लेखक परिचय

अनिल अनूप

अनिल अनूप

लेखक स्‍वतंत्र टिप्‍पणीकार व ब्लॉगर हैं।

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-अनिल अनूप
भारत में बीते दो दशकों में शराब की खपत पचपन फीसदी बढ़ी है और अब किशोर और महिलाओं में भी इसकी लत जोर पकड़ रही है. आर्थिक सहयोग और विकास संगठन की ताजा रिपोर्ट में हुए इस खुलासे ने स्वास्थ्य विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी है.
अब शराब पीने की बढ़ती प्रवृत्ति पर अंकुश लगाने की मांग तेज हो रही है. पेरिस स्थित संगठन ओईसीडी के इस अध्ययन में रूस और एस्टोनिया के बाद भारत तीसरे स्थान पर है. ताजा खुलासे से चिंतित स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने सरकार से शराब के सेवन को नियंत्रित करने के लिए नई नीति बनाने की मांग की है. आंकड़ों से साफ है कि देश का युवा तबका अब कम उम्र में ही मयखाने का दरवाजा तलाश रहा है. देश में बढ़ते सड़क हादसों की यह एक प्रमुख वजह है. सेकसरिया इंस्टीट्यूट आफ पब्लिक हेल्थ के निदेशक डा पी.सी.गुप्ता विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों के हवाले कहते हैं, “लगभग तीस फीसदी भारतीय अल्कोहल का सेवन करते हैं. इनमें चार से 13 फीसदी लोग तो नियमित रूप से शराब का सेवन करते हैं. उनमें से आधे लोग खतरनाक पियक्कड़ों की कतार में शुमार हैं.” कैंसर विशेषज्ञ डा. सुनील मुखर्जी कहते हैं, “मुंह, लीवर और स्तन समेत कैंसर की कई किस्मों का संबंध शराब के सेवन से है.” सामाजिक कार्यकर्ता नीलिमा घोष कहती हैं, “आश्चर्य की बात यह है कि इन आंकड़ों के बावजूद सरकारें इस गंभीर मामले पर कोई ध्यान नहीं दे रही हैं.”
विशेषज्ञों का कहना है कि दूसरे उत्पादों के बहाने टीवी चैनलों और अखबारों में शराब की विभिन्न किस्मों के लुभावने विज्ञापन दिखाए और छापे जा रहे हैं. लेकिन किसी भी सरकार ने इन पर अंकुश लगाने में दिलचस्पी नहीं दिखाई है. इन लुभावने विज्ञापनों से आकर्षित होकर कम उम्र के किशोर भी शराब की बोलत को मुंह लगा रहे हैं. यही नहीं, बीते 10 वर्षों में किशोरियों में भी तेजी से शराबखोरी बढ़ी है. विशेषज्ञों की राय में कम उम्र के युवकों के साथ युवतियों में बढ़ती शराबखोरी गहरी चिंता का विषय है. युवतियों को होने वाली विभिन्न बीमारियों का प्रभाव उनकी संतान पर भी पड़ता है. लिहाजा, बढ़ती शरबाखोरी के दूरगामी नतीजे हो सकते हैं.
शराब के बढ़ते सेवन से स्वास्थ्य को गंभीर नुकसान के अलावा भी कई तरह के खतरे हैं. शराब का सेवन दिल, दिमाग, लीवर और किडनी की दो सौ से भी ज्यादा बीमारियों को न्योता देता है. कई मामलों में यह कैंसर का भी प्रमुख कारण बन जाता है. कम उम्र के किशोरों में शराब पीने की बढ़ती प्रवृत्ति का उनके भविष्य और रोजगार पर सीधा असर पड़ता है. स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि शराब का बढ़ता सेवन समाज के हर तबके के लोगों को समान रूप से प्रभावित करता है. शराब की बढ़ती खपत का अर्थव्यवस्था से भी संबंध है.
ब्रिटिश मेडिकल जर्नल में छपी रिपोर्ट बताती है कि शराब के फायदों के बारे में पहले कई दावे बढ़ाचढ़ा कर किए गए थे. ज्यादा शराब पीने का 200 से भी अधिक बीमारियों से संबंध है. रोज केवल एक या दो ड्रिंक लेने वालों को होने वाले फायदे की रिपोर्टों पर इसलिए सवाल उठ रहे हैं क्योंकि उन स्टडीज में कम शराब पीने वालों की तुलना ज्यादा पीने वालों से की गई थी, ना कि शराब बिल्कुल ना पीने वालों से.
अर्थशास्त्रियों का कहना है कि शराब पीकर काम पर आने वाले कर्मचारियों की वजह से उत्पादकता को जो नुकसान होता है उससे भारत जैसे किसी भी विकासशील देश को सालाना उत्पादन में लगभग एक फीसदी नुकसान होता है. और यह एक मोटा अनुमान है. एक गैर-सरकारी संगठन के प्रमुख नृपेन धर कहते हैं, “किशोरों में बढ़ते शराब का सेवन का दूरगामी असर हो सकता है. इससे उनके भावी जीवन की दशा-दिशा तो तय होती ही है, जीवन में उनको कई तरह की बीमारियों से भी जूझना पड़ता है.”
विशेषज्ञों का कहना है कि शराब की बढ़ती खपत पर अंकुश लगाने के लिए केंद्र को एक राष्ट्रीय नीति बनानी चाहिए. उनकी दलील है कि शराब की बिक्री से मिलने वाले भारी राजस्व ने ही सरकार के कदमों में बेड़ियां डाल रखी हैं. राजस्व को ध्यान में रख कर ही पूर्वोत्तर राज्य मिजोरम ने 18 वर्षों से जारी शराबबंदी खत्म कर दी है. लेकिन महज राजस्व के लिए देश के भविष्य से खिलवाड़ नहीं किया जा सकता. शराब और सिगरेट की बिक्री से होने वाली आमदनी को उसकी वजह से होने वाले स्वास्थ्य खर्च के साथ जोड़कर देखा जाना चाहिए और नई नीति बनाने से पहले नफा नुकसान का हिसाब होना चाहिए.
सरकार एक निश्चित उम्र से पहले किसी के शराब पीने को कानूनी जुर्म बना कर इस समस्या पर काफी हद तक अंकुश लगा सकती है. इसके साथ ही कम उम्र के किशोरों को शराब बेचने की स्थिति में विक्रेता के खिलाफ भी कार्रवाई का प्रावधान रखा जाना चाहिए.
देश में बोलचाल की भाषा में कई ऐसे युग्म शब्दों का इस्तेमाल होता है जिनमें दूसरा शब्द भी मूल रूप से पहले शब्द का ही पर्याय होता है. चाय-वाय, नाश्ता-वास्ता और खान-पान समेत ऐसे सैकड़ों शब्दों का रोजाना धड़ल्ले से इस्तेमाल होता है. ऐसा ही एक शब्द है दवा-दारू जिसका इस्तेमाल चोटों और बीमारियों से इलाज के संदर्भ में होता है. लेकिन लगता है देश के ग्रामीण इलाकों के लोग इन दोनों का संधिविच्छेद कर दूसरे शब्द यानी दारू को उसके शाब्दिक अर्थ में ही ले रहे हैं. यही वजह है कि ग्रामीण इलाके में स्वास्थ्य के मुकाबले शराब और तंबाकू पर तीन गुनी ज्यादा रकम खर्च कर रहे हैं. एक ताजा सर्वेक्षण रिपोर्ट में यह बात सामने आई है.
प्राथमिक शोध और आंकड़ों का विश्लेषण करने वाली कंपनी क्रोम डाटा एनालिसिस एंड मीडिया (क्रोम जीएम) की ओर से ग्रामीण जीवनशैली पर किए गए सर्वेक्षण की रिपोर्ट में कहा गया है कि देश के ग्रामीण इलाकों में लोग हर महीने 140 रुपये शराब पर खर्च करते हैं और 196 रुपये तंबाकू पर. लेकिन स्वास्थ्य सुविधाओं पर यह खर्च महज 56 रुपये है. इसके अलावा औसत परिवार हर महीने उपभोक्ता सामग्री पर पांच सौ रुपये खर्च करता है. दवाओं समेत दूसरी वस्तुओं पर उसका मासिक खर्च महज 196 रुपये है. इसमें कहा गया है कि शहरों के मुकाबले ग्रामीण इलाकों में त्वचा की देख-रेख और सौंदर्य प्रसाधन सामग्री पर बहुत मामूली खर्च (हर महीने 36 रुपये) होता है.
रिपोर्ट के मुताबिक, ग्रामीण इलाकों में रहने वाले लोग खाद्य सामग्री में दूध खरीदने पर बहुत कम खर्च करते हैं. वह लोग ज्यादातर इसके लिए अपने पशुओं पर ही निर्भर हैं. क्रोम डीएम के प्रबंध निदेशक पंकज कृष्ण कहते हैं, “ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य सुविधाओं पर खर्च कम होने की एक प्रमुख वजह यह है कि वहां लोग अब भी एलोपैथिक दवाओं की बजाय इलाज के लिए घरेलू व प्राकृतिक उपायों को ही तरजीह देते हैं.”
उक्त सर्वेक्षण 19 राज्यों में फैले 50 हजार गांवों में किया गया. इसमें कहा गया है कि उन इलाकों के महज एक फीसदी परिवार साल में सौंदर्य प्रसाधन सामग्री पर एकत हजार या उससे ज्यादा रकम खर्च करते हैं जबकि 63 फीसदी लोगों के मामले में यह खर्च चार सौ रुपए से भी कम है. कृष्णा कहते हैं कि ग्रामीण इलाकों में सौंदर्य प्रसाधन सामग्री अब भी लक्जरी की श्रेणी में आते हैं. आय कम होने की वजह से सबसे ज्यादा कटौती इसी में की जाती है. इसके अलावा उन इलाकों में ब्रांडेड कंपनियों के उत्पाद भी उपलब्ध नहीं होते.
वैसे कुछ महीने पहले सौंदर्य प्रसाधन के इस्मेतामल के बारे में हुए एक अन्य सर्वेक्षण से यह बात सामने आई थी कि शहरी इलाकों में औसत तबके के लोग इस पर हर महीने 150 रुपये खर्च करते हैं. ताजा रिपोर्ट से तुलना करें तो ग्रामीण इलाकों के मुकाबले यह खर्च चार गुने से ज्यादा है. लेकिन शहरी मध्यवर्ग के मामले में यह खर्च 75 रुपये प्रति माह है.
भारत में खाने-पीने की वस्तुएं, साबुन, सर्फ, शैंपू और बालों में लगाने वाले तेल जैसी तेजी से बिकने वाली उपभोक्ता सामग्री (एफसीएमजी) का बाजार 3.20 लाख करोड़ का है. ग्रामीण इलाकों में मुख्य रूप से छोटी कीमत वाले पैक ही बिकते हैं. बावजूद इसके इस बाजार में ग्रामीण भारत का हिस्सा 36 फीसदी है. समाजशास्त्रियों का कहना है कि ग्रामीण उपभोक्ताओं की आय में इजाफे के साथ वह धीरे-धीरे शहरी मध्यवर्ग से होड़ ले रहे हैं. मिसाल के तौर पर पहले जो लोग दो रुपये का शैंपू का पैक खरीदते थे वहीं अब बड़ा पैक खरीदने लगे हैं. एक समाजशास्त्री प्रोफेसर मनीष भट्टाचार्य कहते हैं, “आय बढ़ने के साथ अब ग्रामीण उपभोक्ता भी औसत शहरी मध्यवर्ग की कतार में शामिल होने लगा है. यह प्रक्रिया धीमी लेकिन नियमित है.”
विशेषज्ञों का कहना है कि ग्रामीण बाजार शहरी बाजारों के मुकाबले तेजी से बढ़ रहा है. बीते दो साल से मानसून बेहतर नहीं होने के बावजूद ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर कोई खास प्रतिकूल असर देखने में नहीं आया है.
एक अर्थशास्त्री दिवाकर मंडल ग्रामीण इलाकों में शराब पर होने वाले खर्च का जिक्र करते हुए कहते हैं, “यह भी ग्रामीण इलाकों में औसत परिवारों की बढ़ती आय का संकेत है.” वह कहते हैं कि जहां तक स्वास्थ्य पर खर्च कम होने का सवाल है इसकी दो प्रमुख वजह हैं. पहली वजह तो यह है कि लोग घरेलू उपचार को ही प्राथमिकता देते हैं. इसके अलाव ग्रामीण इलाकों में सरकारी व निजी स्वास्थ्य सुविधाएं बदहाल हैं. ज्यादातर स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टर, नर्स और दवाओं की भारी कमी है. ऐसे में लोग उन अस्पतालों का चक्कर काटने की बजाय प्राकृतिक व घरेलू इलाज ही चुनते हैं.
विशेषज्ञों का कहना है कि ग्रामीण इलाकों में पहले तो स्वास्थ्य सुविधाओं को बेहतर बनाना जरूरी है. इसके साथ ही आम लोगों को स्वास्थ्य के मुद्दे पर गैर-सरकारी संगठनों को साथ लेकर जागरूकता अभियान चलाया जाना चाहिए. ऐसा नहीं होने तक लोग दवा-दारू में से दवा की जगह दारू को ही तरजीह देंगे.
मादक द्रव्यों एवं पदार्थों के सेवन से होनेवाले नुकशान से कौन अनभिज्ञ है ? आज युवा पीढ़ी जिसके कंधों पर देश का भार है, इन दुर्व्यसनों की शिकार होती जा रही है | युवावस्था में शारीरिक विकास हो रहा हो तब मादक द्रव्यों का सेवन शरीर को निष्क्रिय एवं अशक्त बना देता है | शराब, भांग, चरस, सिगरेट, तम्बाकू, बीडी, अफीम आदि के सेवन का प्रचलन इतनी हद तक हो गया है कि इसका उपयोग न करनेवालों को दकियानूसी समझा जाता है | यह एक विडम्बना ही तो है कि हम जानकर भी कि ये द्रव्य न तो टोनिक है, न ही किन्ही अर्थों में लाभकारी , फिर भी इसका उपयोग करते रहते हैं |ये सच्च है कि इससे दुखों से क्षणिक छुटकारा मिलने का आभास जरुर होता है पर वास्तव में दुःख मिटते नहीं हैं | वे तो जस के तस ही रहते हैं और हमे आर्थिक एवं मानसिक रूप से क्षति भी पहुंचाते हैं | अपने हाथों अपने ही विनाश को आमंत्रित करना क्या सही है ?
समाज का तथाकथित उच्च वर्ग स्वयं को आधूनिक तथा धनी प्रदर्शित करने के लिए इसका उपयोग करता है | शराब के सेवन को समृध्धि और फैशन का प्रतीक समझता है | परिणाम स्वरूप उस परिवार का बेटा / बेटी / बहु भी इस और अग्रसर होते हैं और मध्यवर्ग के अपने मित्रों को भी इस दलदल में घसीटते हैं | मध्यवर्ग के युवा इस चकाचोंध में अनजाने ही सामिल होते चले जाते है, इस लत के शिकार हो जाते है | धीरे धीरे इस लत के कारण आर्थिक तंगी आने लगती है और ये तंगी उन्हें गलत राह पर ला छोडती है ; जहाँ से वापस मुड़ना नामुमकिन सा प्रतीत होने लगता है इस आदत के कारण उन्हें झूठ का सहारा लेना पड़ता है …और एक के बाद एक गलत आदतों के वे शिकार होने लगतें हैं | यानि यह कुसंगति एक परिवार से समाज, समाज से देश और देश से हमारी भारतीय संस्कृति को बर्बाद करती चली जाती है |
वहीं दूसरी और हम देखते हैं कि विद्या के मन्दिर समान विद्यालय जहाँ तरुण / तरुणी आदर्श जीवन का पाठ पढने जाते है वहाँ कुछ असामाजिक गुट ऐसे नशा प्रेरित पदार्थों का सेवन करने के लिए मासूमों को अपनी जालमें फाँस ने का भरपूर प्रयास में लगे होतें हैं | जब ऐसे तरुण / तरुणी उनके जाल में फंस जाते हैं तब वे नशाखोर बनते जाते हैं और तभी से शुरू होती है उनके पतन कि शुरुआत…उनकी बर्बादी की दास्तान..!!
नशाखोरी मानव जीवन की यात्रा का एक ठहराव या भटकाव मात्र है | जैसे जैसे शहरीकरण और औधौगीकरण बढ़ा है वैसे वैसे ये दुर्गुण भी बड़े पैमाने पर बढ़ता चला जा रहा है |एकबार इसकी शुरुआत होने के बाद व्यक्ति धीरे-धीरे गरीबी तथा बीमारी के कंटीले जाल में फंसता चला जाता है | उसके भीतर के मनोबल, बुध्धि चातुर्य, धैर्य, तथा साहस क्षीण होते चले जाते हैं | परिवार बर्बाद होने लगता है | ये नशाखोरी उसे कहीं का नहीं छोडती | वस्तुत: इस तरह की बुराइयों से हमारा युवावर्ग निकम्मा होता दिखाई दे रहा है | हमारी सभ्यता , संस्कृति नष्ट होती जा रही है |
अब भिन्न-भिन्न नशों का विषलेषण एवम होने वाली हानियों की ओर देखें तो पायेंगे कि हर वर्ष 14 अरब तो सिर्फ तम्बाकू के उत्पादन में ही स्वाहा हो जाते हैं | धुम्रपान के कारण करीब 1 से डेढ लाख लोग रोगग्रस्त हो जाते हैं | उनके इलाज में 20 लाख की राशि का सफाया हो जाता है | इन आदतों के कारण अन्य रोग जैसे कि टी.बी., कैंसर, दृष्टिदोष, दिल की बिमारी, मानसिक तनाव आदि भी लग जाते हैं जिस कारण देश आर्थिक बोझ का शिकार बन जाता है | वैज्ञानिक अनुसंधान से पता चला है कि जो व्यक्ति दिन में एक सिगरेट पीता है वह अपनी आयु में 5 मिंनट की कटौती करता है | 5 ग्राम तम्बाकू खानेवाला व्यक्ति अपने जीवन के दस साल कम कर देता है | उसे फेफडों का रोग भी हो सकता है |
वैसे ही अगर अफीम की आदत हो जाये तो वह भी व्यक्तिको कहीं का नहीं छोड्ती | अफीम के सेवन से स्नायुतंत्र पर बुरा प्रभाव पडता है | वह व्यक्ति सुस्त, कमजोर व डरपोक बनता जाता है | मलत्याग में कठिनाई आने लगती है | खूब पसीना आने लगता है | उसकी मांसपेशियां शिथिल होने लगती है | अफीम की आदत उसे ये भ्रममें रखती है कि वह दुखों से छुट गया पर वैसा होता नहीं है | अफीम के कारण उसका मस्तिष्क अप्रभावि बन जाता है जिस के कारण वह ये महसुस करता है |वहीं भांग के सेवन से इंन्सान विवेकहीन होने लगता है | उसकी स्मरण-शक्त काफी हद तक प्रभावीहोती है | व्यक्ति हंमेशा अर्धमूर्छित अवस्था में गुमसुम पडा रहता है | कईबार वह अति आक्रामक भी बन जाता है | इस कारण परिवार की गरिमा को हानि पहुंचती है |
इस संबंध में कहना होगा कि नशा करने से व्यक्ति अगर अपने आप को आधुनिक बने दिखाना चाहता है तो वह उसकी गलती ही होगी | इन व्यसनों से दूषित कर, बिमारियों का हाथ थाम, समाज एवम परिवार पर बोझ बन, सामाजिक ढाचे को तितर-बितर कर अगर कोई अपने आप को आधुनिक माने तो उससे तो अच्छा ये होगा कि वह देशी ही बना रहे…!!

One Response to “नशे की लत या संस्कार है नशाखोरी”

  1. सविता गर्ग

    वाह क्या तस्वीर पैश किया है भारत के महानता की….

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