लेखक परिचय

निर्मल रानी

निर्मल रानी

अंबाला की रहनेवाली निर्मल रानी कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से पोस्ट ग्रेजुएट हैं, पिछले पंद्रह सालों से विभिन्न अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं में स्वतंत्र पत्रकार एवं टिप्पणीकार के तौर पर लेखन कर रही हैं...

Posted On by &filed under कला-संस्कृति.


निर्मल रानी

भारतवर्ष जिसे पर्वों व उत्सवों का देश भी कहा जाता है, निस्संदेह अपने-आप में अनेकानेक ऐसे धार्मिक त्यौहारों, सामाजिक आयोजनों तथा परंपराओं को समेटे हुए है जो हमें अपनी प्राचीन संस्कृति व सभ्‍यता की समय-समय पर याद दिलाती रहती हैं। निश्चित रूप से भारतवर्ष दुनिया का अकेला एक ऐसा देश है जिसमें न केवल विभिन्न धर्मों, संप्रदायों, आस्थाओं, विश्वासों, विभिन्न समुदायों व जातियों के लोग रहते हैं। और यह सभी वर्गों के लोग अपने पूर्वजों से मिली अपनी सांस्कृतिक व धार्मिक विरासत को आगे बढ़ाते हुए नाना प्रकार के धार्मिक व सांस्कृतिक आयोजन करते रहते हैं। हमारे देश की इसी सामूहिक एवं पारंपरिक जीवनशैली को ‘अनेकता में एकता’ का नाम दिया गया है। और यह विशेषण केवल भारत जैसे महान देश के साथ ही जोड़ा जाता है। अर्थात् India, a country of ‘unity in diversity’ । गोया हम अनेक हैं फिर भी हम एक हैं।

परंतु इससे भी आगे बढ़कर देश में कुछ आयोजन व कार्यक्रम ऐसे भी होते हैं जो स्वयं अपने-आप में ही तमाम विशेषताओं को समाहित किए होते हैं। ज़ाहिर है ऐसे आयोजनों के पीछे ऐसे लोगों की सक्रियता ही अपना काम करती है जो बहुमुखी सोच, प्रतिभाओं व विचारों के स्वामी हों। उदाहरण के तौर पर सलमान खान व शाहरुख खान जैसे सुप्रसिद्ध फिल्म अभिनेता मुस्लिम पिता की संतान होने के बावजूद हिन्दू व मुस्लिम दोनों ही धर्मों के त्यौहार ईद, बकरीद, रमज़ान, गणेश पूजा, दीपावली व होली जैसे आयोजन समान रूप से करते दिखाई देते हैं। कला व संगीत तो इनके पेशे में ही शामिल है। ज़ाहिर है ऐसी शख्सियतें सांप्रदायिक सौहाद्र फैलाने वाले अपने इस प्रकार के आयोजनों से देश व दुनिया के लोगों की नज़रों में एक आदर्श स्थापित करती हैं। यह अभिनेता जहां सिर पर टोपी रखकर नमाज़ पढ़ते व खुदा की इबादत करते देखे जाते हैं वहीं उन्हें इसी जोश, श्रद्धा व उत्साह के साथ गणेश पूजा में शामिल होते अपने प्रशंसकों के साथ होली खेलते तथा दीपावली का उत्सव मनाते भी देखा जा सकता है।

इसी प्रकार गत् दो दशकों से भी अधिक समय से अम्बाला जिले का बराड़ा कस्बा भी अपने कुछ ऐसे ही बहुमुखी व बहुउद्देशीय आयोजनों के लिए दुनिया के लिए आकर्षण का केंद्र बनता जा रहा है। बराड़ा कस्बे में आयोजित होने वाले दो प्रमुख त्यौहार दशहरा तथा महाशिवरात्रि जैसे पर्व पूरे देश के लिए संगीत, कला, सांप्रदायिक सौहाद्र तथा भक्ति एवं श्रद्धा का अनूठा उदाहरण पेश करते हैं। दरअसल श्री रामलीला क्लब बराड़ा के संस्थापक अध्यक्ष राणा तेजिन्द्र सिंह चौहान ने पच्चीस वर्ष पूर्व श्री रामलीला क्लब की स्थापना एक ग्रामीण स्तर के छोटे से क्लब के रूप में की थी। हालांकि चौहान के पिता स्वर्गीय अमी सिंह जोकि एक ज़मींदार किसान होने के साथ-साथ एक अध्यापक भी थे, को उर्दू शेरो-शायरी, संगीत व कला का गहरा शौक व कलाकारों से का$फी लगाव था। प्रसिद्ध फिल्मा अभिनेता बलराज साहनी से इनके पिता के गहरे सम्बन्ध थे। कहा जा सकता है कि कला और कलाकारों के प्रति तेजिन्द्र चौहान का लगाव सांस्कारिक था। संभवत: उनके भीतर बाल्यकाल से कला के प्रति लगाव की धधक रही ज्वाला ने ही उन्हें क्लब का गठन करने हेतु युवावस्था में ही प्रोत्साहित किया। महाशिवरात्रि के पर्व के अवसर पर लगभग बीस वर्ष पूर्व उन्होंने अपने हाथों से भगवान शंकर की एक पहली फाईबर निर्मित मूर्ति का निर्माण किया। मूर्ति निर्माण का यह सिलसिला निरंतर चलता रहा। प्रत्येक महाशिवरात्रि से पूर्व चौहान एक अथवा दो नई झांकियां शोभायात्रा हेतु तैयार करने लगे। और आज इसी श्री रामलीला क्लब के पास तेजिन्द्र चौहान के हाथों से निर्मित लगभग पच्चीस विशालकाय मूर्तियां व झांकियों का बेड़ा मौजूद है। मज़े की बात तो यह है कि चौहान अपनी इन सभी मूर्तियों का निर्माण उन्हें केवल महाशिवरात्रि के अवसर पर बराड़ा से निकाली जाने वाली शोभायात्रा में शामिल करने हेतु ही करते हैं। उनके द्वारा निर्मित सभी मूर्तियां व झांकियां शत-प्रतिशत फाईबर से ही तैयार की जाती हैं। पिछले दिनों महाशिवरात्रि शोभायात्रा के अवसर पर चौहान ने अपने क्लब के 25 वर्ष पूरे होने के अवसर पर दो अतिविशेष एवं विशाल झांकियों का निर्माण किया। अपने सहयोगियों के साथ चार महीने की कड़ी मशक़्कत के पश्चात शिव पैलेस व गंगा अवतरण नामक दो अत्यंत आकर्षक झांकियां लगभग 11 लाख रुपए की लागत से तैयार कर शोभायात्रा के रजत जयंती समारोह में अन्य झांकियों के साथ शामिल की गई।

राणा तेजिन्द्र चौहान एक बेहतरीन मूर्तिकार होने के अतिरिक्त संगीत का भी गहरा शौक़ रख़ते हैं। उच्चकोटि के भारतीय संगीत के वे दीवाने हैं। नुसरत फतेह अली खां तथा मेंहदी हसन जैसे महान गायकों को चौहान संगीत का देवता मानते हैं। अत: एक संगीत प्रेमी होने के नाते वे अपनी शोभायात्रा में देश की उन प्रसिद्ध बैंड पार्टियों को आमंत्रित करते हैं जो गायन व संगीत के क्षेत्र में अपनी विशिष्ट पहचान रख़ती हैं। बराड़ा महाशिवरात्रि के अवसर पर देश के कई राज्यों से प्रसिद्ध बैंड पाटिüयां बराड़ा पहुंचकर महाशिवरात्रि की शोभा बढ़ाती हैं। इन बैंड पार्टियों में तमाम लोग मुस्लिम समुदाय के भी होते हैं जोकि भोले शंकर की शान में सुंदर भजन पेश करते हैं तथा दर्शकों व भक्तों को अपने मधुर संगीत से मंत्रमुग्ध करते हैं। महाशिवरात्रि की इसी शोभायात्रा में चौहान की फ़रमाईश पर जहां भोले शंकर के भजन पेश किए जाते हैं वहीं इस्लाम धर्म के पैगंबर हज़रत मोह मद तथा अन्य कई पीरों-फक़ीरों की शान में कव्वालियां व नात भी इन्हीं कलाकारों द्वारा प्रस्तुत किया जाता है। भक्तजन लगभग तीन किलोमीटर लम्बी इस शोभायात्रा में पूरे रास्ते में भजन, कव्वाली व नात आदि का समान रूप से आनंद लेते हैं। गोया बराड़ा की यह शोभायात्रा भक्ति, कला व संगीत के साथ-साथ सांप्रदायिक सौहाद्र का भी एक बेहतरीन उदाहरण पेश करती है।

श्रीरामलीला क्लब बराड़ा की सक्रियता केवल महाशिवरात्रि पर्व तक ही सीमित नहीं है बल्कि इसके अतिरिक्त भी यह क्लब अंतर्राष्ट्रीय ख्‍याति प्राप्त दशहरा महोत्सव भी आयोजित करता है। इस क्लब ने गत पांच वर्षों से लगातार दुनिया के सबसे ऊंचे रावण का निर्माण किए जाने का कीर्तिमान स्थापित किया है। इस उपलब्धि का उल्लेख 2011 की लिम्‍का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में भी हो चुका है। तेजिन्द्र चौहान व उनके क्लब का नाम 2009 में विश्वच का सबसे ऊंचा रावण का पुतला बनाने जैसी उपलब्ध को लेकर लिम्‍का बुक में दर्ज़ है। रावण की लम्बाई के विषय में चौहान का यह मत है कि चूंकि रावण को बुराई का प्रतीक माना जाता है। अत: रावण की इस लम्बाई में वे तमाम सामाजिक बुराईयों जैसे सांप्रदायिकता, जातिवाद, जनसंख्‍या वृद्धि, कन्या भ्रुण हत्या, अशिक्षा मंहगाई, भ्रष्टाचार, मिलावटख़ोरी, असमानता आदि को प्रतीक स्वरूप शामिल करते हैं। गत वर्ष श्री रामलीला क्लब बराड़ा ने 185 फुट का अब तक का सर्वोच्चि रावण का पुतला तैयार किया था। यह क्लब प्रत्येक वर्ष अपने ही रिकॉर्ड को तोड़ता आ रहा है। इस रावण के निर्माण की भी यह विशेषता है कि इसके निर्माण में मुस्लिम तथा दलित संप्रदाय के तमाम लोग दिन-रात लगे रहते हैं। गोया बराड़ा में निर्मित होने वाला रावण का यह पुतला भी सर्वधर्म समभाव एवं सामाजिक सौहाद्र का एक उदाहरण बना रहता है।

तेजिन्द्र चौहान महान गायक नुसरत फतेह अली खां के ज़बरदस्त दीवाने हैं। उन्हें इस बात का गहरा मलाल है कि वे नुसरत फतेह अली खां के जीवन में उनका दर्शन नहीं कर सके। परंतु उनके पास नुसरत के गाए हुए गीतों, कव्वालियों व भजनों का इतना बड़ा ज़खीरा है जितना कि आम तौर पर संगीत सम्बन्धी सामग्री बेचने वाली दुकानों पर भी नहीं पाया जाता। वे फुर्सत के अधिकांश समय फतेह अली खां का संगीत सुनने में बिताते हैं। एक उच्च कोटि के राजपूत घराने के सदस्य होने के बावजूद वे स्वयं नुसरत फतेह अली खां की वेशभूषा में ही रहना पसंद करते हैं। और उनकी यही वेशभूषा उनकी अलग पहचान भी बनाती है। चौहान को खाने व खिलाने का भी शाही शौक़ है। गत् दिनों महाशिवरात्रि के अवसर पर जब उनके क्लब की रजत जयंती मनाई गई इस अवसर पर उन्होंने अपने वार्षिक भण्डारे में लगभग बीस प्रकार के व्यंजन बनवाए। इसके अतिरिक्त अपने करीब पांच सौ सहयोगियों व क्लब के सदस्यों के घरों पर शुद्ध घी के विभिन्न प्रकार के मिष्ठान बनवाकर भेजे। अपने इन शौक़ को पूरा करने के लिए हालांकि अब उन्हें कुछ शुभचिंतकों व सहयोगियों का आंशिक रूप से आर्थिक योगदान मिलने लगा है। परंतु इससे पूर्व वे अपनी ज़मीनें बेच कर भी अपने उपरोक्त शौक़ पूरे करते रहे हैं। इन सब धार्मिक, कला व संगीत सम्बन्धी आयोजनों के अतिरिक्त भी चौहान एक उदार हृदय रखने वाले सहयोगी प्रवृति के व्यक्ति हैं। अपने साथियों पर आने वाले किसी भी दु:ख व संकट की घड़ी में चौहान प्रत्येक स्तर पर सबके साथ खड़े दिखाई देते हैं।

निश्चित रूप से बहुमुखी प्रतिभा के धनी ऐसे व्यक्ति पर केवल राजपूत समाज अथवा बराड़ा कस्बा ही नहीं बल्कि पूरा हरियाणा राज्य गर्व महसूस करता है। समाज के लोगों तथा सरकार को चाहिए कि ऐसे व्यक्ति, उसके द्वारा संचालित क्लब व इस प्रकार के बहुउद्देशीय धार्मिक, सांस्कृतिक व सामाजिक कार्यक्रमों को प्रोत्साहित करें, इन्हें आर्थिक सहयोग दिया जाए तथा इस प्रकार के आयोजनों में आने वाली सभी बाधाओं को दूर किया जाए।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *