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    ऊर्जा ही ऊर्जा

    -फख़रे आलम-

    Modi's rally in Faizabad

    भारतीय जनता पार्टी एनडीए गठबंधन ऊर्जा के साथ सत्ता में आई और तब से आज तक प्रधानमंत्री, उनकी पूरी कैबिनेट ऊर्जावान दिखाई दे रही है। प्रधानमंत्री जब बोलते हैं कुछ घोषणा करते है। किसी कार्य अथवा उपलब्धि वर्णन करते हैं तो पहले से अधिक आत्मविश्वासी दिखाई देते हैं और उनके अन्दर ऊर्जा ही ऊर्जा दिखाई देता है। देश में किसी समारोह अथवा उद्घाटन के अवसर पर अथवा विदेश यात्रा पर ऊर्जावाद ही ऊर्जावान दिखाई पड़ते हैं और यही हाल उनके सरकार में शामिल मंत्रियों का है। लगातार प्रधानमंत्री की कुशलता और सरकार के द्वारा उठाये गये कदमों के कारण जो सफलता सरकार को मिल रही है, वह उनके मंत्रियों में अधिक से अधिक ऊर्जा भरने का काम कर रही है।

    एक पत्राकार की परिभाषा लोगों ने इस प्रकार से भी दी है। पत्राकार का अर्थ समसामयिक घटनाओं और सभी विषयों की जानकारी रखने वाला मगर किसी विषय विशेष का एक्सपर्ट नहीं होना। एक और परिभाषा इस प्रकार से है। जो कुछ घटित होता है अथवा जो कुछ उसके मन में जन्म लेता है उसे इमानदारी से लिख दे।

    मैंने सरकार को गठित होते, प्रधानमंत्री और उनके मंत्री परिषद को बड़े ऊर्जा के साथ शपथग्रहण करते देखा। प्रत्येक जगह ऊर्जा ही ऊर्जा था। स्थानीय भाषाओं में, हिन्दी और संस्कृत में शपथ लेते समय देश और समाज के लिए कुछ कर गुजरने के लिए सरकार के गठन को सौ दिन से अधिक हो गए हैं और मंहगाई को छोड़कर सरकार लगातार अपनी उपलब्ध्यिाँ दर्ज करवा रही है। मैंने चार अवसरों पर सरकार और जनता के मध्य बेतहाशा ऊर्जा देखा है। सर्वप्रथम सरकार के गठन और फिर प्रधानमंत्री के विदेश यात्रा के क्रम में। मुझे दो अवसरों पर इस ऊर्जा ने बहुत अध्कि प्रभावित किया। स्वतंत्रता दिवस अर्थात् 15 अगस्त राष्ट्र पर्व के अवसर पर देश और देशवासियों के मध्य मैंने एक अलग उत्साह देखा था। देश भक्ति का वह जज्बा और वह अंदाज मैंने अभी तक नहीं देखा है। सरकारी अथवा गैर सरकारी स्तरों पर राष्ट्रीय पर्व मनाने का अन्दाज जुदागाना और अनूठा था। मुझे राष्ट्रीय पर्व के उस पावन अवसर पर हर जगह ऊर्जा ही ऊर्जा दिखाई पड़ा था। इन सौ दिनों के अन्दर ही अन्दर एक और अवसर आया था। शिक्षक दिवस अर्थात् 5 सितम्बर के दिन। प्रधानमंत्री का देश के बच्चों और देश के भविष्य के साथ सम्बोधन बड़ा अच्छा कार्यक्रम था, उत्साहवर्धक और ऊर्जा से भर देने वाला कार्यक्रम था। इससे पूर्व इस प्रकार के आधुनिकता पर आधरित और देश में बच्चों को दिखाने का प्रयास कभी नहीं हुआ। इस प्रयास ने कईयों कमियों की ओर ध्यान आकृष्ट किया। देश भर में सरकारी और गैर सरकारी शैक्षिक संस्थाओं में जो ऊर्जा था उसका वर्णन शब्दों में संभव नहीं है। मुझे खुशी है और शायद बहुत से देशवासियों को मुझ जैसी खुशी होगी की सरकार ने शिक्षा के ऊपर ध्यान देना शुरू कर दिया है और वह भी प्राइमरी स्तर से। 5 सितम्बर के दिन जो उत्साह, खुशिया, जोश उमंग मैंने प्रातः काल से सायं तक देश के होनहारों, छात्रों, छात्राओं और भविष्य के अन्दर देखा, तो मेरा मन, सरकार, प्रधानमंत्री और मंत्रिमंडल को धन्यवाद देने को चाहा।

    फखरे आलम
    फखरे आलमhttps://www.pravakta.com/author/fakhrealam
    स्वतंत्र वेब लेखक व ब्लॉगर

    4 COMMENTS

    1. टिप्पणी में थोड़ी टाइप की भूल हो गयी है.’कथनी के विष ‘के बदले ‘करनी का विष’ होना चाहिए.

      • अरे रमश भाई, आपकी कथनी में इतना विष है कि आप जैसे राष्ट्र मित्र (भारतीय नागरिक) होते देश को दुश्मन की कोई आवश्यकता नहीं रह जाती! पूर्व सरकारों द्वारा लूटमार में सहयोगिता की आपकी भागीदारी आपको बुढ़ापे में चैन से जीने नहीं देगी। मंदिर नहीं, चौपाल नहीं, कोई पान की दूकान पर जा कर चिल्लाते ऊर्जा लगाओ नहीं तो आपकी विषैली ऊर्जा आपको भस्म न कर दे। मात्र लिखने से ऊर्जा कम खर्च होती है।

    2. “कथनी मीठी खांड से करनी विष की लोए.
      कथनी तजि करनी करे,विष से अमृत होए.”
      कथनी में तो ऊर्जा बहुत दिख रहा है,पर कथनी का विष दिल्ली राज्य की राजनीति में स्पष्ट दिख रहा है.

      • फखरे आलम जी को उनके सुन्दर आलेख के लिए मेरा साधुवाद।

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