लेखक परिचय

लोकेन्द्र सिंह राजपूत

लोकेन्द्र सिंह राजपूत

युवा साहित्यकार लोकेन्द्र सिंह माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में पदस्थ हैं। वे स्वदेश ग्वालियर, दैनिक भास्कर, पत्रिका और नईदुनिया जैसे प्रतिष्ठित संस्थान में अपनी सेवाएं दे चुके हैं। देशभर के समाचार पत्र-पत्रिकाओं में समसाययिक विषयों पर आलेख, कहानी, कविता और यात्रा वृतांत प्रकाशित। उनके राजनीतिक आलेखों का संग्रह 'देश कठपुतलियों के हाथ में' प्रकाशित हो चुका है।

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-लोकेन्‍द्र सिंह

या तो हमारी सरकार का खून सूख गया है या फिर उसकी नक्सलियों से कोई गुप्त संधि है। वरना इतने बेगुनाहों का खून सड़कों पर, रेल की पटरियों पर और छोटे से घर के बाहर बने नाले में बहते देख सरकार का हृदय पिघलता जरूर। वह सिर्फ बातें नहीं करती, कुछ कड़े कदम भी उठाती। हाल ही की तीन बड़ी घटनाओं ने पूरे देश को हिला कर रख दिया है। और उन निरीह गरीबों की तो जान कलेजे में हैं जहां नक्सलियों की सरकार खुल के चलती है। जिसकी चाहे जान ले लेते हैं, चाहे जिस बच्चे को उठाकर ले जाते हैं उसके निश्छल मन में अपनी ही मिट्टी और अपने ही लोगों के खिलाफ बैर भर देते हैं। पिछले दिनों मामला सामने आया था कि एक लड़की ने नक्सलियों की शैतानी सेना में शामिल होने से इनकार किया तो इन्हीं नक्सलियों ने उसके साथ सामूहिक बलात्कार किया। सात-आठ माह पुरानी घटना है किसी व्यक्ति के समूल परिवार (जिसमें मासूम दूध पीते बच्चे भी शामिल थे) को झौंपड़े के अंदर बंद कर आग से जला दिया। कारण बताया कि उस परिवार के एक व्यक्ति ने उनकी मुखबरी की थी। माना की भी हो तो उन मासूमों का क्या दोष था जो अभी अपनी मां को मां और पिता को बाप भी नहीं कहना सीख पाए थे। और दंतेवाड़ा में ७० जवान की हत्या, उसके बाद बस में विस्फोट कर ३५ लोगों की जान ली और अब रेल को खून से लाल करके करीब सवा सौ लोगों की जिंदगी छीन ली। माफ करना सवा सौ लोगों की जिंदगी नहीं संख्या और अधिक है। उनकी भी मौत हुई है जो इनसे प्रेम करते थे, जो इन पर आश्रित थे।

कौन है नक्सली- ‘नक्सलियों’ का अर्थ में उन लोगों से लगाता हूं ‘जिनकी नस्ल खराब हो गई है।‘ इनका कहना है कि इन्होंने हथियार गरीब और वंचितों के लिए उठाए हैं (शायद उन्हें जान से मारने के लिए)। लेकिन हकीकत यह है कि ये डाकू हैं, लुटेरे हैं, लूट-लूट के खाना पसंद करते हैं। यदि किसी ने इनकी बात नहीं मानी तो वो चाहे गरीब ही क्यों न हो वे उसे मार डालते हैं, इतना ही नहीं उसके परिवार का समूल नाश भी करने से नहीं चूकते। ये नहीं चाहते कि पिछड़े क्षेत्रों में विकास हो। तभी रेल की पटरियां उखाड़ते हैं, सड़कें खोदते हैं, स्कूल भवन को बम से उडाते हैं। इतना ही नहीं कहीं उन गरीबों के बच्चे पढ़-लिख कर समझदार न हो जाएं (हो गए तो इनके खिलाफ आवाज बुलंद करेंगे) इसलिए ये बच्चों को पढ़ाने आने वाले मास्टर को ही उठवा लेते हैं और क्रूरता से उसकी हत्या कर देते हैं। इन्हें ही कहते हैं हम नक्सली।

इनके पैरोकार- इस देश में सब तरह के लोग हैं। आंतकवादी का सम्मान करने वालों से लेकर इन खूनी दरिंदों के लिए चिल्ला-चिल्लाकर गला और लिख-लिखकर कलम की स्याही सुखाने वाले भी। ये ऐसे इसलिए कर पाते हैं क्योंकि इनके भीतर की भी मानवीय संवेदनाएं मर गईं हैं। साथ में इस देश के प्रति प्यार भी नहीं बचा। और कभी नक्सलियों ने इनके घरों के दुधमुहें बच्चों को गोली नहीं मारी, वरना ये तथाकथित सेक्यूलर ऐसा कभी नहीं कह पाते।

सरकार जाग जाए वरना….. अब हद हो चुकी है। जनता और नहीं सहेगी। जनता खून से भरे गले से रो-रोकर कह रही है कोई है जो इन दुष्टों को भी फांसी देगा, कोई है जो इन्हें भी बुलेट को जबाव बुलेट से देगा। अगर सरकार ने नक्सलियों को खत्म करने के लिए हथियार नहीं उठाए तो मजबूरन भोली जनता को ये कदम उठाना पड़ेगा। और जब जनता उठाएगी तो फिर सरकार को भी नहीं छोड़ेगी। क्योंकि वे भोले मानुष सरकार से भी त्रस्त हैं। पंजाब में उग्रवाद का खात्मा करने के लिए जैसे कठोर निर्णय लेने पड़े थे वैसे ही खूनी हो चुके नक्सलवाद को खत्म करने के लिए लेने होंगे।

3 Responses to “नक्सलवाद : उफ! कोई इन्हें भी फांसी दे दे”

  1. पंकज झा

    पंकज झा.

    बहुत अच्छा आलेख…..आक्रोश की सच्ची अभिव्यक्ति.

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  2. डॉ. महेश सिन्‍हा

    महेश सिन्हा

    सरकार बुद्धिजीवियों के हाथ में है .बुद्धिजीवी मानवाधिकारी हैं . जंगल और ट्रेन में गरीब रहते हैं . उनका कोई माई बाप नहीं क्योंकि उनके पास केवल एक वोट होता है और सरकार चलने वाले उन्हें खरीद लेते हैं .

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  3. Dr. Purushottam Meena

    श्री लोकेन्द्र सिंह जी आपने अपनी बात शानदार तरीके से प्रस्तुत की है। आपके लेखन में युवा मन का जोश और राजपूती संस्कारों का प्रतिबिम्ब साफ झलक रहा है। हिंसा का किसी को भी समर्थन नहीं करना चाहिये। इस बात को हर कोई समझता है, लेकिन हालात बिगड जाने पर निरीह व्यक्ति भी हथियार उठा लेता है। आपने अपने लेख के अन्त में निम्न शब्दों में इस बात का खुलकर समर्थन करते हुए लिखा है कि-

    अगर सरकार ने नक्सलियों को खत्म करने के लिए हथियार नहीं उठाए तो मजबूरन भोली जनता को ये कदम उठाना पडेगा। और जब जनता उठाएगी तो फिर सरकार को भी नहीं छोडेगी। क्योंकि वे भोले मानुष सरकार से भी त्रस्त हैं।

    आपने जिन हालातों में सरकार के विरुद्ध हथियार उठाने के बात कही है, उनसे भी बदतर हालातों में शुरूआत में अर्थात्‌ चालीस वर्ष पूर्व नक्सलियों ने सरकार के खिलाफ हथियार उठाये थे, ऐसा नक्लवाद को गहराई से समझने वाले तटस्थ लोगों का स्पष्ट रूप से मानना है। जिसमें सच्चाई है। आपने भी सरकार के खिलाफ हथियार उठाने की सम्भावना जतलाई है।

    यहाँ सवाल यह है कि सरकार कौन है? क्या बेचारे पुलिस वाले सरकार हैं? नहीं सरकार तो राष्ट्रपति, प्रधानमन्त्री, मुख्यमन्त्री, मन्त्री हैं और इन सबके अधिकारों का उपयोग करते हैं प्रशासनिक अधिकारी, जिनके खिलाफ आपके द्वारा उल्लेख की गयी जनता चाहकर भी हथियार नहीं उठा सकती है, क्योंकि इन सबको पुख्ता सुरक्षा उपलब्ध करवाने के लिये गरीब से गरीब व्यक्ति से कर वसूला जाता है! गरीब को पानी मिले न मिले लेकिन इन लोगों के लिये बोतल बन्द पानी जरूर मिलता है! किसी गरीब को डॉक्टर देखे या नहीं, लेकिन उक्त सरकार चलाने वालों को देखने के लिये, उनके निवास पर जरूर हाजिरी देता है! ऐसे में आप किसके विरुद्ध हथियार उठाने की बात कर रहे हैं।

    अन्तत: व्यथित और पीडित व्यक्ति को हर वह व्यक्ति ही अपना दुश्मन नजर आने लगता है, जो तमाशबीनों की फौज में शामिल है। आप बडे-बडे समाचार-पत्रों से जुडे हुए हैं, आपने या आपके समाचार-पत्र ने कभी किसी गरीब की बेटी के बलात्कार की खबर को अपने समाचार-पत्र की हैड लाइन बनाया है? शायद कभी नहीं, यदि कौशिश भी की होगी तो आपके बॉस लोगों ने इसकी स्वीकृति नहीं दी होगी, लेकिन जब किसी अधिकारी या मन्त्री या धन कुबेर से जुडी ऐसी घटना होती है, तो न मात्र उसे जोर-शोर से मीडिया द्वारा उठाया जाता है, बल्कि लगातार कई दिनों तक उछाला जाता है। बहसें आयोजित की जाती हैं। विशेषज्ञों के लेख प्रकाशित किये जाते हैं।

    आपको बतलाना जरूरी समझता हँू कि डँूगरपुर, बांसवाडा, छाबुआ आदि आदिवासी क्षेत्रों में रोजाना अनेक आदिवासी लडकियों व औरतों के साथ बलात्कार होता है, लेकिन न तो पुलिस उनकी रिपोर्ट लिखती है, न डॉक्टर उनका चैकअप करता है और तो और उनके बीच से चुनकर जाने वाले उनके स्वयं के जन प्रतिनिधि भी बलात्कारियों के साथ खडे नजर आते हैं! यदि कोई पीडिता अपने परिजनों को आपबीति सुनाती भी है और यदि उसके भाई, पिता या पति द्वारा आतताईयों के विरुद्ध आवाज उठाई जाती है, तो ऐसे परिजनों को चोरी, बलवा, डकैती की साजिश, लूट आदि किसी भी अपराध में पकड कर जेल भिजवा दिया जाता है और ऐसे मामलों को आप जैसे लोग खूब नकम-मिर्ची लगाकर अपने समाचार-पत्रों में बिना ये जाने कि सच्चाई क्या है, प्रकाशित करते हैं। पुलिस की कहानी को सच्ची मानकर, ऐसे लोगों को गम्भीर अपराधी सिद्ध कर दिया जाता है, लेकिन इनमें से अधिकतर चार-पाँच या दस वर्ष बाद अदालत द्वारा निर्दोष करार दे दिये जाने पर जेल से छूट जाते हैं। इनके बारे में मीडिया के लोग एक शब्द भी लिखना जरूरी नहीं समझते हैं। जब ये निर्दोष लोग लौटकर आते हैं, तो ऐसे लोगों की पत्नी किसी और की रखैल बनकर कई बच्चों को जन्म दे चुकी होती है। उनकी खेती की जमीन पर किसी और का कब्जा हो चुका होता है। उनका घर जलाकर राख कर दिया होता है। गाय, बैंस, बकरी, बैल आदि का कहीं अता-पता नहीं चलता है। इसके अलावा जेल से बरी होकर आने के बाद भी ऐसे व्यक्ति के ललाट पर अपराधी होने का दाग लग चुका होता है।

    मेरी जानकारी के अनुसार बिना कारण और निर्दोष होकर भी अपने जीवन के अनेकों वर्ष जेल में गुजार देने वालों के पुनर्वास या उनको मुआवजा दिलाने या देने के लिये सरकार की ओर से कोई योजना नहीं चलाई जा रही है।
    ऐसे में, ऐसे व्यथित व्यक्ति से आप जैसे जोशीले युवा पत्रकार या एक जिम्मेदार नागरिक की हैसियत से क्या उम्मीद करते हैं? यह आप जानें, लेकिन मानव मानोविज्ञान को गहरे से जानने वाले विश्वस्तर के मनोव्यवहारशास्त्रियों का साफ कहना है, कि ऐसा व्यक्ति या तो आत्महत्या कर लेता है या वह खॅूंखार अपराधी बनता है, जिससे न्याय या अन्याय की परख करने की अपेक्षा नहीं की जा सकती है। मैं समझता हँू कि शुरुआती अवस्था में नक्सलवाद ऐसे ही लोगों का गिरोह था। आज इन घृणित और निन्दनीय अपराधियों को चीन, पाकिस्तान, बाग्लादेश, बर्मा, अमेरिका आदि अनेक देशों का सहयोग मिल रहा है। जिसके लिये सरकारी की सुरक्षा एवं गुप्तचर ऐजेंसियों की असफलता भी जिम्मेदार है। फिर भी मैं यही कहँगा कि आपके लेख के लिये साधुवाद और शुभकामनाएँ।-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा निरंकुश, सम्पादक-प्रेसपालिका (जयपुर से प्रकाशित पाक्षिक समाचार-पत्र) एवं राष्ट्रीय अध्यक्ष-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास) (जो दिल्ली से देश के सत्रह राज्यों में संचालित है। इस संगठन ने आज तक किसी गैर-सदस्य, या सरकार या अन्य बाहरी किसी भी व्यक्ति से एक पैसा भी अनुदान ग्रहण नहीं किया है। इसमें वर्तमान में ४३०१ आजीवन रजिस्टर्ड कार्यकर्ता सेवारत हैं।)। फोन : ०१४१-२२२२२२५ (सायं : ७ से ८) मो. ०९८२८५-०२६६६

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