नासमझी में मुस्लिमपरस्ती

Sonia-Gandhiहरि शंकर व्यास

सोनिया गांधी की कमान से पहले कांग्रेस के जितने भी अध्यक्ष हुए हैं उन्होंने हिंदू अवचेतन का ध्यान रखा। हिंदू की संवेदनाओं से खेला नहीं खेला। कोई माने या न माने तथ्य है कि गांधी की राजनीति में हिंदू बुनियाद थी। तभी जिन्ना और मुस्लिम लीग को गांधी पर भरोसा नहीं था और उन्होंने अलग पाकिस्तान बनवाया। खैर, यह इतिहास है। इसके तथ्य मौजूद हैं। आजादी के बाद नेहरू, इंदिरा, राजीव, नरसिंहराव सबने अपने ढंग से हिंदू को ऐसे हैंडल किए रखा जिससे पार्टी के साथ हिंदुओं ने अपने को चिन्हित रखा। हिंदू तब कांग्रेस के मंच पर युनाईटेड था। नेहरू चुनाव के वक्त अपने नाम के आगे पंडित लिखवा ब्राह्मण वोट पटाते थे। राजीव गांधी को भी समझ आया जो उन्होंने अयोध्या में शिलान्यास की, वहां से चुनाव प्रचार शुरू करने की सोची। नेहरू से ले कर राजीव तक प्रतीकों में, व्यवहार में, रूद्राक्ष, कर्मकांड में हिंदू संवेदनशीलता को कायदे से सींचा जाता था।

सोनिया गांधी की कमान में ऐसा एक काम नहीं हुआ। उलटे सोनिया गांधी ने कांग्रेस को अल्पसंख्यक केंद्रित पार्टी बनाना शुरू किया। कई वजह थी। एक तो गुजरात के कारण यों भी मुस्लिम वोट पर फोकस था। पहली बार मुस्लिम चिंता में भारत सरकार में अल्पसंख्यक मंत्रालय बना। पराकाष्ठा मुस्लिम आतंकवाद को बैलेंस कराने के लिए हिंदू आतंकवाद का हल्ला था।

एक वजह पहले कार्यकाल में गुजरात और वामपंथ के कारण सेकुलर राजनीति के जलजले से मैनेजरों में बनी यह सियासी थीसिस थी कि हिंदू तो जातियों में बंटा है। वह एकजुट नहीं हो सकता। इसलिए देश के सबसे बड़े वोट बैंक याकि मुसलमानों को अपने साथ पुख्ता तौर पर जोड़ा जाए।

यह बेसिक बात है। राजीव गांधी के बाद से कांग्रेस का जो चुनावी इतिहास रहा है उसमें यह बात उभरी है कि कांग्रेस से निकली नई पार्टियां, नए क्षत्रप कांग्रेस के परंपरागत वोटों को खा कर सफल हुए। कांग्रेस का जो मूल हिंदू आधार था उसके ब्राह्मण, फारवर्ड भाजपा ने छीने तो लालू-मुलायम सिंह मायावती आदि ने दलित, यादव, मुसलमान छीने। इनके कारण कांग्रेस सिकुड़ती गई। इसलिए सोनिया गांधी ने भी समझा कि कांग्रेस को या तो जातिगत समीकरण बना कर राजनीति करनी होगी या कोर अल्पसंख्यकों का बनाना होगा।

जातियां वापिस लौटे तो उसके लिए जरूरी है कांग्रेस अधिक मुखरता से अपने को जाति विशेष का पैरोकार बताए। मतलब मायावती से ज्यादा कांग्रेस अपने को दलित हितैषी बताए। टुकड़ों-टुकड़ों की इस राजनीति में मुसलमान का वोट क्योंकि थोक वाला है और वह भाजपा के साथ कभी नहीं जा सकता है इसलिए मुस्लिम मनोदशा को लुभाने के लिए सोनिया, राहुल गांधी की एप्रोच यह हुई कि उनकी सरकार ऐसी राजनीति करे जिससे असम के अजमल या हैदराबाद के ओवैसी या मुलायम सिंह के आजम खान से भी ज्यादा धांसू मुस्लिमपरस्ती कांग्रेस की दिखलाई दे।

नतीजतन मुस्लिम मनोविज्ञान में पैठे नरेंद्र मोदी-अमित शाह को ‘मौत का सौदागर’ साबित करने की कांग्रेस ने कोशिशें की। इसी में मुस्लिम आतंकवाद के आगे हिंदू आतंकवाद का हल्ला बनाने का मिशन भी बना। यह आत्मघाती अदूरदर्शितापूर्ण सियासी हिसाब था। सोनिया गांधी, राहुल गांधी ने चिंता की कि वे कैसे ओवैसी, अजमल, आजम खान, मुलायम-लालू यादव की मुस्लिम राजनीति से अधिक धांसू मुस्लिमपरस्ती करते दिखलाई दें। सोचा ही नहीं कि इससे हिंदू संवेदनाएं घायल होंगी। नरेंद्र मोदी, अमित शाह की हिंदू राष्ट्रवादी राजनीति खिल उठेगी।

तुक नहीं थी कि मुस्लिम आतंकवाद के आगे बात का बतंगड़ बना कर हिंदू आतंक का हल्ला हो। भगवा आतंक की राहुल गांधी विदेशी नेता से बात करें। दिग्विजय सिंह ओसामा को ओसामाजी कहें या आतंकियों से मुठभेड़ की बाटला घटना पर शक खड़ा किया जाए। मकसद सिर्फ और सिर्फ मुस्लिमपरस्ती में अपने को अव्वल दिखलाना था। 2009 में इसका हल्का सा फायदा हुआ। यूपी जैसी कुछ जगह मुस्लिम वोट थोक में मिले। आडवाणी के आगे मनमोहन सिंह चल गए। इसलिए 2009 के बाद भगवा आतंक को कांग्रेस ने और तूल दिया। इसरत जहां के मामले में सफेद-काली दाढ़ी को हत्यारा करार देने का रोडमैप बना।

जान लें सोनिया, राहुल, कांग्रेस में आज भी हिंदू वोटों को अपना बनाने की सोच नहीं है। वह जातीय समीकरण के फेर में राज्यवार एलायंस बनाने की सोच रही है। कांग्रेस की दिक्कत यह है कि पहले उसके लिए पूरे हिंदू को जोड़ने का जो ब्राह्मण आधार था वह नहीं है। वह भाजपा को शिफ्ट है। नरेंद्र मोदी ने वाराणसी को चुना, पंडित मदनमोहन मालवीय की महिमा मंडन की तो वह सोची समझी रणनीति थी।

एक वक्त यूपी का ही ब्राह्मण गांव-देहात में सभी जातियों के टोलों को कांग्रेस की तरफ मोड़ता था उस सिस्टम को संजय गांधी ने वीरबहादुर सिंह, वीपी सिंह के प्रयोगों से जैसे खत्म किया था उसके नतीजे की सोनिया, राहुल, प्रियंका या अहमद पटेल को समझ नहीं आ सकती है। मगर गुजरात के दो बनियों ने इसको समझा। एक का नाम गांधी था और दूसरे का नरेंद्र मोदी। इतिहास-राजनीति जिन्होंने पढ़ी है उन्हें पता है कि गांधी ने अपनी राजनीति हिंदी बेल्ट के सबसे प्रतिष्ठित-मालदार ब्राह्मण मोतीलाल नेहरू के परिवार और उनके आनंद भवन को मुख्यालय बना कर शुरू की थी। फिर ऐसा ही काम नरेंद्र मोदी ने बनारस व पंडित मालवीय की धरोहर को चुन कर किया।

कितना त्रासद है इस बात को सोनिया, राहुल गांधी ने न जाना और न किसी पुराने कांग्रेसी ने समझाया। ये अपनी पार्टी सर्वहिंदू मंच की जगह उसे मुस्लिम लीग या लालू जैसी जातीय पार्टी बनाने की आत्मघाती राजनीति कर बैठे।
इसी में कांग्रेस का हिंदू को बदनाम करने का पाप हुआ। परिणाम था 44 सांसद। क्या नहीं?

1 thought on “नासमझी में मुस्लिमपरस्ती

  1. कांग्रेस ने हमेशा ही मुस्लिम वोटो का सहारा लिया है उसने पहले जनसंघ फिर भा ज पा को हिन्दू पार्टी कह कर साम्प्रदायिकता को बढ़ाया मुसलमानो में इस डर को बैठाया कि अगर यह सत्ता में आ गए तो उनका विनाश हो जायेगा। असल में कांग्रेस ही सब से बड़ी सांप्रदायिक पार्टी है और इसका निखार अब सोनिया के काल में स्पष्ट रूप से आ गया

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