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    मानसून आने वाला है

    मई और जून की तपती गर्मी के बाद होने वाली बारिश को मानसून कहा जाता है। तुम तो जानते हो कि बारिश के लिए बादलों वाला पानी होना जरूरी है, तभी तो बारिश होगी। तुमने यह भी सुना होगा कि इस बार मानसून देर से आएगा या बारिश कम होगी। इस मानसून के बारे आओ तुम्हें और भी बहुत-सी बातें बताते हैं:
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    monsoon
    ग र्मी से जन-जीवन बेहाल है, कड़ी धूप और पसीने वाली इस गर्मी से तो बारिश का मौसम ही निजात दिला सकता है। पशु, पक्षी, ख्ोत सभी को मानसून यानि बरसात का इंतजार रहता है। तुम्हें भी बरसात का मौसम अच्छा लगता होगा। बारिश में भीगना और फिर चारों ओर फैली हरियाली देखकर मन कितना खुश हो उठता है।

    मानसून यानी बारिश
    का मौसम
    हिंद महासागर और अरब सागर से भारत के दक्षिण-पश्चिम तट पर आने वाली हवाओं को मानसून कहते हैं। ये हवाएं पानी वाले बादल ले आती हैं, जो भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश यानी भारतीय उपमहाद्बीप में बरसते हैं। मानसून ऐसी मौसमी पवन है, जो दक्षिणी एशिया क्षेत्र में जून से सितंबर तक चलती रहती है। यानि भारत में चार महीने बारिश का मौसम होता है। आम हवाएं जब अपनी दिशा बदल लेती हैं तब मानसून आता है। केरल के तट से सैकड़ों मील दूर मानसूनी हवाएं अपने साथ नमी लेकर आती हैं, जो धीरे-धीरे भारतीय महाद्बीप की ओर बढ़ती हैं। मानसूनी हवाएं ठंडे से गर्म क्षेत्रों की तरफ बहती हैं तो उनमें नमी की मात्रा बढ़ जाती है, जिस कारण बरिश होती है।
    कैसे होती है बारिश
    हिंद महासागर और अरब सागर की मानसूनी हवाएं हिमालय की ओर बढ़ने से पहले भारत के दक्षिण-पश्चिम तट पर पश्चिमी घाट से टकराती हैं तो केरल और दक्षिण भारत में पहले बारिश होती है। फिर इनमें से बची हुई मानसूनी हवाएं हिमालय की ओर बढ़ती हैं और फिर उत्तर-पूर्व भारत में भारी बारिश करती हैं। इस तरह पूरे भारत में बारिश का मौसम आ जाता है। ये सिलसिला जून से सितंबर तक चलता रहता है। भारत की जलवायु गर्म है, इसलिए यहां पर दो तरह की मानसूनी हवाएं चलती हैं। जून से सितंबर तक चलने वाली मानसूनी हवाएं दक्षिणी पश्चिमी मानसून कहलाती हैं, जबकि ठंडी में चलने वाली मानसूनी हवा, जो मैदान से सागर की ओर चलती है, उसे उत्तर-पूर्वी मानसून कहते हैं। यहां पर अधिकांश वर्षा दक्षिण-पश्चिम मानसून से ही होती है।
    मानसून का पूर्वानुमान
    मानसून की अवधि 1 जून से 3० सितंबर यानी चार महीने की होती है। मानसून की भविष्यवाणी 16 अप्रैल से 25 मई के बीच कर दी जाती है। भविष्यवाणी के लिए भारतीय मानसून विभाग कुल 16 फैक्ट का अध्ययन करता है। 16 फैक्ट को चार भागों में बांटा गया है और सारे तथ्यों को मिलाकर मानसून के पूर्वानुमान निकाले जाते हैं।=

    जून में उत्तरी अमेरिका में भी होती है बारिश

    उत्तरी अमेरिकी मानसून को शॉर्ट में गइM से भी जाना जाता है। ये मानसून जून के अंत या जुलाई के आरंभ से सितंबर तक रहता है। गइM मानसून की नमी वाली हवाएं मैक्सिको की खाड़ी से बनता है, जोकि यूनाइटेड अमेरिका में जुलाई तक खूब बरसता है। उत्तरी अमेरिकी मॉनसून को समर, साउथवेस्ट, मैक्सिकन या एरिजोना मानसून के नाम से भी जाना जाता है। इसे कई बार डेजर्ट मानसून कहा जाता है, क्योंकि इसके प्रभावित क्षेत्रों में अधिकांश भाग मोजेव और सोनोरैन मरुस्थलों
    के हैं।

    कैसे मापा जाता है बारिश को?
    कितनी बारिश हुई है, यह मापने के लिए मौसम विज्ञानी रेन गॉग का उपयोग करते हैं। रेन गॉग यह बताता है कि एक निश्चित समय में कितनी वर्षा हुई है। अधिकतर रेन गॉग में वर्षा मिलीमीटर में ही मापी जाती है। 1662 में क्रिस्टोफर व्रेन ने ब्रिटेन में पहला रेन गॉग बनाया था। रेन गॉग यंत्र में एक फनल होती है, जिसमें वर्षा का जल इकट्ठा होता है और फिर पता लगाया जाता है कि कितनी बारिश हुई है। ये जरूरी नहीं कि रेन गॉग हमेशा बारिश की सही जानकारी दे, क्योंकि कई बार बहुत तेज तूफान के साथ बारिश होने पर जानकारी लेना असंभव हो जाता है। ऐसे में यंत्र में ही टूट-फूट होने की आशंका रहती है। इसके साथ रेन गॉग किसी एक निश्चित स्थान की वर्षा को मापने में ही प्रयोग किया जा सकता है, बहुत ज्यादा बड़े इलाके की वर्षा इससे नहीं मापी जा सकती। रेन गॉग को पेड़ और इमारत से दूर रखा जाता है ताकि वर्षा का मापन ठीक-ठीक हो सके। ओले या बर्फबारी के समय भी रेन गॉग से वर्षा का मापन नहीं हो पाता है।

    अभिषेक कांत पांडेय
    अभिषेक कांत पांडेय
    पत्रकार एवं टिप्पणीकार शिक्षा— पत्रकारिता से परास्नातक एवं शिक्षा में स्नातक की डिग्री

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