मायावती के कमजोर होने से दूसरी पार्टियों को इसलिए परेशान होना चाहिए

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव परिणाम इतने अप्रत्याशित होंगे, किसी ने सोचा नहीं था. हालांकि, ज्यादातर लोगों को ये समझ आ रहा था कि इस चुनाव में मायावती की बहुजन समाज पार्टी (बसपा) बहुमत की सरकार बनाने नहीं जा रही है. साथ ही, अब ये भी साफ होता नजर आ रहा है कि बसपा एक हाशिए पर जाती हुई पार्टी है. इसके कई कारण हैं. हम इन कारणों की चर्चा तो करेंगे ही, साथ ही ये जानने की कोशिश भी करेंगे कि अगर बसपा हाशिए पर गई, तो किस तरह की दलित राजनीति उभर कर आएगी और उसका भारतीय राजनीति पर क्या असर पड़ेगा.

20वीं सदी के दूसरे दशक में डॉ. अंबेडकर ने कांग्रेस के अभिजनवादी नेतृत्व के खिलाफ हाशिए के लोगों को संगठित किया और उन्हें राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़ा. ये दलित चेतना और सैकड़ों सालों की बंदिश से मुक्ति के लिए एक अच्छी शुरुआत थी. डॉ. अंबेडकर ने पार्टी निर्माण की बात कही, लेकिन उसे संगठित स्वरूप देने से पहले चले गए.

रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया का गठन हुआ, लेकिन वो कुछ बेहतर नहीं कर पाई. महाराष्ट्र और यूपी की कुछ पॉकेट्स के अलावा वो कहीं परिणाम नहीं ला पाई. दलित वोट कांग्रेस को ही पड़ते रहे. लेकिन, यहां दलित पैट्रन (मालिक) नहीं थे, बल्कि क्लाइंट मात्र थे, जहां वो खुद के लिए कुछ नहीं कर सकते थे, बल्कि कांग्रेसी नेतृत्व के मोहताज़ भर थे. इस 50 साल के कांग्रेसी पैट्रन-क्लाइंट संबंध में मात्र एक नेता दिखाई दिए, जो ऊपर तक आए. वो थे बाबू जगजीवन राम.

1960 के दशक के प्रथम लोकतांत्रिक उभार का लाभ पिछड़ी जातियों को मिला और कई नेता उभरकर सामने आए. ये नेता राज्यों के मुख्यमंत्री बने, राष्ट्रीय फलक पर चमके और सबसे बड़ी बात, उत्तर भारत की विधानसभाओं में इनकी संख्या एकदम से बढ़ गई. हरित क्रांति, कांग्रेस से निराशा और गांधी-नेहरू की विरासत का कमजोर होना इसके बड़े कारण थे. ये अलग राजनीतिक संस्कृति से निकले लोग थे, जिन्होंने कभी कांग्रेसी राजनीति नहीं की थी. इसीलिए इन्हें इंदिरा गांधी का जबरदस्त विरोध करने में कोई दिक्कत नहीं हुई. ये महज कोई संयोग नहीं था कि गुजरात के छात्र आंदोलन ने बिहार में आकर अपना स्वरूप प्राप्त किया.

इन सबके बीच दलित राजनीति का कोई नामलेवा नहीं था, जबकि उनके बीच सामाजिक सुधार आंदोलन की एक पूरी परंपरा काम कर रही थी, जो जातीय या राष्ट्रीय चेतना के लिए बहुत जरूरी होती है. ठक्कर बापा, महात्मा ज्योतिबा फुले और डॉ अंबेडकर ने जिस तरह दलित और वंचित समाज की वकालत की, वैसी पिछले 200 साल में किसी भी राष्ट्रीय नेता ने किसी भी समाज के लिए नहीं की.

रिपब्लिकन प्रयोग फेल हो चुका था, लेकिन जातीय चेतना, शिक्षा के प्रसार और आरक्षण के लाभ के कारण दलित समाज में एक बड़ा वर्ग खड़ा हुआ, जो अपनी पहचान तलाश कर रहा था. जिसे आजादी के बाद से ही कसमसाहट थी, जो अब बड़ा रूप ले रही थी. इतने लंबे समय तक दबी रही ये दलित जातीय चेतना 1970 और 1980 के दशक में दो रूपों में बाहर आती दिखी.

एक था दलित पैंथर और दूसरा कांशीराम के नेतृत्व वाला बहुजन प्रयोग. दोनों के ही तेवर आक्रामक थे, जो लाजिमी भी था. इतने लंबे समय से दबी चेतना दरअसल ऐसे ही बाहर आती है. अमेरिका के ब्लैक पैंथर आंदोलन से प्रभावित दलित पैंथर कर्नाटक और महाराष्ट्र में सक्रिय हुआ, जिसकी आक्रामकता हिंसक भी हो जाती थी और कई बार लोकतांत्रिक मूल्यों की सीमाएं लांघ जाती थी. नामदेव धसाल और अर्जुन डांगले जैसे कई नेता और लेखक इसी आंदोलन की उपज थे, जिनके शब्द अगड़ी जातियों को नश्तर की तरह चुभते थे, लेकिन दलित जातियों के लिए मरहम का काम करते थे.

दूसरी तरफ कांशीराम ने दलित कर्मचारियों को संगठित करने का बड़ा काम किया और 1978 में बामसेफ का गठन किया, जो दलितों, बहुजनों और वंचित समाज के मुद्दों को उठाने वाला ट्रेड यूनियन था. 1982 में कांशीराम ने डीएस4 (दलित, शोषित संघर्ष समाज समिति) और 1984 में बसपा का गठन किया. बसपा ने 1980 के दशक से चुनाव लड़ना शुरू किया और 1993 में सबसे बड़े प्रदेश में सत्ताधारी गठबंधन का हिस्सा बनी.

1995 में बसपा महासचिव मायावती, जो खुद दलित समाज से आती हैं, उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं. बसपा ने यूपी के साथ-साथ बिहार, मध्य प्रदेश और राजस्थान की कुछ सीटों पर भी जीत हासिल की. पिछले बीस सालों में लोकसभा चुनावों में सभी सीटों पर चुनाव लड़कर करीब 5% मत हासिल किया. कांशीराम के लिए चुनाव लड़ना राजनीतिक-सांस्कृतिकरण का एक बड़ा माध्यम था, जिससे दलित जनता पब्लिक स्फियर का हिस्सा बनती थी.

प्रोफेसर बद्रीनारायण ने उत्तर भारत में दलित पब्लिक के निर्माण की गाथा का खूबसूरत वर्णन अपनी किताब ‘मेकिंग ऑफ दलित पब्लिक इन नॉर्थ इंडिया’ में किया है, जिसमें वो बताते हैं कि कैसे साइकिल पर बैठकर एक आदमी दलित बस्तियों में पतली-पतली किताबें लेकर जाता है. वहां उन किताबों का वाचन होता है और किन परिस्थितियों में एक अनपढ़, ग्रामीण, दलित महिला बसपा की रैली में हिस्सा लेने जाती है और पब्लिक स्फीयर का हिस्सा बनती है. ऐसा कहना उचित होगा कि डेमोक्रेसी का कोई भी नैरेटिव तब तक बेमानी है, जब तक वो अनपढ़, ग्रामीण, दलित महिला हमारे डेवलपमेंट नेट का हिस्सा नहीं बन जाती.

तो पिछले चालीस सालों में एक तरफ दलित पैंथर रहा, जो कुछ सालों में खत्म हो गया और दूसरी तरफ कांशीराम का बहुजन आंदोलन रहा, जिसका नेतृत्व बाद में मायावती ने संभाला. 2014 के लोकसभा चुनाव में मायावती की बसपा को एक भी सीट नहीं मिली और 2017 के यूपी विधानसभा चुनाव में सिर्फ 18 सीटें मिली, जो पिछले 25 सालों में बसपा की सबसे खराब परफॉरमेंस है.

यूपी के आसपास के राज्यों के पॉकेट्स में भी बसपा जो जगह बनाने की कोशिश करती दिखती थी, वो भी नाकाम रही. बसपा का वोट प्रतिशत पिछले पांच सालों में काफी कम हुआ है. दलितों के अंदर भी बसपा का कोर वोट जाटव या चमार जाति हैं, जो अब छिटकने लगा है.

बसपा का कमजोर होना, उसके दलित वोटों का बिखराव और उसके बाद सहारनपुर की घटना, जिसमें एक दलित युवा चंद्रशेखर के नेतृत्व वाली भीम आर्मी सामने आई; इस घटनाक्रम को सिलसिलेवार ढंग से समझने की जरूरत है. शायद इसी से भविष्य की राजनीति को समझा जा सकता है.

पिछले 25 सालों में बसपा मजबूत हुई और उदारीकरण ने समाज के हर वर्ग को प्रभावित किया. इन दोनों वजहों से दलित समाज का सशक्तीकरण हुआ. संविधान द्वारा सुनिश्चित किया आरक्षण अपना काम पहले से कर ही रहा है. इन तीनों के प्रयास से सामाजिक न्याय और सशक्तिकरण की जो राजनीति खड़ी हुई, उसने दलित समाज में एक मध्य वर्ग खड़ा किया, जो शिक्षित था. वो तो सम्मानित रोजगार कर रहा था या उसकी तलाश में था.

ये सामाजिक न्याय से आगे का कदम था, जहां उसके सामने सवाल दूसरे थे. कांशीराम की बसपा ने अपना काम बखूबी निभाया, लेकिन मायावती के नेतृत्व वाली 21वीं सदी की बसपा कोई नए सपने परोसती नजर नहीं आई. सत्ता के मोह में बसपा बहुजन को छोड़ सर्वजन की तरफ जरूर बढ़ गई, जहां दलित समाज को अपनी पहचान ही बसपा में संकुचित होती नजर आई.

ये शिक्षित दलित अब 21वीं सदी में नव-मध्यवर्ग का हिस्सा हैं, जिसके लिए उच्च शिक्षा, नौकरी, स्वरोजगार और आर्थिक सशक्तिकरण एक बड़ी जरूरत है. शायद यही कारण है कि इस नव-मध्यवर्ग ने बसपा से बाहर वोट करने का जोखिम उठाया. ऐसे वोटर्स ने 2014 के लोकसभा और 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के लिए वोट किया. इन्हें लगा कि मध्यवर्ग की तरह बदलकर वोट करने से अपने फायदे सामने आ सकते हैं. मोदी सरकार की कई स्कीमों से ऐसा लगता है कि दलितों का ये फैसला गलत नहीं गया. इस तरह आज दलित वोटों पर बसपा का एकाधिकार टूटा है और भाजपा ने उसमें भारी सेंध लगाई है.

ऐसे दौर में जब बसपा कमजोर हुई है, तो उत्तर-बसपा, उत्तर-मायावती दलित राजनीति किस दिशा में जाएगी? दलित राजनीतिक आंदोलन की वो आक्रामक आवाजें, जिन्हें एक स्तर पर बसपा में स्थान मिल जाता था, वो कहां जाएगी? यहां ऐसे कई सवाल खड़े होते हैं. अगर 1970 के दशक में एंग्री यंग मैन मध्य वर्ग से आता था, तो वो आज कहां है. वो क्रुद्ध युवा कहां है. मुझे लगता है आज का क्रुद्ध युवा दलित समाज से आ रहा है, जिसके अपने सपने हैं, जो व्यवस्था की चक्की में कई बार पिसते नजर आ रहे हैं. ‘मसान’, ‘सैराट’ और ‘कबाली’ जैसी फिल्मों के नायक उसी क्रुद्ध दलित युवा का प्रतिनिधित्व करते हैं.

उत्तर-बसपा, उत्तर-मायावती दलित राजनीति आज कई खतरनाक मोड़ ले तकती है, क्योंकि बसपा एक लोकतांत्रिक राजनीतिक दल था, जिसे समय-समय पर चुनाव में जाना होता था. उसके प्रतीक और नारे आक्रमक हो सकते थे, लेकिन लोकतांत्रिक दायरे के भीतर थे. अब जो दलित राजनीति खड़ी होगी, वो दलित पैंथर की तरह हिंसात्मक रूप ले सकती है. वो छोटे-छोटे समूहों और NGO में तब्दील होगी. उसका कोई एक नायक नहीं होगा. ऐसा भी अंदेशा है कि ये छोटे-छोटे समूह देश-विरोधी ताकतों से हाथ मिला लें.

विश्वविद्यालय परिसर में भी जो ट्रेंड सामने आ रहे हैं, उनमें अंबेडकर-पेरियार स्टडी सर्किल, अंबेडकर स्टूडेंट्स असोसिएशन और बापसा जैसे संगठन हैं, जो दलित छात्रों को संगठित करने की कोशिश कर रहे हैं. इनकी राजनीति एक स्तर पर वामपंथी दलों से अलग तो है, लेकिन स्थापित भारतीय जीवन मूल्यों के खिलाफ है. ये अपनी नई राजनीति गढ़ना चाहते हैं, जो दरअसल समाधान की ओर नहीं ले जाती.

उत्तर प्रदेश चुनाव के बाद सहारनपुर की घटना में भीम आर्मी का सामने आना इसका पहला उदाहरण है. भीम आर्मी ने मायावती जैसी किसी नेता के निर्देश का इंतजार नहीं किया. सन 2012 में बनी ये भीम आर्मी तब तक प्रमुखता से सामने नहीं आ पाई, जब तक बसपा तातकतवर थी, लेकिन जैसे ही बसपा कमजोर हुई, ये उभरकर सामने आ गई.

ऐसे कई संगठन और व्यक्ति अभी सामने आएंगे, जो स्थानीय जातिगत झगड़ों को उठाएंगे और सोशल मीडिया के युग में ये लड़ाइयां घर-घर तक पहुंचेगी. इन जातीय संघर्षों से समाधान नहीं निकलेगा, बल्कि मन की वैमनस्यता और बढ़ेगी.

इन संगठनों और इनके नेताओं को हाल-फिलहाल चुनाव में नहीं जाना होगा. हिंसा और अराजकता फैलाने में इन्हें कोई दिक्कत नहीं होगी. केंद्र और राज्य के सत्ताधारी दलों को सोचना चाहिए कि उत्तर-बसपा दलित राजनीति को कैसे अपने पक्ष में किया जाए, जिससे दलित समाज के अधिक से अधिक युवा सकारात्मक एजेंडे के साथ देश की मुख्यधारा से जुड़ सकें और भारत के विचार के साथ-साथ आगे बढ़ सकें.

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