राष्ट्रीय—एकता एक चिंतन

शिवदेव आर्य,
किसी भी राष्ट्र के लिये राष्ट्रीय एक ता का होना अत्यन्त आवश्यक है। राष्ट्रीय एकता राष्ट्र को सशक्त व संगठित बनाये रखने की अनन्य साधिका है। राष्ट्रीय एकता विभिन्नताओं में एकता स्थापित करने की व्यवस्थापिका है।
    प्रायः कहा जाता है कि वर्तमान में भारत की राष्ट्रीयएकता सर्वमत समभाव पर आश्रित है। सर्वमत समभाव से तात्पर्य है कि सभी मतों के प्रति समान आदर-भाव। मुसलमानों के धार्मिक कृत्यों में हिन्दुओं की और हिन्दुओं के धार्मिक कृत्यों में मुसलमानों का एकत्रित हो जाना आदि राष्ट्रीय एकता का स्वरूप बताया जा रहा है। जबकि मेरी दृष्टि में यह राष्ट्रीय-एकता को विखण्डित करने का षड्यन्त्र है। यही वह विकृत अवधारणा है, जिसने भारतवर्ष का विभाजन किया, भारत में असहिष्णुता का पाठ पढ़ाया, वन्दे मातरम् को बोलना साम्प्रदायिक बताया और भारत में आतंकवाद, नकस्लबाद जैसी महाबिमारी को जन्म देकर हॅंसते हुए भारतवर्ष को करुणक्रन्दन से युक्त होने पर मजबूर कर दिया।
    भारतवर्ष के प्रायः सभी प्रसिद्ध हिन्दू तीर्थ-मन्दिरों, गुरुकुलों की व्यवस्था और आय पर सरकार का अधिाकार है, परन्तु भारत की किसी भी मस्जिद, गिरिजाघर या मदरसों की व्यवस्था पर सरकार कोई हस्तक्षेप नहीं करती। हिन्दुओं के बड़े-बड़े विद्वानों, सन्तों व विदुषियों को येन-केन प्रकारेण फ़ंसाकर जेल भिजवाया जाता है किन्तु मस्जिद तथा मदरसों के इमामों के दोष युक्त होने पर कुछ नहीं किया जाता। जामा मस्जिद दिल्ली के पूर्व प्रमुख इमाम अब्दुल्ला बुखारी को तीन-तीन बार न्यायालयों के समन के बावजूद हाथ तक नहीं लगाया गया। ‘हिन्दू लॉ’ को ‘गरीब की बहू सबकी भाभी’ मानकर छेड़खानी की जाती है किन्तु ‘मुस्लिम लॉ’ पर कोई हस्तक्षेप नहीं होता। भारत का सर्वोच्च न्यायालय भी ‘मुस्लिम लॉ’ की दलिलें प्रस्तुत करता है। मुस्लिम हज-यात्रियों पर सरकार करोड़ों रुपया खर्च करती है किन्तु कुम्भ मेले पर टैक्स लगाती है। फि़र ये व्यवस्थायें राष्ट्रिय एकता को कैसे सिद्ध कर सकती हैं? ये कैसा न्याय है और कैसी व्यवस्था है? क्या यह न्याय व व्यवस्था  प्रत्येक भारतीय के लिए एक समान है? और यदि नहीं है तो राष्ट्रीय एकता कैसे स्थापित हो पायेगी?
    हमारा भारतीय संविधान विभिन्न धार्मों, जातियों, प्रान्तों में विभेद खड़ा करने में राष्ट्रिय-एकता का स्वरूप निर्धारित करता है। अहिन्दू एक से अधिक विवाह कर सकता है, किन्तु हिन्दू एक पत्नी रहते हुए दूसरा विवाह रचाएं तो संविधान का उल्लंघन है। संविधान शिक्षा, नौकरी, पदोन्नति में जातीयता के आधार पर प्रोत्साहन देता है। चिकित्सा, इंजीनियरिंग के क्षेत्र में 80 प्रतिशत अंक पाने वाले वंचित रह जाते हैं और 25 प्रतिशत अंक पाने वाले सर्वथा अयोग्य भी जातिगत आरक्षण के नाम पर प्रविष्ट हो जाते हैं। ये कैसी विस्मता है? क्या ये पक्षपात नहीं है?
    भारत में भाषायी स्तर पर राष्ट्रिय एकता की माला में अंग्रेजी को पिरोया गया है। भारत की प्रान्तीय भाषायें राष्ट्रिय-एकता में सक्षम नहीं और संस्कृत पुत्री हिन्दी जो राष्ट्रिय-एकता की पथप्रदर्शिका बन सकती थी, उसमें नेताओं को साम्प्रदायिकता और दक्षिण भारत का अपमान दृष्टिगोचर होता है। इसलिए भारत में राष्ट्रीय एकता के निर्धारण में विदेशी भाषा अंग्रेजी एक सूत्र बनी हुई है। देखो! भला जिस भाषा को भारत के सभी लोग जानते तक न हों तो उस भाषा से एकता कैसे स्थापित हो सकती है? अंग्रेजी भाषा राष्ट्रीय एकता की जब सूत्र बनी तो अंग्रेजी सोच ने सभी के मन-मस्तिष्क को गहरा पहार किया कि हम आज भी काले अंग्रेज बनकर जी रहे हैं। अपनी सभ्यता व संस्कृति से विमुख होते जा रहे हैं। प्रातः जागरण से लेकर रात्रि शयन तक विदेशी वस्तुओं का प्रयोग तथा विदेशी सभ्यता का अन्धानुकरण हमारी राष्ट्रियता की पहचान बनती जा रही है।
    देश में व्याप्त साम्प्रदायिकता, जातिवाद, भाषावाद, क्षेत्रवाद आदि सभी राष्ट्रिय एकता के अवरोधक तत्त्व हैं। ये सभी अवरोधाक तत्त्व राष्ट्रीय -एकता की दीवार को कमजोर बनाते हैं। इन अवरोधाक तत्त्वों के प्रभाव से ग्रसित होकर लोगों की मानसिकता क्षुद्र होतीं जा रही है, जो निज स्वार्थ  के चलते स्वयं को राष्ट्र की प्रमुख धारा से अलग रखते हैं। इन विघटनकारी तत्त्वों की संख्या जब और अधिाक होने लगती है तब ये सभी परस्पर राष्ट्रिय एकता को कमजोर बनाते हैं। इस प्रकार ये विभिन्नताएं जो हमारी संस्कृति की अमिट पहचान है, जिनपर हम गौरवान्वित होते हैं वे ही जब उग्र रूप धारण करती हैं तब यह हमारी एकता और अखण्डता की बाधाक बन जाती हैं। देश की एकता के लिए आन्तरिक अवरोधक तत्त्वों के अतिरिक्त बाह्य शक्तियॉं भी बाधाक बनती हैं। जो देश हमारी स्वतन्त्रता व प्रगति से ईर्ष्या रखते हैं, वे इसे खण्डित करने हेतु सदैव प्रयासरत् रहते हैं। कश्मीर की समस्या हमारी इन्हीं प्रयासों की उपज है, जिससे हमारे देश के कई नवयुवक दिग्भ्रमित होकर राष्ट्र की प्रमुख धारा से अलग हो चुके हैं।
    आज हमारे भारतवर्ष के लोगों में ऐसी क्षुद्र मासिकता विकसित हो गई है, जो अत्यन्त दयनीय है। यह देखकर बहुत आश्चर्य होता है कि उच्चबुद्धिजीविवर्ग अपना भारतीय अस्तित्व ही खो देता है। अभी हाल में ही एक ऐसी घटना भीमा कोरे गॉंव हिंसा से सम्बन्धिात हम सबके सामने आयी, जिसने सभी को स्तब्धा कर दिया। इसमें जो आरोपित पकड़े गये हैं वे बहुत की योग्य शिक्षाविद् हैं परन्तु उनकी मानसिकस्थिति को देख आश्चर्य लगता है। देश के माननीय प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी जी सहित अनेक शीर्षस्थ नेताओं को समाप्त करने के लिए एक योजनाबद्ध तरीके से कार्य हो रहा था, किन्तु हमारी की सुरक्षा ऐजन्सियों ने मिलकर अलग-अलग स्थानों से योजनाकर्ताओं को पकड़ा लिया। इन आरोपियों में मानवाधिाकार कार्यकत्री सुधा भारद्वाज, मानवाधिाकार एवं पत्रकार गौतम नवलखा, एक्टिविष्ट वर्नान गॉन्जारन्वेस, एक्टिविष्ट एवं वामपन्थी वरबरा रॉव एवं वकील अरुण फ़रेरा जैसे उच्चशिक्षाविद् शामिल हैं। इससे बड़े आश्चर्य की बात तो यह है कि इन लोगों के समर्थन में देश के बड़े-बड़े राजनेता व सामाजिक-कार्यकर्ता खड़े हैं। ऐसे राजनेताओं व सामाजिक-कार्यकर्ताओं को देखकर शर्म आती है? इनको देखकर हम कैसे कह सकते हैं कि हमारा देश राष्ट्रीय एकता में सम्बद्ध है? क्या ऐसे लोगों से देश की एकता व अखण्डता स्थिर रह सकती है?
    प्रत्येक राष्ट्र के लिए राष्ट्रीय एकता का होना अत्यावश्यक है। भारत जैसे एक असीम असमानताओं से भरे देश में एकता लोगों को जोड़ने वाले कारक के रूप में काम करता है। पिछले कुछ वर्षों से पाकिस्तान हिन्दू-मुस्लिम मतभेद बढ़ाते हुए एवं कश्मीर में भारत विरोधी भावनाओं एवं उग्रवाद को उकसाते हुए राष्ट्रिय एकता को कमजोर करने की कोशिश कर रहा है। इन्हीं विभाजनकारी नीतियों द्वारा अंग्रेजों ने सैकड़ों वर्षों तक भारत पर शासन किया। लेकिन जब भारत के लोगों ने इन मतभेदों से ऊपर उठकर ‘राष्ट्रवाद’ का प्रदर्शन किया तो अंग्रेज स्वयं ही भारत से जाने को उद्यत हो गये।
    लोकतन्त्रता की स्थिरता, स्वतन्त्रता की रक्षा एवं राष्ट्र के समग्र विकास के लिए राष्ट्रिय एकता और एकता निश्चित रूप से आवश्यक है। जब तक पूरा राष्ट्र एकता की भावना को अपनाने का प्रयास नहीं करता तब तक देश में कोई विकास या आर्थिक प्रगति नहीं हो पायेगी। इसलिए देश के प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य होना चाहिए कि वे राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देने के लिए राष्ट्रीय एकता को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएं।
    राष्ट्रिय एकता को अक्षुण्य बनाये रखने के लिए हम अपनी क्षुद्र मानसिकता से स्वयं को दूर रखें तथा इसमें बाधाक समस्त तत्त्वों का बहिष्कार करें। हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि हम जिस क्षेत्र, प्रान्त, जाति या समुदाय से हैं परन्तु उससे पूर्व हम भारतीय नागरिक हैं। भारतीयता ही हमारी पहचान है। इसलिए हम कभी भी ऐसे कृत्य न करें जो हमारे देश के गौरव व उसकी प्रगति में बाधक बनें…….

1 thought on “राष्ट्रीय—एकता एक चिंतन

  1. बहुत दुखद है कि हम शुतुरमुर्ग बने हैं — आज भी फारस – सिंध-मुल्तान -पंजाब -कश्मीर से भगाए गए लोग लड़ने का वो माद्दा नहीं रखते हैं जो तिब्बतियों में है —– ….एक बात अभी तक मेरे समझ में नहीं आ रही है : — क्या कश्मीर प्रेमियों में कोई भी अच्छे वकील – आई टी के जानकार नहीं हैं जिससे हम अपनी व्यथा विशेषकर अपने दादा नाना नानी पापा आदि की ज़ुबानी रिकोर्डिंग करवाकर मीडिया पर प्रचार और कानूनी लड़ाई में जीत हासिल कर सकें , भले हम इजरायल की तरह जुझारू दस्ते बनाकर न लड़ सकें पर हमारे सैनिक जो असहज परिस्थितियों में हमारे लिए आतताइयों से लोहा ले रहे हैं – उनके त्याग – बलिदान का बखान करके उनका उत्साहवर्धन अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर पर तो कर सकते हैं — हिन्दू समाज की तथाकथित एडवांस महिलाओं के कारण हम वोट बैंक में पिछड़ रहे हैं – ये महिलाएं सेना और उनके अधिकारियों पर भी गलत इल्ज़ाम लगा रही हैं ??? पर कोई गंभीर नहीं है कि 10 सालों के बाद भारतीय लोकतंत्र का क्या हश्र होगा ??? —–हिन्दू होने की कीमत इस लड़की से सुनिए — ये उस समय हुआ था जब जम्मू कश्मीर राज्य में अब्दुल्लाह सरकार और केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी फिर किस मुंह से बेशर्म कांग्रेसी बोलने आ जाते हैं ??? लगभग सात लाख कश्मीरियों को निकाला गया था , कभी समय मिले तो अनुपम खेर के वीडियो सुन लीजिए — आँखों में आँसू आ जाएंगे —- —–कम हिन्दू होने की कीमत इस लड़की से सुनिए :——-
    https://youtu.be/4pRJ0XZJSoo

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