापित किए । उसके बाद मंगोलिया संयुक्त राष्ट्र संघ की सदस्यता के लिए प्रयास कर रहा था । लेकिन चीन इसका डट कर विरोध कर रहा था , क्योंकि चीन का कहना था कि पूरा मंगोलिया चीन का हिस्सा है । यहाँ तक कि मंगोलिया की सदस्यता का विरोध करने में दोनों चीन ( माओ का चीन और च्यांग काई शेक का चीन ) एकमत हो गए । लेकिन भारत ने उस समय मंगोलिया का डट कर समर्थन किया । कहा जा सकता है कि भारत मंगोलिया के हर सुख दुख में साथ रहा है । जिस प्रकार तिब्बत के लोगों का भारत में गहरा विश्वास है उसी प्रकार मंगोलिया के लोगों का भी भारत में गहरा विश्वास है ।
मंगोलिया के लोकसाहित्य में एक कथा शताब्दियों से प्रचलित है । एक समय ऐसा आएगा जब मंगोलिया में बौद्ध बचनों पर संकट आ जाएगा । विहार में जाने वाले भक्तों को शासक दल के लोग प्रताड़ित करेंगे । बौद्ध विहारों को गिरा दिया जाएगा । त्रिपिटकों को जला दिया जाएगा । मंगोलिया में किसी भिक्षु के दर्शन करना कठिन हो जाएगा । लेकिन निराशा का यह कठिन कालखंड ज़्यादा देर नहीं रहेगा । फिर एक दिन भारत से अर्हत बकुला के अवतार मंगोलिया में आएँगे और यहाँ पुनः बौद्ध बचनों का प्रसार होगा । मंगोलिया में जब साम्यवादी शासन शुरु हुआ तो लोगों को इस लोककथा में सत्यता का आभास होने लगा । मंगोलिया में साम्यवादी शासन के दिनों में सरकार ने पूरी तरह कोशिश की थी कि मंगोलिया से बौद्ध बचनों के प्रभाव को समाप्त कर दिया जाए । वहाँ बौद्ध विहारों पर एक प्रकार से प्रतिबन्ध ही लगा हुआ था । देश ने अपने आप को निरीश्वरवादी घोषित किया हुआ था । 1924 से ही देश पर मंगोलिया जन क्रान्तिकारी दल का एकाधिकारवादी शासन था और वह सोवियत रूस का पिछलग्गू बना हुआ था । कम्युनिस्टों ने बौद्ध धर्म ग्रन्थों को जला दिया था । मंगोलियां में तीन सौ से भी ज़्यादा मठ थे और वहाँ की एक तिहाई जनसंख्या मठों में भिक्षु थी । साम्यवादी शासन ने बौद्ध मठों को गिरा कर भिक्षुकों को वहाँ से निष्कासित कर दिया गया था । हज़ारों चीवरधारी भिक्षुकों की गोली मारकर हत्या कर दी गई ।  शासन ने भिक्षु संघों को प्रतिबन्धित कर दिया । बौद्ध दर्शन व साहित्य के अध्ययन और साधना को लगभग समाप्त कर दिया । लेकिन मंगोलिया के लोगों के ह्रदय के भीतर घर किए गए बौद्ध बचनों को मिटाना क्या इतना आसान था ? कशुक बकुला की दृष्टि सदा मंगोलिया में हो रहे बौद्ध बचनों के इस संहार की ओर ही लगी रहती थी क्योंकि तिब्बत में वे यह सब कुछ प्रत्यक्ष देख चुके थे । उन्होंने टिप्पणी भी की थी ,” बुद्ध बचनों के प्रचारक पश्चिम की ओर जा रहे हैं क्योंकि वहाँ जाना आसान भी है और सुविधापूर्ण भी । लेकिन जहां सचमुच बौद्ध बचन संकट में हैं , उधर का रुख़ कौन करता है ? क्योंकि वहाँ किसी प्रकार की सुविधा नहीं है ।  सन 1970 ई. में कशुक बकुला मंगोलिया की यात्रा पर गए । इससे पहले वे 1968 में साम्यवादी रूस की यात्रा कर आए थे । वहाँ उन्होंने बुरयात बौद्धों की दुर्दशा देखी थी । अब मंगोलिया में बौद्ध समाज का उत्पीड़न उन्होंने स्वयं अपनी आँखों से देखा । यहाँ भी वे बौद्ध मठों के भग्नावशेषों को देख रहे थे । पददलित चीवर साम्यवादियों के अत्याचारों की साक्षी दे रहे थे । मंगोलिया में उन परिस्थितियों में कशुक बकुला का आगमन साम्यवाद की तप्त हवाओं में ठंडी हवा का एक झोंका था । बुद्धम् शरणम् गच्छामि की एक मद्धम ध्वनि । मंगोलिया के लोगों ने इसे स्पष्ट सुना । शायद कशुक बकुला मंगोलिया के लोगों को अपने भविष्य में आने के प्रति आश्वस्त कर रहे थे ।
दो दशक बाद सचमुच वही घटित होने लगा जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी । बीसवीं शताब्दी का अंतिम दशक विश्व इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण दशक बन गया । सोवियत संघ में दरारें पड़नी शुरु हो गईं । लोकतंत्र की आवाज़ें उठने लगीं । देखते देखते मध्य एशिया के वे सब देश जो अब तक रूस की छाया में सिकुड़े हुए थे , वे आकार ग्रहण करने लगे । शायद मंगोलिया के लिए भी वह कालखंड आ गया था जिसकी प्रतीक्षा वहाँ के लोग शताब्दियों से कर रहे थे । भारत से कशुक बकुला के आने की प्रतीक्षा । भारत के प्रधानमंत्री राजीव गान्धी ने 1990 में कशुक बकुला को मंगोलिया में भारत के राजदूत बना कर उलान बातोर भेजा । यह काल मंगोलिया के इतिहास का संक्रमण काल था । वहाँ की साम्यवादी सरकार के ख़िलाफ़ युवा पीढ़ी का विद्रोह शुरु हो चुका था । उलान बातोर का सुखबतार चौक लोकतांत्रिक प्रदर्शनकारियों का केन्द्र बन गया था । यह सत्तर साल के साम्यवादी शासन के अन्त की पूर्वपीठिका थी । 9 मार्च 1990 तक आते आते सुखबतार  चौक पर प्रदर्शनकारियों की संख्या बेतहाशा बढ़ रही थी । साम्यवादी शासक दल के सशस्त्र बल भी सन्नद्ध थे । दोनों पक्ष आमने सामने थे । किसी समय भी हिंसा भड़क सकती थी । नर संहार हो सकता था । एक साल पहले ही चीन के तियानमेन चौक पर चीन की साम्यवादी सरकार द्वारा अपने ही प्रदर्शनकारियों का किया गया नरसंहार लोगों की स्मृति में अभी भूला नहीं था । उसकी पुनरावृत्ति यहाँ भी हो सकती थी । दोनों पक्ष आमने सामने डटे थे । कौन उनको संवाद की स्थिति में ला सकता था ? प्रदर्शनकारियों के कुछ प्रमुख लोग भारतीय दूतावास में कशुक बकुला से मिलने के लिए आए । किसी विदेशी राजदूत से सरकार विरोधी पक्ष का उस प्रकार के उत्तेजित वातावरण में मिलना कितने ही भ्रम पैदा कर सकता था । लेकिन मंगोलिया के लोगों के लिए , चाहे वे सरकारी पक्ष के हों या फिर विरोधी पक्ष के भारत विदेश था ही कहाँ ? भगवान बुद्ध की भूमि मंगोलिया के लिए विदेश कैसे हो सकती थी ? कशुक बकुला ने उनको किसी भी स्थिति में अहिंसा का रास्ता ही अपनाने के लिए कहा । उन्होंने उन्हें महात्मा गान्धी का स्मरण करवाया । उन्होंने उनकी कलाई पर मौली का अभिमंत्रित धागा बाँधा । कुछ और अभिमंत्रित धागे उन्हें दिए । कुछ देर के बाद ही सुखबतार के प्रदर्शनकारी , वे अभिमंत्रित धागे अपनी अपनी कलाई पर बाँध रहे थे । सरकार ने प्रदर्शनकारियों पर गोली न चलाने का निर्णय किया । उधर साम्यवादी पार्टी की पोलितब्यूरो की बैठक शुरु हो चुकी थी । महासचिव को हस्ताक्षर करने के लिए एक अध्यादेश दिया गया जिसमें देश में मार्शल क़ानून लागू करने और प्रदर्शनकारियों को नज़रबन्द करने का आदेश था । सरकारी टैंक एक्शन लेने के लिए तैयार थे । सेना सन्नद्ध थी । लेकिन महासचिव ने हस्ताक्षर करने से इन्कार कर दिया । उसने कहा,” मैं इस पर कभी हस्ताक्षर नहीं करूँगा । हम मंगोल संख्या में पहले ही बहुत कम हैं और अभी वह मुक़ाम नहीं आया है जहाँ हम आपस में ही एक दूसरे को लहूलुहान कर दें ।” संवाद का रास्ता खुला और इस संवाद ने बिना एक भी गोली चलाए देश का इतिहास बदल दिया । मंगोलिया में साम्यवादी शासन के अन्त की शुरुआत हो गई । उस कालखंड में जितने देश साम्यवादी शिकंजे से मुक्त हुए , उन सभी में हिंसा के चलते रक्तपात हुआ । लेकिन  मंगोलिया ही एकमात्र ऐसा देश था जहाँ बिना रक्त की एक बूँद भी बहाए सत्ता परिवर्तन हो गया । यह रहस्य आज तक बना हुआ है कि महासचिव ने ऐसा क्यों किया । कुछ लोगों का मानना है कि यह कुशोग बकुला के प्रभाव के कारण ही हुआ था ।
कशुक बकुला की नियुक्ति दो साल के लिए की गई थी लेकिन एक बार वे वहाँ जाकर रम गए तो दस साल तक वहीं भारत के राजदूत बन कर रहे । मंगोलिया में बुद्ध बचनों और विहारों को पुनर्जीवित करने में उनका सर्वाधिक योगदान रहा । साम्यवादियों द्वारा किए गए मंगोलिया के इस सांस्कृतिक विनाश को देख कर बहुत दुखी थे । वे मंगोलिया को पुनः उसके सांस्कृतिक उत्स से जोड़ने में सक्रिय हो गए । उन्होंने मंगोलिया में आते ही घोषणा कर दी थी कि मंगोलिया में भारत के सबसे पहले राजदूत तो भगवान बुद्ध ही थे । उनका आशय स्पष्ट था कि वे बुद्ध की उसी परम्परा को आगे बढ़ाने के लिए आए हैं । मंगोलिया के लोगों को भी उनका यह संदेश समझने में देर नहीं लगी , क्योंकि वे तो सहस्रों साल से बकुला के आने की प्रतीक्षा कर ही रहे थे । उनके आने मात्र से सत्तर साल का साम्यवादी प्रभाव उसी प्रकार उड़ गया जिस प्रकार तेज़ हवा चलने से बादलों का झुंड ग़ायब हो जाता है । कशुक बकुला समझ गए थे कि भिक्खुओं की नई पीढ़ी को प्रशिक्षित करने में अब अनेकों वर्ष लग जाएँगे । लेकिन एक बार दलाई लामा के आ जाने से मंगोलिया में पुनः धर्म के प्रति जन ज्वार उमड़ेगा । युवा पीढ़ी पुनः महाविहारों की ओर आकर्षित होगी और मंगोलिया अपने वास्तविक स्वरूप को प्राप्त कर लेगा , ऐसा उनका विश्वास था । पहले भी 1979 और 1982 में दलाई लामा मंगोलिया में आ चुके थे लेकिन तब देश में साम्यवादी शासन था ।  अब देश में लोकतांत्रिक प्रक्रिया शुरु हो चुकी थी । इस नए माहौल में  1991 में दलाई लामा धर्मशाला से मंगोलिया पहुँचे । लगभग सत्तर साल बाद एक बार फिर मंगोलिया में भगवान बुद्ध की जयन्ती मनाई गई । इस अवसर पर कशुक बकुला ने अवलोकितेश्वर के मंत्रों का पाठ किया । 1992 में कशुक बकुला के प्रयासों से मंगोलिया बौद्ध परिषद की स्थापना हुई । कशुक बकुला ने अनुभव किया कि यदि भगवान बुद्ध के  कुछ अवशेष मंगोलिया में लोगों के दर्शन के लिए रखे जाएँगे तो लोगों में सुप्त  चेतना पुनः जागृत हो जाएगी । उन्होंने भारत सरकार से आग्रह किया कि बुद्ध के कुछ अवशेषों को मंगोलिया में सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए रखा जाए । भारत सरकार ने उनके इस आग्रह को स्वीकार किया और पहली बार 1993 में बुद्ध के अवशेष मंगोलिया में प्रदर्शित किए गए । इससे उमड़े जन ज्वार का अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि सुदूर पठारों में भेड़ बकरियाँ चराने वाले चरवाहों से लेकर देश के राष्ट्रपति तक एक ही पंक्ति में दर्शन के लिए खड़े थे । 1994 में कशुक बकुला के प्रयासों से मंगोलिया में कालचक्र दीक्षा का आयोजन किया गया । इस अवसर पर प्रवचन के लिए एक बार पुनः धर्मशाला से दलाईलामा को आमंत्रित किया गया । मंगोलिया में बहुत लम्बे अरसे के बाद काल चक्र दीक्षा का आयोजन हुआ था । ऊपर से दलाई लामा उसमें आओ रहे थे । यह मणिकांचन संयोग ही था । उसके बाद 1995 में वे फिर मंगोलिया गए । किशोर बकुला जानते थे कि मंगोलिया में दलाई लामा का हर प्रयास वहाँ बौद्ध बचनों को पुनः जागृत करता है ।
कशुक बकुला स्वयं बौद्ध समाज में गेलुग्पा सम्प्रदाय के थे लेकिन उनका प्रयास था कि मंगोलिया के बौद्ध समाज में एकता और समरसता के लिए अन्य सम्प्रदायों के विद्वानों को भी बुलाया जाना चाहिए । इसी कारण से उन्होंने 1995 में शाक्य सम्प्रदाय के ठिपोन रिंपोछे को मंगोलिया आमंत्रित किया । रिंपोछे ने अनेक लोगों को धम्म शिक्षा दी और उन्हें भिक्खुसंघ में दीक्षित भी किया ।  कशुक बकुला मंगोलिया में दस साल तक रहे । सैकड़ों बन्द हो चुके गोम्पाओं को उन्होंने पुनः खुलवाया । अनेकों बौद्ध शान्ति सम्मेलनों का आयोजन किया ।  उनके प्रयासों से उलानबतार में बौद्ध अध्ययन के लिए एक महाविद्यालय की स्थापना की गई । महाविद्यालय के लिए भारत से बौद्ध ग्रन्थ मँगवाए गए । मंगोलिया में जो युवा भिक्खुसंघ में दीक्षित हुए उन्हें उच्च अध्ययन के लिए बकुला ने धर्मशाला और सारनाथ भिजवाया । भारत से बौद्ध विद्वानों को मंगोलिया बुलाया गया । कशुक बकुला ने बदली परिस्थितियों में सारे देश में बुद्ध बचनों का उपदेश देते हुए यात्रा की । कशुक बकुला के प्रति मंगोलिया के लोगों की श्रद्धा इतनी थी कि पुराने बुज़ुर्ग भिक्षु धरती पर लेटकर उन्हे साष्टांग प्रणाम करते दिखाई देते थे । युवा लड़के केवल उनके हस्ताक्षर और आशीर्वाद लेने के लिए पंक्तियों में खड़े रहते थे । कशुक बकुला उनकी कलाई में मौली बाँध कर आशीर्वाद देते थे ।  सत्तर साल में नष्ट हो चुकी बौद्ध परम्पराओं को पुनः जीवित करने का महत्वपूर्ण कार्य करने में कशुक बकुला की भूमिका सचमुच ऐतिहासिक ही मानी जाएगी । मंगोलिया और रुस में बौद्ध मत को पुनर्जीवित करने और उनका भारत के निर्वासित तिब्बती समुदाय से सम्पर्क स्थापित करवाने में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की । उन्होंने मंगोलिया में अनेक युवाओं को बौद्ध भिक्षु के रूप में दीक्षा दी ।  बकुला ने 1999 में उलान बतार में The Bakula Rinpoche Süm की स्थापना की । उलान बातोर में नष्टप्राय हो चुके पेठुप गोन्पा को पुनः स्थापित करने और उसे बौद्ध क्रिया कलापों का केन्द्र बनाने में बकुला ने दिन रात एक कर दिया । कालान्तर में कशुक बकुला का यह पारम्परिक मठ बौद्ध शिक्षा का एक बड़ा केन्द्र बना । मंगोलिया में बकुल रिंपोछे के बहुमूल्य योगदान को ध्यान में रखते हुए महान् मंगोलियाई भिक्षु विद्वान जावा दम्दीन ने अर्हत बकुल की स्तुति में एक काव्य रचना की, जिसे मंगोलिया के सभी बौद्ध-विहारों में पढ़ा जाता है। बकुला  रिंपोछे के सम्मान में मंगोलिया में एक विशेष थंका का निर्माण किया गया। यह थंका सम्पूर्ण मंगोलिया में अद्भुत एवं अद्वितीय है, जो आज भी वहां संरक्षित है।

 

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