जीवन का पल-पल लक्ष्मण रेखा

  • एसपी जैन

नियमों में बंधना मनुष्य के आनन्द और विकास की अचूक औषधि है। इतिहास गवाह है,  सीता ने किस प्रकार लक्ष्मण रेखा का उल्लंघन कर अपने जीवन को कष्टमय और दुःखमय बना डाला था। काश, वह रेखा जो लक्ष्मण के विश्वास पर आक्षेप लगने पर उनकी रक्षा हेतु खींची गयी थी, अगर नहीं लांघी गई होती, तो रामायण में धोबी पुराण, अग्नि परीक्षण, पिता-पुत्रों के मध्य युद्ध जन्म नहीं ले पाता। इसमें कोई संदेह नहीं है, प्रत्येक प्राणी अपने कार्यों कृत्यों, विचारों और निर्णय से ही सुख और दुःख का कारण बनता है, सीता भी अपवाद नहीं बन पाई। प्रकृति भी अपने नियमों से बंधी है। सूर्य, चन्द्रमा, ऋतुएं, पर्वत, नदियां, वन लहलहाते खेत, समुद्र, पेड़, पौधे, सदियों से समयानुसार अनुशासित रहकर हमारे जीवन का एकमात्र आधार बनी हुई है। इतिहास गवाह है, जब-जब मानवीय भूलों से जीवन दायिनी प्राकृतिक सम्पदा अनियमित हुर्ह है, प्राणी मात्र को भीषण आपदाओं  और विपत्तियों का सामना करना पड़ा है। नियम के साथ त्याग जुड़ा हुआ है, नियमों के पालन में हमें अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण करना पड़ता है। स्वंय को संकल्पित कर ही नियमों का पूर्ण रूप से पालन किया जा सकता है। नियमबद्धता, त्यागपूर्ण इच्छा रहित संकल्पित भाव ही धर्म है परन्तु दुर्भाग्यवश प्रत्येक सम्प्रदाय ने धर्म के नाम पर विभिन्न औपचारिकताएं निर्धारित कर रखी हैं। धार्मिक स्थलों पर प्रार्थना हेतु समय, भाव भंगिमा, पूजा आरती, भजन, नृत्य, भोग इत्यादि आवश्यक किए हुए हैं, जिनका निर्वाह होना किसी आश्चर्य को जन्म नहीं देता, क्योंकि ऐसा करने में हमें किसी भी प्रकार की मानसिक, शारीरिक परेशानी नहीं होती और मान लिया जाता है कि धर्म का पालन हो गया। हम भूल जाते हैं, त्याग करने से पूर्व धर्म संभव नहीं, चाहे वह किसी भी रूप में क्यों ना हो।

काश हमारे प्रत्येक पुरूषार्थ में भी नियमों-नैतिकता का समावेश होता है। प्रत्येक क्षेत्र चाहे व्यापारिक हो, राजनीतिज्ञ, सामाजिक, धार्मिक या और कोई अन्य क्षेत्र हो, हम नियमों को भूल जाते हैं। सीमा लांघ जाते हैं। सजा पाते हैं। सुख से वंचित रह जाते हैं। शराब, जुआ सरीखी विकृतियाँ भी अगर नियमबद्धता के माध्यम से तथाकथित सुख मानकर भोगी जाए तो उतनी विषाक्त नहीं होगी, जितना उन पर अंकुश नहीं लगने के कारण अनियंत्रित होने पर परिवार सहित दुःख भोगना पड़ेगा। नियम हमारी इच्छा शक्ति के निर्माण में बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करता है। उपवास वाले दिन हमारी इच्छा शक्ति मजबूती प्राप्त करती है, क्योंकि उस दिन हम अपनी इच्छाओं का दमन नहीं अपितु उन पर नियंत्रण रखते हैं। इच्छा के मालिक बन जाते हैं। इच्छा हमारी गुलाम बन जाती है जबकि अन्यत्र दिनों में इसके विपरीत होता है। हम कभी भी किसी कार्य में सफल नहीं हो पाते, जब तक हम अपने को नियम से नहीं बांधते। उदहारण के तौर पर एक विद्यार्थी अच्छे अंकों से तब तक परीक्षा में सफल नहीं हो पाता जब तक वह नियम नहीं बना लेता कि उसे वर्ष भर नियमित प्रत्येक दिन तय घंटे अवश्य पढ़ना है। यह नियम उसके लक्ष्य की प्राप्ति में सहयोगी होता है। नियम का सुफल तभी मिल पाता है, जब निरतंरता उसके साथ सम्मिलित की जाए। जिस प्रकार हमें प्रत्येक दिन सुबह-शाम भोजन की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार प्रत्येक नियम के साथ निरंतरता आवश्यक रूप से बंधी हुई है, अन्यथा वह अधूरा, परिणाम विहीन है। फलदायक नहीं है।

पशु और इंसान में मात्र फर्क इतना ही है कि पशु नियम बना नहीं सकता है। वह जैसा है, उसे वैसा ही रहना है। उसके जन्म और जीवन में कोई भिन्नता नहीं होती है। परिवर्तन की कोई संभावना नहीं है। मनुष्य में सदैव परिवर्तन की संभावना नहीं होती है। उसे जन्म मिला है, जीवन बनाना शेष है। नियमों और संकल्पों के माध्यम से आकांक्षा अनुरूप जीवन सहजता से प्राप्त किया जा सकता है। अगर मनुष्य में नियमों और संकल्पों का पालन करने का साहस नहीं हो पाता है, तो उसमें और पशु में कोई ज्यादा भिन्नता नहीं रह जाती क्योंकि किसी भी स्थिति में वह जन्म तक ही सीमित रह जाता है। जीवन पाने की कल्पना हो नहीं पाती है। सुखमय जीवन की कल्पना लक्ष्मण रेखा के सम्मान में ही निहित है। नियमों के पालन से अनैतिक कार्यों का होना संभव नहीं होता है। हमें प्रभु कृपा प्राप्त होती है। मंदिर, मस्जिद, गिरजाघर, गुरूद्वारे में जाकर हमारी यही प्रार्थना होनी चाहिए कि परमात्मा हमें इतनी शक्ति प्रदान करें, हम नियमों और संकल्पों की डोर से बंधे। उनकी उपेक्षा-अवहेलना हमसे  कभी न हो। प्रभु के द्वार पर हम धन्यवाद, अनुगृहीत भाव के साथ ही जाए। अगर कोई इच्छा हो तो बस इतनी कि हे प्रभु अज्ञानतावश हुई भूलों को क्षमा करते हुए अपनी करूणा दृष्टि हम सभी पर बनाए रखें। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि एक संत मानव से महामानव बन जाता है। केवल अपने को असधारण नियम और संकल्पों से बांधकर। कड़वा सच यह है, इनके अकल्पनीय त्याग की व्याख्या शब्दों के माध्यम से संभव नहीं है, काश, हम उनकी परछाई बन पाते।

हम अपनी विभिन्न वर्जनाओं के साथ किसी न किसी रूप में दैनिक जीवन यापन करते हैं, वही वर्जनाएं हमारी लक्ष्मण रेखा बन जाती है। बच्चों के लिए मुहल्ले की सीमा, स्कूल में बाउंड्री वॉल, बेटी-बहू के लिए गांव की सीमा, अकेले वीरान और वन्य प्रदेश में न जाना, अपरिचित और अवांछित व्यक्तियों से एकांत में चर्चा आदि न करना, जैसे निर्देश हम समय -समय स्वजनों को देते रहते हैं, ये ही निर्देश लक्ष्मण रेखा बन जाती हैं। जीवन में वाह्य लक्ष्मण रेखा की मानिंद आंतरिक लक्ष्मण रेखा भी होती है। दरअसल लक्ष्मण रेखा मर्यादा, संयम, संकल्प और समर्पण के प्रतीक है। भगवान श्रीराम ने कहा था, जब कभी कोई इस मर्यादा की रेखा को पार करेगा, उसे रावण रूपी संकट का सामना करना ही होगा। अब कोविड-19 संकट के बीच लक्ष्मण रेखा कहती है, डब्ल्यूएचओ की गाइडलाइन्स का सख्ती से पालन कीजिएगा ताकि आप खुद, आपका परिवार और समाज सुरक्षित रह सके। हमारे यशस्वी प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी भी हमें लक्ष्मण रेखा पार न करने को लेकर बार-बार आगाह करते रहते हैं।

(लेखक तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी में निदेशक एडमिशंस हैं। श्री जैन की पठन-पाठन और देशाटन में गहरी रुचि है। वह अब तक 20 देशों का भ्रमण कर चुके हैं।

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