लेखक परिचय

शादाब जाफर 'शादाब'

शादाब जाफर 'शादाब'

लेखक स्‍वतंत्र टिप्‍पणीकार हैं।

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शादाब जफर ‘‘शादाब’’

दुनिया ने आज भले ही चाहे कितनी तरक्की कर ली हो, पर हम लोगो द्वारा स्थापित दिखावे की तैयार की गई इस संस्कृति से हमारे अपने जीवन और समाज में अशांति और विषमता आज लगातार बढती जा रही है। जिसने कई बुनियादी रिश्तो के साथ ही आज समाज में मॉ और बच्चे के रिश्तो की बुनियाद को हिला कर रख दिया है। आज भागमभाग वाले इस जमाने में अधिकतर मॉओ को अपने बच्चो के पास रहने का वक्त ही नही है। आज भयंकर मंहगाई के इस दौर में रोजमर्रा की जरूरतो को पूरा करने में परिवार के दोनो पहिये कमाई करने में लगे है। नतीजन बच्चे को आया पाल रही है या फिर परिवार का दूसरा कोई सदस्य। ऐसी स्थिति में बच्चे को मॉ का प्यार दुलार नही मिल पा रहा है, वो गोद नही मिल पा रही है जिस में लेट कर वो घंटो घंटो गहरी नींद सोता है, वो कंधा नही मिल पा रहा है जिस से लग कर उसे मॉ के दिल की घडकन सुनाई देती है, वो छाती नही मिल पा रही है जिस से मुॅह लगा कर वो अपना पेट भरता है। बच्चे के जीवन के शुरूआती सालो में ही नैतिक कार्य की जडे उस में विकसित होती है अगर इस समयावधि में बच्चे की सही देखभाल न की जाये तो आगे चलकर उस के षारीरिक और मानसिक विकास और जीवन पर इस का बहुत बडा असर पडता है। स्वभाविक है कि ऐसी स्थिति में जब बच्चे को मॉ की गोद, स्नेह, दुलार नही मिलेगा तो वो सारा दिन रोते हुए ही व्यतीत करेगा। आज देखने में ये आता है कि मॉ के घर से निकलते ही आया बच्चे पर कोई ध्यान नही देती बच्चे को सोफे या पालने में डाल आया टीवी देखने में व्यस्त हो जाती है बच्चा हॅस रहा है या रो रहा है उस की सेहत पर इस का कोई असर नही पडता। बच्चा घंटो घंटो रोता रहता है बग्घी या पालने में पडा रहता है। आज बच्चो के अपहरण की वजह से हाई सोसाईटी के ये मॉ बाप अपनी आया या परिवार के किसी सदस्य को बच्चो को घर के बाहर घुमाने की इजाजत भी नही देते। आज बच्चे का समुचित विकास नही हो पा रहा है जिस से आज हमारे समाज में एक अपेक्षाकृत अक्ष्म पीढी तैयार हो रही है।

सचमुच आज हमारे समाज में ऐसा ही हो रहा आज बच्चो के जीवन से मॉ गायब हो चुकी है। अब से दो दशक पहले तक बच्चो को मॉ हमेशा अपने साथ और सीने से लगा कर रखती थी। पर अब बच्चो का ज्यादा समय बग्गी, ट्रॉली, पालने, बेबी सीट, आया की गोद या फिर कार की सीट पर बीतता है। पहले मॉ बच्चे के रोने या किसी भी हरकत पर उसे लेकर फौरन हरकत में आ जाती थी। बच्चा ज्यादा देर मॉ से दूर होकर परेशान नही हो पाता था। पर आज बच्चो को रोने के लिये छोड दिया जाता है। आज की आधुनिक मॉए इस के पीछे ये तर्क देती है कि इस से बच्चा रात में खुद भी सही से सोएगा और हमे भी चैन से सोने देगा। पहले जमाने में बच्चो को तीन चार साल तक मॉ अपना दूध पिलाती थी। आज कुछ चुंनिदा माताए ही अपने बच्चो को दूध पिलाती है। आध्ुनिक मॉए तीन दिन भी अपने नवजात बच्चे को दूध नही पिलाती और तर्क देती है कि स्तन खोलकर बच्चे को दूध पिलाने से बैकवर्ड फीलिंग होता है। फीगर बिगड जाती है वो खुद को देहाती मॉ कहलाना नही चाहती। जब कि एक षोध के अनुसार बच्चो को साथ साथ रखने, उसे सीने से लगाकर पुचकारने, दुलारने, रोने के लिये अकेला न छोडने, ज्यादातर समय घर के बाहर व्यतीत करने और महीनो की जगह वर्षो बच्चो को स्तनपान कराने से शरीर ताकतवर होने के साथ ही उन के कल्याण और नैतिक मूल्यो में वृद्धि होती है। मॉ द्वारा बच्चो का जोश-ओ-खरोश और जिम्मेदारी पूर्वक ध्यान रखने से बच्चा शांत रहने के साथ ही दिन रात चैन की नींद लेता है जिस के कारण बीमारियो से बचने के साथ ही बच्चे के शरीर का संपूर्ण विकास होता है। पहले जमाने में मॉ बाप के आलावा बच्चे का ध्यान पारिवारिक सदस्य रखते थे। पर आज गुजरे कुछ वर्षा मे हमारे घरो की तस्वीर तेजी से बदली है बच्चो से बात करने की उनके पास बैठने उसे दुलारने निहारने की आज की आधुनिक मॉ को फुरसत नही। क्यो कि वो तो नौकरी, किटटी पाॅिट्रयो ,शापिंग घरेलू कामो में उलझी है। दादा दादी ज्यादातर घरो में है नही। ज्यादातर हाई सोसायटी घरो में एक बच्चा है। घर में अकेला बच्चा रोने के अलावा क्या करे किस से बोले किस के साथ खेले आया के साथ माली के साथ, आखिर कब तक खेले इन से लिपट कर चिपट कर इन कंधे से लगकर उसे वो गंध वो सुगंध नही आती जो उस की मॉ की है। इन के सीने से लग कर बच्चे को वो धडकन सुनाई नही देती जो इस के मॉ के दिल से निकलती है। पडोस, पडोसी से इन पॉश कालोनी वालो का कोई वास्ता नही होता। बच्चा अकेलेपन ,सन्नाटे ,घुटन और उपेक्षा के बीच बडा होता है। बच्चे को ना तो अपने मिलते है और ना ही अपनापन। पहले जमाने में बच्चे को घर से बाहर निकलकर अलग अलग आयु वर्ग के बच्चो के साथ खेलने की पूरी आजादी थी। पर आज बच्चे को एक काल कोठरी रूपी कमरे में बंद कर दिया जाता है। जिस में उसे सोफे पर बैठ कर पूरे दिन अकेले टीवी, डीवीडी, कंप्यूटर पर वीडियो गेम्स खेलते हुए समय काटना पडता है।

आज दूधमुहे बच्चो की दुनिया लाचारी भरी होने के साथ ही उन के जीवन से मॉ का प्यार, दुलार, लोरी, मॉ की गोद और मॉ का दूध खत्म होता जा रहा है। आने वाले समय में हम किसी को ये भी नही कह कर ललकार सकते की मॉ का दूध पीया है तो सामने आजा। आज की आधुनिक मॉ को बच्चा गोद में लेकर चलने में शर्म आती है। हा अब तो बच्चे को पीठ पर कपडे के एक झिगोले में ठंूसकर लेकर चलने का चलन भी शहरो में बडी तेजी से चल निकला है। जैसे बच्चा न हो कोई सामान हो। पर मॉ की गोद की बात ही निराली होती है। मॉ के द्वारा चलते हुए थकान से बच्चे का बार बार बदलता कंधा, मॉ के दोनो हाथो का सिर से लेकर पॉव तक बच्चे को बार बार करता स्पर्ष, मॉ के धडकते हुए दिल की धडकन का बच्चे की धडकन से बार बार टकराने और इन धडकनो का एक दूसरे को महसूस करना, बच्चा पूरी तरह से मॉ के दिल में उतरा हुआ रहता था। बच्चा मॉ की ममता को पूरी शिद्दत के साथ जीता था। जिगर से जिगर के टुकडे का नाता ऐसे बनता था की एक बच्चे में एक मॉ को पूरी कायनात, कायनात की सारी खुशिया दिखाई देती थी। उसे उस बच्चे में अपना पूरा जीवन अपनी पूरी ताकत दिखाई देती थी। आज के दौर की मॉए आखिर ऐसी क्यो नही सोचती, क्यो ऐसा महसूस नही करती, समझ नही आता। क्या ये सब बदलाव बच्चे के जन्म देने की प्रक्रिया के बदलाव के कारण हुआ या आधुनिक समाज की संरचना ने मॉ के सामाजिक ताने बाने को बिखेर कर रख दिया शायद आज इस पर एक लम्बी बहस की जरूरत है। बच्चे के जन्म देने की प्रक्रिया भले ही बदली हो पर आज भी बच्चे के पहली बार मॉ कहने का सम्बोधन वही है। मॉ की गोद वही है, मॉ चाहे आधुनिक समाज की हो या पिछडे समाज की बच्चा चाहे प्राकृतिक तरीके से पैदा हुआ हो या मेडीकल तकनीक के द्वारा बच्चे के जन्म के बाद दोनो मॉओ की छाती में दूध एक जैसा ही उतरता है, फिर मॉ क्यो बदलती जा रही आज ये सवाल हमारे सामने एक बडा सवाल बनकर खडा हो रहा है।

दरअसल इस का एक बडा कारण ये भी है कि आज षहरो में जो मॉए प्राकृतिक रूप से बच्चा जनना पसंद नही करती वो उस मॉ बनने के अहसास को जीवन भर महसूस नही कर पाती। उस पीडा उस दर्द को महसूस ही नही करती जो मॉ और बच्चे के बीच में प्यार का रिश्ता बनाता है। आज बडे बडे शहरो में हाई सोसायटी की महिलाए बच्चा जनने की पीढा के डर से आप्रेशन द्वारा बच्चा पैदा कराना आसान समझती है। जिस कारण आज बच्चा मॉ के जिगर का टुकडा नही बन पा रहा है। नर्सिग होम का बिल चुका कर बच्चा एक बाजार से खरीदे सामान की तरह घर आ जाता है। और छोड दिया जाता व्हीकल टैªक पर ट्रॅाली में गुमसुम अनाथो की तरह आया या नौकरो के हवाले ट्रॅाली धकेलने के लिये। कोई उस की कौली नही भरता उस के खिल खिलाने पर उठाकर कोई उसे चूमता नही। अपने कंधो से कोई उसे प्यार से नही लगाकर चिपकाता। आज कोई इन आधुनिक माओ को बताए की बच्चे को गोद में लेने से कोई मॉ देहाती मॉ नही कहलाता बल्कि एक जिम्मेदार मॉ कहलाई जाती है। बाजार या सडक पर बच्चे को गोद में लेकर चलने से बैकवर्ड फीलिग नही बल्कि फील गुड महसूस होता है। आज बच्चे मॉ से गोद और अपने हिस्से का दूध ही तो मॉग रहे बाकी जीवन की लडाई तो इन्हे खुद ही लडनी है।

4 Responses to “मॉ की ममता, मां का ऑचल जींस और टॉप में गायब हो गया ……..”

  1. LAIQ CHODRY

    शादाब भाई वास्तव में आज ऐसा ही हो रहा है मां के साथ साथ बचपन भी खो रहा है आज बच्चो के हिंसक होने के समाचार पत्रो में जो आ रहे है उनके होने का कारण मां ममता और बच्चो की परवरिश ठीक से न होना ही है।

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  2. RAJESH MISHRA

    bahut sundar aalekh hai…. Shadab ji…. bahut-bahut Dhanybad… AAJ KI MAAYEN PUJNE YOGYA NAHI HAIN….

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  3. Bipin Kishore Sinha

    अत्यन्त सुन्दर लेख है। आपने तो मेरे मन की बात कह दी। यह आधुनिकता और पश्चिम का अन्धानुकरण हमें कहां ले जाएगा, कुछ मालूम नहीं। हम एक अन्धी सुरंग में दौड़ लगा रहे हैं। जब महिलाओं के पास आंचल रहा ही नहीं, तो वे अपने बच्चों को आंचल की छांव कैसे दे सकती हैं।

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