“आधुनिक शिक्षा नारी को विलासिता की ओर ले जाती हैः आचार्य उमेशचन्द्र कुलश्रेष्ठ”

मनमोहन कुमार आर्य,

वैदिक साधन आश्रम तपोवन-देहरादून में दिनांक 5 अक्टूबर, 2018 को दिन के 10 बजे से 1.00 बजे तक महिला सम्मेलन का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का संचालन आर्यसमाज के यशस्वी विद्वान रहे महात्मा दयानन्द वानप्रस्थी जी की सुपुत्री लगभग 80 वर्षीय माता श्रीमति सुरेन्द्र अरोड़ा जी द्वारा किया गया जो स्वयं एक विदुषी महिला हैं और दैनिक यज्ञ करती हैं। कार्यक्रम में पं. नरेश दत्त आर्य तथा पं. सत्यपाल पथिक जी के भजन भी हुए। मुख्य सम्बोधन आर्य विद्वान आचार्य उमेशचन्द्र कुलश्रेष्ठ जी का हुआ। अपने सम्बोधन के आरम्भ में उन्होंने कहा कि ऋषि दयानन्द ने महिलाओं के लिए जिस प्रकार की शिक्षा चाहते थे वह उन्हें नहीं मिल पायी। उन्होंने कहा कि ऋषि दयानन्द महिलाओं को वेदों के अनकूल शिक्षा देना चाहते थे। यदि ऐसा होता तो उनके बच्चे वैदिक संस्कारों को धारण करते और देश में वेद एवं वैदिक धर्म व संस्कृति का प्रचार होता। विद्वान आचार्य उमेशचन्द्र कुलश्रेष्ठ जी ने कहा कि आधुनिक शिक्षा नारी को विलासिता की ओर ले जाती है। उन्होंने कहा कि देश में नारी को भोग की वस्तु के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। उन्होंने दुःख भरे शब्दों में कहा कि नारी जो संसार की मां है, उसे वेदों के अनुकूल गरिमामय रूप में प्रस्तुत नहीं किया जाता।

 

आचार्य उमेशचन्द्र कुलश्रेष्ठ जी ने आगे कहा कि आज की नारी होटलों में जाती है, वहां परपुरुषों के साथ नृत्य वा डांस करती है। किट्टी पार्टी, शराब पार्टी आदि में भी वह सम्मिलित होती है। आजकल इसे बुरा नहीं माना जा रहा है जबकि यह ईश्वरीय ज्ञान वेदों के सर्वथा प्रतिकूल व विरुद्ध है। आचार्य जी ने भारत की विदेशी मंत्री श्रीमती सुषमा स्वराज जी का उल्लेख कर कहा कि वह विदेशी प्रतिनिधि मण्डल के पुरुष सदस्यों से हाथ मिलाती हैं। भारतीय वैदिक संस्कृति इसे बुरा एवं वर्जित कर्म मानती है। वेदों व वैदिक साहित्य में अभिवादन के लिये हाथ जोड़ कर नमस्ते का विधान है परन्तु धर्म व संस्कृति की बातें करने वाले हमारे राजनेताओं को न तो इसका ज्ञान है न ही परवाह है। आचार्य जी ने कहा कि इन सब बुराईयों का कारण हमारे देश की नारियां का वैदिक शिक्षा से दूर होना है। आचार्य जी ने दिल्ली के प्रसिद्ध मिराण्डा कालेज का उल्लेख कर बताया कि इस कालेज में देश के धनवानों के लड़के व लड़किया पढ़ते हैं। सर्वेक्षण के अनुसार यहां कि 75 प्रतिशत लड़कियां को नशे की आदत है। नशीले पदार्थ उन्हें स्कूल के बाहर ही प्राप्त हो जाते हैं। यह तथ्य एक पत्रिका में प्रकाशित रिर्पोट में सामने आया है। आचार्य उमेश चन्द्र कुलश्रेष्ठ जी ने पूछा कि क्या इनसे उत्तम सन्तानें उत्पन्न हो सकती हैं? उन्होंने कहा कि भोजन व खाने की वस्तुओं से ही मनुष्य के शरीर में रज व वीर्य बनता है। इन नशा करने वालों की सन्तानें भी उन्हीं के संस्कारों की उत्पन्न होंगी। उनसे धर्मात्मा व संस्कारी सन्तान उत्पन्न करने की आशा नहीं की जा सकती।

 

आचार्य जी ने कहा कि आजकल की पढ़ाई व दिशा गलत है। आजकल की शिक्षा भारतीय वैदिक संस्कृति की मान्यताओं व सत्य सिद्धान्तों के प्रतिकूल है। आजकल के छात्र सन्ध्या व यज्ञ को नहीं मानते। उनका मानना है कि सन्ध्या व यज्ञ करने वाले पिछड़े हुए विचारों के हैं और वह शराब व मांस आदि के सेवन करने वाले प्रगतिशील विचारों के हैं। उन्होंने देश व आर्यसमाज के विद्वानों से इस पर विचार करने को कहा। उन्होंने कहा कि आर्यसमाज की महिलाओं का एक प्रतिनिधि मण्डल विदेश मंत्री श्रीमती सुषमा स्वराज से मिलना चाहिये और उनसे विदेशी व स्वदेशी पुरुषों से हाथ न मिलाने का अनुरोध करना चाहिये।

 

आचार्य उमेशचन्द्र कुलश्रेष्ठ जी ने प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के गुणों व कार्यों की प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि मोदी जी गुणवान है। हमें उन पर गर्व है। वह भी विदेशी महिलाओं से नमस्ते न करके हाथ मिलाते हैं। उन्होंने अपनी धर्मपत्नी को छोड़ा हुआ है, उन्हें साथ नहीं रखते और दूसरे मतों की महिलाओं के कल्याण के लिये काम कर रहे हैं। तीन तलाक पर वह कानून बना रहे हैं। तलाक के कानून से हमारा विरोध नहीं है। उन्होंने कहा कि उनकी पत्नी की भी तो भावनायें हैं। हमारे नेता कहते हैं कि वह भारतीय संस्कृति की रक्षा कर रहे हैं। मैं इस बात को समझ नहीं पा रहा हूं कि वह किस प्रकार से भारतीय संस्कृति की रक्षा कर रहे हैं। आचार्य जी ने मर्यादा पुरुषोत्तम राम के छोटे भाई लक्ष्मण जी की पत्नी उर्मिला और भगवान बुद्ध की पत्नी उर्मिला की चर्चा की और कहा कि इनकी पत्नियों को उम्मीद थी कि उनके पति लौटेंगे और उन्होंने अपने पतियों की प्रतीक्षा भी की थी। आचार्य जी ने महिला व पुरुष श्रोताओं को कहा कि आप जिस बात को अनुचित समझते हो उसके लिये सम्बन्धित व्यक्ति, नेता व अधिकारी को पत्र लिखा करें। हम किसी व्यक्ति से पक्षपात व कटुता नहीं रखते। हमारे गुण व कार्य ऐसे होने चाहियें जिनसे नई पीढ़ी व बच्चों पर अच्छा प्रभाव पड़े। सरकार की नीतियों के कारण हमारा सब काम चौपट हो जाता है।

 

आचार्य जी ने कहा कि विदेशी संस्कृति हमारे घरों में पूरी तरह से प्रविष्ट हो चुकी है। टीवी का प्रचलन, स्त्री पुरुषों की वेशभूषा में दिन प्रति दिन परिवर्तन, सुधार के स्थान पर बिगाड़ आदि से हम अपनी संस्कृति से बहुत दूर चले गये हैं। आचार्य जी ने कहा कि हमें नारी उत्थान व भारतीय संस्कृति से जुड़े सभी मुद्दों पर विचार करना चाहिये। अपने वक्तव्य को विराम देते हुए विद्वान वक्ता ने कहा कि हमारी समझ में नहीं आ रहा है कि हमारे देश में कौन सी संस्कृति विकसित हो रही है और इसके देश व समाज पर क्या परिणाम होंगे? आचार्य जी का प्रवचन सबसे अन्त में हुआ। समय समाप्त हो चुका था। आचार्य जी लगभग 10 मिनट ही बोल पाये।

 

इससे पूर्व सुप्रसिद्ध आर्य गीतकार एवं भजनोपदेशक प्रसिद्ध वयोवृद्ध विद्वान पं. सत्यपाल पथिक जी ने गायत्री मन्त्र पर आधारित स्वरचित एक प्रभावशाली भजन सुनाया जिसके बोल थे ‘‘वरदायिनी हे गायत्री माता गुणमान तेरे संसार गाता पथिक जी ने भी विस्तार से नारी सम्मेलन में नारियों से सम्बन्धित अपने विचार व्यक्त किये। हमें दुःख है कि हम समयाभाव के कारण उनके प्रमुख विचारों को प्रस्तुत नहीं कर पा रहे हैं। पथिक जी से पूर्व आर्य विदुषी तथा डीएवी महाविद्यालय में संस्कृत विभाग की प्रोफेसर डा. श्रीमती सुखदा सोलंकी का व्याख्यान हुआ। उन्होने कहा कि संस्कृत में गृहस्थ जीवन का व्यापक अर्थ है। उन्होंने महाराज दुष्यन्त व शकुन्तला के विवाह तथा विदाई के अवसर पर ऋषि कण्व के वचनों को भी सुनाया। उन्होंने कहा कि ऋषि कहते हैं कि सन्तान ऐसी उत्पन्न करना जिसका यश युगो-युगों तक विद्यमान रहे। उन्होंने कहा कि बच्चा अच्छाई देखता है तो अच्छाई और बुराई देखता है तो बुराई ग्रहण करता है। बहिन डा. सोलंकी जी ने कहा कि बिना बच्चों को संस्कारवान् बनाये वह संस्कारित नहीं हो सकते। बनाने से बनते हैं और न बनाने से कोई संस्कारवान् नहीं बनता। बहिन जी से पूर्व प्रसिद्ध आर्य भजनोपदेशक पं. नरेश दत्त आर्य जी ने भी अपने विचार प्रस्तुत किये और नारी गौरव से सम्बन्धित एक प्रभावशाली गीत प्रस्तुत किया। उनके द्वारा प्रस्तुत गीत की प्रथम पंक्ति थी यदि इन देवियों में वेदों का प्रचार हो जाये तो बेड़ा डूबता भारत का पल में पार हो जाये। उन्होंने कहा कि विवाह संस्कार सद्गृहस्थी बनाने का प्रशिक्षण है। उन्होंने यह भी बताया कि मनुष्य को प्रशंसा अपनी अच्छी लगती है और बुराई दूसरों की अच्छी लगती है। कार्यक्रम को एम.टैक. की एक छात्रा कु. जागृति ने भी सम्बोधित किया और ऋषि दयानन्द के नारी उत्थान के कार्यों के लिये उनकी भूरि भूरि प्रशंसा की। कार्यक्रम गायत्री मन्त्र से आरम्भ हुआ था। श्रीमती प्रोमिला आर्या एवं अनेक बहिनों ने इस कार्यक्रम में गीत व भजन प्रस्तुत किये।

 

महिला सम्मेलन की संयोजिका श्रीमती सुरेन्द्र अरोड़ा जी ने कहा कि समाज के अन्दर कुरीतियों को दूर करने के लिये हमें जागृति लानी होगी। आजकल की नारियों में सहनशीलता नहीं है। आज हम स्वतन्त्र हो गये हैं और समझते हैं कि हम जो चाहें करें। हम सामाजिक मर्यादाओं का ध्यान भी नहीं रखते। आज काल के युवा इच्छानुसार विवाह के बन्धन तोड़ते और बांधते रहते हैं। हमें गृहस्थ आश्रम को स्वर्ग बनाना है। इसके लिये हमें अपने व दूसरों के जीवन को सुधारना होगा। उन्होंने कहा कि माता का दर्जा बहुत ऊंचा है। हमें स्वयं को मर्यादा में रखना होगा। तपस्वी जीवन जीनें से जीवन चमकता है। अग्नि में पड़ने से जीवन कुन्दन बनता है। सद्ज्ञान व पुरुषार्थ ही वह अग्नि है जिससे हमारा जीवन कुन्दन बनेगा। इसी के साथ दोपहर लगभग 1.15 बजे यह कार्यक्रम समाप्त हुआ।

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