राष्ट्रीय समस्याओ से भटकती पत्रकारिता

jounalismक्रिकेट माफिया ललित मोदी के सम्बन्ध में जिस प्रकार बीजेपी की नेत्री श्रीमती सुषमा स्वराज व श्रीमती वसुन्धरा राजे को कुछ दिनों से निरंतर निशाना बनाया जा रहा है और विभिन्न टीवी चेंनेल अपने पूर्वाग्रहो से ग्रस्त होने के कारण कुछ विपक्ष के नेताओ को लेकर अनावश्यक बड़ी बड़ी  बहस करके क्या स्वतंत्र लोकतंत्र की मर्यादाओ का सार्थक पालन कर रहें है ?
यह हमारा दुर्भाग्य है की जो मीडिया जगत राष्ट्र को सकारात्मक दिशा देकर एक विकसित व समृद्ध आधार दें सकता है वह अत्यंत नकारात्मक विषयो पर अपनी शक्ति केंद्रित करके समाज के समक्ष उपहास का पात्र क्यों  बनता जा रहा है ?
क्यों नहीं कोई कश्मीर में फलते फूलते मजहबी आतंकवाद पर चर्चा करता ?
क्यों नहीं कोई 1947 में पश्चिमी पाकिस्तान से आकर जम्मू कश्मीर में बसे हुए हजारों हिन्दू शरणार्थियों को आज 68 वर्ष बाद भी उनके प्रदेशीय मौलिक मानवाधिकारों के हनन पर खेद व चिंता करके उस पर परिचर्चा करते ?
याद करो लगभग दो दशक पहले का  कश्मीर का वह खूनी  इतिहास जब वहां  हिन्दुओ के सामूहिक नरसंहार किये जा रहे थे तब मीडिया क्यो सर्वनाश का मूकदर्शक बना रहा ? उसी के  परिणामस्वरूप विस्थापित हुए लगभग 4 लाख हिन्दुओ को आज अपने ही देश में  विकट परिस्थितियों में  दर दर की ठोकरे खाने को विवश होना पड़ रहा है । क्या मीडिया को इस ज्वलंत समस्याओं को धारावाहिक  बहस का विषय बना कर साहसिक पत्रकारिता का परिचय नहीं देना चाहिये ?
सन् 1993 से विभिन्न  आतंकवादी गतिविधियॉ में संलिप्त डी कंपनी, अजहर मसूद, सलाहुद्दीन, आदि से जुड़े दसियों जिहादियो को पाकिस्तान से भारत लाने की चर्चा करके देश के शत्रुओ पर आघात क्यों नहीं किया जाता ?
कश्मीर की सीमाओ पर चल रहे अनेक आतंकवाद प्रशिक्षण केन्द्रो की देशद्रोही गतिविधियॉ पर क्या खोजी पत्रकारिता आवश्यक नहीं ?
कश्मीर में पूनर्वास नीति के अंतर्गत पी.ओ. के. में गए हुए आतंकियों को वहां बनाये गए परिवारो सहित वापस बुला कर और उन पर करोडो रुपया खर्च करके यहां बसाने से क्या मीडिया अनभिज्ञ है ?
देश की और भी अन्य ज्वलंत समस्यायें जैसे बढ़ती  बांग्लादेशी घुसपैठ व उनके विभिन्न अपराधो में संलिप्तता, अवैध हथियारों के भण्डार व नकली नोटों से देश की चरमराती आर्थिक व्यवस्था, जिहादी मानसिकता से समाज में बढ़ती आपसी घृणा, लव जिहाद के नाम पर गैर मुस्लिम लड़कियो का शोषण, मुस्लिम बस्तियों से पलायन करते भयभीत हिन्दू , गाय आदि पशुधन का अवैध व्यापार और सरकारी कोष से केवल अल्पसंख्यको को ही मालामाल करने की भेदभाव वाली योजनाओ से विभिन्न नागरिको में पनपता वैमनस्य आदि विषयो पर भी धारावाहिक  विस्तृत चर्चाये करवा कर क्या मीडिया कभी स्वस्थ पत्रकारिता स्थापित करके देशवासियो को सजग व सावधान करेगा ?
निष्पक्ष पत्रकारिता का राजनैतिक पक्ष भी सोचे तो बीजेपी के नेताओ को ललित मोदी के घोटाले में घेरने वालो को पिछली सरकार के घोटालो को क्यों भुलाया जा रहा है व बीजेपी के प्रवक्ता पिछली सरकार के  निम्न घोटालो पर क्यों नहीं आक्रामक होते …
~बोफोर्स घोटाले के दोषी सोनिया गांधी  के तथाकाथित दूर के इटालियन रिश्तेदार क्वात्रोची का इंटरपोल रेड कार्नर नोटिस रद्द करवाना व लंदन में उसके बैंक अकॉउट को खुलवाना ?
~2 जी स्पेक्ट्रम,कॉमनवेल्थ गेम्स,कोल खंड आवंटन आदि खरबो के घोटाले ?
~गांधी परिवार के दामाद वढेरा के हरियाणा व राजस्थान के भूमि घोटाले ?
~गांधी परिवार का नेशनल हेराल्ड घोटाला ?
~राहुल गांधी की बेक्काप्स इंजीनियरिंग लिमिटेड कम्पनी ,मुम्बई ?
~विदेशी बैंको में जमा दशको पुराना काला धन आदि ?.

पत्रकारिता हो या राजनीति सबसे यही आशा होती है कि वे सत्यता के साथ पारदर्शिता का पालन करते हुए देशवासियो का स्वस्थ मार्गदर्शन करें जिससे  भयंकर विपदाओं व चुनौतियो से घिरा हमारा देश सफलतापूर्वक शांति व विकास के पथ पर अग्रसर हो सकें ?

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