मूर्तिपूजा और सत्यार्थप्रकाश : काशी शास्त्रार्थ के 150 वर्ष पूर्ण होने पर

-मनमोहन कुमार आर्य

महर्षि दयानन्द को सत्यार्थप्रकाश लिखने की आवश्यकता इस लिये पड़ी थी कि उनके समय में वेद एवं वैदिक शिक्षाओं का लोप हो चुका था और यदि कहीं कुछ बचा हुआ था तो वह भी लुप्त होता जा रहा था। वैदिक धर्म एवं संस्कृति की रक्षा के साथ सत्य की प्रतिष्ठा और असत्य के त्याग करने कराने के लिये ऋषि दयानन्द ने एक अपूर्व ग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ की रचना की। जिस प्रकार से सूर्य के अस्त होने पर अन्धकार हो जाता है उसी प्रकार से वेदज्ञान रूपी सूर्य के अस्त विलुप्त हो जाने से देश देशान्तर में अज्ञान, अन्धविश्वास एवं मिथ्या परम्पराओं का आरम्भ हुआ था जो समय के साथ वृद्धि को प्राप्त हो रहा था। देश की दासता वा पराधीनता के कारण भी वेदों के लुप्त होने तथा अन्धविश्वासों के अस्तित्व में आने उनके हमारे जीवन का अंग बन जाने के कारण ही उत्पन्न हुए थे। सृष्टि की उत्पत्ति से लेकर महाभारत काल तक के 1.96 अरब वर्षों में आर्यावर्त वा भारत स्वतन्त्र देश व राष्ट्र रहे जिसने विश्व के सभी देशों पर चक्रवर्ती राज्य किया।

               देश की उन्नति व इसे शिखर स्थान पर रखने के लिये वेदों के प्रचार सहित ऋषियों व योगियों का देश में होना व उनका सक्रिय जीवन व्यतीत करना आवश्यक होता है। यह स्थिति ऋषि दयानन्द के सामाजिक व राष्ट्रीय जीवन में प्रविष्ट होने पूर्व अवरुद्ध थी जो उनके आने से पुनः जीवन्त हो उठी थी। इस कार्य को पूर्णता पर पहुचना तथा वैदिक कालीन प्राचीन गौरव को पुनः स्थापित करना था। देश व समाज में अज्ञान व स्वार्थ से भरे लोगों के व्यवधानों के कारण ईश्वर, वेद और ऋषि दयानन्द के मानवमात्र के लिय कल्याणप्रद उद्देश्य पूर्ण न होने से देश व विश्व में अज्ञान, अन्याय तथा अभाव की अपेक्षित निवृति न हो सकी। यदि ऋषि दयानन्द की भावना, सद्धर्म के सिद्धान्तों मान्यताओं को संसार ने स्वीकार कर लिया होता तो विश्व की अधिकांश समस्याओं का समाधान मिल जाता और विश्व में सर्वत्र शान्ति, भातृत्वभाव, परस्पर प्रेम तथा स्नेह का वातावरण होता। वेद सह-अस्तित्व के सिद्धान्त को स्वीकार करते हैं परन्तु इसके साथ सब मनुष्यों का सत्य को अपनाना और असत्य का त्याग करना आवश्यक होता है। यदि कोई प्रेमभाव से सत्य को स्वीकार न करे तो उसे व्यवस्था के द्वारा दण्ड देकर सत्य मार्ग पर लाना होता है जिससे सबका हित हो एवं अहित किसी का भी न हो। इस भावना का अभाव पूरे विश्व में देखा जाता है। विश्व में कहीं भी सत्य का ग्रहण करने और असत्य का त्याग करने का आन्दोलन होता दिखाई नहीं देता। यह आन्दोलन ऋषि दयानन्द ने अपने समय में किया था जिसे उनके बाद उनके प्रमुख अनुयायियायें तथा आर्यसमाज के संगठन ने जारी रखा था। वर्तमान में आर्यसमाज का संगठन भी शिथिल हो जाने के कारण आर्यसमाज का सत्य तथा विद्या के प्रसार का आन्दोलन निष्क्रिय प्रायः हो गया है।

               अन्धविश्वासों की जब बात करते हैं तो उसकी प्रमुख देन देश समाज में जड़ मूर्तियों की पूजा विदित होती है। ऋषि दयानन्द ने ईश्वरीय ज्ञान वेद का आद्योपान्त अध्ययन चिन्तन-मनन किया था। वेदों के आद्यान्त सत्य होने का उनका निश्चय हुआ था। वह ऋषि एवं योगी थे। उनको समाधि प्राप्त थी। समाधि में ईश्वर का साक्षात्कार होता है। यह साक्षात्कार ऋषि दयानन्द अपने जीवन में प्रतिदिन करते थे। यही कारण था कि वह किसी भी मूल्य पर सत्य को छोड़कर असत्य को स्वीकार नहीं कर सकते थे। उन्होंने समकालीन समाज में वेदों की मान्यताओं के अनुरूप ईश्वर की स्तुति-प्रार्थना-उपासना को न होते देख और इसके स्थान पर जड़ मूर्तिपूजा के प्रचलन पर अपना ध्यान केन्द्रित किया था। जड़ मूर्तिपूजा की हानियों से भी वह पूर्णरूपेण परिचित थे। इसका विस्तार से वर्णन भी उन्होंने अपने विश्व के प्रमुख ग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश में किया है। वेदज्ञान के विरुद्ध प्रचलित जड़ मूर्तिपूजा को हटाकर ईश्वर के सत्यस्वरूप को जानकर उसके अनुसार ईश्वर की स्तुति-प्रार्थना-उपासना को प्रचलित करना भी उनका एक प्रमुख उद्देश्य था। मूर्तिपूजा से अनेक हानियां होती हैं, मनुष्य ईश्वर के साक्षात्कार एवं आनन्द से वंचित होता है, उसका जन्म व परजन्म दोनों बिगड़ते हैं, देश व समाज में इसके आधार पर अनेक भ्रान्तियां एवं मिथ्या परम्पराओं के उत्पन्न होने से लोगों की बौद्धिक एवं आत्मिक उन्नति में बाधा आती है। इसके साथ ही मूर्तिपूजा से ईश्वर की वेद में दी गई आज्ञायें भी भंग होती है और ईश्वर की अवज्ञा का पाप भी मूर्तिपूजा से मनुष्यों को लगता है। दूसरी ओर वेदों का अध्ययन करने तथा वेदानुसार ईश्वर के गुणों आदि के द्वारा सत्याचरण को धारण कर ईश्वर की उपासना करने से मनुष्य की शारीरिक, आत्मिक एवं सामाजिक उन्नति होती है। सभी हानियों को दूर करने, सभी लाभों को प्राप्त कराने तथा देश, धर्म व समाज की उन्नति के लिये ही ऋषि दयानन्द ने वेदों का प्रचार करने सहित अज्ञान व अंधविश्वासों की प्रतीक मूर्तिपूजा का खण्डन करने का निर्णय किया और इसके लिये अपना जीवन समर्पित कर मृत्यु का वरण किया था। वर्तमान समय से 150 वर्ष पूर्व 16-11-1869 को विद्या और धर्म की तत्कालीन नगरी काशी में ऋषि दयानन्द ने ईश्वर के भरोसे अपने प्राणों को संकट में डालकर अकेले तीस से अधिक सनातनी पौराणिक विद्वानों से मूर्तिपूजा की सत्यता, वेदानुकूलता तथा उसकी तर्कयुक्तता पर शास्त्रार्थ किया था जिसमें काशी के सभी पण्डित मूर्तिपूजा से सम्बन्धित अपना पक्ष सिद्ध करने में विफल रहे थे। दूसरी ओर ऋषि दयानन्द ने अपने अनेक तर्कों व प्रमाणों से मूर्तिपूजा की निरर्थकता को सिद्ध कर स्वपक्ष का मण्डन एवं उसे सिद्ध किया था। आजतक भी मूर्तिपूजा का वेदसम्मत प्रमाण किसी को नहीं मिला है। इस शास्त्रार्थ ने ऋषि दयानन्द को स्वामी शंकराचार्य की भांति दिग्विजयी ऋषि व संन्यासी बनाया है।

               सत्यार्थप्रकाश ऋषि दयानन्द की विश्व भर में प्रसिद्ध धार्मिक एवं सामाजिक परम्पराओं की सत्य मान्यताओं एवं सिद्धान्तों से युक्त सर्वोत्तम एवं अपूर्व कृति है। सत्यार्थप्रकाश के अध्ययन के पश्चात वेद और ऋषियों के 6 दर्शन, 11 उपनिषदों एवं प्रक्षेपरहित मनुस्मृति आदि आर्ष ग्रन्थों का अध्ययन करने पर यह सब धर्म एवं संस्कृति के समस्त मनुष्यों के लिये उपादेय एवं जन्मजन्मान्तर में उन्नति दिलाने वाले ग्रन्थ सिद्ध होते हैं। वहीं अन्य अज्ञान, अविद्या व अन्धविश्वासों से युक्त प्रचलित ग्रन्थ विष सम्पृक्त सत्यासत्य मिश्रित ग्रन्थ सिद्ध होते हैं। सत्य को ग्रहण करने और असत्य का त्याग करने की धार्मिक व सामाजिक लोगों में प्रवृत्ति व भावना के न होने वा अत्यल्प मात्रा में होने के कारण ईश्वर, वेद, समस्त वेदकालीन ऋषियों एवं ऋषि दयानन्द का लक्ष्य पूरा न हो सका। जब तक यह लक्ष्य पूरा नहीं होता, वेद प्रचार के इस कार्य को जारी रखना होगा। तर्क व युक्ति के आधार पर वेद वर्णित ईश्वर व आत्मा का सत्यस्वरूप ही ज्ञान-विज्ञान की भांति सभी मनुष्यों द्वारा धारण करने योग्य सिद्ध होता है। सत्य को ग्रहण, धारण करने व कराने का यह आन्दोलन प्रलय काल तक जारी रहेगा। इसी में मनुष्यों के अभ्युदय एवं निःश्रेयस की प्राप्ति निहित और सम्भव है। अभ्युदय एवं निःश्रेयस अथवा धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष की प्राप्ति का अन्य कोई मार्ग नहीं है। सत्यार्थप्रकाश को अपनाने से मनुष्यों को भौतिक एवं आध्यात्मिक अनेक लाभ होते हैं। मनुष्य सात्विक एवं पारमार्थिक जीवन व्यतीत कर सन्तोष रूपी सुख तथा यश को प्राप्त होता है। इससे निर्धन, अशिक्षित, अज्ञानी, अन्धविश्वासी, व्यस्नों में फंसे हुए, राग-द्वेष से युक्त तथा स्वार्थों में लिप्त सभी मनुष्य लाभान्वित होते हैं। अतः वेदों के मार्ग पर चल कर सत्य ज्ञान से युक्त अनुष्ठानों, कार्यो सहित परम्पराओं का पालन करना और अविद्या से युक्त मूर्तिपूजा आदि सभी अन्धविश्वासों एवं परम्पराओं का त्याग करना सभी बुद्धि व ज्ञान से युक्त मनुष्यों का कर्तव्य एवं हितकारी कार्य है। हम सबको सत्य को जानने, उसे अपनाने, असत्य का त्याग करने तथा आत्मा को शुद्ध व पवित्र बनाकर सर्वव्यापक सच्चिदानन्दस्वरूप ईश्वर का साक्षात्कार करने का व्रत लेना चाहिये जिससे हमें व सभी मनुष्यों को लाभ हो।

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