लेखक परिचय

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

मीणा-आदिवासी परिवार में जन्म। तीसरी कक्षा के बाद पढाई छूटी! बाद में नियमित पढाई केवल 04 वर्ष! जीवन के 07 वर्ष बाल-मजदूर एवं बाल-कृषक। निर्दोष होकर भी 04 वर्ष 02 माह 26 दिन 04 जेलों में गुजारे। जेल के दौरान-कई सौ पुस्तकों का अध्ययन, कविता लेखन किया एवं जेल में ही ग्रेज्युएशन डिग्री पूर्ण की! 20 वर्ष 09 माह 05 दिन रेलवे में मजदूरी करने के बाद स्वैच्छिक सेवानिवृति! हिन्दू धर्म, जाति, वर्ग, वर्ण, समाज, कानून, अर्थ व्यवस्था, आतंकवाद, नक्सलवाद, राजनीति, कानून, संविधान, स्वास्थ्य, मानव व्यवहार, मानव मनोविज्ञान, दाम्पत्य, आध्यात्म, दलित-आदिवासी-पिछड़ा वर्ग एवं अल्पसंख्यक उत्पीड़न सहित अनेकानेक विषयों पर सतत लेखन और चिन्तन! विश्लेषक, टिप्पणीकार, कवि, शायर और शोधार्थी! छोटे बच्चों, वंचित वर्गों और औरतों के शोषण, उत्पीड़न तथा अभावमय जीवन के विभिन्न पहलुओं पर अध्ययनरत! मुख्य संस्थापक तथा राष्ट्रीय अध्यक्ष-‘भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान’ (BAAS), राष्ट्रीय प्रमुख-हक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन, राष्ट्रीय अध्यक्ष-जर्नलिस्ट्स, मीडिया एंड रायटर्स एसोसिएशन (JMWA), पूर्व राष्ट्रीय महासचिव-अजा/जजा संगठनों का अ.भा. परिसंघ, पूर्व अध्यक्ष-अ.भा. भील-मीणा संघर्ष मोर्चा एवं पूर्व प्रकाशक तथा सम्पादक-प्रेसपालिका (हिन्दी पाक्षिक)।

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डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’

कुछ समय पूर्व मैंने एक खबर पढी थी कि अजा, अजजा एवं अन्य पिछड़ा वर्ग के लिये आरक्षित उनंचास फीसदी आरक्षित कोटे के अलावा शेष बचे सामान्य वर्ग के इक्यावन फीसदी पदों पर अजा, अजजा एवं अन्य पिछड़ा वर्ग के तीस फीसदी प्रत्याशी मैरिट के आधार पर नियुक्त हो गये। इसे मीडिया द्वारा सामान्य वर्ग के हिस्से पर आरक्षित वर्गों का डाका बताकर प्रचारित किया गया। मीडिया के अनुसार सामान्य वर्ग के लोगों के लिये शेष बचे इक्यावन फीसदी का तीस फीसदी कोटा आरक्षित वर्ग द्वारा मैरिट के नाम पर हथिया लिया जाता है, जो अनुचित है। जिस पर रोक लगनी चाहिये। केवल इतना ही नहीं इस मामले में कुछ संगठनों की द्वारा औपचारिक रूप से विरोध भी जताया गया। जिसे आरक्षित वर्ग विरोधी मीडिया द्वारा बढाचढाकर प्रकाशित किया।

विरोध करने वालों के अपने-अपने तर्क हैं, जबकि मैरिट के आधार पर नियुक्ति पाने वाले अजा, अजजा एवं अन्य पिछड़ा वर्ग के मैरिट में स्थान प्राप्त करने वालों के पक्ष में संविधान और न्यायपालिका का पूर्ण समर्थन है। यही नहीं प्राकृतिक न्याय का सिद्धान्त भी उनके पक्ष में है, लेकिन इसके बाद भी सामान्य वर्ग के प्रत्याशियों की पीड़ा को भी नकारा नहीं जा सकता।

यह एक ऐसा विषय है, जिस पर निष्पक्ष रूप से विचार करके देखा जाये तो आंकड़े इस बात की गवाही देते हैं कि अजा, अजजा एवं अन्य पिछड़ा वर्ग की कुल आबादी देश की कुल आबादी का पिच्यासी फीसदी बतायी जाती है, लेकिन पिच्यासी फीसदी आरक्षित वर्ग के लोगों को मात्र उनंचास फीसदी ही आरक्षण प्रदान किया जा रहा है। ऐसे में शेष अर्थात् छत्तीस फीसदी लोगों का सरकारी सेवाओं में आनुपातिक प्रतिनिधित्व किस प्रकार से सम्भव होगा? इस विषय पर संविधान की मूल भावना अर्थात् सामाजिक न्याय की अवधारणा के प्रकाश में निष्पक्षता पूर्वक विचार नहीं किये जाने के कारण ही ऐसी अप्रिय स्थिति निर्मित की जा रही हैं। जिसके लिये तथाकथित आरक्षण विरोधी राष्ट्रीय मीडिया भी कम दोषी नहीं है।

मीडिया द्वारा आरक्षण के मुद्दे पर आपवादिक अवसरों को छोड़कर अधिकतर केवल भावनात्मक बातों को ही बढावा दिया जाता है। जबकि पृथक निर्वाचक पद्धति की मंजूरी, पृथक निर्वाचक पद्धति का एम के गांधी द्वारा दुराशय पूर्वक विरोध और अन्तत: दबे-कुचले वर्गों के ऊपर पूना पैक्ट को थोपे जाने से लेकर के आज तक के सन्दर्भ में खुलकर चर्चा और विचार करने की सख्त जरूरत है। लेकिन अपने पूर्वाग्रहों से ग्रस्त भारत का मीडिया इन ऐतिहासिक और संवैधानिक मुद्दों को कभी भी निष्पक्षता से पेश नहीं करता है। जिसके चलते आरक्षित और अनारक्षित वर्गों के बीच में लगातार खाई बढती पैदा की जा रही है। जिससे समाज का माहौल लगातार खराब हो रहा है। इस बारे में तत्काल सकारत्मक कदम उठाये जाने की जरूरत है। विशेषकर मीडिया को अपना सामाजिक धर्म निभाना होगा।

इसके साथ-साथ भारत सरकार को भी इस बारे में नीतिगत निर्णय लेकर उसे कड़ाई से लागू करना होगा।वर्तमान में जारी जाति आधारित जनगणना के नतीजे इस विषय को हमेशा के लिये सुलझाने के लिये सरकार का मार्गप्रशस्त करेंगे। क्योंकि प्राप्त नतीजों से इस बात का तथ्यात्मक ज्ञान हो सकेगा कि अजा, अजजा एवं अन्य पिछड़ा वर्ग की ओर से अपनी जनसंख्या के बारे में किये जाने वाले दावों की सत्यता की पुष्टि हो सकेगी और सरकार को अजा, अजजा एवं अन्य पिछड़ा वर्ग की जनसंख्या के अनुपात में उन्हें सरकारी सेवाओं में प्रतिनिधित्व तथा शिक्षण संस्थानों में प्रवेश देने में किसी प्रकार की संवैधानिक या कानूनी अड़चन नहीं होगी।

एक बार दबे-कुचले वर्गों को उनकी जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व प्रदान करना सुनिश्‍चित कर दिया गया तो फिर मैरिट के आधार पर अजा, अजजा एवं अन्य पिछड़ा वर्ग के लोगों की तथाकथित घुसपैठ को रोकना आसान हो जायेगा। और कम से कम इस कारण से सामान्य वर्ग के प्रत्याशियों के मनोमस्तिष्क में पैदा होने वाले भावनात्मक दुराग्रहों को सदैव के लिये दूर किया जा सकेगा। ऐसे में जाति आधारित जनगणना के नतीजे आने का हम सबको सकारात्मक रूप से इन्तजार और स्वागत करने को तैयार रहना होगा।

5 Responses to “आरक्षित उम्मीदवारों के मैरिट में चयन का औचित्य!”

  1. abhishek kumar

    आरक्षण से पिछले ६५ साल में देश की हालत बद से बदतर ही हुई है. ५१% योग्य व्यक्तियों के साथ ४९% नालायक (जी हाँ क्योंकि कई बार तो इनके मार्क्स इतने कम होते हैं कि स्कूल की परीक्षाओं में भी पास नहीं हो पायें पर देश चलाने की जिम्मेदारी इन्हें दे दी जाती है. उदाहरण के लिए PET परीक्षा में ऋणात्मक अंक पाने वाले सिलेक्ट हो जाते हैं पर ४०% अंक लाने वाले अनारक्षित होने के कारण योग्य नहीं समझे जाते.) लाद दिए जाते हैं. अब इन नालायकों को काम तो आता नहीं तो ऑफिस में राजनीति करते हैं और काम करने वालों को भी अपने रवैये से बिगाड़ देते हैं. फिर जब योग्य व्यक्ति देखते हैं कि ये नालायक उनके बाद भर्ती होकर काम न करते हुए भी उनके बॉस बन गए हैं और सही गलत जो मन में आए करना चाहते हैं (क्योंकि नियमों की न तो इन्हें जानकारी होती है और न ही ये जानकारी लेना चाहते हैं, सिर्फ अधीनस्थों पर रौब झाड़ना ही इनकी फितरत हो जाती है.) तो उनके मन में कितनी निराशा और हताशा भर जाती होगी इसकी जरा कल्पना कीजिये. और ये कौन सा संविधान या नियम कहता है कि अच्छा काम करने वाले को दरकिनार कर किसी अन्य व्यक्ति को इसलिए आगे लाना चाहिए क्योंकि वह किसी विशेष जाति में पैदा हुआ था?
    हाँ यह जरूर है कि जिस देश में अनपढ़ व्यक्ति मंत्री और मुख्यमंत्री बन जाते हों, जहाँ जनता जाति और धर्म के नाम पर वोट देती हो, जहाँ अपराधी चुनाव में खड़े होते हों और सभ्य और भले व्यक्तियों की सरेआम हत्या की जाती हो और सबसे बढ़कर जहाँ कॉलेज के किसी प्रोफेसर या किसी महान वैज्ञानिक के वोट की कीमत उतनी ही हो जितनी किसी अनपढ़, संकीर्ण मानसिकता वाले (मानसिक रोगी /पागल या नासमझ) या किसी सड़कछाप लफंगे या शराब के नशे में टुन्न रहने वाले किसी व्यक्ति की, वहां पर क्या उम्मीद की जा सकती है कि ऐसे लोगों के वोट से (पैसे या शराब बांटकर) चुनकर आए नेता इस सिस्टम को सुधारने के बारे में सोच भी सकते हैं ???

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  2. आर. सिंह

    R.Singh

    डाक्टर निरंकुश जी हो सकता है कि आप ठीक हो.मैं यह दावा कतई नहीं करता कि मुझे पूर्ण ज्ञान है.मैं तो आज भी अपने को एक विद्यार्थी ही मानता हूँ.पर अगर आपका यह कहना सही है कि आरक्षित वर्ग के प्रत्यासियों को भी मेरिट में आने पर उनका चयन आरक्षित वर्ग के अंश से अलग होता है, भले ही उन्होंने जाति प्रमाण पत्र प्रस्तुत किया तब ऐसे यह सामान्य तरीके से उचित नहीं लगता,पर अगर उचित रूप से इसकी समीक्षा की जाए तो इसे गलत नहीं ठहराया जा सकता,क्योंकि अनारक्षित अंश केवल योग्यता पर आधारित हैऔर वहां किसी भी अन्य समीकरण का कोई अर्थ नहीं है.

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  3. डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

    डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’

    श्री सन्दीप के. उपाध्याय जी आपने भी टिप्पणी लिखी है, जिसके लिये आपका आभार और धन्यवाद ज्ञापित करता हूँ| आपका विशेष आभार इस बात के लिये कि आप जातिगत आरक्षण के विरोधी हैं, इसके उपरान्त भी आपने शालीन तरीके से आपनी बात कही है, बेशक आपने संविधान और इंसाफ के सिद्धांत के विपरीत राय रखी है|

    श्री उपाध्याय जी, सर्वप्रथम तो आपको और आप जैसे विचार रखने वाले सभी साथियों से मेरा विनम्र निवेदन है कि अजा एवं अजजातियों ने संविधान लागू होने से पूर्व कभी भी भारत सरकार या अंग्रेजी सरकार के समक्ष आरक्षण प्रदान करने की मांग नहीं रखी थी, बल्कि श्री मोहनदास कर्मचन्द गॉंधी नामक शख्स ने हम पर जबरन यह तमगा लगाया है| आरक्षण उन्हीं के रुग्ण विचारों की दैन है|

    श्री गॉंधी नहीं चाहते थे कि अजा एवं अजजा के लोग कभी अपने पैरों पर खड़े हों| इस कारण से उन्होंने अजा एवं अजजा वर्ग के लोगों को हमेशा पंगु बनाये रखने के दुराशय से पूना पैक्ट के जरिये जबरन आरक्षण थोप दिया| जिसका डॉ. अम्बेड़कर साहब ने पुरजोर विरोध किया था| जबकि तत्कालीन अंग्रेजी सरकार ने डॉ. अम्बेड़कर की बात को मानकर के देश के सभी दमित वर्गों की सरकार और सभी क्षेत्रों में समान भागीदारी के लिये आरक्षण के बजाय सैपरेट इलेक्ट्रोल को मान्यता दी थी, जिसे गोलमैज वार्ता में स्वयं गॉंधी ने भी स्वीकार किया था, लेकिन भारत आकर गॉंधी मुकर गये और हृदय परिवर्तन के लिये अनशन करने का ढोंग करने वाले एम के गॉंधी ने दमित वर्गों से उनका सैपरेट इलेक्ट्रोल का हक छीनने के लिये अनशन शुरू कर दिया| जिसकी परिणिती पूना पैक्ट में हुई| जिसके आधार पर संविधान में शिक्षण संस्थाओं और सरकारी सेवाओं में आरक्षण का प्रावधान जोड़ा गया| जिसका संवैधानिक उद्देश्य (संविधान सभा की चर्चाओं में) हजारों वर्षों से सवर्णों के भेदभाव के शिकार दबे-कुचले वर्गों को सरकार और प्रशासन में समान भागीदारी देना बताया गया| जबकि यह लक्ष्य आज तक पूर्ण नहीं हुआ है|

    श्री उपाध्याय जी आप जानते ही होंगे कि भारत में जाति की पहचान अजा, अजजा एवं पिछड़ा वर्ग के लोगों के पूर्वजों द्वारा तय नहीं की गयी थी| इसलिये जाति-पॉंति फैलाने के लिये आरक्षित वर्ग में शामिल जातियों के लोग जिम्मेदार नहीं हैं| बल्कि जिन लोगों ने जाति-पॉंति का विभेद किया और जिनने जाति के आधार पर देश के बहुसंख्यकों को शूद्र कहकर उनका हजारों साल तक शोषण किया (जो आज भी जारी है), वे लोग ही जाति पांति के विभेद के लिये जिम्मेदार हैं और उन लोगों के दुष्क्रत्य से बचाव के लिये ही डॉ. अम्बेड़कर ने सैपरेट इलेक्ट्रोल का अधिकार मांगा गया, लेकिन गॉंधी ने इसके बदले आरक्षण थमा दिया|

    आजादी के बाद आरक्षण का मामला सुप्रीम कोर्ट के समक्ष विचार हेतु पेश किया गया तो सुप्रीम कोर्ट ने अनेक बार इस बात को निर्धारित किया है (निर्णय करने वाले जजों में एक भी आरक्षित या शूद्र वर्ग का नहीं था) कि चूँकि विगत में शूद्रों का जातिगत आघार पर ही शोषण और उत्पीड़न किया गया था| शूद्रों को जातिगत आधार पर ही सरकार और प्रशासन में भागीदारी से वंचित रखा गया था| शूद्रों को जाति के आधार पर ही शिक्षा और संस्कृति में भागीदारी से वंचित रखा गया था| शूद्रों को जाति के आधार पर ही सामाजिक रूप से तिरस्कृत किया जाता रहा| अत: आरक्षण प्रदान करने का आधार भी जाति ही होगा|

    अब थोड़ी सी चर्चा गरीबी के बारे में कर लेते हैं|

    गरीबों की कोई जाति या कोई वर्ग नहीं होता है, जिसे सरकार एवं प्रशासन में भागीदारी की जरूरत हो| गरीब सभी जातियों में पाये जाते हैं| गरीबों की आर्थिक स्थिति ठीक करने की जरूरत है न कि गरीबों को आरक्षण देने की| दोनों विषय एक-दूसरे से पूरी तरह से भिन्न हैं| जिन्हें वे लोग ही आपसे में मिलाते हैं-जिन्हें या तो आरक्षण की मूल अवधारणा का ज्ञान नहीं है या जो जानबूझकर आरक्षित वर्ग का येनकेन प्रकारेण विरोध करने के लिये ही पैदा हुए हैं| मैं उम्मीद करता हँ कि आप दूसरी श्रेणी में शामिल नहीं होंगे|
    आपका शुभाकांक्षी-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’

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  4. डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

    डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’

    आदरणीय श्री आर सिंह साहब, आपने इस आलेख पर टिप्पणी की, जिसके लिये आपका आभार और धन्यवाद|

    मैं काफी समय से आपको टिप्पणीकार के रूप में पढ रहा हूँ और आपको एक स्वतन्त्र तथा तथ्यपरक टिप्पणीकार के रूप में समझने लगा हूँ|

    अनेक लोग आपकी टिप्पणियों से असहमत होते हैं, जिनके अपने कारण हैं| लेकिन पहली बार मुझे आपकी टिप्पणी पर तथ्यों के आधार पर कुछ लिखने की जरूरत अनुभव हुई है|

    इससे पहले मैं यह स्पषट कर दूँ कि मेरा ऐसा मत है, (जरूरी नहीं कि आप या अन्य विद्वान मेरे इस मत से सहमत हों) कि मैं उन्हीं विषयों पर लिखूँ या टिप्पणी करूँ, जिनका मुझे कम से कम प्रारम्भिक ज्ञान हो| अन्यथा मैं बहुत सारे विषयों पर चुप रहना ही बेहतर समझता हूँ| इसके विपरीति वेब-मीडिया पर और विशेषकर ‘प्रवक्ता’ पर अधिकतर टिप्पणीकार सिर्फ टिप्पणी करने के लिये, टिप्पणी करते हैं| उन्हें तो टिप्पणी करनी होती है| बेशक उनकी टिप्पणी तार्किक, प्रासंगिक, तथ्यपरक या शिष्ट हो या नहीं इस बात की उन्हें कोई परवाह नहीं रहती है| कथित राष्ट्रवादी तो दूसरों को राष्ट्रद्रोही सिद्ध करने के लिये ही टिप्पणी करते हैं|

    मेरा मानना है कि कम से कम आप उक्त वर्णित श्रेणी के लोगों में से नहीं होंगे| फिर भी आपकी प्रस्तुत टिप्पणी को पढकर पहली बार ऐसा लगता है कि केवल टिप्पणी करने के लिये ही टिप्पणी की गयी है| जो आरक्षण, मैरिट, चयन आदि की प्रक्रिया के बारे में वास्तविक जानकारी से कोसों दूर है| आप बहुत वरिष्ठ हैं और आप से हम जैसे नये लोग अपने मार्गदर्शन की अपेक्षा करते हैं|

    मैं आपको निवेदन कर दूँ कि आपने जैसा लिखा है, उस तरीके से आरक्षित श्रेणी के प्रत्याशी मैरिट के आधार पर चयन नहीं होते हैं| हॉं कुछ अपवाद ऐसे भी हो सकते हैं| मैं आपको एक उदाहरण के द्वारा स्पष्ट करने का प्रयास करता हूँ| माना कि किसी सेवा के लिये 100 पदों का चयन करना है| उसमें से 49 फीसदी आरक्षित पद अजा, अजजा एवं अन्य पिछड़ा वर्ग के लिये आरक्षित रखे जाते हैं और शेष 51 फीसदी पदों पर प्रत्याशियों का मैरिट के आधार पर चयन किया जाता है| इन 51 फीसदी पदों को हमारे सवर्ण बन्धु सामान्य श्रेणी के पद कहते हैं, जिसे सरकार, संविधान और सुप्रीम कोर्ट नहीं मानता है| असल में शेष 51 फीसदी पद सर्वोच्च योग्यताधारी प्रत्याशियों में से भरे जाते हैं| जिसका सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित पद्धति यह है कि मैरिट में जो भी टॉपर 51 हों सबसे पहले उन्हें चयन किया जावे| बेशक सारे के सारे टोपर 51 आरक्षित वर्ग के ही क्यों न हों और बेशक उन्होंने आरक्षित वर्ग में अपने चयन केलिये जाति प्रमाण-पत्र भी साथ में क्यों न लगाया हो| इस प्रकार से 100 पदों पर सबसे पहले 51 प्रत्याशियों को बिना किसी वर्गीकरण के केवल मैरिट के आधार पर चयनित किया जाता है| इसके बाद शेष पदों के लिये आरक्षित वर्गों के टॉपर्स की मैरिट सूची बनायी जाती है और प्रत्येक वर्ग के सबसे योग्य प्रत्याशी को आरक्षित कोटे में चयन किया जाता है|

    एक बात और आपकी टिप्पणी के बारे में कहनी है कि आरक्षित वर्ग के जो प्रत्याशी मैरिट के आधार पर चयनित किये जाते हैं, पदोन्नति के समय आरक्षित पदों पर उन्हें सबसे पहली वरियता दी जाती है| हॉं आपके अनुभव के अनुसार जो कोई भी प्रत्याशी प्रथम चयन के समय जाति प्रमाण-पत्र नहीं लगाता है, उसे अवश्य पदोन्नति में आरक्षण का लाभ नहीं मिलता है| मेरी जानकारी में आरक्षित वर्ग के ऐसे कोई भी प्रत्याशी नहीं होते हैं, जो कि आरक्षित वर्ग के होकर भी आरक्षण का लाभ नहीं लेते हों| विशेषकर उस स्थिति में जबकि सीबीआई का कहना है कि केन्द्रीय सरकार की सरकारी सेवाओं में आरक्षण का लाभ ले रहे लोक सेवकों में 35 फीसदी अनारक्षित वर्ग के हैं, जिन्होंने जाली जाति प्रमाण-पत्र पेश किये हुए हैं, लेकिन उनकी एक एक कर पहचान करना सीबीआई के अनुसार दुरूह कार्य है| मेरा मानना है कि संभवत: सरकार ही नहीं चाहती!

    मैं समझता हूँ कि अब श्री सिंह साहब को और अन्य साथियों को चयन प्रक्रिया समझ में आ गयी होगी और मैं यह भी मानता हूँ कि बहुतों को इसका पूर्व से भी ज्ञान होगा|

    अब श्री सिंह साहब विचारणीय विषय यह है कि ऐसे हालात में जनसंख्या के आधार पर आरक्षण के कोटे को बढाने की जरूरत है या नहीं इस बात पर आपको उपरोक्त विवेचन के बाद टिप्पणी करनी चाहिये| आपकी विवेकसम्मत टिप्पणी की प्रतीक्षा रहेगी| धन्यवाद|
    शुभाकांक्षी-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’

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  5. आर. सिंह

    R.Singh

    डाक्टर निरंकुश यह तो आरम्भ से होता आया है कि जिन लोगों ने आरक्षित अंश में स्थान पाने के लिए प्रमाण पत्र नहीं प्रस्तुत किया वे लोग सामान्य अंश में चुने जाने के अधिकारी हो गए.इसका पहला कारण यह रहा है कि वे लोग नहीं चाहते हैं कि योग्यता होते हुए भी उनके आगे आरक्षित अंश का तगमा लग जाए .दूसरा प्रच्छन पहलू यह भी हो सकता है कि वे लोग अपने भाई बंधुओं को उससे लाभान्वित कराना चाहते हों.मुझे तो यह केवल व्यक्तिगत प्रतिष्ठा का प्रश्न ही लगता है.इसमे न संविधान से कोई रोक है और न कानूनी अड़चन है.ऐसे इन लोगों को वहां हानि होने की भी संभावना रहती है,जहां पदोन्नति भी आरक्षण के आधार पर है.मैं नहीं समझता कि इसमे किसी बदलाव की आश्यकता है या जनसँख्या के आधार पर आरक्षण को बढाने की,क्योंकि सामान्य स्थान किसी के लिए भी आरक्षित नहीं होता,अतः उस पर किसी जाति या वर्ग विशेष का अधिकार नहीं माना जा सकता

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  6. Sandeep K. Upadhyay

    मीणा जी आपके लेख से एक बात साफ दिख रही है की आप की मनसा क्या है, आप बोल रहे है की मिडिया और अगदी जाती के लोग दुरागाह से पीड़ित है, एबात आप भी पर लागु होती है, कोई भी चीज को उसके गुणवत्ता के हिसाब से मौका दिया जय तो उसके साथ न्याय होता है, लेकिन राजनितिक पार्टियो की तरह आप भी पिछडो के नाम पर हाय तौबा कर रहे है, अगर आप सच में इस देश का भला चाहते है तो मैरिट के बात आपको अगर अरक्छां की बात करनी है तो गरीबी रखा के नीछे रहने वाले लोगो के लिए आरक्षण की मांग करनी चाहिए जो शायद न्याय सांगत होगा लेकिन आप लोग जाती पति के नाम पर आरक्षण …..का हो हल्ला मचा कर देश के लोगो में आतंरिक मतभेद और घृणा को पोषित कर रहे है जो सही नहीं है. आप जैसे लोगो से कम से कम ए अपेक्षा नहीं किया जा सकता..

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