लेखक परिचय

अरूण पाण्डेय

अरूण पाण्डेय

मूलत: इलाहाबाद के रहने वाले श्री अरुण पाण्डेय अपनी पत्रकारिता की शुरुआत ‘दैनिक आज’ अखबार से की उसके बाद ‘यूनाइटेड भारत’, ‘राष्ट्रीय सहारा’, ‘देशबंधु’, ‘दैनिक जागरण’, ‘हरियाणा हरिटेज’ व ‘सच कहूँ’ जैसे तमाम प्रतिष्ठित एवं राष्ट्रीय अखबारों में बतौर संवाददाता व समाचार संपादक काम किया। वर्तमान में प्रवक्ता.कॉम में सम्पादन का कार्य देख रहे हैं।

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कश्मीर में लगभग चालीस मुस्लिम महिलाओं ने शरीयत अदालत में वाद दाखिल किया और अपने शौहर को इसलिये तलाक दे दिया क्योेकि वह नशे में रहते थे और उनका मानसिक , शारीरिक व आर्थिक शोषण किया करते थे। जिसे मुस्लिम शरीयत अदालत ने सही माना ओर मंजूर कर लिया। इसी के साथ वह रास्ता भी खुल गया जो कि मुस्लिम महिलाओं को उस रास्ते पर ले जा सकेगा जो कि अभी तक बदहाल हालत से गुजर रही थी और अब खुशहाली की ओर जा सकेगी। यह नेक काम जिन महिलाओं ने किया उन्हें उस दिन के लिये याद किया जायेगा जिन्होनें जंजीर से निकलकर अपने लिये आजाद राह चुनी और परिवार ने साथ दिया । आखिर सही भी है ,कब तक हमारी मुस्लिम बहने इस तलाक नामक शब्द को त्रासदी की तरह झेलती रहेगी। जहां पुरूषों के लिये जुबानी तलाक शब्द का इस्तेमाल होता हो और महिलाओं को तलाक लेने के लिये जुबानी नही शरीयत अदालत में अपनी बात को रखकर उसे हासिल करना पडता हो।
सही मायने में देखा जाय तो कश्मीर से आई क्रांतिकारी खबर, जो देशभर की मुस्लिम महिलाओं के लिए शक्ति का स्रोत बन सकती है। कश्मीर से खबर आई है कि पिछले करीब दो महीनों के दौरान 40 मुस्लिम महिलाओं ने अपने पतियों को तलाक देकर छोड़ दिया है क्योंकि उनके पति लाख समझाने के बावजूद अपने नशे की आदत छोड़ने के लिए तैयार नहीं हुए ये बहुत बड़ी बात है क्योंकि मुस्लिम समाज में पति को तो ये अधिकार प्राप्त है कि वो किसी भी बात से नाराज होने पर तीन बार तलाक बोलकर अपनी पत्नी को छोड़ सकता है लेकिन मुस्लिम महिलाओं के लिए तलाक लेना इतना आसान और सहज नहीं होता मुस्लिम महिलाएं अपने पति से चाहे कितनी भी परेशान क्यों ना हों उन्हें पति को तलाक देने के लिए कड़े शरीयत कानून का पालन करना पड़ता है और शरीयत अदालत में तलाक मांगने की वजह को जायज साबित करने के लिए लंबी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है।
muslimयह जरूरी भी था क्योंकि हर व्यक्ति अपने फायदे के लिये इस्लाम को तोडने मरोडने लग गया है । जिस काजी की मौजूदगी में ईमाम को निकाह पढने के लिये कहा जाता है , वही काजी व ईमाम पति को पत्नी से तलाक के समय मैहर की रकम भी दिलाने से गुरेज करते है । निकाह के वक्त जो औरतों की मैहर की रकम रखी जाती है वह भी इतनी कम होती है कि जिस पत्नी का परित्याग कर रहा है वह उसमें किसी झुग्गी झोपडी में गुजारा भी कर सके। अपने बच्चों का पेट पाल सकें जबकि पुरूष अपनी दौलत के बल पर कई शादियां कर सकता है और हर साल बीबी का परित्याग कर नयी दुल्हन ला सकता है। उसके मामले में शरीयतों की जगह कुछ उदाहरण देकर मामला को रफा दफा कर दिया जाता है यह भी नही सोचा जाता कि आखिर उनके बाद यह महिलायें कहां जायेगी , जिन्होने अपना सारा जीवन इनके प्रति न्यौछावर कर दिया। वास्तव में देखा जाय तो वोटों की राजनीति ने महिलाओं के जीवन को वेश्यावृत्ति के समकक्ष लाकर खडा कर दिया है । उन मुस्लिम महिलाओं के लिये हिन्दू महिलाओं जैसा तलाक कानून क्योें है अब वह भी इसके लिये लामबंद होने लगी है।
इसी सन्दर्भ में जीन्यूज पर एक खबर जारी की गयी जिसके अनुसार मुस्लिम महिलाओं की सोच पर आधारित एक सर्वे जिसके जरिये भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन नामक संस्था ने देश के 10 राज्यों में 4710 मुस्लिम महिलाओं की राय ली है। सर्वे में शामिल 92 फीसदी मुस्लिम महिलाओं के मुताबिक तलाक का नियम एकतरफा है और इस पर रोक लगनी चाहिए। सर्वे में शामिल तलाकशुदा महिलाओं में से 65.9 फीसदी का जुबानी तलाक हुआ। वहीं 91.7 फीसदी महिलाओं ने कहा कि वो अपने पतियों के दूसरी शादी करने के खिलाफ हैं। सर्वे में शामिल 55 फीसदी औरतों की शादी 18 साल से कम उम्र में हुई। और 44 फीसदी महिलाओं के पास अपना निकाहनामा तक नहीं है। सर्वे के मुताबिक 53.2 फीसदी मुस्लिम महिलाएं घरेलू हिंसा का शिकार हैं। 75 फीसदी औरतें चाहती थीं कि लडकी की शादी की उम्र 18 वर्ष से ज्यादा और लडके की उम्र 21 वर्ष से ज्यादा होनी चाहिए। सर्वे के दौरान पता चला कि 40 फीसदी औरतों को 1000 रुपये से भी कम मेहर मिली जबकि 44 फीसदी महिलाओं को तो मेहर की रकम मिली ही नहीं। मेहर वो रकम होती है जो निकाह के वक्त तय होती है और तलाक की स्थिति में पति को अपनी पत्नी को मेहर की तय रकम देनी होती है। सर्वे के मुताबिक देश की 82 प्रतिशत मुस्लिम महिलाओं के नाम पर कोई संपत्ति नहीं है।
जीन्यूज के अनुसार मुस्लिम समाज में शरीयत कानून लागू करने की जिम्मेदारी ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की होती है। आपको जानकर हैरानी होगी कि सर्वे में शामिल 95.5 फीसदी मुस्लिम महिलाओं ने ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड का नाम ही नहीं सुना था। मुस्लिम समाज में महिलाओं की स्थिति किसी से छिपी नहीं है। वहां तलाक और निकाह के लिए जो नियम कायदे बनाए गए हैं वो सिर्फ मर्दों के लिए फायदे का सौदा साबित होते हैं लेकिन अपने नशाखोर पतियों को तलाक देकर, कश्मीर की 40 महिलाओं ने जो परंपरा शुरु की है वो काबिल-ए-तारीफ है। कश्मीर की 40 महिलाओं की ये हिम्मत, देश की मुस्लिम महिलाओं को लंबे समय तक, अपने हक की आवाज बुलंद करने की ताकत देती रहेगी।

2 Responses to “मुस्लिम तलाक का कानून हिन्दूओं जैसा क्यों नही है”

  1. Himwant

    एक दिन मुस्लिम महिलाए इन आसमान और लैंगिक विभेद के विरुद्ध् विद्रोह कर देंगी। समझदार मुस्लिम समान कानूनी प्रावधान की मांग करते हैं।

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