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मनुस्मृति और भारतीय संविधान, भाग – 17

राज्य के नीति निदेशक तत्व और मनुस्मृति

भारत के संविधान में अनुच्छेद 36 से लेकर 51 तक राज्य के नीति निदेशक तत्वों का उल्लेख किया गया है। इन अनुच्छेदों के माध्यम से भारतीय संविधान में कुल 17 निदेशक तत्वों को स्थान दिया गया है। राज्य के नीति निदेशक तत्वों के विषय में हमको यह जानकारी होनी चाहिए कि इन्हें भारत के किसी न्यायालय द्वारा प्रवृत्त नहीं कराया जा सकता।
संविधान सभा के सलाहकार सर बी.एन. राव ने संविधान सभा को यह परामर्श दिया था कि व्यक्ति के अधिकारों को दो प्रवर्गों में विभाजित किया जाए। प्रथम वे जिन्हें न्यायालय द्वारा लागू कराया जा सकता है और दूसरे वे जिन्हें न्यायालय द्वारा प्रवृत्त नहीं कराया जा सकता। दूसरे वर्ग में ही राज्य के नीति निदेशक तत्वों को सम्मिलित किया गया। संविधान सभा के परामर्शदाता सर बी.एन. राव जी का यह विचार था कि नीति निदेशक तत्व राज्य के प्राधिकारियों के लिए एक नैतिक उपदेश के रूप में सम्मिलित किए जाएं।
श्री राव के इस सुझाव को संविधान सभा ने यथावत स्वीकार कर लिया गया था। इस प्रकार यदि राज्य के नीति निदेशक तत्वों की प्रकृति पर विचार किया जाए तो ये केवल राज्य के लिए ऐसे निर्देश हैं, जिन्हें वह नागरिकों के कल्याण के लिए अपनाने का प्रयास करेगा। यदि किन्हीं कारणों से राज्य देशवासियों की इस प्रकार की अपेक्षा पर खरा नहीं उतरता है तो इसके लिए न्यायालय उस पर कोई दबाव नहीं बना पाएगा। हमारे संविधान में राज्य के जिन नीति निदेशक तत्वों का उल्लेख किया गया है, उनका विवरण इस प्रकार है :-

अनुच्छेद 36 .राज्य की परिभाषा का वर्णन किया गया है।

अनुच्छेद 37 . इस भाग में अंतर्विष्‍ट तत्‍वों का लागू होना अनिवार्य है , ये न्यायालय द्वारा अप्रवर्तनीय हैं।
न्यायालय द्वारा अप्रवर्तनीय होना राज्य को इस बात के असीमित अधिकार देता है कि वह यदि चाहे तो नीति निर्देशक तत्वों की ओर कभी देखे भी नहीं।

अनुच्छेद 38 .राज्‍य लोक कल्‍याण की अभिवृद्धि के लिए सामाजिक व्‍यवस्‍था बनाएगा ।
विशेष कथन: राज्य लोक कल्याण की अभिवृद्धि के लिए सामाजिक व्यवस्था बनाने में कौन सी नीति अपनाएगा ? जिससे लोक व्यवस्था बने- संविधान को अच्छी प्रकार टटोलने पर भी आप कहीं से भी किसी भी अनुच्छेद में कोई ऐसा प्रावधान नहीं खोज पाएंगे, जिससे यह स्पष्ट हो कि राजा धर्म ,न्याय, नीति के अनुसार अमुक-अमुक ढंग से लोक व्यवस्था बनाने का कार्य करेगा ? यदि इस संबंध में कहीं कुछ मिलेगा तो बस केवल इतना ही मिलेगा कि अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति या और दूसरे ऐसे ही वर्गों के कल्याण के लिए राज्य आरक्षण की व्यवस्था करेगा या उन्हें आगे बढ़ाने के लिए विशेष सुविधा उपलब्ध कराएगा। यह व्यवस्था अब समाज के लिए असहनीय हो चुकी है ,क्योंकि इसमें कोई सुपरिणाम नहीं दिया है। इस प्रकार की व्यवस्था को आप सार्वकालिक नहीं कह सकते।
भारत के संविधान के अनुच्छेद 330 में लोकसभा में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए स्थान का आरक्षण किया गया है। जबकि अनुच्छेद 331 के अंतर्गत लोकसभा में आंग्ल भारतीय समुदाय का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया गया है। इसी प्रकार अनुच्छेद 332 में राज्यों की विधानसभाओं में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए स्थान का आरक्षण किया गया है। अनुच्छेद 333 में राज्यों की विधानसभाओं में आंग्ल भारतीय समुदाय का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया गया है। अनुच्छेद 336 में कुछ सेवाओं में आंग्ल भारतीय समुदाय के लिए विशेष उपबंध दिया गया है। अनुच्छेद 337 के अंतर्गत आंग्ल भारतीय समुदाय के फायदे के लिए शैक्षिक अनुदान के लिए विशेष उपबंध किया गया है। अनुच्छेद 338 में राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग , 338 क में राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग, 339 में अनुसूचित क्षेत्र के प्रशासन और अनुसूचित जनजातियों के कल्याण के बारे में संघ का नियंत्रण , अनुच्छेद 340 में पिछड़े वर्गों की दशाओं के अन्वेषण के लिए आयोग की नियुक्ति का प्रावधान किया गया है।
भारतीय संविधान में ये सारे अनुच्छेद लोक कल्याण की दृष्टि से स्थापित किए गए हैं। परंतु व्यवहार में हम समता मूलक समाज की संरचना करने के अपने संवैधानिक आदर्श को प्राप्त करने में असफल रहे हैं। ये अनुच्छेद लोक कल्याण को प्रोत्साहित करने के उपरांत भी कहीं न कहीं चुभते भी हैं।

अनुच्छेद 39. राज्य भौतिक और अभौतिक साधनों के संकेन्द्रण को रोकेगा। राज्य महिलाओं व बालकों और पुरूषों की सभी अवस्था का ध्यान रखेगा। समान कार्य के लिए समान वेतन की व्यवस्था रखी गई है।
संविधान के इस अनुच्छेद से यह स्पष्ट हो जाता है कि समान बौद्धिक स्तर सभी का नहीं होता। इसलिए सभी समान योग्यता अथवा बौद्धिक क्षमताओं के धनी भी नहीं होते। मनुष्य में बौद्धिक स्तर पर कहीं न कहीं ऊपर नीचे का अंतर होता है। इस ऊपर- नीचे के अंतर को आज की संवैधानिक व्यवस्था अथवा आज का संवैधानिक तंत्र समझने में असफल रहे हैं । जबकि मनु महाराज ने इसको वर्ण का नाम देकर स्पष्ट कर दिया कि बौद्धिक आधार पर मनुष्य के चार वर्ण होंगे। आज भी उन चारों वर्णों को यथावत स्वीकृति प्रदान की जानी अपेक्षित थी उन चारों वर्णों में से कौन व्यक्ति कब ऊपर के वर्णन में चला जाएगा और कब ऊपर से नीचे के वर्ण में आ जाएगा इस व्यवस्था को संविधान में स्थान दिया जाना अपेक्षित था जहां पर अनेक उपबंध अथवा अनुच्छेद देकर लोगों के कल्याण की बात की गई है वहां पर यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि इन वर्णों में रहने वाले लोग किस परिस्थिति में ऊपर के वर्ण में गए हुए मां लिए जाएंगे ? आरक्षण की व्यवस्था को देखकर ऐसा लगता है जैसे ऊपरी बौद्धिक क्षमताओं को जबरदस्ती नीचे की ओर धकेलने का प्रयास किया जा रहा है। इस प्रकार की व्यवस्था को संवैधानिक अन्याय ही कहा जाना चाहिए।

अनुच्छेद 39क . समान न्‍याय और नि:शुल्‍क विधिक सहायता

अनुच्छेद 40. ग्राम पंचायतों का संगठन

अनुच्छेद 41. कुछ दशाओं में काम, शिक्षा और लोक सहायता पाने का अधिकार,राज्य आर्थिक और शैक्षिक दृष्टि से पिछडे वर्गों का विशेष ध्यान रखेगा।

अनुच्छेद 42. काम की न्‍यायसंगत और मानवोचित दशाओं का तथा प्रसूति सहायता का उपबंध

अनुच्छेद 43. कर्मकारों के लिए निर्वाह मजदूरी आदि

अनुच्छेद 43क. सहकारी समितियों की स्थापना ,97 वां संविधान संशोधन, 2011

अनुच्छेद 44. सभी नागरिकों के लिए एक समान कानून व्यवस्था समान नागरिक संहिता

अनुच्छेद 45. बालकों के लिए नि:शुल्‍क और अनिवार्य शिक्षा का उपबंध

अनुच्छेद 46. अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति तथा अन्‍य दुर्बल वर्गों के शिक्षा और अर्थ संबंधी हितों की अभिवृद्धि :

महर्षि मनु को उद्धृत कर स्वामी दयानंद जी महाराज लिखते हैं : -” जितने से उन राजपुरुषों का योगक्षेम भली भांति हो और वे भली भांति धनाढ्य भी हों, उतना धन वा भूमि राज्य की ओर से मासिक, वार्षिक अथवा एक बार मिला करे और जो वृद्ध हों, उनको भी आधा मिला करें परंतु यह ध्यान में रखें कि जब तक वे जिएं तब तक वह जीविका बनी रहे, पश्चात नहीं। परंतु उनके संतानों का सत्कार व नौकरी उनके गुण के अनुसार अवश्य देवें और जिसके बालक जब तक समर्थ न हों और उनकी स्त्री जीती हो, उन सबके निर्वाह हेतु राज्य की ओर से यथा योग्य धन मिला करे, परंतु जो उसकी स्त्री व लड़के कुकर्मी हो जाएं तो कुछ भी ना मिले। ऐसी नीति राजा बराबर रखे।” ( सत्यार्थ प्रकाश 156 )
इससे स्पष्ट है कि मनुस्मृति के अनुसार विधवा पेंशन की भी व्यवस्था की गई थी।
अनुच्छेद 47. पोषाहार स्‍तर और जीवन स्‍तर को ऊंचा करने तथा लोक स्‍वास्‍थ्‍य को सुधार करने का राज्‍य का कर्तव्‍य

अनुच्छेद 48.कृषि और पशुपालन का संगठन

अनुच्छेद 48क. पर्यावरण का संरक्षण और संवर्धन और वन तथा वन्‍य जीवों की रक्षा

अनुच्छेद 49.राष्‍ट्रीय महत्‍व के संस्‍मारकों, स्‍थानों और वस्‍तुओं का संरक्षण देना

अनुच्छेद 50. कार्यपालिका से न्‍यायपालिका का पृथक्‍करण

अनुच्छेद 51.अंतरराष्‍ट्रीय शांति और सुरक्षा की अभिवृद्धि।

भारतीय संविधान में वर्णित उपरोक्त राज्य के नीति निदेशक तत्वों पर यदि विचार किया जाए तो पता चलता है कि राज्य का मुख्य उद्देश्य लोक कल्याण है। इसके लिए वह हर उस उपाय को अपनाएगा, जिससे लोक कल्याण को साधा जा सके। महर्षि मनु राजा के लिए नीति निदेशक तत्व का सृजन करते हुए कहते हैं कि राजा दण्ड के योग्य प्राणियों को दंड से साधे अर्थात दण्ड के भय से अनुशासन में रखे। मनु की यह व्यवस्था स्पष्ट करती है कि वह किसी को भी किसी दूसरे व्यक्ति अथवा व्यक्तियों के समूह पर अत्याचार करने की अनुमति नहीं देते। उनकी मनुस्मृति स्पष्ट करती है कि जो दूसरे वर्ग पर अत्याचार करने का प्रयास करेगा, उसे राजा दंड से सीधा करेगा। मनु किसी के अधिकारों को छीन कर दूसरे को देने की कोई आरक्षण जैसी व्यवस्था स्थापित नहीं कर रहे हैं। वे इस बात का प्रयास कर रहे हैं कि किसी को भी किसी दूसरे पर अत्याचार करने का अधिकार ही न हो। महर्षि मनु लोक कल्याण के लिए दण्ड को आवश्यक मानते हैं, क्योंकि दण्ड ही लोगों को अनुशासन में रखता है । इसलिए राजा को ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए कि सभी नागरिक स्वाभाविक रूप से अनुशासन का पालन करें। राजा के लिए यह भी आवश्यक है कि वह :-

अमाययैव वर्तेत न कथञ्चन मायया।
बुध्येतारिप्रयुक्ता च मायां नित्यं स्वसंवृतः ॥ 79।।

भावार्थ : राजा अथवा प्रशासनिक प्राधिकारियों के लिए यह भी आवश्यक है कि वह कभी भी प्रजाजनों के साथ छल कपट का बरताव न करें। निष्कपट होकर सबसे बर्ताव रखें।
राजा नित्य प्रति अपनी रक्षा में सावधान रहे और शत्रु अर्थात राष्ट्रद्रोही, समाजद्रोही, संस्कृतिद्रोही, धर्मद्रोही और देश की एकता और अखंडता को खतरा बने हुए लोगों के किए हुए छल कपट को जाने और उनका सही उपचार करे।
यदि राजा आरक्षण जैसी व्यवस्था के माध्यम से किसी एक व्यक्ति या व्यक्तियों के समुदाय को किसी दूसरे व्यक्ति या व्यक्तियों के समुदाय पर हावी होने के लिए व्यवस्था करता है या उसे मार्ग उपलब्ध कराता है तो यह राज्य का छल- कपट का मार्ग होगा। हमारा मानना है कि जो लोग किसी भी दृष्टिकोण से आर्थिक ,सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्र में पिछड़ गए हैं या जिनके पास विकास की किरण नहीं पहुंची है, उन्हें आगे लाना निश्चित रूप से मानवता के लिए किया गया सबसे पुण्य कार्य है। परंतु उसके लिए मानवीय दृष्टिकोण अपनाया जाना भी आवश्यक है। आरक्षण मानवीय दृष्टिकोण में नहीं आता। मानवीय दृष्टिकोण के लिए सबसे अच्छा उपाय होगा – शिक्षा में किसी भी प्रकार का भेदभाव न होने देना,। शिक्षा के माध्यम से संस्कारित मानव का निर्माण करना। नि:शुल्क शिक्षा उपलब्ध कराते हुए सभी को एक साथ शिक्षित और संस्कारित करना। जब तक कोई उद्योगपति , कोई राजनेता, कोई आईएएस अधिकारी या कोई धनी व्यक्ति अपने बच्चों को गरीबों के बच्चों के साथ अध्ययन कराने में अपना अपमान समझेगा, तब तक आप श्रेष्ठ और समतामूलक समाज नहीं बना सकते।

नास्य छिद्रं परो विद्याच्छिद्रं विद्यात्परस्य तु ।
गूहेत्कूर्म इवाङ्गानि रक्षेद्विवरमात्मनः ॥ १०५ ॥(८०)

राष्ट्र रक्षा भी राजा के लिए करणीय कर्म है। उसे राष्ट्र रक्षा के लिए हर प्रकार का उपाय अपनाने की पूरी छूट है। इस श्लोक में भी राजा के लिए एक निदेशक तत्व की स्थापना की गई है। मनु महाराज स्पष्ट व्यवस्था कर रहे हैं कि ” राजा यह सावधानी रखे कि कोई शत्रु उसके छिद्र अर्थात् कमियों को न जान सके, राजा को अपने स्वयं के, अपने राज्य के और अपने राष्ट्र के छिद्रों को अर्थात कमियों को शत्रु से छुपा कर रखने का हरसंभव प्रयास करना चाहिए अर्थात उसका गुप्तचर तंत्र बहुत मजबूत होना चाहिए ,जिससे उसकी राज्य की कमियों का शत्रु को बोध न हो। किन्तु स्वयं शत्रु राजा के छिद्रों को जानने का प्रयत्न करे, जैसे कछुआ अपने अंगों को गुप्त रखता है वैसे ही शत्रु राजा से अपनी कमियों को छिपाकर रखे और अपनी रक्षा करे ॥ 105 ॥

मनुस्मृति के आधार पर स्वामी दयानंद जी महाराज लिखते हैं- “जैसे बगुला ध्यानावस्थित होकर मच्छी के पकड़ने को ताकता है, वैसे ( ही राजा )अर्थसंग्रह का विचार किया करे, द्रव्यादि पदार्थ और बल की वृद्धि कर शत्रु को जीतने के लिए (सिंहवत् पराक्रमेत्) सिंह के समान पराक्रम करे, चीते के समान छिपकर शत्रुओं को पकड़े और समीप में आये बलवान् शत्रुओं से सुस्से के समान दूर भाग जाये और पश्चात् उनको छल से पकड़े।” (स०प्र०, समु० 6)
स्वामी दयानंद जी महर्षि मनु के धर्मशास्त्र के आधार पर राजा के लिए यह अनिवार्य कर रहे हैं कि उसे हर स्थिति में राष्ट्र की रक्षा के अपने दायित्व का निर्वाह करना चाहिए।
राजा को राज्य में उपद्रव मचाने वाले परिपंथी अर्थात डाकू और लुटेरे लोगों से भी राज्य की रक्षा करने के प्रति सावधान रहना चाहिए । समाज में शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए ऐसे लोगों की सफाई करना राज्य का महत्वपूर्ण दायित्व है।

एवं विजयमानस्य येऽस्य स्युः परिपन्थिनः ।
तानानयेद्वशं सर्वान् सामादिभिरुपक्रमैः ॥ ॥ 82, वि.म.)

अर्थात ” पूर्वोक्त प्रकार से रहते हए विजय की इच्छा रखने वाले राजा के जो शत्रु अथवा राज्य में बाधक जन साम, दान, भेद, दण्ड इन उपायों से हों उन सबको वश में करे।”
महर्षि दयानंद जी कहते हैं- “इस प्रकार विजय करने वाले सभापति के राज्य में जो परिपंथी अर्थात डाकू, लुटेरे हों उनको साम = मिला देना, दान= कुछ देकर ,भेद= तोड़फोड़ करके वश में करे । ( सत्यार्थ प्रकाश समुल्लास 6 )

योगक्षेम का साधक हो राजा

महर्षि मनु की व्यवस्था है कि राजा और राजसभासद मिलकर अप्राप्त राज्य और धन आदि की प्राप्ति की इच्छा अवश्य करें। लोक कल्याण की साधना के लिए दोनों काम ही बहुत आवश्यक हैं। यदि राजा आलसी है तो वह प्राप्त राज्य और प्राप्त धन की रक्षा नहीं कर पाता। ऐसा राजा ही वास्तव में कायर कहलाता है। जिस राजा के राज्य क्षेत्र से उसका भाग छीन लिया जाता है उस क्षेत्र के प्रजाजन कभी भी सुखी नहीं रह पाते हैं। क्योंकि उन पर दूसरा राजा मनमाने अत्याचार करता है।
स्वतंत्र भारत में भी हम देख सकते हैं कि पाकिस्तान को मजहब के आधार पर एक अलग देश के रूप में हमसे ले लिया गया तो वह भाग भी हमारा था और वहां की जनसंख्या में से एक बड़ी जनसंख्या अर्थात वहां का हिंदू समाज भी हमारा था। तब उन पर वहां के शासक वर्ग ने मनमाने अत्याचार करने जारी कर दिए। यहां तक कि 1971 में जब पाकिस्तान से अलग बांग्लादेश अस्तित्व में आया तो वहां पर भी बड़ी संख्या में हिंदू महिलाओं के साथ बलात्कार हुए और लगभग 20 लाख हिन्दू लोग मार दिए गए। यदि हम प्राप्त राज्य और प्राप्त धन की रक्षा करने में सफल हो जाते तो ऐसा कदापि नहीं होता।
मनुस्मृति के आधार पर स्वामी दयानंद जी कहते हैं- ” राजा और राजसभा अलब्ध की प्राप्ति की इच्छा, प्राप्त की प्रयत्न से रक्षा करे, रक्षित को बढ़ावें, और बढ़े हुए धन को वेदविद्या, धर्म का प्रचार, विद्यार्थी, वेदमार्गोपदेशक तथा असमर्थ अनाथों के पालन में लगावे ॥” (स०प्र०, समु० 6)

अलब्धमिच्छेद्दण्डेन लब्धं रक्षेदवेक्षया।
विरक्षितं वर्द्धयेद वृद्ध्या वृद्धं पात्रेषु निःक्षिपेत् ॥

महर्षि मनु का विधान है कि राजा अप्राप्त राज्य और धन आदि की प्राप्ति की इच्छा, प्राप्त राज्य और धन आदि की सुरक्षा सावधानीपूर्वक ध्यान लगाकर अथवा युद्ध द्वारा करे, निरीक्षण से रक्षा करे,रक्षित किये हुए को वृद्धि के उपायों से बढ़ाये, और बढ़ाये हुए धन को सुपात्रों और जनहितकारी कार्यों में लगाये ।

स्वामी दयानंद जी का अर्थ

ऋषि अर्थ- “राजाधिराज पुरुष अलब्ध राज्य की प्राप्ति की इच्छा दण्ड से, और प्राप्त राज्य की रक्षा देखभाल करके, रक्षित राज्य और धन को व्यापार और ब्याज से बढ़ा और सुपात्रों के द्वारा सत्यविद्या और सत्यधर्म के प्रचार आदि उत्तम व्यवहारों में बढ़े हुए धन आदि पदार्थों का व्यय करके सबकी उन्नति सदाकिया करें।” (सं०वि०, गृहाश्रमप्रकरण)

राजा के आठ रूपों का वर्णन

महर्षि मनु ने मनुस्मृति के नौवें अध्याय में राजा के आठ रूपों का वर्णन किया है । इस अध्याय में मनु जी ने बहुत ही उत्तमता के साथ राजा के आठ रूपों का वर्णन किया है। वास्तव में राजा को किस प्रकार जनकल्याण के कार्यों में लगा रहना चाहिए और उसके लिए क्या नीति निदेशक तत्व हो सकते हैं ? – एक प्रकार से इन आठ रूपों में महर्षि मनु ने राजा को उसके नीति निदेशक तत्व समझा दिए हैं ।

इंद्र रूप में राजा के आचरण का वर्णन करते हुए महर्षि मनु कहते हैं कि जैसे इंद्र प्रत्येक वर्ष के श्रावण आदि चारों माहों में जल बरसाता है, उसी प्रकार इंद्र के व्रत को आचरण में लाता हुआ राजा अपने राष्ट्र की प्रजाओं की कामनाओं को पूर्ण करे। यही राजा का इंद्रव्रत नामक आचरण है।
यहां पर महर्षि मनु ने राजा के लिए ‘ इंद्रव्रती ‘ होने का निदेशक तत्व प्रतिपादित किया है। दिव्य शक्तियों से हम कौन सा गुण प्राप्त कर सकते हैं ? और उसे किस प्रकार जन सेवा के लिए उपयोग में ला सकते हैं ? इसका उदाहरण महर्षि मनु ने राजा के लिए प्रतिपादित किए गए नीति निदेशक तत्वों में पहले तत्व की युक्ति इंद्र के साथ जोड़कर प्रस्तुत किया है।
वह आगे लिखते हैं कि जैसे सूर्य अपनी किरणों से 8 माह तक जल ग्रहण करता है, उसी प्रकार राजा राष्ट्र से अपने अधिकारियों के माध्यम से थोड़ा-थोड़ा कर ग्रहण करे। यही राजा का सूर्य रूप आचरण है ।
यहां पर महर्षि मनु ने सूर्य का उदाहरण देकर अपनी बात को बहुत ही सुंदरता के साथ प्रस्तुत किया है। हम सभी जानते हैं कि सूर्य धीरे-धीरे गर्मी बढ़ाता है और समुद्र से अथाह जलराशि को उठाकर आकाश में बादलों को सौंप देता है। बादल उसे समस्त वसुधा पर बरसाकर लोक कल्याण करते हैं । जिससे किसानों के खेतों में फसल लहलहा उठती है। इस उदाहरण से यह भी स्पष्ट हुआ कि राजा यदि अपने अधिकारियों के माध्यम से सूर्य की भांति थोड़ा-थोड़ा कर ग्रहण कर रहा है तो वह कर भी उसे अपने लिए नहीं रखना है अपितु उसे जनता के कल्याण के लिए लगा देना है अर्थात जैसे सूर्य से अथाह जल राशि लेकर बादल पानी बरसा देते हैं और उसे अपने लिए नहीं रखते , वैसे ही राजा भी कर के रूप में प्राप्त धनराशि को जन कल्याण पर खर्च करे। राजा के लिए यह सूर्यव्रत नीति निदेशक तत्व है।
मनु कहते हैं कि जैसे वायु सब प्राणियों में प्रविष्ट होकर विचरण करता है ,उसी प्रकार राजा को अपनी तथा शत्रु की प्रजाओं में गुप्तचरों द्वारा सर्वत्र प्रवेश रखकर राज्य संबंधी सभी गतिविधियों का ज्ञान करना चाहिए। यही राजा का वायुरूप आचरण अर्थात नीति निदेशक तत्व है ।
मनु की मान्यता है कि जिस प्रकार यम अर्थात ईश्वर की नियामक शक्ति अर्थात कर्मफल का समय आने पर प्रिय और शत्रु सबको अपने वश में करके यथायोग्य दंडित करता है, राजा को उसी प्रकार अपराध करने पर प्रिय – शत्रु सभी प्रजाओं को न्यायपूर्वक पक्षपात रहित दण्ड देना चाहिए। यही राजा का यमव्रत अर्थात नीति निदेशक तत्व है।
राष्ट्र में अराजकता फैलाने वाले लोग अपराधी कहलाते हैं। पापी कहलाते हैं। उन पर नियंत्रण स्थापित करना राज्य का सर्वोपरि कार्य है। वास्तव में इसी प्रकार के अपराधी और पापी लोगों का अंत करने के लिए ही राज्य की उत्पत्ति हुई थी। मनु महाराज इन्हीं पर नियंत्रण स्थापित करने के लिए राजा बनाए गए थे। इसीलिए मनु जी कहते हैं कि जिस प्रकार अपराधी मनुष्य वरुण के द्वारा पाशों से अर्थात जलीय या समुद्र की तरंगों भंवरों रूपी बंधनों में फंसकर जैसे मनुष्य बंधा जकड़ा हुआ दिखता है अर्थात अवश्य जकड़ा जाता है, उसी प्रकार राजा भी पापियों, अपराधियों को सुधारने तक साम, दाम ,भेद, दण्ड आदि से वश में करके रखे या बंधन में अर्थात कारागार में डालकर रखे, यही राजा का वरुणव्रत अर्थात राज्य का एक नीति निदेशक तत्व है।
चंद्रमा की कांति हम सबके लिए बहुत उपयोगी होती है। उसकी चांदनी पर लोगों ने अनेक कविताएं बनाई हैं। उसके रूप पर भी लोगों ने अनेक कविताओं की रचना की है।
उसका स्वरूप भी हमको प्यारा लगता है और उसकी कांति भी प्यारी लगती है। इसी को दृष्टिगत रखते हुए महर्षि मनु कहते हैं कि राजा को भी चंद्रमा की भांति अपनी प्रजा के मध्य लोकप्रिय होना चाहिए। इसी अध्याय में महर्षि मनु यह भी व्यवस्था देते हैं कि जिस प्रकार पूर्ण प्रकाशित चंद्रमा को देखकर मनुष्य प्रसन्न होते हैं, पूर्णिमा का चंद्रमा सबको प्रिय लगता है, उसी प्रकार जिस राजा को पाकर और देखकर उसके द्वारा प्रदत्त सुखों से प्रजाजन या नागरिक जन स्वयं को हर्षित अनुभव करें, वह राजा का चंद्रव्रत है अर्थात एक नीति निदेशक तत्व है कि राजा को भी चंद्रवत होना चाहिए।
राजा पापियों में अर्थात पाप करने वालों के लिए सदैव संतापित करने वाला और तेज से प्रभावित कर भयभीत करने वाला होना चाहिए। यह आवश्यक नहीं है कि राजा के साक्षात उपस्थित होने पर ही पापी अपने आप को दु:खी देखे बल्कि राष्ट्र में तेजस्वी राजा का होना ही पर्याप्त होना चाहिए। यदि वह है तो किसी भी पापी को पाप करने का साहस नहीं होना चाहिए। दुष्ट मंत्री, मांडलिक राजा आदि को दंडित करने वाला भी होना चाहिए । यही राजा का आग्नेयव्रत अथवा राज्य का एक नीति निदेशक तत्व कहा गया है।
अंत में महर्षि मनु कहते हैं कि जिस प्रकार धरती सब प्राणियों को बिना किसी भेदभाव अर्थात समानभाव से धारण करती है, सबके प्रति समानता का दृष्टिकोण अपनाती है, किसी से किसी प्रकार का भेदभाव नहीं करती , उसी प्रकार समान भाव से सभी प्राणियों का धारण पोषण करने वाले राजा का समान व्यवहार होना चाहिए। उसकी सोच में और उसकी नीतियों में किसी प्रकार का पक्षपात नहीं होना चाहिए जाति, मजहब, लिंग के आधार पर लोगों में भेदभाव नहीं होना चाहिए।
वास्तव में महर्षि मनु ने इस व्यवस्था को देकर समता मूलक समाज की संरचना के लिए राजा के दृष्टिकोण को सर्वसमावेशी बनाने के लिए महत्वपूर्ण नीति निदेशक तत्व प्रतिपादित किया है । राजा यदि स्वयं अपने प्रजाजनों के प्रति समान भाव रखेगा तो सब प्रजाजन भी एक दूसरे के प्रति सदाशयता का भाव रखेंगे । इसी से समाज में समरसता का माहौल बनेगा। जब समान नागरिक संहिता में राजा का स्वयं का विश्वास होगा तो उसके राज्य में किसी भी प्रकार का पक्षपात नहीं होगा, यह राजा का पार्थिव व्रत होता है।
महर्षि मनु कहते हैं कि राजा इस प्रकार का आचरण करता हुआ सदा राजधर्म में स्वयं को संलग्न रखे सभी राजकर्मचारियों को भी प्रजा के हित में लगाए रखे। हमने यहां पर मनु द्वारा प्रतिपादित कुछ नीति निदेशक तत्वों की बानगी प्रस्तुत की है और साथ ही अपने संविधान में स्थापित किए गए राज्य के नीति निदेशक तत्वों को भी संक्षिप्त स्थान दिया है। दोनों के मौलिक अंतर को समझ कर अपने आप स्पष्ट हो जाएगा कि महर्षि मनु की व्यवस्था ही उत्कृष्ट सिद्ध होती है।