सूखे के हालात निर्मित करता मानसून

प्रमोद भार्गव

देश  के माथे पर मानसून ने चिंताएं गहरा दी है। इस

साल पिछले 12 सालों में मानसून की गति धीमी है। आम

तौर पर इस समय तक देश  के दो तिहाई हिस्सों में -हजयमा-हजयम

बारिश  हो जाती है, किंतु अभी इसकी पहुंच बमुश ्किल 10 से

15 फीसदी क्श ेत्रों में हुई है। एक जून से अब तक औसतन

यह 44 प्रतिश त कम बारिश  का संकेत है। जून के अंत तक 40

फीसदी के इर्द-ंउचयगिर्द इस स्थिति के बने रहने की आश ंका

है। हालांकि मौसम पूर्व आई बरसात ने राजस्थान समेत

दक्श िण भारत के कुछ क्श ेत्रों में ठीक-ंउचयठाक बारिश  कर दी

है। इस साल मानसून की श ुरूआत ही आठ दिन की देरी से केरल

के तट पर हुई थी, लेकिन बाद में गुजरात में आए वायु

चक्रवात के कारण इसकी रफ्तार पहले तो धीमी हुई और फिर

जैसे थम ही गई। जबकि इस समय तक देश  के आधे से ज्यादा

भू-ंउचयभाग में बादलों को को बरस जाना चाहिए था।

अलबत्ता देश  भयावह पेयजल के संकट से जू-हजयता दिखाई दे

रहा है। चेन्नई में बूंद-ंउचयबूंद पानी को लोग तरस गए

हैं। यहां कि आईटी और आॅटोमोबाइल कंपनियों

ने अपने कर्मचारियों को घर से पानी लाने के निर्देश  दे

दिए है। मौसम विभाग के ताजा आंकड़ों ने बताया है

कि इस साल 84 प्रतिश त उप संभागों में कम बारिश  दर्ज की

गई है। दूसरी तरफ आईआईटी गांधीनगर की रिपोर्ट

के अनुसार देश  के 40 फीसदी से अधिक सूखे का संकट गहरा

गया है। केंद्रीय जल आयोग ने बताया है कि देश  के प्रमुख

91 जलाश यों में 17 प्रतिश त ही पानी बचा है। साफ है, इस

भयावह जल संकट ने खेती-ंउचयकिसानी के लिए भी संकट खड़ा

कर दिया है।

इन अध्ययनों से देश  के नीति-ंउचयनियंताओं को चेतने

की जरूरत है, क्योंकि हमारी खेती-ंउचयकिसानी और 70 फीसदी

आबादी मानसून की बरसात से ही रोजी-ंउचयरोटी चलाती है

और देश  की अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार भी खेती

है। गोया, इस हद तक मानसून का कमजोर होना हमारी

-सजयाई ट्रिलियन डाॅलर की अर्थव्यवस्था के लिए खतरनाक

संकेत है। सालाना बारिश  में जून और सितंबर के बीच 70

प्रतिश त पानी बरसता है। चूंकि यह पानी अब तक काम-ंउचयचलाउ

भी नहीं बरसा है। इसलिए खरीफ फसलों की समय पर बुवाई

भी नहीं हुई है। कृशि मंत्रालय द्वारा जारी आंकड़ों

के अनुसार 14 जून तक 8.22 मिलियन हेक्टेयर रकबे में ही

बुबाई हो पाई है, जो इसी अवधि में पिछले साल हुई

बुवाई के आंकड़ों से 9 प्रतिश त कम है। फसलों की

बुवाई का समय निश ्चित होता है, यदि बारिश  नहीं होने के

चलते यह टलता गया तो देश  को भारी संकट से दो-ंउचयचार

होना पड़ सकता है।

दरअसल वह खेती-ंउचयकिसानी ही है, जो समूची आबादी

को अनाज, दालें और तिलहन उपलब्ध कराती है। देश  के

ज्यादातर व्यवसाय भी कृशि आधारित हैं। देश  की जीडीपी

में कृशि का योगदान 15 फीसदी है। देश  में मौसम का

अनुमान लगाने वाली सरकारी एजेंसी के साथ निजी एजेंसी

स्काईमेट भी है, लेकिन दोनों के अनुमान कसौटी

के धरातल पर खरे नहीं उतरे। प्रत्येक साल अप्रैल-ंउचयमई में

मानसून आ जाने की अटकलों का दौर -रु39याुरू हो जाता है।

यदि औसत मानसून आये तो दे-रु39या में हरियाली और समृद्धि की

संभावना ब-सजय़ती है और औसत से कम आये तो पपड़ाई

धरती और अकाल की क्रूर परछाईयां देखने में आती

हैं। मौसम मापक यंत्रों की गणना के अनुसार यदि 90 प्रतिश त

से कम बारिश  होती है तो उसे कमजोर मानसून कहा जाता

है। 90-ंउचय96 फीसदी बारिश  इस दायरे में आती है। 96-ंउचय104

फीसदी बारिश  को सामान्य मानसून कहा जाता है। यदि बारिश 

104-ंउचय110 फीसदी होती है तो इसे सामान्य से अच्छा

मानसून कहा जाता है। 110 प्रतिश त से ज्यादा बारिश  होती है

तो इसे अधिकतम मानसून कहा जाता है।

मौसम वैज्ञानिकों की बात मानें तो जब

उत्तर-ंउचयप-िरु39यचमी भारत में मई-ंउचयजून तपता है और भी-ुनवजयाण

गर्मी पड़ती है तब कम दाव का क्श ेत्र बनता है। इस कम दाव

वाले क्श ेत्र की ओर दक्श िणी गोलार्ध से भूमध्य रेखा के

निकट से हवाएं दौड़ती हैं। दूसरी तरफ धरती की परिक्रमा

सूरज के इर्द-ंउचयगिर्द अपनी धुरी पर जारी रहती है। निरंतर चक्कर

लगाने की इस प्रक्रिया से हवाओं में मंथन होता है और

उन्हें नई दि-रु39याा मिलती है। इस तरह दक्श िणी गोलार्ध से

आ रही दक्श िणी-ंउचयपूर्वी हवाएं भूमध्य रेखा को पार करते ही

पलटकर कम दबाव वाले क्श ेत्र की ओर गतिमान हो जाती हैं।

ये हवाएं भारत में प्रवे-रु39या करने के बाद हिमालय से टकराकर

दो हिस्सों में विभाजित होती हैं। इनमें से एक हिस्सा

अरब सागर की ओर से केरल के तट में प्रवे-रु39या करता है और

दूसरा बंगाल की खाड़ी की ओर से प्रवे-रु39या कर उड़ीसा,

प-िरु39यचम-ंउचयबंगाल, बिहार, -हजयारखंड, पूर्वी उत्तर-ंउचयप्रदे-रु39या,

उत्तराखण्ड, हिमाचल-ंउचयप्रदेश  हरियाणा और पंजाब तक बरसती

हैं। अरब सागर से दक्श िण भारत में प्रवे-रु39या करने वाली हवाएं

आन्ध्र-ंउचयप्रदे-रु39या, कर्नाटक, महारा-ुनवजयट्र, छत्तीसग-सजय़, मध्य-ंउचयप्रदे-रु39या

और राजस्थान में बरसती हैं। इन मानसूनी हवाओं पर

भूमध्य और क-रु39ययप सागर के ऊपर बहने वाली हवाओं के मिजाज

का प्रभाव भी पड़ता है। प्र-रु39याांत महासागर के ऊपर

प्रवाहमान हवाएं भी हमारे मानसून पर असर डालती हैं।

वायुमण्डल के इन क्श ेत्रों में जब विपरीत परिस्थिति निर्मित

होती है तो मानसून के रुख में परिवर्तन होता है और

वह कम या ज्यादा बरसात के रूप में धरती पर गिरता है।

अब मानसून की कछुआ चाल को नापने का जो

आंकड़ा मौसम विभाग ने दिया है, वह सूखे का स्पश्ट

संकेत दिखाई दे रहा है। 22 जून तक विभाग ने औसतन

39 फीसदी कम बारिश  दर्ज की है। बारिश की गणना करने के

लिए विभाग ने जो संभाग बनाए हैं, उनके 84 प्रतिश त

उपसंभागों में कम बारिश  दर्ज की गई है। ओडिश ा

और लक्श द्वीप संभागों में सामान्य वर्शा दर्ज की गई

है। जबकि जम्मू-ंउचयकश ्मीर और पूर्वी राजस्थान में अधिक

वर्शा हुई है। इनके विपरीत अंडमान और निकोबार द्वीप

समूह में बहुत अधिक वर्शा हुई हैं। भारतीय मौसम

विभाग ने इस गणना के लिए चार संभाग बनाए हैं। इनमें

पूर्व एवं उत्तर पूर्व, दक्श िणी प्रायद्वीप, मध्य-ंउचयभारत और

उत्तर-ंउचयपश ्चिम भारत है। पूर्व एवं उत्तर-ंउचयपूर्व संभाग के

राज्य बिहार, -हजयारखंड और पश ्चिम बंगाल में कम बारिश  हुई

है। महाराश्ट्र के विदर्भ, मराठावाड़ और

मध्य-ंउचयमहाराश्ट्र सहित चार उप-ंउचयसंभागों में बेहद कम बारिश 

हुई है। इन क्श ेत्रों के जलाश यों में जल बिल्कुल निचले

स्तर तक पहुंच जाने के कारण सूखे की स्थिति निर्मित हो

गई है। गंभीर जल-ंउचयसंकट से जू-हजय रहे चेन्नई,

तमिलनाडू, पुड्डुचेरी और कराईकल उप-ंउचयसंभागों

में करीब 38 फीसदी कम बारिश  हुई है। चेन्नई के

प्रमुख चारों तालाब सूख जाने से पेयजल का संकट ब-सजय़ गया

है। इस संकट को दूर करने के लिए वेल्लोर और जोलारपेट

से एक करोड़ लीटर पानी विश ेश रेल से मंगाया गया है।

कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरू का भूजल स्तर पिछले दो

दश क में दस से बारह मीटर नीचे खिसक गया है। महाराश्ट्र 47

साल का सबसे बड़े सूखे के संकट की त्रासदी -हजयेल रहा है।

नीती आयोग की रिपोर्ट के अनुसार अगले साल ऐसे ही जल

संकट के दायरे में 10 करोड़ लोग आ जाएंगे। 2030 तक

तो देश  की 40 फीसदी आबादी इस संकट के दायरे में

होगी। ऐसा नहीं है कि देश  इन हालातों से निपटने में

सक्श म नहीं है। अलबत्ता चिंता का बड़ा कारण यह है कि

नदियों, तालाबों और देश  के अन्य परंपरागत जल स्रोतों

को संभालने की बजाय उन्हें नश्ट करने की नीतियां

अस्तित्व में बनी हुई है। आपात स्थिति से निपटने के लिए

कोई दूरगामी कार्य योजना भी दिखाई नहीं दे रही

है। लिहाजा सूखे और पेयजल का संकट फिलहाल तो गंभीर

ही बना रहने वाला है।

प्रमोद भार्गव

-रु39याब्दार्थ 49,श्रीराम काॅलोनी

-िरु39यावपुरी म.प्र.

मो. 09425488224,9981061100

फोन 07492 404524

लेखक वरि-ुनवजयठ साहित्यकार और पत्रकार हैं।

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