लेखक परिचय

नीरज वर्मा

नीरज वर्मा

1998 से सक्रिय, टी.वी.पत्रकारिता की शुरुवात , 16 सालों का तज़ुर्बा, राजनीति-आध्यात्म-समाज और मीडिया पर लगातार लेखन ! एक्टिव ब्लॉगर ! हिन्दी-मराठी-अंग्रेजी-भोजपुरी पर ख़ासी पकड़ ! अघोर-परम्परा पर, पिछले कई सालों से लगातार शोध !

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– नीरज वर्मा-

Narendra_Modi

सपने बेचना कोई खेल नहीं ! तमाशा नहीं ! हुनर चाहिए ! एक हुनर-मंद गया ! दूसरा अभी-अभी आया है ! बदकिस्मती से ये तमाशा बदस्तूर जारी है ! देश को 60,000 करोड़ की एक बुलेट ट्रेन चाहिए या इसी रकम में सैकड़ों एक्सप्रेस ट्रेनों का कायाकल्प चाहिए ? बुलेट ट्रेन में रईस वर्ग सवारी करेगा ! एक्सप्रेस ट्रेन, आज भी आम आदमी को ढोती है ! एक बुलेट ट्रेन में क़रीब 400 रईस लोग बैठेंगे ! सैकड़ों एक्सप्रेस ट्रेनों में हज़ारों आम-आदमी ! एक्सप्रेस ट्रेन में तक़रीबन 300 रुपया मिनिमम किराया होता है ! जबकि बुलेट ट्रेन में टिकट की शुरुवात ही 3,000 रुपयों से होगी ! ये एक बानगी है, नए प्रधानमंत्री की सोच की ! ऐसी सोच, जो सड़े-गले सिस्टम को सुधार कर ईमानदार बनाने की बजाय, पूंजी आधारित प्रणाली विकसित करने की फ़िराक में है ! एक गरीब देश के गरीब नागरिकों को, राहत देने की बजाय परेशान करने की फ़िराक में !

2014 का  नरेंद्र मोदी नाम का “नायक” अब प्रधानमंत्री है ! ऐसा प्रधानमंत्री , जो दशकों से खराब पड़े सिस्टम को सुधारने की बजाय, इसे निजी हाथों में देने को बेताब है ! इस नायक का सिद्धांत साफ है , कि, आम आदमी को सुविधा तो मिलेगी , मगर अतिरिक्त कीमत अदायगी के बाद ! ज़्यादा पैसा खर्च करना होगा ! यानि सिस्टम को दुरूस्त कर, जायज़ कीमत में, सुविधा नहीं दी जाएगी ! सुविधा के लिए अम्बानीयों-अडानियों जैसे किसी ठेकेदार का मुंह देखना होगा ! ! मसलन, ट्रेन में मिलने वाली 10 रुपये की चाय तो वैसी ही सड़ी हुई मिलेगी , मगर अच्छी चाय चाहिए तो अम्बानीयों-अडानियों जैसे किसी ठेकेदार को 15 रुापये अदा करने होंगे ! 25 रुपये की कीमत वाली घटिया भोजन की थाली, ट्रेन में 100 रुपये की मिलती है ! नए प्रधानमंत्री की अगुवाई में ये ऐलान किया गया है कि 100 रुपये की घटिया भोजन थाली मिलती रहेगी ! हाँ , अच्छा भोजन चाहिए तो किसी ब्रांडेड कंपनी को 150-200 रुपये अदा कीजिये ! यानि सिस्टम को दुरूस्त करने की बजाय, सारा ध्यान आम आदमी की जेब से निकासी पर रहेगा !  जेब पर डाका डालने के बावजूद, आम आदमी की भक्ति तो देखिये ! अंधभक्ति ! अम्बानीयों-अडानियों जैसों की मार झेल रहा आम आदमी,  अम्बानीयों-अडानियों जैसे ठेकेदारों को भारत का भाग्य विधाता”  दर्ज़ा देने से वाक़िफ़ नहीं है ? आम आदमी अभी भी स्वस्थ औघोगिक विकास और शॉर्ट-कट वाले औद्योगिक विकास में अंतर नहीं समझ पा रहा और न ही इस बात में भेद कर पा रहा कि व्यक्तिगत विकास और सामूहिक विकास का फासला बहुत बड़ा कैसे होता जा रहा है ? आंकड़े बता रहे हैं कि आम आदमी का विकास रॉकेट की गति से भले ही न हुआ हो लेकिन आम आदमी की बदौलत, पिछले कुछ ही सालों में, स्पेस विमान की रफ़्तार से हिन्दुस्तान में कई अम्बानी-अडानी पैदा हो गए ! करोड़ों की दौलत, अचानक से सैकड़ों-हज़ारों-लाखों करोड़ में जा पहुंची ! कैसे ? क्या नरेंद्र मोदी और मनमोहन सिंह जैसे लोग इस बात के ज़िम्मेदार हैं ? क्या आम आदमी की हिस्सेदारी का काफी बड़ा हिस्सा “हथियाने” का हक़, अम्बानीयों-अडानियों को मोदी और मनमोहन जैसे लोगों ने दिया ? क्या आम-आदमी को मालूम है कि विकास की आड़ में आम-आदमी की आर्थिक हिस्सेदारी सिमटती जा रही है और व्यक्ति-विशेष की मोनोपोली सुरसा के मुंह की तरह फ़ैली जा रही है ? आम आदमी को मालूम होता तो उसके ज़ेहन में ये सवाल ज़रूर आता , कि, ईमानदार सिस्टम जायज़ कीमत में अगर सुविधा दे सकता है तो उसी सुविधा के लिए नाजायज़ या अतिरिक्त राशि की मांग क्यों ? क्या आम आदमी को मालूम है कि आज आम आदमी की औकात, अम्बानीयों-अडानियों के सामने दो-कौड़ी की हो चली है ? नहीं ! आम आदमी को नहीं मालूम ! मालूम होता तो वो मोदी और मनमोहन जैसों से ये ज़रूर पूछता कि आम आदमी और अम्बानीयों-अडानियों की विकास-दर में क्या फ़र्क़ है ? आम आदमी को मालूम होता तो वो ज़रूर सवाल करता कि अपने मुल्क़ में अम्बानी-अडानियों की इच्छा के बिना कोई फैसला क्यों नहीं होता ? आम आदमी को मालूम होता तो वो ज़रूर ज़ुर्रत करता, ये पूछने, कि इस देश के प्राकृतिक संसाधन या ज़मीन पर पहला हक़ अम्बानीयों-अडानियों जैसों का क्यों है ? आम आदमी को , मोदी और मनमोहन जैसे लोग ये कभी नहीं बताते कि अम्बानी-अडानी जैसों की जेब में भारत के मोदी और मनमोहन क्यों पड़े रहते हैं ?

किसी भी देश के विकास में उद्योग-धंधों की स्थापना का अहम योगदान होता है ! पर इस तरह के विकास में समान-विकास की अवधारणा अक्सर बे-ईमान दिखती है ! ऐसा तब होता है जब, भ्रष्टाचार की क्षत्रछाया में, देश-प्रदेश के “भाग्य-विधाता” हिडेन एजेंडे के तहत निजी स्वार्थ की पूर्ति में लग जाते हैं ! यही कारण है कि अन्ना-आंदोलन और केजरीवाल जैसों की पैदाइश होती है ! हिन्दुस्तान में 2012-2013 के दौरान पनपा जनाक्रोश, संभवतः, इसी एक-तरफ़ा विकास की अवधारणा के खिलाफ था  ! एक तरफ देश में महंगाई-हताशा-बेरोज़गारी चरम सीमा पर और दूसरी तरफ, उसी दरम्यान, विकास के नाम पर अम्बानीयों-अडानियों-वाड्राओं जैसों की दौलत, अरबों-खरबों में से भी आगे निकल जाने को बेताब  ! ऐसा कैसे हो सकता है कि एक ही वक़्त में मुट्ठी भर लोगों की दौलत बेतहाशा बढ़ रही हो और आम आदमी, महंगाई-हताशा-बेरोज़गारी का शिकार हो ? अन्ना-आंदोलन या केजरीवाल जैसों का जन्म किसी सरकार के खिलाफ बगावत का नतीज़ा नहीं है ! ये खराब सिस्टम के ख़िलाफ़ सुलगता आम-आदमी का आक्रोश है जो किसी नायक की अगुवाई में स्वस्थ सिस्टम को तलाशता है ! इसी तलाश के दरम्यान कभी केजरीवाल तो कभी मोदी जैसे लोग नायक बन रहे हैं , जिनसे उम्मीद की जा रही है कि महंगाई-हताशा-बेरोज़गारी के लिए ज़िम्मेदार अम्बानीयों-अडानियों-वाड्राओं पर रोक लगे ! लेकिन मामला फिर अटक जा रहा है कि अम्बानी-अडानियो -वाड्राओं जैसे ठेकेदारों ने विकास का लॉलीपॉप देकर मोदी सरीखे नायकों को सीखा रखा (डरा रखा ) है कि आम आदमी को बताओ कि ये मुल्क़ अम्बानीयों-अडानियों-वाड्राओं की बदौेलत चल रहा है ! इस मुल्क़ का पेट, अम्बानी-अडानियो-वाड्राओं की बदौलत भर रहा है ! ये देश अम्बानीयों-अडानियों-वाड्राओं जैसे ठेकेदारों के इशारों पर सांस लेता है ! पिछले 10 साल से केंद्र में मनमोहन सिंह और अब मोदी भी मनमोहन फॉर्मूले के ज़रिये आम-आदमी को यही बतला कर डरा रहे हैं !

खैर ! प्रधानमंत्री साहिबान का (मीडिया की रहनुमाई से) सियासी “खुदा” बनने का शौक , भले ही, परवान चढ़ गया हो पर इतना ज़रूर है कि मुट्ठी भर अम्बानी-अडानियो-वाड्राओं जैसे ठेकेदारों से ये देश परेशान है ! सतही तौर पर गुस्सा किसी पार्टी विशेष के ख़िलाफ़ है मगर बुनियादी तौर पर ये आक्रोश अम्बानीयों-अडानियों-वाड्राओं जैसों के विरोध में है ! आर्थिक सत्ता का केंद्र तेज़ी से सिमट कर मुट्ठी भर जगह पर इकट्ठा हो रहा है ! मुट्ठी भर अम्बानी-अडानी-वाड्रा, देश के करोड़ों लोगों का हिस्सा मार कर अपनी तिजोरी भर रहे हैं और विकास की “फीचर फिल्म” के लिए मोदी या मनमोहन जैसे नायकों को परदे पर उतार रहे हैं ! ये नायक अपने निर्माता-निर्देशकों और स्क्रिप्ट राइटर्स के डायलॉग मार कर बॉक्स ऑफिस पर इनकी रील फिल्म हिट कर रहे हैं ! मगर रियल फिल्म? पब्लिक चौराहे पर है ! कई सौ साल तक ईस्ट इंडिया कंपनी की गुलामी झेलने के बाद आज़ाद हुई, मगर एक बार फिर से हैरान-परेशान है ! बंद आँखों से हक़ीक़त नहीं दिखती, लेकिन, सपने ज़रूर बेचे जाते हैं ! उम्मीदों के सेल्फ-मेड नायक ने समां बाँध दिया है लिहाज़ा उम्मीद , फिलहाल , तो है ! मगर टूटी तो ? क्रान्ति असली “खलनायकों ” के खिलाफ ! इंशा-अल्लाह ऐसा ही हो !

24 Responses to “नमो-नमो हक़ीक़त नहीं, सपनों का सौदागर !”

  1. आर. सिंह

    आर. सिंह

    भक्त की असलियत सामने आ गयी न. ऐसी भी अंधभक्ति क्या कि आप अपने भगवान के विरुद्ध एक शब्द भी सुनने को तैयार नहीं .आदमियों को ( मैं किसी के लिए भी इंसान शब्द का जल्दी इस्तेमाल नहीं करता,क्योंकि मेरीदृष्टि में इंसान कोई बिरले ही है,चाहे कोई अपना नाम इंसान भले ही रख ले)भगवान बनने के पहले इंसान बनना आवश्यक है.हर कदम झूठ और फरेब बड़बोला पन और डींग हांकने वाला देखते ही देखते कुछ लोगों के लिए कैसे भगवान बन गया ,यह मेरी समझ से बाहर है.रही बात व्यक्ति पूजा से राष्ट्र भक्ति को जोड़ने की बात तो आप जैसे ज्ञान लवदुर्विदग्धं की नजर में मेरे जैसे लोग राष्ट्र द्रोही कहलाने में ज्यादा गर्व महसूस करेंगे,क्योंकि अगर चाटुकारिता राष्ट्र भक्ति का पर्याय है ,तो ऐसी राष्ट्र भक्ति आप जैसे ज्ञान लवदुर्विदग्धं को ही मुबारक

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  2. शिवेंद्र मोहन सिंह

    छाती कूट दल को दिक्कत ये हो गई है कि भगेड़ू ४९ दिन तक टिक नहीं पाया, आका ४४ पर अटक गए। बजट से और कुछ निकाल नहीं पाए तो छाती कूटने लगे की हाय हाय “बुलेट ट्रेन, बुलेट ट्रेन”. दो कौड़ी के चिरकुट लोग पत्रकार बन गए हैं। इन लोगों को ६० साल की भुखमरी और सत्ता की लूट खसोट नहीं दिखाई दे रही थी। आका की सत्ता थी तो जुबान तालू से चिपक गई थी। अब वो जमाने गए जब चंद चन्दाखोर, रिश्वतखोर, दलाल टाइप के लोग मठाधीशी करते थे और अपनी कलम से सच को झूठ और झूठ को सच बताया करते थे। जनता जागरूक है लोगों को दिखाई देता है क्या सच है और क्या झूठ। लोगों ने हवाई कलाबाजी देख कर सत्ता नहीं दी है। आज देश में विकास की सार्थक चर्चा चल रही है हर तरफ। जिस वक्त राजीव गांधी ने कंप्यूटर के सपने दिखाए थे उस वक्त भी छाती पीटने वाले मातम मना रहे थे, ये लोगों की नौकरी खा जाएगा ये हो जाएगा वो हो जाएगा। हुआ क्या आज वही कंप्यूटर लोगों की रोजी रोटी का सहारा बना हुआ है विदेशों में भारतीय मेधा का सम्मान हो रहा है। प्री प्लॉटेड स्क्रिप्ट ले कर चंद मातमी बुलेट ट्रेन का मातम कर रहे हैं।

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  3. इक़बाल हिंदुस्तानी

    Iqbal hindustani

    मोदी को pm चुनने को लेकर ऊँगली उठाना तो देश के लोकतंत्र और जनता की समझ पर सवाल खड़ा करना है जो मेरे विचार से मुनासिब नहीं है।
    जहां तक विकल्प उपलब्ध न होने की बात है वो R SINGH जी ने बिलकुल ठीक कही है लेकिन ये भी देखा जाना चाहिए कि जो हालात मनमानी और भ्रष्टाचार का रिकॉर्ड upa की मनमोहन सरकार बना रही थी मोदी सरकार उस से काफी बेहतर है।
    रहा सवाल बुलेट ट्रेन का तो किसी एक फैसले से मोदी फी सरकार का फैसला नही किया जा सकता। सच तो ये है कि पूँजीवाद में ऐसा होना स्वाभाविक ही है। आज वो दौर है जब खुद वामपंथी भी समाजवाद पर चलकर देश को आगे नहीं ले जा सकते।
    अभी मोदी को अनुभव हो जाने दो कि सरकार चलाना और सपने दिखाना क्या अंतर होता है?
    रहा जनता का सवाल उसको वास्तविक मुद्दों से ज्यादा भावनात्मक मुद्दों से अपने पक्ष में किया जा सकता है जैसा सेकुलर दल मुस्लिमो को करते हैं वैसे ही बीजेपी को भी हिन्दुओं का ध्रुवीकरण करने का एक आसान रास्ता मिल गया है।
    इस चक्रव्यूह को केजरीवाल जैसा कोई नेता और आप जैसी कोई पार्टी आज नहीं तो कल जरूर तोड़ेगी ये बात सारे मोदी भक्त और सारे मुस्लिम अंधभक्त सेकुलर नेता नोट कर लें।
    मोदी याद रखें अब उनके सपने और दावे नहीं आम आदमी के पक्ष में किया काम ही अगला चुनाव जिता सकता है वरना विकल्प आम आदमी पार्टी के तौर पर तय्यार है। यही वजह है दिल्ली में बीजेपी इलेक्शन न कराकर शॉर्टकट से सरकार बनाना चाहती है क्योंकि चुनाव हुए तो AAP जीत सकती है।

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  4. बीनू भटनागर

    सच मे, दिखावा व्यक्तिगत स्तर पर ही नहीं राष्ट्रीय स्तर पर भी बढ़ गया है। मेरे पास दो छोटी कार हैं ग्रहस्थी मज़े से चल रही है, फ्लैट भी अच्छा ,ख़ासा है बच्चे भी पढ लिख
    गये है, पर मै बहुत दुखी हूँ मै एक मर्सीडीज़ और हवेलीनुमा घर चाहती हूँ दिखावे के लियें
    मैने किसी तरह उधार पर ये ख़रीद भी लिये हैं पर अब गाड़ी के पैट्रोल और दूध सब्ज़ी फल पर भी कटौती करनी पड़ रही है…

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    • नीरज वर्मा

      neeraj

      बिलकुल सही फ़रमाया !यही ख़यालात, हैं मोदी-अंधभक्तों के !

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  5. आर. सिंह

    आर. सिंह

    तो धमाचौकड़ी मच ही गयी. थोड़ी देर से ही सही,पर लोग जग ही गए.,आखिर भगवान पर कीचड उछाला गया था,भक्त लोग कैसे बरदास्त करते और कबतक चुप रहते.
    मैंने हमेशा यह स्वीकार किया है कि नमो विकल्प के अभाव में आये हैं.कांग्रेस ने देश को इतना गन्दा कर दिया था कि लोग त्राहिमाम कर रहे थे और किसी तरह उससे छुटकारा पाना चाहते थे,उसपर नमो द्वारा दिखाए जाने वाले सपने.जिस गुजरात के तरक्की के बारे में इतने ढिंढोरे पीटे जा रहे उसके बारे मैंने पहले भी टिप्पणी की थी. बाद में उसका पूरा पोल आनंदी बेन ने मुख्य मंत्री बनने के बाद अपने पहले सम्बोधन में ही खोल दिया था,जब उन्होंने कहाथा कि गुजरात की मुख्य समस्या भ्रूण हत्या,अशिक्षा और बेरोजगारी है.मैं उसमे एक अन्य समस्या जोड़ देता हूँ.वह है.स्वास्थ्य,क्योंकि वहां सरकारी अस्पतालों की हालत दूसरे राज्योंकी तुलना में शायद ज्यादा ही खराब है.
    इस सपने के सौदागर ने अगस्त २०१२ में कहा था कि मुझे १०० दिनों के लिए प्रधान मंत्री बना दो,मैं विदेशों सेसब कालाधन वापस ले आऊंगा.अगर ऐसा नहीं हुआ ,तो मुझे फांसी दे देना. आज क्या वे फांसी पर चढ़ने को तैयार हैं? बहुत सी अन्य बातें भी हैं.बुलेट ट्रेन लाना तो गरीबों और आम आदमियों के जले पर नमक छिड़कने जैसा है. यह ठीक है कि बुलेट ट्रेन शायद अभी अमेरिका और ब्रिटेन में भी नहीं है,अतः जो अमेरिका में या अन्य जगह विदेशों में जाकर बस गए हैं,उनके लिए कुछ गौरव की बात हो जाए,पर देश के लिए तो अमीरों के चोचले के सिवा वह कुछ नहीं है.देश के ट्रेनों की आज क्या हालत है ,वह किसी भुक्तभोगी से छिपा नहीं है. एतराज का सबसे बड़ा कारण है,उसपर सब्सिडी देना,क्योंकि उसके बिना बुलेट ट्रेन का टिकट कोई खरीद ही नहीं सकेगा.भक्त लोग तो इसको भी उचित ठहराने के लिए तैयार हैं.

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    • नीरज वर्मा

      neeraj

      सिंह साहब , इस देश की यही त्रासदी है ! लोग समर्थन करते हैं, वहां तक तो ठीक है ! पर जब समर्थन करने की बजाय , भला-बुरा देखे बिना, अंधभक्ति करने लगते हैं ( तो ) यहीं से शुरू होता है दुर्दशा का एक और दौर ! पिछले ६० साल कांग्रेस के अंध-भक्तों ने ये सब किया और अब मोदी- अंधभक्त उसी राह पर !

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  6. Sachin Tyagi

    नीरज वर्मा जी , आपकी कुछ बातें ( सिस्टम , ट्रेन , वाड्रा ,केजरीवाल आदि ) के बारे में , एक हद तक सही हो सकतीं हैं .लेकिन क्या आपको मोदी और मनमोहन …… या भाजपा और काँग्रेस में , कुछ भी अंतर नही लगता……. ?…….. आपने तो सबको एक ही लाठी से हांक रखा है ……….हाल ही के आम चुनाव में , जनता या आम आदमी ने कांग्रेस या UPA-2 की सरकार को, अभी -2 बताया है की उसने कैसा काम किया है .अगर UPA-1 ने सही काम न किया होता तो आम आदमी ऐसा बेवकूफ नही जो उसे दोबारा चुनता ……….और मोदी , केजरीवाल नही हैं .मोदी ने लगातार १३ साल गुजरात सरकार चलाई है, वो भी दुनिया भर की मुसीबत झेलकर , और केजरीवाल पे ५० दिन भी ऐसा नही किया गया …….. आपकी भाषा और लहजे से पता चलता है कि आप कैसे लोगों के संपर्क में है और आपके स्क्रिप्ट-रायटर्स कौन हैं ……..!!…….. आपकी बातो से ऐसा लगता है कि आप बातो को मोटे तोर पर लेते है और आपका ध्यान बस कुछ चीजो पर है ……….!!!

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    • नीरज वर्मा

      neeraj

      सचिन जी आप बात दिमागी तौर पर मोटी और छोटी दोनों हैं ! स्तर बढायेंगें तो , बहस का मज़ा है वरना कालिदास बन कर डाल काटते रहिये, सर्वाधिकार आप के पास सुरक्षित है ! रहा सवाल अंतर का तो , बाल बराबर बारीक से अंतर से पिछले ६० सालों की (कांग्रेस की) तहस-नहस वाली परम्परा को नहीं बदला जा सकता ! अंतर करते समय फासला बढ़ाना होगा ! क्योंकि चुनाव के वक़्त भाषण तो 22 वीं शताब्दी वाला दिया गया और तुलना 19-20वीं शताब्दी की कांग्रेस के साथ ! अब “सपने दिखाना” किसको कहते हैं, ये आप तय कीजिये !

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      • Sachin Tyagi

        नीरज जी शायद आप मेरी, ”बेवकूफ” और ”बातो को मोटे तोर पर लेने” वाली बात से चिढ गए ….. आपका दिमागी स्तर किसके जितना है और आपमें किस किस्म की उग्रता भरी हुई है – ये अब मैं बहुत अच्छी तरह समझ गया .असल में , गलती मेरी ही है . मुझे आपके इस लेख पे टिप्पणी करनी ही नही चाहिए थी . ये बकवास लेख इस लायक भी नही .

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  7. bipin kumar sinha

    भारत की आज़ादी के ६० वर्ष से ऊपर हो चुके हैं. पर नीरज वर्मा जैसे लोगों की सोच में कोई अंतर नहीं आया है.वे मानते है कि भारत को अभी भी बैलगाड़ी के युग में रहना चाहिए .पर भला हो आधुनिक युग के निति निर्धारकों का जिन्होंने इन लोगों की बातों पर ध्यान नहीं दिया वर्ना कम्पूटर मोबाईल आदि तो इस देश में आना ही नहीं चाहिए था. हमें वक्त के साथ दुनिया के अन्य देशों जो विकसित हैं या तीव्र गति से विकसित हो रहे हैं ,की तरफ भी देखना चाहिए जनाब वर्मा जी रेलगाड़ियों में जो गंदगियाँ मुसाफिरों की तरफ से फैलाई जाती ही हैं वे भी क्या मोदीजी ही बताएँगे कि हमें क्या करना चाहिए

    बेहतर हो हम स्वयं को समझने की कोशिश करे और आगे की ओर देखने का प्रयत्न करे .वैसे पत्रकारों को तो विरोध में लिखने से ही प्रसिद्धि मिलने की उम्मीद होती है. इसी पर ही उनकी रोजी रोटी चलती है.

    बिपिन कुमार सिन्हा

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    • नीरज वर्मा

      neeraj

      बिपिन जी

      चलिए हम तो विरोध में लिख कर रोजी-रोटी चला रहे हैं ! कम-से-कम विरोध करने का तो माद्दा है ! ६० साल बाद भी हमारे देश की ये दुर्दशा है कि आम आदमी को कोई राहत नहीं और आप १२० साल बाद की बुलेट ट्रेन के सपनों से सहमती जता कर बरगला रहे हैं ! यानि सिस्टम सुधारने की बजाय , उसे उसी हाल में सदा पड़े रहने के लिए ! पड़े रहिये और सपने देखते रहिये ! लेकिन जब कभी ट्रेन के किसी साधारण डब्बे में बैठ कर यात्रा कीजिएगा तो ये ज़रूर बताइयेगा कि आप का अनुभव इसे सुधारने को कहता है या फिर इसे बिना सुधारे बुलेट ट्रेन लाने की बात करता है !

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    • Binu Bhatnagar

      हम निश्चय ही बैलगाडी के युग मे नहीं रह सकते, विकास ज़रूरी है पर बुलेट ट्रेन अहमदाबाद से मुबंई चला दी गई तो कितनो को लाभ होगा इसलियें इस विशाल देश मे रेल सेवाओं मे सुधार, नई तक्नीक से सुरक्षा, रखरखाव विकलांगों को सुविधायें देने की ज़रूरत है। जनता भी सफ़ाई पर ध्यान देने लगेगी, अगर लम्बी दूरी की ट्रेनो मे कुछ घंटों के अंतराल पर सफ़ाई की व्यवस्था होगी।आप दिल्ली से चेन्नई के लियें जायें तो दिल्ली मे ट्रेन की सफाई का स्तर संतोष जनक नहीं होगा, फिर चेन्नई तक कोई सफाई कर्मचारी नहीं आयेगा। वही जनता दिल्ली के अक्षरधाम मन्दिर मे भी जाती है, वहाँ की सफ़ाई विश्व स्तरीय है।
      बुलेट ट्रेन से सफ़र मे किसी को समय बचाने के लियें जाने की ज़रूरत क्या है, जब हवाई सेवा उपलब्ध है। हाँ आपका अपनी कार से जी भर गया होतो दिखावे के लियें या प्रचार के लियें मर्सीडीज़ खरीद सकते हैं।

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  8. डॉ. मधुसूदन

    डॉ. मधुसूदन

    (१)
    “बुलेट ट्रैन” के एक बिन्दू पर, केंद्रित आलेख,..” क्या समग्र आर्थिक नीति का द्योतक” माना जाए? निश्चित नहीं।

    (२)
    प्रकल्प जब कार्यान्वित होगा, तो व्यावसायिकों को, श्रमिकों को, साथ साथ उसपर आधार रखनेवाले अनेक व्यवसायों को, भी काम और जीविका मिलेगी। कितनों को व्यवसाय मिलता है, यह उनका निकष मानता हूँ।

    (३)
    कुछ प्रकल्प देश की अस्मिता जगाने के लिए भी आवश्यक होते हैं।

    (४)
    बच्चों के लिए आप पर्यटन पर भी जाते हैं।उसे अकारण खर्च तो नहीं मानते। दिवाली पर पटाखे और संक्राति पर पतंग भी लाते हैं। ऐसे ही भारत का स्वाभिमान भी जगाना चाहिए…”हमारे पास भी बुलेट ट्रैने हैं”। हम पिछडे नहीं।
    (५)
    नरेंद्र मोदी नें, कितने करोड बनाए, इसमें?

    (६) यदि बुलेट ट्रैनें ना लाई जाती, तो, आप नहीं तो और कोई, कहता, कि, क्या, भारत के पास बुलेट ट्रैने भी नहीं?

    कुछ प्र. मन्त्री को निर्णय की स्वतंत्रता तो उन्हें चुनकर देश ने सौंपी है।

    सोचिए।

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    • इंसान

      बहुत सुंदर। लगता है लेखक की बंद आँखें अवश्य खुल जाएंगी और सच्चाई (हकीकत) को देख समझ अब वह कांग्रेसी कविता करना छोड़ कर कोई भला सा व्यवसाय ढूँढ लेगा।

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  9. बीनू भटनागर

    सटीक लेख, इनही लोगों ने आम आदमी पार्टी को बदनाम करने मे कोई कसर नहीं छोड़ी।अभी केजरीवाल कुछ अनुभव की कमी, राजनैतिक अपरिपक्वता के कारण पिछड़ गये हैं, पर उनकी वापसी ज़रूर होगी…क्योंकि उनकी नीयत साफ़ है।

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  10. शैलेन्‍द्र कुमार

    Shailendra Kumar

    नीरज वर्मा जी देश जान गया है कौन अम्बानी, जिंदल और सहारा के साथ है और कौन विरोध में एक ने अम्बानी को 400 करोड़ दिल्ली में मुफ्त में बिजली सब्सिडी के नाम पर दे दिया तो एक ने केंद्र में आते ही 3500 करोड़ का जुर्माना लगा दिया

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  11. इंसान

    यह मैं क्या देख रहा हूँ, एक कांग्रेसी राजकवि और एक राजदरबारी दोनों मिल पत्रकारिता की ओट में धमाचौकड़ी लगाए एक नया विवाद खड़ा कर रहे हैं। यदि नीरज वर्मा हिंदी भाषा ढंग से लिखना सीख ले तो पत्रकारिता पर भी दो एक हाथ चलाना सीख लेगा। कीचड़ उछालने को पत्रकारिता नहीं कह्ते।

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  12. आर. सिंह

    आर.सिंह

    नीरज वर्मा जी को यह स्वप्न भंग करनेवाले सामयिक आलेख के लिए साधुवाद.देखना यह है कि इस पर कोई सार्थक टिप्पणी आती भी है या नहीं.प्रवक्ता के अग्रणी टिप्पणीकारों पर जब दृष्टि जाती है,तो यह मानकर चलना पड़ता है कि इस आलेख पर कोई साथ बहस नहीं होगी.

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    • इंसान

      देख रहे हैं रमश जी? प्रभु, अब लेखक की ओर से शैलेन्द्र कुमार जी, डॉ मधुसूदन जी व बिपिन कुमार सिन्हा जी को कोई नया उपदेश दे डालिये।

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      • नीरज वर्मा

        neeraj

        “इंसान” नाम रख लेने भर से , गर , शब्दों की हैवानियत ख़त्म हो जाए तो आप का नाम अच्छा है ! अब तक तो अच्छा नहीं लगा , (भविष्य में) ईश्वर करे ऐसा ही हो !

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        • इंसान

          कीचड़ के लिए कहे कीचड़ शब्द पर भी कीचड़ फैंक मेरे नाम को कीचड़ में घसीटना हैवानियत अथवा मन की संकीर्ता है या नहीं मैं नहीं जानता लेकिन भारतीय नागरिकता की मर्यादा का उलंघन करते पथभ्रष्ट लोगों द्वारा सदियों में पहली बार उदयमान राष्ट्रीय नेता पर कीचड़ उछालना अवश्य ही राष्ट्रद्रोहियों का काम है।

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          • आर. सिंह

            आर. सिंह

            भक्त की असलियत सामने आ गयी न. ऐसी भी अंधभक्ति क्या कि आप अपने भगवान के विरुद्ध एक शब्द भी सुनने को तैयार नहीं .आदमियों को ( मैं किसी के लिए भी इंसान शब्द का जल्दी इस्तेमाल नहीं करता,क्योंकि मेरीदृष्टि में इंसान कोई बिरले ही है,चाहे कोई अपना नाम इंसान भले ही रख ले)भगवान बनने के पहले इंसान बनना आवश्यक है.हर कदम झूठ और फरेब बड़बोला पन और डींग हांकने वाला देखते ही देखते कुछ लोगों के लिए कैसे भगवान बन गया ,यह मेरी समझ से बाहर है.रही बात व्यक्ति पूजा से राष्ट्र भक्ति को जोड़ने की बात तो आप जैसे ज्ञान लवदुर्विदग्धं की नजर में मेरे जैसे लोग राष्ट्र द्रोही कहलाने में ज्यादा गर्व महसूस करेंगे,क्योंकि अगर चाटुकारिता राष्ट्र भक्ति का पर्याय है ,तो ऐसी राष्ट्र भक्ति आप जैसे ज्ञान लवदुर्विदग्धं को ही मुबारक हो.

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