लेखक परिचय

सुप्रिया सिंह

सुप्रिया सिंह

स्वतंत लेखिका

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 हालात की चाल : –  पात्र बदला , स्थान बदला और समय भी बदल गया लेकिन कहानी वही की वही रही । बदला तो सिर्फ पात्र, स्थान, और समय । हर बार की तरह इस बार भी कहानी का शीर्षक वही था , सारांश भी लगभग वही था और अगर यह कहा जाएं कि निर्ष्कष भी वही ही रहेगा तो ज्यादा अतिशोयक्ति नही होगी । यह कहानी हमारे समाज की कहानी कहती है , कहती है आपकी छोटी और ओछी मानसिकता की कहानी , कहती है आपकी निर्दयता की कहानी । कहानी है आपके उसी समाज की जिसका दिल न जाने किस पत्थर का बना है ? इतना निर्मम एंव निर्दयी है कि आँसूओं के सैलाब से भी नही पिघलता है ।

जब तक कहानी के पात्र के स्थान पर आपकी घर की बहन और बेटी नही है तब तक तो आपको कहानी से कोई मतलब ही नही रहता है , मतलब रहता है तो सिर्फ और सिर्फ भारतीय संस्कृति की आड़ लेकर बहन , बेटियों को ही गलत साबित करने से और उसे पश्चिमी सभ्यता का नमूना साबित कर उसकी आलोचना करने से लेकिन जाने आपको जब क्या हो जाता है जब आपके ही समाज मे महिलाओं को कमजोर मानकर उन्हें शासकीय रुप से कुछ विशेष अधिकार दिए जाने की बात की जाती है तो आप सामनता का झण्डा लेकर खड़े हो जाते लेकिन जब पश्चिमी सभ्यता को परिभाषित करने के लिए आप महिलाओं की आलोचना करते है तो उस समय आपका सामनता का झण्डा क्यो नीचे हो जाता है ? अगर महिलाएं रात को देर से घर आती है , अपनी जिन्दगी जीती है और पार्टियों मे जाती है तो वे पश्चिमी हो गई लेकिन जब आप ही के समाज के पुरुष देर रात घर आएं , पार्टियों मे जाएं और राह चलती महिलाओं और लड़कियों को छेडते है तो वे कैसे और किस तरह से भारतीय संस्कृति का झण्डा बुलंद करते है ? ये बातें तो कई बार समझ से परे ही लगने लगती है ।

कहने को आप भले ही कितनी बार भी कह दे कि आप महिलाओं का सम्मान करते है लेकिन अपने दिल और समाज को ये समझाने का एक मौका नही छोड़ते कि आप पुरुष प्रधान समाज मे है । कहने को आप कितनी आसानी से कह देते है कि मै कमा कर लाता हूँ तभी तुम कुछ बना पाती हो और खा पाती हो लेकिन हर बार आपके इन शब्दो से आपका ही डर दिखता है , डर आपको इस बात का है अगर मुझे आपके जैसी नौकरी करने का मौका मिल गया तो कही मै आपसे ऊपर न उठ जाऊँ , आप भले ही ये न दिखाएं पर ये हमको पता रहता है कि आपको पल – पल अपने अहम की चिन्ता सताती रहती है ।

अब तो आप से और आपके समाज से हमारी उम्मीदें ही छूटती जा रही है । आप जैसे – जैसे चांद और मंगल पर पहुँच रहे है आपकी सोच वैसे – वैसे ही या उससे कही ज्यादा गर्त मे गिरती जा रही है । आप आज भी मुझे पैरो की जूती समझकर अपने मन को झूठी दिलासा बहुत अच्छे से दे देते है । आपके समाज ने न कभी मुझे सम्मान दिया और न ही कभी देगा । आपके समाज ने मुझे हर बार सिर्फ और सिर्फ प्रयोग की वस्तु और अपनी वासना मिटाने का साधन समझा है ।

आज भी हर रोज एक निर्भया मरती है , समाज और जिंदगी से जंग लड़ते – लड़ते उसे पता ही चलता की कब वे खुद से हार जाती है । आज भी हर रोज कही न कही एक बंगलौर जैसा स्थान बनता है पर इस स्थान और उस स्थान मे फर्क मात्र बस इतना है कि एक मीडिया के पास है तो एक मीडिया से आज भी कोसो दूर समाज की रुठिवादी जंजीरो से जकड़ा हुआ है । और हर बार की तरह इस बार भी मै एकबार फिर ऊठँगी और खुद को झूठी दिलासा दूँगी कि ये आखिरी बार था , अगली बार से शायद ऐसा कुछ न हो ।

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