मुज्जफर हुसैन : हम तुम्हें यूं भुला ना पाएंगें

संजय द्विवेदी

मुंबई की सुबह और शामें बस ऐसे ही गुजर रही थीं। एक अखबार की नौकरी,लोकल ट्रेन के घक्के,बड़ा पाव और ढेर सी चाय। जिंदगी में कुछ रोमांच नहीं था। इस शहर में बहुत कम लोग थे, जिन्हें अपना कह सकें। पैसे इतने कम कि मनोरंजन के बहुत उपलब्ध साधनों से दूर रहना जरूरत और विवशता दोनों ही थी। ऐसे कठिन समय में जिन लोगों से मुलाकात ने मेरी जिंदगी में बहुत से बदलाव किए, लगा कि लिखकर भी व्यस्त और मस्त रहा जा सकता है, उन्हीं में एक थे पद्मश्री से अलंकृत वरिष्ठ पत्रकार-स्तंभकार-अप्रतिम वक्ता श्री मुजफ्फर हुसैन। 13फरवरी,2018 की रात जब श्री मुजफ्फर हुसैन के निधन की सूचना मिली, तबसे मुंबई में बीता सारा समय चलचित्र की भांति आंखों के सामने तैर रहा है।

श्री मुजफ्फर हुसैन हमारी जिंदगी में एक ऐसी जगह रखते थे, जो उनकी अनुपस्थिति में  और ज्यादा महसूस हो रही है। उनका घर और उनकी धर्मपत्नी नफीसा आंटी सब याद आते हैं। एक याद जाती है, तो तुरंत दूसरी आती है। लिखने का उनका जुनून, लगभग हर भारतीय भाषा के अखबारों में उनकी निरंतर उपस्थिति, अद्भुत भाषण कला, संवाद की आत्मीय शैली,सादगी सारा कुछ याद आता है। सत्ता के शिखर पुरुषों से निकटता के बाद भी उनसे एक मर्यादित दूरी रखते हुए, उन्होंने सिर्फ कलम के दम पर अपनी जिंदगी चलाई। वे सही मायने में हिंदी के सच्चे मसिजीवी पत्रकार थे। नौकरी बहुत कम की। बहुत कम समय देवगिरि समाचार, औरंगाबाद के संपादक रहे। एक स्वतंत्र लेखक, पत्रकार और वक्ता की तरह वे जिए और अपनी शर्तों पर जिंदगी काटी। सच कहें तो यह उनका ही चुना हुआ जीवन था। मनचाही जिंदगी थी। वे चाहते तो क्या हो सकते थे, क्या पा सकते थे यह कहने की आवश्यक्ता नहीं है। भाजपा और संघ परिवार के शिखर पुरुषों से उनके अंतरंग संबंध किसी से छिपे नहीं थे। लेकिन उन्हें पता था कि वे एक लेखक हैं, पत्रकार हैं और उनकी अपनी सीमाएं हैं।

वे लिखते रहे एक विचार के लिए, एक सपने के लिए,ताजिंदगी और अविराम। भारतीय मुस्लिम समाज को भारतीय नजर से देखने और व्याख्यायित करने वाले वे विरले पत्रकारों में थे। अरब देशों और वैश्विक मुस्लिम दुनिया को भारतीय नजरों से देखकर अपने राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में समाचार पत्रों में प्रस्तुत करने वाले वे ही थे। वे ही थे जो भारतीय मुस्लिमों को एक राष्ट्रीय प्रवाह में शामिल करने के स्वप्न देखते थे। उन्हें अपनी मातृभूमि और उसके लोगों से प्यार था। वे भारतीयता और इस देश के सपनों को जीने वाले पत्रकार थे। उन्हें संवाद प्रिय था। वे अपनी प्रिय भाषा हिंदी में लिखते, बोलते और संवाद करते हुए देश भर के दुलारे बने। श्री अटलबिहारी वाजपेयी से लेकर उन दिनों के संघ प्रमुख श्री केसी सुदर्शन अगर उनकी प्रतिभा के प्रशंसक थे, तो यह अकारण नहीं था।

आज कंगूरों पर बैठे लोगों को शायद श्री मुजफ्फर हुसैन नजर न आएं, किंतु जिन्हें परंपरा के पाठ का तरीका पता है, वे अपने इस बुजुर्ग को यूं भुला न पाएंगें। जिन दिनों में भारतीयता और भारतबोध जैसी बातें मुख्यधारा के मीडिया में अछूत थीं, उन्हीं दिनों में सिर्फ पांचजन्य जैसे पत्रों में ही नहीं, देश के हर भाषा के बड़े अखबार मुजफ्फर हुसैन को सम्मान के साथ छापते थे। अखबारों में छपने वाले लेखों से ही उनकी जिंदगी चलती थी। इसलिए उन्हें मसिजीवी कहना अकारण नहीं है। वे सही मायने में कलम के हो गए थे। एक विचार के लिए जीना और उसी के लिए अपनी समूची प्रतिभा, मेघा, लेखन और जीवन को समर्पित कर देना उनसे सीखा जा सकता है।

आज जब वे नहीं हैं तो उनकी पत्रकारिता से कई बातें सीख सकते हैं। पहला है उनका साहस और धारा के विरूद्ध लिखने का । दूसरा वे सिद्धांतनिष्ठ जीवन, ध्येयनिष्ठ जीवन का भी उदाहरण हैं। वे पल-पल बदलने वाले लोगों में नहीं हैं। जीवन के कठिन संघर्ष उनमें अपने विचार के प्रति आस्था कम नहीं करते। वे अपने लेखन में कड़वाहटों से भरे नहीं हैं, बल्कि इस महादेश की समस्याओं के हल खोजते हैं। वे सुविधाजनक सवाल नहीं उठाते बल्कि असुविधाजनक प्रश्नों से टकराते हैं। वे अपने मुस्लिम समाज में भारतीयता का भाव भरने के लिए सवाल खड़े करते हैं और अभिव्यक्ति के खतरे भी उठाते हैं। उन पर हुए हमले, विरोधों ने उन्हें अपने विचारों के प्रति और अडिग बनाया। वे वही कहते,लिखते और बोलते थे जो उनके अपने मुस्लिम समाज और राष्ट्र के हित में था। वे कट्टरपंथियों की धमकियों से डरकर रास्ते बदलने वाले लोगों में नहीं थे। उनके लिए राष्ट्र और उसके लोग सर्वोपरि थे। अपने इन्हीं विचारों के नाते देश भर में वे आमंत्रित किए जाते थे। लोग उन्हें ध्यान से सुनते और गुनते थे। एक प्रखर वक्ता, सम्मोहक व्यक्तित्व के रूप में वे हर सभा का गौरव बने रहे। भारत, भारतप्रेम की प्रस्तुति से उनका शब्द-शब्द ह्दय में उतरता था। उन्हें मुझे मुंबई से लेकर भोपाल,रायपुर, बिलासपुर की अनेक सभाओं में सुनने का अवसर मिला। उनके अनेक आयोजनों का संचालन करते हुए, साथ रहने का अवसर मिला। यूं लगता था, जैसे मां सरस्वती उनके कंठ से बरस रही हैं। वे कश्मीर, देश विभाजन जैसे प्रश्नों पर बोलते तो स्वयं उनकी आंखों से आंसू झरने लगते। सभा में मौजूद लोगों की आंखें पनीली हो जाती थीं। ऐसा आत्मीय और भावनात्मक संवाद वही कर सकता है जिसकी कथनी-करनी, वाणी और कर्म में अंतर न हो। वे ह्दय से ह्दय का संवाद करते थे। इसलिए उनकी वाणी आज भी कानों में गूंजती है। महाराष्ट्र के अनेक नगरों में गणेशोत्वों पर दिए गए उनके व्याख्यान एक बौद्धिक उपलब्धि हैं।

इन चार दशकों में उनका लिखा-बोला गया विपुल साहित्य उपलब्ध है। दैनिक अखबारों समेत, पांचजन्य जैसे पत्रों में उन्होंने नियमित लिखा है। उस पूरे साहित्य को एकत्र कर उनके लेखन का समग्र प्रकाशित होना चाहिए। केंद्र और महाराष्ट्र सरकार को उनकी स्मृति को संरक्षित करने के लिए कुछ सचेतन प्रयास करने चाहिए। वे अपनी परंपरा के बिरले पत्रकारों में हैं। वे भारतीय पत्रकारिता में साहस, धैर्य,प्रतिभा, स्वावलंबन और वैचारिक चेतना के प्रतीक भी हैं। लोकजागरण के लिए पत्रकारिता के माध्यम से उन्होंने जो प्रयास किए उनको रेखांकित करते हुए कुछ प्रयत्न उनसे जुड़े लोग और संस्थाएं भी कर सकती हैं। राष्ट्रवादी पत्रकारिता के तो वे शिखर हैं ही, उनकी स्मृति हमें संबल देगी, इसमें दो राय नहीं हैं। किंतु इससे जरूरी यह भी है कि उनके जाने के बाद, उनकी स्मृति संरक्षण के लिए हम क्या प्रयास करते हैं, ताकि आने वाली पीढ़ियां याद कर सकें कि इस घरती पर एक मुजफ्फर हुसैन नाम का पत्रकार भी रहा, जिसने बिना बड़े अखबारों की कुर्सियों के भी, सिर्फ कलम के दम पर अपनी बात कही और देश ने उसे बहुत ध्यान से सुना। इन दिनों जब भारतीय पत्रकारिता की प्रामणिकता और विश्वसनीयता पर गहरे काले बादल छाए हुए हैं तब श्री मुजफ्फर हुसैन  का जाना एक बड़ा शून्य रच रहा है, जिसे भर पाना कठिन है, बहुत कठिन।

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