लेखक परिचय

इक़बाल हिंदुस्तानी

इक़बाल हिंदुस्तानी

लेखक 13 वर्षों से हिंदी पाक्षिक पब्लिक ऑब्ज़र्वर का संपादन और प्रकाशन कर रहे हैं। दैनिक बिजनौर टाइम्स ग्रुप में तीन साल संपादन कर चुके हैं। विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में अब तक 1000 से अधिक रचनाओं का प्रकाशन हो चुका है। आकाशवाणी नजीबाबाद पर एक दशक से अधिक अस्थायी कम्पेयर और एनाउंसर रह चुके हैं। रेडियो जर्मनी की हिंदी सेवा में इराक युद्ध पर भारत के युवा पत्रकार के रूप में 15 मिनट के विशेष कार्यक्रम में शामिल हो चुके हैं। प्रदेश के सर्वश्रेष्ठ लेखक के रूप में जानेमाने हिंदी साहित्यकार जैनेन्द्र कुमार जी द्वारा सम्मानित हो चुके हैं। हिंदी ग़ज़लकार के रूप में दुष्यंत त्यागी एवार्ड से सम्मानित किये जा चुके हैं। स्थानीय नगरपालिका और विधानसभा चुनाव में 1991 से मतगणना पूर्व चुनावी सर्वे और संभावित परिणाम सटीक साबित होते रहे हैं। साम्प्रदायिक सद्भाव और एकता के लिये होली मिलन और ईद मिलन का 1992 से संयोजन और सफल संचालन कर रहे हैं। मोबाइल न. 09412117990

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इक़बाल हिंदुस्तानी

0 गुजरात का विकास एक मिथ है जबकि ‘दंगा’ हकीकत!

नरेंद्र मोदी को भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाये जाने का जैसा विरोध राजग के अंदर हो रहा है, उससे यह बात साफ हो गयी है कि देश तो मोदी को पीएम के रूप में क्या स्वीकार करेगा अभी तो वह गठबंधन ही इसके लिये तैयार नहीं है जिस के समर्थन से उनको यह पद नसीब होगा। इतना ही नहीं भाजपा के वरिष्ठ नेता आडवाणी और सुषमा स्वराज भी उनके पीएम बनने के पक्ष में नहीं हैं लेकिन चूंकि भाजपा की कमान आरएसएस के हाथों में होती है और संघ प्रमुख मोहन भागवत यह कह चुके हैं कि देश का अगला पीएम हिंदूवादी ही होना चाहिये जिससे भाजपा के मोदी विरोधी नेता चाहकर भी मोदी का खुलकर विरोध नहीं कर सकते। इस बात पर दावे के साथ कुछ कहना अभी जल्दबाज़ी होगी कि देश की जनता मोदी को विकासपुरूष के रूप में स्वीकार करती है या एक कट्टर हिंदूवादी और गुजरात दंगों के विवादास्पद सीएम के नाते ठुकरा देती है?

यह बात पहले ही साफ हो चुकी थी कि भाजपा के साथ गठबंधन की बिहार में सरकार बनाने वाले जनतादल यू के नीतीश कुमार मोदी की छवि से दूरी बनाकर चलते हैं तो उनको मोदी पीएम के नाते किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं हो सकते। जदयू का ही नहीं राजग के किसी भी घटक का सीधा सा वोटों का समीकरण है कि उसे अगर मुस्लिम और उदार सेकुलर हिंदू वोट भी मिलता है तो वह मोदी जैसे कट्टर हिंदूवादी और दंगाई छवि के आरोपी को राजग के नेता के तौर पर स्वीकार करके अपने हाथों से अपने पैरों पर कैसे कुल्हाड़ी मार सकता है? संजय जोशी को जिस तरह से मोदी ने पार्टी नेतृत्व को एक तरह से मजबूर करके भाजपा से बाहर का रास्ता दिखाया उससे उनके अहंकार को बल मिला है लेकिन वे यह भूल रहे हैं कि गुजरात में दो बार सत्ता दिलाकर और देश की सत्ता में एक बार फिर से भाजपा को लाने का सपना दिखाकर वह संघ परिवार में तो मनमानी कर सकते हैं लेकिन राजग में नहीं।

यूपीए सरकार का उदाहरण सामने है कि कैसे अकेली ममता बनर्जी ने मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी को हर मामले में नाको चने चबवा रखे हैं यह अलग बात है कि ममता की जगह मुलायाम और मायावती के समर्थन की व्यवस्था होने के बावजूद कांग्रेस अभी भी टीएमसी को यह सोचकर नहीं छोड़ रही कि फिर ऐसा ना हो जो दबाव की राजनीति ममता कर रही हैं वही काम मुलायम करना शुरू करदें। प्रेसीडेंट इलेक्शन को लेकर सपा एक दांव चल भी चुकी है। सोचने की बात है कि अगर यूपीए की सरकार बनते समय ही ममता इस बात पर अड़ जाती कि मनमोहन पीएम नहीं बनेंगे तो कांग्रेस उनकी बात ना नकुर करके मानने को मजबूर होती। वही मामला मोदी को लेकर आज सामने है। मोदी एक सच और नहीं समझ रहे कि राजग के पूर्व प्रधानमंत्री वाजपेयी अपनी उदार छवि के चलते ही राजग के घटक दलों को स्वीकार हुए थे और आडवाणी दो दो बार इसी कट्टर हिंदूवादी छवि और बाबरी मस्जिद विवाद के कारण पीएम पद से वंचित रह गये हैं।

संघ परिवार आडवाणी की जगह मोदी को पीएम पद के लिये आगे करके ऐसा प्रयोग कर रहा है जैसे कोई डाक्टर मरीज को उस दवा की मात्रा पहले से भी बढ़ाकर दे जिससे उसे रिऐक्शन हुआ हो। संघ परिवार पता नहीं क्यों यह बात समझने का तैयार नहीं हो रहा कि विपक्ष का काम केवल सरकार का विरोध करते रहना ही नहीं बल्कि जनहित की वैकल्पिक नीतियां पेश करना भी होता है जिससे जनता का मन जीता जा सके। बेहतर होता कि भाजपा मोदी की बजाये नेतृत्व परिवर्तन के लिये यशवंत सिन्हा या अरूणा जेटली जैसे उदार और अधिक योग्य व विवेकशील नेता का नाम आगे करती। अभी तक राजग में मोदी के नाम पर कोई नया घटक जुड़ने के स्थान पर पुराना और मज़बूत जदयू टूटने के कगार पर पहुंच गया है। मोदी के विरोध का स्तर इस बात से भी पता चलता है कि नीतीश अपनी साझा सरकार भी इस मामले में दांव पर लगाने और कुर्बान करने को तैयार हैं।

राजनीतिक कारणों से जयललिता और नवीन पटनायक जैसे लोग भले ही राजग में रहते हुए मोदी को पीएम पद का दावेदार स्वीकार करलें लेेकिन चदंरबाबू नायडू और ममता बनर्जी जैसे क्षेत्रीय राजनेताओं को अपने मुस्लिम वोटों के समीकरण के चलते मोदी को गले उतारना घाटे का सौदा लगेगा। यह भी विडंबना है कि गुजरात में मोदी का जाूद अब तक सर चढ़कर बोलता था वह भी पूर्व सीएम केशुभाई पटेल की बगावत से अब आगामी चुनाव में दोहराने की गारंटी नहीं है। मोदी कार्यकर्ताओं में भले ही लोकप्रिय हों लेकिन गुजरात से लेकर दिल्ली तक उनको कोई भाजपा नेता पसंद नहीं करता क्योंकि वह अहंकारी होने के कारण एकला चलो की नीति अपना रहे हैं। जब जब मोदी पर दंगों का आरोप लगता है उनके समर्थक गुजरात के विकास के प्रायोजित आंकड़े बाचने लगते हैं। उनका दावा है कि मोदी राज्य के सभी 6 करोड़ 30 लाख गुजरातियों का समावेशी विकास निष्पक्ष रूप से कर रहे हैं।

गुजरात हिंदुत्व की प्रयोगशाला तो बना ही है साथ ही उद्योग और कृषि के लिये भी उसको आदर्श राज्य का तमगा दिया जाता है। आंकड़ों की रोश्नी में देखें तो 2009-10 में ग्रामीण गुजरात में श्रम शक्ति का लगभग 45.9 प्रतिशत हिस्सा असंगठित क्षेत्र मंे काम कर रहा है, जबकि पूरे देश में यह अनुपात केवल 40.8 ही है। शहरी क्षेत्र में यह हिस्सा राष्ट्रीय औसत यानी 35 प्रतिशत से मात्र दो फीसदी अधिक है। उल्लेखनीय है कि देश में केवल कर्नाटक और आन्ध्र में ही यह औसत पूरे देश से ज्यादा है जिससे ये दोनों राज्य भी पूंजीपतियों और उद्योगपतियों की पहली पसंद बने हुए हैं। सच तो यह है कि मोदी जिस तरह से बड़ी कम्पनियों के निर्यात वाले विकास को प्रोत्साहन दे रहे हैं उससे वहां भूमिहीनता बढ़ रही है। 2009-10 में गुजरात में यह अनुपात देश के कुल औसत से चार फीसदी अधिक यानी 45.2 प्रतिशत था। औद्योगिक निवेश का हाल यह है कि श्रमिकों का बड़ा वर्ग नये उद्योगों में ठेका मज़दूरी करने को विवश है। 2011 की वार्षिक सर्वे रिपोर्ट दिखाती है कि देश की सबसे अधिक हड़तालें इसी राज्य में हो रही हैं।

इसका कारण यह है कि मोदी सरकार मज़दूरों की जायज़ मांगे मनवाने के लिये बड़े उद्योगपतियों को ख़फा करने को तैयार नहीं है। हालत यह है कि कम्पनियों के मुनाफे में दस गुना तक वृध्दि होने के बावजूद मज़दूरों को पांच हज़ार रू. मासिक या कहीं कहीं तो 85 रू. दैनिक मज़दूरी दी जाती है। विकास की दुहाई देने वाली मोदी सरकार बजाये न्यूनतम मज़दूरी लागू कर गरीब मज़दूरों का साथ देने के उद्योगपतियों से मिलीभगत करके उनकी अवैध गिरफ्तारी और डराने धमकाने का अभियान चलाती है। यही एकमात्र कारण है कि बड़े बड़े दौलतमंद मोदी को काफी पहले पीएम पद का दावेदार मानकर उनको प्रायोजित कर चुके हैं। 2002 के भीषण और सरकार प्रायोजित दंगों और विकास को सत्यता के पैमाने पर परखा जाये तो दंगे जहां हकीकत थे वहीं विकास एक मिथ ही अधिक है। 2005 से 2010 तक जीएसडीपी में हुयी बढ़ोत्तरी के हिसाब से देखा जाये तो इसमें गुजरात का स्थान 10 वां है।

मिसाल के तौर पर सबसे ऊपर उत्तराखंड 250.65, छत्तीसगढ़ 229.46, हरियाणा 226.91, बिहार 225.31, महाराष्ट्र 217.80, दिल्ली 217.15, ओडिशा 211.97, तमिलनाडु 211.65, आन्ध्र प्रदेश 211.50 के बाद गुजरात 211.12 का नम्बर आता है। अगर बड़े शहरों में बने मॉल्स और टाटा जैसे उद्योगपतियों को मिट्टी के मोल गरीब किसानों की ज़मीन औने पौने में अधिग्रहित कर दान करने को कहते हैं तो गुजरात का वास्तव में विकास हो रहा है। मिसाल के तौर पर गुजरात की 55 फीसदी ग्रामीण जनता की पूरे साल की खेती की आमदनी 32000 करोड़ है जबकि मोदी ने टाटा को नैनो प्रोजैक्ट लगाने को जो ज़मीन दी उसकी कीमत 33000 करोड़ है। ऐसे में टाटा जैसे उद्योपतियों को इस बात से क्या लेना देना कि गरीब किसानों का अब क्या होगा और उन दंगा पीड़ितों का क्या भविष्य है जिनके हत्यारे आज भी खुले घूम रहे हैं?

टाटा के पूरे प्रोजेक्ट की कीमत 2200 करोड़ है जबकि उनको नीलामी के बिना 1100 एकड़ ज़मीन 900 रु. प्रति वर्ग मीटर के हिसाब से दी गयी है, जबकि बाज़ार भाव इसका 10,000 रु. वर्ग फिट है। इसके साथ ही टाटा मोटर्स को यह छूट दी गयी है कि वह हर साल दो किस्तों में 50 करोड़ के हिसाब से इसका भुगतान कर सकती है। इतना ही नहीं टाटा को मोदी सरकार ने 9750 करोड़ का कर्ज़ 0.10 प्रतिशत मामूली ब्याज पर दिया है। ऐसे ही 2003-04 में अदानी समूह को जो ज़मीन मोदी सरकार ने एक से लेकर 32 रु. वर्ग मीटर के हिसाब से दी थी उसकी प्लॉटिंग कर 10,000 रु. वर्ग मीटर तक सरकारी कम्पनियों को बेचा गया। गुजरात पर 2008 में जो 87010 करोड़ का कर्ज था वह 2010 में बढ़कर 112462 करोड़ हो चुका है। यह भी जानकारी है कि 2003 से लेकर 2009 के बीच गुजरात में निवेश के लिये 18.77 लाख करोड़ के सहमति पत्रों पर हस्ताक्षर किये गये लेकिन आज तक केवल 2.88 करोड़ का ही वास्तविक काम वहां हुआ है। ऐसे में मोदी पर जब भाजपा में ही एका नहीं हो पा रही तो राजग में उनके नाम पर सहमति कैसे हो सकती है?

0 अजीब लोग हैं क्या खूब मुंसफी की है,

हमारे क़त्ल को कहते हैं खुदकशी की है।

इसी लहू में तुम्हारा सफीना डूबेगा,

ये क़त्ल नहीं तुमने खुदकशी की है।। 

4 Responses to “मोदीः भाजपा की ज़रूरत हो सकते हैं राजग की नहीं ?”

  1. Anil Gupta

    मेरे कमेन्ट पर श्री इक़बाल हिन्दुस्तानी जी ने अपनी प्रतिक्रिया में लिखा है की “मोदी ने दंगे नहीं कत्लेआम कराया था उन्हें मुस्लमान तो क्या सेकुलर हिन्दू भी पी एम् तो क्या सी एम् भी नहीं रहने देंगे.” मैं पूरी विनम्रता के साथ नहाई इक़बाल जी से कहना चाहूँगा की गुजरात में, जहाँ सदैव दंगों की आवृति होती रहती थी वहां २००२ के बाद दंगे क्या कोई बर्तन भी कहीं नहीं खडका, आखिर क्यों?एक बात और. हेदराबाद स्थित भारत सर्कार की प्रतिष्ठित प्रयोगशाला सेंटर फॉर सेलुलर एंड मोलिक्यूलर बायोलोजी ने देश भर से लगभग पांच लाख लोगों के सेम्पल इकट्ठे कारके उनकी डी एन ऐ टेस्टिंग की और ये निष्कर्ष निकला की देश के सभी वर्गों के लोगों का, चाहे वो उत्तर के हों या दक्षिण के, कथित आर्य हों या द्रविड़, हिन्दू हों या मुस्लिम या ईसाई, सभी का डी एन ऐ एक ही है अर्थात सभी एक ही वंश परंपरा के हैं. संघ भी यही कहता है की इस देश के सभी लोगों के पूर्वज एक ही थे और किन्ही एतिहासिक कारणों से कुछ लोगों द्वारा अपनी पूजा पद्धति बदले जाने से उनका ये रक्त सम्बन्ध ख़त्म नहीं हो जाता. लेकिन दुर्भाग्य वश वोट की राजनीती करने वालों के कारन और उनके छाद्म्धार्म्निर्पेक्ष रवैय्ये से गुमराह होकर लोग अपनी अलग पहचान पर जोर देते हैं और उन कारकों को नकारते हैं जो देश को जोड़ सकता हो.दो तीन उदाहरण दूंगा. एक बार ईद के अवसर पर दिल्ली की जामा मस्जिद में इंडोनेसिया, दुनिया का सर्वाधिक मुस्लिम आबादी वाला देश, के राजदूत भी अपनी बेटियों के साथ पधारे. उनकी बेटियों के नाम लक्ष्मी और कमला थे. वो मुस्लमान थे. जब दिल्ली के मुसलमानों ने उनकी बेटियों के हिन्दू नाम प् आपत्ति जताई तो उन्होंने स्पष्ट कहा की हमने अपना मजहब बदला है अपने बाप दादा नहीं बदले हैं. इंडोनेसिया के पूर्व राष्ट्रपति सुकर्णो मुस्लिम थे. एक बार भारत के संसदीय प्रतिनिधि मंडल में शामिल कुछ मुस्लिम सदस्यों ने उनसे उनके हिन्दू जैसे नाम के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा की इसका कारन उनके अब्बा बता सकेंगे. उनके अब्बा पांच वक्त नमाज पढने वाले मुसलमान थे.लेकिन वो महाभारत के विद्वान् थे. उन्होंने काहा की वो महाभारत में कर्ण के चरित्र से सबसे ज्यादा प्रभावित थे लेकिन चूँकि कर्ण ने कौरवों का यानि अधर्म का साथ दिया था अतः उससे फर्क करने के लिए उसके नाम से पहले प्रिफिक्स ‘सु’ अर्थात अच्छा लगा दिया था. मुस्लिम देश इंडोनेसिया में उनकी एयरलाईन का नाम ‘गरुड़ एयरलाईन’ है. वहां पूरे वर्ष रामायण व महाभारत पर नृत्य नाटिकाएं होती है. वहां की मिलिटरी इंटेलिजेंस का प्रतीक हनुमान जी है. और वहां की करेंसी के बड़े नोटों पर गणेश जी का चित्र छपता है. फिर भी उन्हें इस बात पर गर्व है की वो सबसे बड़ा मुस्लिम देश हैं और उनके पुरखे हिन्दू थे.नब्बे के दशक में कुंवर महमूद अली मध्य प्रदेश के गवर्नर थे.वो उज्जेन के प्राचीन देवी मंदिर में गए तो पत्रकारों ने उनसे कहा की जनाब आप तो मुस्लमान हो और मुस्लमान बुतपरस्त नहीं होता है फिर अप्प यहाँ क्यों आये हो? इस पर गवर्नर महमूद अली साहेब ने जवाब दिया की ‘सवाल बुत परस्ती या बुत शिकनी का नहीं. ये मंदिर यहाँ के परमार राजपूत राजाओं की कुलदेवी का मंदिर है और मैं परमार राजपूत राजों का वंशज हूँ अतः मैं तो अपने पुरखों की कुलदेवी के मंदिर के हालत का जायजा लेने आया हूँ.’ आज भी हज करने के लिए जाते समय मुस्लमान बिना सिले वस्त्र पहन कर जाते हैं जो उनकी इस्लाम पूर्व की पद्धति का ही अनुसरण है. उल्लेखनीय है की इस्लाम से पुर्व अरब देशों के साथ भारत के व्यापक व्यापारिक व सांस्कृतिक सम्बन्ध थे और बिना सिले वस्त्रों में ही तीर्थस्थानों के दर्शन की परंपरा दाक्षिण भारत केमंदिरों में आज भी है.
    तो भाई इक़बाल जी ,आज आवश्यकता इस बात की है की हम वोट के लोलुप इन छद्मधर्मनिरपेक्ष नेताओं के झूठे प्रचार से बचें और मिलकर देश को मजबूत बनाने के लिए अपने अपने समाज के बीच के कोमन सूत्रों को जोर देकर सामने रखे. आखिर इस देश के बीस करोड़ मुस्लमान भी भारतमाता की ही संतानें हैं. चाहे वो भारतमाता की जय का नारा लगाने से परहेज ही क्यों न करें.गुजरात २००२ के प्रारभिक बिंदु अर्थात गोधरा ट्रेन बर्निंग को भी कृपया याद करें और कभी उनके बारे में भी अपनी संवेदना का इजहार कर दिया करें.साथ ही देश में छाद्म्धार्म्निरापेक्ष्ता बनाम हिंदुत्व पर बहस को भी आगे बढ़ाएं.

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  2. डॉ राजीव कुमार रावत

    इकबाल जी
    बहुत अच्छा लिखा है आपने। लेख से सहमत अथवा असहमत हुआ जा सकता है। लेखक को हिंदू अथवा मुसलमान नहीं होना चाहिए और इसी प्रकार पाठक को भी हिंदू मुसलमान नहीं होना चाहिए किंतु दोनों ही होते हैं। इस लिए मैं अपने जीवन में इस दरार से ही काम चलाना सीख गया हूं क्यों कि इसे भर तो नहीं सकता किंतु न बढ़ाऊं यह प्रयास अवश्य कर सकता हूं। इस लेख में लेखक कम मुसलमान ज्यादा दिखा वरना आपके लेख को पढ़ना पहली प्राथमिकता होती है, हो सकता है यह मेरा हिंदू पाठक हो।
    थोड़ा और सार्थक लिखें। भाजपा के १९७७ में जन्म से पूर्व पूरे देश में कितने दंगे हुए और कौंन कौंन से मुख्यमंत्री जिम्मेदार थे कृपया प्रकाश डालें। कश्मीर में हिंदू किस हाल में हैं और कितने वर्ष उन्हें बेघर हुए हो गए कृपया उस पर भी अपनी लेखनी चलाएं। आपके दिए आंकड़ों में सच्चाई होगी तो लोकतंत्र में जनता को अगर समझ आ गया तो आगे दिखा देगी, इसमें लेखक पाठक को क्यों झगड़े में पड़ना चाहिए। मोदी चाहे प्रधानमंत्री बन जाएं या मुख्यमंत्री भी न रहें, क्या हम लोगों को कोई फर्क पड़ेगा ? मीडिया को जज की भूमिका में आने के लिए बहुत योग्य और निरपेक्ष होना पड़ेगा जो कि वह नहीं है।
    आपसे थोड़ा और सार्थक लेखन की अपेक्षा रहती है इस गंदगी से अलग का। खासतौर से आपके शेर।
    सादर

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  3. Anil Gupta

    भाई इक़बाल जी, आपने अपनी सोच के अनुसार जो लिखा है वह ठीक ही होगा. लेकिन मैं एक बात की और आपका ध्यान आकर्षित करना चाहूँगा की हाल में जितने ओपिनियन पोल हुए हैं उनमे मोदी को पी एम् पद के लिए सबसे आगेमाना गया है. ये सर्वे केवल संघियों अथवा भाजपाइयों के बीच नहीं हुए थे बल्कि पूरे देश में विभिन्न तबकों के बीच हुए थे.भाजपा के पिछले दो चुनावों में पिछड़ने का मुख्य कारन पब्लिक के परसेप्शन में उनका अपने घोषित हिंदुत्व के सिद्धांतों से भटकना था.आक्रामक हिंदुत्व के सहारे भाजपा देश की राजनीती के केंद्र में आने में सफल हुई थी और भाजपा ने अपनी उदार छवि बनाने के लिए कुछ मुद्दे पीछे रख दिए थे लेकिन ये नीति असफल रही और अब सर्वेक्षणों के अनुसर्देश का सबसे बड़ा वर्ग मोदी को पी एम् के रूप में देखना चाहता है.मैं हिन्दू मुस्लिम दंगों के इतिहास के बारे में चर्चा नहीं करूँगा लेकिन गुजरात में ही १९६९ में गाँधी जन्मशताब्दी वर्ष में भयंकर दंगे हुए थे जिनमे पाकिस्तान से आये खान अब्दुल घफ्फार खान भी फंस गए थे जिन्हें निकलने के लिए इंदिराजी को दिल्ली से विशेष सुरक्षा दल भेजना पड़ा था. उन दंगो में सरकारी आंकड़ों के अनुसार २००२ से लगभग ढाई गुना लोग मारे गए थे जबकि गैर सरकारी आंकड़ों के अनुसार २००२ से लगभग चौदह गुना (अर्थात ११०० के विरुद्ध १५०००) लोग मरे गए थे और कंग्रेस्सी मुख्या मंत्री हितेंद्र देसाई को कोई याद भी नहीं करता है.१९८७ में मेरठ में तत्कालीन केन्द्रीय गृह राज्य मंत्री(आंतरिक सुरक्षा) पी.चिदंबरम और कांग्रेसी मुख्या मंत्री वीर बहादुर सिंह के निर्देश पर पी ऐ सी ने सेंकडों निर्दोष मुस्लिम युवकों को गोली से उड़कर गंग नाहर में बहा दिया लेकिन २५ साल बीतने के बावजूद आज तक किसी को कोई सजा नहीं मिली और कोई इस घटना का जिक्र भी नहीं करता है.आज गुजरात में हिन्दू मुस्लमान सभी बिना किसी भेदभाव के तरक्की कर रहे हैं. लेकिन मिडिया आज भी मोदी को चर्चा में बनाये हुए है. वास्तव में आप लोगों ने ही मोदी को एक हिन्दू आईकोन के रूप में स्थापित कर दिया है. जो हिन्दुत्ववादियों के लिए तो अच्छा ही है. जितने आप मोदी को कोसेंगे उतना ही उनका कद बढेगा.

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  4. tapas

    इकबाल जी …
    एक बात पर मैं आपका समर्थन करता हूँ की चाहे कुछ भी हो जाये… मोदी PM नही बन पाएंगे…
    और बाकि की जो बाते आपने लिखी है उसके लिए आपको गालिया देने वाले हजारो है … देखते जाइये ….
    कई लोग पुराने दंगे और उनमे मरे गए लोगो के आंकड़े देंगे … कुछ विकास से सम्बंधित आंकड़े देंगे … जो अंतहीन वार्ता है

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