बेकाबू माओवादी-घबराई सरकार:फिर कैसे हो समाधान

-तनवीर जाफरी

माओवादी अथवा नक्सली हिंसा के विरुद्ध केंद्र सरकार का कुछ राज्‍य सरकारों के सहयोग से चलाया जाने वाला आप्रेशन ग्रीन हंट जारी है। इस आप्रेशन ग्रीन हंट के परिणाम अप्रत्याशित रूप से जो सामने आ रहे हैं वह आश्चर्यचकित कर देने वाले हैं। आप्रेशन ग्रीन हंट का संचालन करने वाला केंद्रीय गृह मंत्रालय इस आप्रेशन को लेकर कांफी चिंतित, परेशान तथा किसी अंतिम निर्णय पर न पहुंचता हुआ साफ दिखाई दे रहा है। उधर नक्सली छापामारों के योजनाबद्ध हमलों ने सुरक्षा बलों के मनोबल को भी एक दो नहीं बल्कि कई बार काफी बड़ा धक्का पहुंचाया है। दंतेवाड़ा में 76 सुरक्षा बलों के जवालों की एक साथ हत्या कर देना इस देश की कोई छोटी-मोटी घटना नहीं है। यदि यह घटना सीमापार घुसपैठियों से मुठभेड़ के दौरान घटी होती तो या तो पड़ोसी देश के साथ युद्ध छिड़ गया होता या हम युद्ध के करीब पहुंच गए होते। परंतु दंतेवाड़ा घटना के बाद भी यही देखा गया है कि नक्सलियों ने अपने योजनाबद्ध हमले तो पूर्ववत् जारी रखे जबकि सुरक्षा बल, इनके अधिकारी, केन्द्र व राज्‍य सरकार एक-दूसरे पर आरोप मढ़ते, एक दूसरे को जिम्मेदार ठहराते तथा पूरी तरह बेचैन व व्याकुल नजर आए।

यह तो थी सरकार द्वारा संचालित आप्रेशन ग्रीन हंट के मोर्चे की संक्षिप्त स्थिति। उधर दूसरी ओर बौध्दिक स्तर पर भी सरकार विचलित तथा बिना किसी निर्णय पर पहुंचती हुई प्रतीत हो रही हैं। जब-जब माओवादियों अथवा नक्सलियों के विरुद्ध सशस्त्र कार्रवाई की बात होती है उसी समय देश में चारों ओर से कुछ ऐसी आवाजों सार्वजनिक रूप से उठने लगती हैं जिनके बारे में यह कहा जाने लगा है कि यह माओवादी अथवा नक्सलियों के समर्थन में उठाई जाने वाली आवाजों हैं। गरीबों व भूमिहीनों के मध्य जाकर अपना काफी समय गुजारने वाली तथा माओवाद व नक्सलवाद की जड़ों व इनकी जमीनी हकीकतों से स्वयं रूबरू होने वाली लेखिका अरुंधति राज्‍य के विरुद्ध तो खुलकर कुछ तथाकथित बुध्दिजीवी जहर उगलने लग जाते हैं। क्योंकि शायद अरुंधति राय भूमिहीनों एवं शोषित समाज के वास्तविक तथा डरावने पक्ष को बड़ी बेबाकी तथा निष्पक्षता के साथ समाज व सरकार के समक्ष रख देती हैं। संभवत: यही उनका सबसे बड़ा कुसूर है। पिछले दिनों प्रधानमंत्री की बहुचर्चित प्रेस कांफ्रेंस में भी प्रधानमंत्री से कुछ ऐसे प्रश् किए गए जो अरुंधति राय की ओर उंगली उठा रहे थे। बहरहाल वास्तविकता से रूबरू होना यादा बेहतर है बजाए इसके कि वास्तविकता पर पर्दा डाला जाए तथा इसे भीतर ही भीतर पनपने का तथा इनकी जड़ों को और अधिक फैलने का अवसर दिया जाए।

माओवादियों द्वारा चिन्हित लाल गलियारा कोई आज या कुछ दिनों पूर्व चिन्हित किया गया नया गलियारा नहीं है। गत तीन दशकों से यह माओवादी अपने इस रेड कारिडोर पर न केवल अपना नियंत्रण माबूत करते जा रहे हैं बल्कि इसके क्षेत्र में निरंतर वृद्धि भी करते जा रहे हैं। पूरा देश यह भली-भांति जानता है कि माओवादी अथवा नक्सलवादी उन्हीं स्थानों पर अपनी दस्तक देते हैं जहां न्याय के बजाए अन्याय का बोलबाला होने लग जाता है। जहां इंसान गरीबी,भुखमरी, साहुकारी, पूंजीवाद तथा बड़े जमींदारों के जुल्मो-सितम का शिकार होने लग जाता है। और पेट से भूखे उसी परिवार को कभी बलात्कार जैसे घृणित दौर से भी गुजरना पड़ता है। ऐसी विषम एवं दर्दनाक परिस्थितियां ही माओवादी हिंसा को अपने आप दावत देती हैं क्योंकि इनके अनुसार इनकी सशस्त्र संघर्ष की शैली तथा विचारधारा शोषित समाज को तत्काल न्याय दिलाने का प्रयास करती है। प्रश् यह है कि यदि कोई लेखक या कोई बुद्धिजीवी माओवादियों द्वारा चलाए जाने वाले एक सशस्त्र संघर्ष की जमीनी हंकींकतों को उजागर करे अथवा इनपर विस्तृत रौशनी डाले या उस शोषित समाज से जाकर मिले तथा उनसे की गई अपनी वार्तालाप के आधार पर कुछ ऐसे कड़वे सच को उजागर करे जो सरकार या शहरी तथाकथित सभ्य समाज सुनना भी पसंद नहीं करता तो क्या ऐसे लेखक को हम देशद्रोही, राष्ट्रद्रोही अथवा माओ या नक्सली समर्थक होने आदि की उपाधियों से नवाज दें?

हिंसा का निश्चित रूप से किसी भी सभ्य मानव समाज में कोई स्थान नहीं है। हिंसा में लिप्त माओवादियों अथवा नक्सलवादियों के विरुद्ध निश्चित रूप से सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए। परंतु मेरे एक लाईन में इतना लिख देने मात्र से तो क्या बल्कि केंद्रीय गृहमंत्री पी चिदम्बरम द्वारा अपनी एड़ी-चोटी का जोर लगा देने के बावजूद भी क्या ऐसा संभव हो सका है कि ऑप्रेशन ग्रीन हंट के माध्यम से इनके विरुद्ध कोई निर्णायक लड़ाई सरकार द्वारा लड़ी जा सके? यह माओवादियों या नक्सलियों का पक्षपात नहीं बल्कि एक शाश्वत सत्य है कि इन्हें हमारे सुरक्षा बल अथवा सेना के द्वारा नियंत्रित हरगिज नहीं किया जा सकता। क्योंकि यह कोई संगठित बल अथवा संगठित सेना नहीं बल्कि शोषित समाज की वह आवाज है जो अपने मूल अधिकारों- रोटी, कपड़ा और मकान की खातिर तथा चैन से जीने देने के अधिकार के लिए, अपने अस्तित्व व मान-सम्मान के लिए समय-समय पर उठती ही रहती है। परंतु सरकारें इस ओर गंभीर होने के बजाए उल्टे उन्हीं रास्तों पर आगे बढ़ती जाती हैं जो रास्ते इस शोषित समाज को फायदे के बजाए कहीं न कहीं नुंकसान ही पहुंचाते रहते हैं।

हमारे पड़ोसी देश नेपाल में माओवादी सत्ता तक पहुंच गए। इस राजनैतिक घटनाक्रम के बाद माओवाद के आलोचक अपनी छातियां तो जरूर पीटते दिखाई दे रहे हैं। परंतु इस हंकींकत को फिर भी नजरअंदाज करना चाह रहे हैं कि आखिर कौन सी ऐसी परिस्थितियां थीं जिन्होंने नेपाल में माओवादियो को इस हद तक माबूत कर दिया। राजशाही के तमाम पक्षधर भारत में वावैला करते फिर रहे हैं। परंतु उन्हें यह नजर नहीं आता कि राजशाही के दौरान पूरे नेपाल में विकास के नाम की ईंट काठमांडू के अतिरिक्त किसी भी दूसरे शहर में नहीं लगाई गई। अन्यथा आज भारत जैसे पड़ोसी देश का आम आदमी भी नेपाल में काठमांडू के अतिरिक्त किसी और शहर के नाम से भी ारूर वाक़िफ होता। आंखिरकार शेष नेपाल की उपेक्षा ने ही माओवाद को माबूत किया तथा उनकी बातों को वहां की आम जनता ने भी आम चुनावों के दौरान सुना व सराहा। और अब नतीजा सामने है। राजशाही धाराशायी हो चुकी है तथा माओवादी सत्ता पर अपनी पकड़ और अधिक माबूत करने जैसी राजनैतिक जुगत में लगे हुए हैं। लिहााा भारत की केंद्र व राज्‍य सरकारों को भी पड़ोसी देश नेपाल के इस घटनाक्रम से सबंक लेने की बहुत सख्त ारूरत है।

माओवादियों के विषय में यह कहा जाता है कि वे हमारे देश की शासन व्यवस्था को ही स्वीकार नहीं करते। परंतु उनसे यह भी पूछा जा सकता है कि आखिर वे इस व्यवस्था को स्वीकार क्यों नहीं करते। इस व्यवस्था में उन्हें क्या खामियां नजर आती हैं। और यदि वह खामियां जाया हैं तो उन्हें सुधारने अथवा उनका परिवर्तन करने में हमें क्या एतराज है। माओवादियों अथवा नक्सलियों की तो बात ही छोड़िए, हमारे देश का आम आदमी चाहे वह शहरी हो या ग्रामीण, गरीब हो या मध्यमवर्गीय, छात्र हो या मजदूर, किसान अथवा अन्य कामगार। जरा उसी से निष्पक्ष रूप से यह पूछिए कि क्या वह हमारे देश की वर्तमान लचर व्यवस्था से खुश है? हालांकि मैं फिल्में वग़ैरह देखकर अपना समय बर्बाद करने का आदी नहीं हूं फिर भी मेरे एक मित्र ने मुझे लाल सलाम नामक एक फिल्म की सीडी लाकर दी। मैंने पूरी फिल्म बहुत गौर से देखी तथा उस फिल्म का अनुत्तरित अंत भी देखता रह गया। दरअसल वह फिल्म माओवाद अथवा नक्सलवाद के बुनियादी कारणों का एक जीवंत उदाहरण थी। तमाम लोग इसी प्रकार के दबाव में आकर विद्रोही या बागी बन जाते हैं। परिस्थितियां ही प्राय: किसी व्यक्ति को मरने या मारने पर मजबूर कर देती हैं। ऐसे में मेरे विचार से तो इस बात की कल्पना करना ही छोड़ देना चाहिए कि माओवाद, नक्सलवाद अथवा गरीबों, भूमिहीनों तथा शोषित समाज के पक्ष में उठाई जाने वाली किसी भी आवाज को किसी जवाबी हिंसा या किसी ग्रीन ऑप्रेशन हंट जैसे सरकार प्रायोजित ऑप्रेशन से दबाया जा सकता है। इस संबंध में माओवादियों को हथियार व बारूद पहुंचाने वाले अपने ही सुरक्षा बलों जैसे स्रोतों को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। जिस प्रकार यह लोग निहत्थे किसानों, गरीबों व भूमिहीनों के बुजुर्गों, औरतों व बच्चों को अपने आगे रखते हैं जैसा कि ऑप्रेशन लालगढ़ के दौरान देखने को मिला, वह भी इनकी रणनीति का एक बहुत अहम हिस्सा है। इसका सीधा अर्थ सरकार व सुरक्षा बलों को समझना चाहिए। अपनी इस रणनीति के द्वारा वे यह स्पष्ट संदेश देना चाहते हैं कि सुरक्षा बलों का सामने वे लोग हैं जिनके लिए वे संघर्ष कर रहे हैं। यानि यदि सुरक्षा बलों को सशस्त्र माओवादियों या नक्सलियों पर गोलियां चलानी हैं तो सबसे पहले निहत्थे शोषित समाज को ही निशाना बनाना पड़ेगा।

पिछले दिनों माओवादियों की ओर से कुछ ऐसे समाचार जरूर आने शुरु हुए हैं जो सरकार तथा आम लोगों में चिंता पैदा करने वाले हैं। कहां तो यह लोग सरकार तथा व्यवस्था के विरुद्ध अपना परचम बुलंद करने की बात किया करते थे और कहां अब इन्होंने आम बेगुनाह भारत वासियों को भी निशाना बनाना शुरु कर दिया है। मिदनापुर के पास हुए ट्रेन हादसे में इन्हीं को जिम्मेदार माना जा रहा है। दंतेवाड़ा में इन्होंने आम यात्रियों की एक बस को अपना निशाना बनाया जिसमें सुरक्षा बलों के जवानों के अतिरिक्त कई आम नागरिक भी मारे गए। और अब अपुष्ट रूप से कुछ ऐसी खबरें भी आ रही हैं कि पाकिस्तान में बैठे लश्कर-ए-तैयबा जैसे आतंकवादी संगठनों से इनकी सांठगांठ चल रही है। ऐसे सभी समाचारों ने माओ व नक्सली आंदोलन की नीतियों व सिध्दांतों पर प्रश् चिन्ह लगा दिया है। ऐसी ख़बरें इस आंदोलन को उन लोगों की नारों से भी गिरा सकती हैं जोकि शोषित समाज के पक्ष में समय-समय पर अपनी आवाजों उठाते रहते हैं। इन विद्रोहियों को तो सरकार से शांतिपूर्ण वार्ता की मो पर बैठकर पूरी ईमानदारी व पारदर्शिता से शोषित समाज के अधिकारों पर तथा उन्हें उनके अधिकार तथा उनसे मिलने वाले लाभ उन तक सीधे तौर पर कैसे पहुंचाए जाएं, इस विषय पर खुली चर्चा करनी चाहिए। उनके द्वारा चलाया जाने वाला सशस्त्र आंदोलन आंदोलनकारियों को भले ही कुछ राहत पहुंचाता हो परंतु ऐसी हिंसक घटनाएं किसी भी समस्या का स्थायी समाधान तो हरगिज नहीं होतीं। उधर सरकार को भी यह बात पूरी तरह समझ लेनी चाहिए कि जब तमक भूखा इंसान रहेगा, धरती पर तूंफान रहेगा।

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