राष्ट्रीय सुरक्षा की अवहेलना क्यों ?

हमारी ढुलमुल शत्रु नीति व समझौतावादी प्रवृति का ही दुष्परिणाम है कि सर्जिकल स्ट्राइक के बाद भी सीमाओं पर अनेक दर्दनाक घटनाऐं राष्ट्रीय सुरक्षा की पोल खोलने के लिए पर्याप्त है। इस पर भी आज राष्ट्र में पूर्णकालिक रक्षा मंत्री का न होना हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रति सतर्कता व गंभीरता के अभाव का बोध करा रही है। कहा गये वो “आंख में आंख डाल कर उसी की भाषा में उत्तर देने वाले ” साहसिक नारे और कहां गई वह “एक के बदले दस सिर ” लाने के उत्साहवर्धक वक्तव्य ? क्या यह सब चुनावी लुभावने थोथे नारे थे या कुछ धरातल पर कर दिखाने की वास्तविक इच्छा ?

देश के सीमावर्ती क्षेत्रों व सैन्य ठिकानों की उच्चस्तरीय सुरक्षा की अवहेलना क्यों हो रही है , जबकि शत्रु बार बार हमको घायल कर रहा है ? पिछले सितंबर माह में सर्जिकल स्ट्राइक से आहत होने के उपरांत भी पाकिस्तानियों ने सीमाओं पर अनगिनत बार युद्ध-विराम उल्लंघन किया परंतु हम अपने धैर्य और संयम के गुणगान करने में ही वीरता का परिचय कराते है । सेनाओं को शस्त्र उठाने के प्रति नकारात्मक भाव रखने वाले हमारे राजनैतिक नेतृत्व को सेनाओं पर तो भरोसा है परंतु वे अपनी दृढ़ इच्छा शक्ति के अभाव में कठोर निर्णय लेने से बचते आ रहें है । अगर केवल पिछले 10 वर्षो के ही आंकड़े देखे जाये तो पाक सेनाओं व आतंकवादियों द्वारा हज़ारों घटनायें संघर्ष विराम उल्लघंन, घुसपैठ तथा हमारे सुरक्षा बलों व सीमावर्ती नागरिको पर घात लगाकर हमले करते रहने धारावाहिक समाचार आते रहें है । इतने पर भी हम शांतिदूत बने रहकर अडिग रहें तो आक्रमणकारी पाक अपनी सुनियोजित जिहादी षडयंत्रो द्वारा भारत को आहत करता ही रहेगा ।
जरा सोचो जब जब सैनिको के सीमाओं पर पाक सेना द्वारा सिर काटे जाते है तब तब मुगलो द्वारा हिन्दुओं पर 500-600 वर्ष तक हुए घिनौने और पाशविक अत्याचारों से भरे काले इतिहास के पन्ने सामने आते रहते है। गैर मुस्लिमों (काफिरों) के सिर कलम करने की जिहादी परंपरा सदियों पुरानी है। हम क्यों भूल गये कि तैमूर लंग के वंशज बाबर ने अपनी विजय के पश्चात आगरा के समीप एक गाँव में महाराजा राणा सांगा की सेना के 84 हज़ार सैनिकों के सिर कलम करके एक टीला (शिखर) या पहाड़ बना दिया था जिसका विवरण बाबर की पुत्री गुलबदन ने अपनी एक पुस्तक में लिखा था। ध्यान देने व अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि इस गाँव का प्राचीन नाम जो भी हो पर इस कटे हुए सिरों के पहाड़ या शिखर को मुगलो की जीत के लिये “फतेहपुर सीकरी” के नाम से जाना जाता है (जिसका अर्थ है विजय शिखर)। आज यह एक पर्यटक स्थल बन चुका है । इसी संदर्भ में एक इतिहासिक तथ्य 155 वर्ष पूर्व ‘भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग’ के जनक अंग्रेज़ मि. अलेक्जेंडेर कन्निघम ने अपने अनुसंधानों पर आधारित एक पुस्तक में लिखा था कि मुगल नई दिल्ली स्थित हौजखास की “चोर मीनार” में हिंदुओं के सिर काटकर उस मीनार में बने आलो में ठूस देते थे ताकि उन्हें देखने वालों में मुगलों के प्रति भय बना रहें। वे लोग हिन्दुओं को “चोर” कहते थे इसीलिए इसको “चोर मीनार” कहा गया था। इतिहास की गहराईयों में उतरने से यह ज्ञात होता है कि ऐसे असंख्य स्थल है जहां मुगलों आदि इस्लास्मिक आक्रान्ताओं ने पराजित हिन्दू सेनाओं के सिर काटकर उनके ढेर लगाये और फिर उन पर विजय के जश्न मनाये थे। शत्रुओं के शव को क्षत-विक्षत करके उनके हृदय में भय उत्पन्न करना भी इस्लामिक जिहाद का ही एक भाग है। वर्तमान युग मे सीरिया व ईराक़ में बगदादी के दरिंदों ने तो पिछले 3-4 वर्षों में काफिरो के सिर को काटने के सैकड़ो वीडियो बनाये और उनको अपलोड करके सम्पूर्ण मानव जगत में अपने खौफनाक अंदाज़ का कुप्रचार करके सभ्य समाज के करोड़ों लोगों के मन-मस्तिष्क को झकझोर दिया है।
1999 में अघोषित करगिल युद्ध के समय कैप्टन कालिया व उनके 5 अन्य साथी भटकते हुए पाक क्षेत्र में चले गए थे वहां उनको पाक सैनिको ने 15 मई को पकड़ कर अनेक प्रकार से 21-22 दिनों तक उत्पीड़ित किया और फिर 6-7 जून को गोली मार दी थी। उनके शव लगभग 22 दिन बाद अत्यंत दर्दनाक स्थिति में भारतीय क्षेत्र में मिले थे। इसके अतिरिक्त अनेक घटनायें हमारे सैनिको के सिर काटने के अतिरिक्त उनके शवों को क्षत-विक्षत करने की वर्षो से होती आ रही है। इस प्रकार अंतरराष्ट्रीय नियमों का खुला उल्लघंन होने पर भी हमारी सरकार मौन है । लगभग 4 वर्ष पूर्व मै स्वयं व्यक्तिगत रुप से कैप्टन सौरभ कालिया के माता-पिता से पालमपुर में मिला था और उनके दर्द को जाना । वे अपने उस वीर पुत्र की जिसने अपने अनुमानतः 3 माह के अल्पकार्यकाल में सरकारी वेतन पाने से पूर्व ही अपने जीवन का राष्ट्र के लिए बलिदान कर दिया हो , के लिए न्याय की आशा लगाए बैठे है ?
हमारी ढुलमुल शत्रु नीति व समझौतावादी प्रवृति का ही दुष्परिणाम है कि सर्जिकल स्ट्राइक के बाद भी सीमाओं पर अनेक दर्दनाक घटनाऐं राष्ट्रीय सुरक्षा की पोल खोलने के लिए पर्याप्त है। इस पर भी आज राष्ट्र में पूर्णकालिक रक्षा मंत्री का न होना हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रति सतर्कता व गंभीरता के अभाव का बोध करा रही है। कहा गये वो “आंख में आंख डाल कर उसी की भाषा में उत्तर देने वाले ” साहसिक नारे और कहां गई वह “एक के बदले दस सिर ” लाने के उत्साहवर्धक वक्तव्य ? क्या यह सब चुनावी लुभावने थोथे नारे थे या कुछ धरातल पर कर दिखाने की वास्तविक इच्छा ?
यह विचारणीय बिंदू है कि जब हमारी अर्थव्यवस्था करोड़ों-अरबो के बजट से राजनेताओं व उनके परिवारों एवं अलगाववादियों जैसे देशद्रोहियों को भी अतिविशिष्ट सुरक्षा देने में समर्थ है तो फिर राष्ट्र रक्षा की सर्वोपरिता में अत्याधुनिक शस्त्रों से सेनाओं को सुशोभित करने में परहेज क्यों ? किसी ने कभी यह प्रश्न उठाया कि भ्रष्टाचार की पोषक पिछली संप्रग सरकार (2004-2014) ने 10 वर्षो में रक्षा बजट का हज़ारों करोड़ रुपया अल्पसंख्यको को लाभान्वित करने वाली योजनाओं में क्यों लगाया ? क्या मुस्लिम वोट बैंक की लालसा में ऐसा हुआ ? जबकि देश में आधुनिक शस्त्रो एवं आवश्यक रक्षा सामग्रियों का अभाव बना हुआ था ? परिणामस्वरुप आज देश की रक्षा व्यवस्था भी दुर्बल हो गयी । हमारे अदूरदर्शी राजनेताओं की इन मुस्लिम पोषित व अन्य अराष्ट्रीय राजनीति के दुष्परिणामों का दंश देश को अभी भी झेलना पड़ रहा है। इस पर भी राजनेताओं की सुरक्षा व अन्य सुविधाओं पर होने वाले अत्यधिक व्यय से राष्ट्रीय सुरक्षा का बजट प्रभावित हो तो वह भी आपत्तिजनक व निंदनीय है। साथ ही यह भी सोचना अनुचित नहीं होगा कि धर्मनिरपेक्ष देश में प्रति वर्ष अल्पसंख्यको पर अरबों रुपयों का अनावश्यक व्यय का क्या औचित्य है ? जबकि राष्ट्र की सीमाओं को सुरक्षित रखने के लिए सेनाओं को सुरक्षित रखना हम सबका सर्वोच्च दायित्व है। हम सब तभी तक सुरक्षित है जब तक हमारी सेनायें आधुनिक शस्त्रो व तकनीकियों से लैस होकर सीमाओं की रक्षा कर सकें अन्यथा जिहादियों के जनून से बचना असंभव नहीं तो कठिन जरुर होता जा रहा है। अतः आज की परिस्थिति में सेनाओं को सामर्थ्यशाली बनाना किसी भी अन्य योजना की तुलना में परम आवश्यक है।
इसके साथ ही इन विषम परिस्थितियों में आत्मरक्षा व राष्ट्र रक्षा के लिए सैन्य प्रशिक्षण भी सामान्य नागरिको के लिए अनिवार्य किया जाय तो अनुचित न होगा । निसंदेह जब हमारा देश सदियों से आतंकवादियों के अत्याचारों को झेलता आ रहा है तो जिहादियों व देशद्रोहियों के बढ़ते आतंक की आहट को अन्देखा नहीं किया जा सकता। हमारे पास आधुनिक शस्त्रों के साथ साथ सैनिक व अन्य सुरक्षाबलों की भारी कमी है और वे भी सीमाओं आदि पर नित्य शत्रुओं व आतंकियों से संघर्ष में व्यस्त है तो ऐसे में देश की आंतरिक सुरक्षा केवल पुलिस के भरोसे तो संभव नहीं। समाचार पत्रो के माध्यम से गुप्तचर विभाग की सुचनाओ द्वारा यह ज्ञात भी होता रहा है कि सीमाओँ के साथ साथ अनेक नगरों में आतंकवादियों के ठिकाने बने हुए है जहां उनको विभिन्न प्रकार का सैन्य प्रशिक्षण दे कर जिहाद के लिए तैयार किया जाता है। अनेक पकडे गए आतंकवादियो से प्रायः इन स्थलो का पता भी चलता है फिर भी सामान्यतः उनकी जांच नहीं हो पाती क्योंकि वह विशेष सम्प्रदाय से सम्बंधित होने के कारण राजनीति का लाभ उठा लेते है।
पिछले कुछ वर्षों से तो जिहादियों ने हमारे सैन्य व पुलिस ठिकानों को लक्ष्य बना कर उनको हानि पहूंचाने का नया ढंग निकाला है। जैसा कि पिछले दो वर्षो में दीनानगर थाना, गुरदासपुर (27 जुलाई 2015 ), बीएसएफ के काफिले, उधमपुर (5अगस्त 2015) ,पठानकोट एयरबेस (3 जनवरी 2016) व उरी सेना ब्रिगेड मुख्यालय ( 18 सितंबर 2016 ) पर हमले हुए थे। इसके अतिरिक्त पहले भी देश के अनेक भागों में हुए विभिन्न दंगों में यह देखा जाता रहा है कि ये दंगाई / आतंकी पुलिस चौकियों, थानों व पुलिस/प्रशासकीय कर्मचारियों व अधिकारियों पर भी आक्रमण करने से नहीं चूकते जैसा कि पिछले वर्षो में मालदा आदि पश्चिम बंगाल के अनेक क्षेत्रों में भी हुआ था । सम्भवतः सामान्य नागरिको की उदार,अहिंसक , भीरु व झंझट से बचने या संघर्ष से दूर रहने की प्रवृत्ति के कारण ही जिहादियों ने किसी विशेष षडयंत्र के अन्तर्गत सुरक्षा कर्मियों व उनके ठिकानों को नष्ट करने की कुटनीति बनाई हो और अगर वे इसमें सफल होते रहे तो भविष्य में आम नागरिकों की सुरक्षा कैसे संभव हो पायेगी ? अतः ऐसी स्थिति में जिहादियों से अपनों को सुरक्षित करने के लिए सामान्य नागरिकों का सैन्य प्रशिक्षण बहुत आवश्यक है । यह हमारा मौलिक व संवैधानिक अधिकार भी है कि राष्ट्र रक्षा के लिए हर क्षण तैयार रहे। इज़राइल जैसे देशो से हमको शिक्षा लेनी होगी वहां का हर नागरिक सैनिक भी है क्योंकि उनको नित्य मज़हवी आतंकियों के हमलो का सामना करना पड़ता है। आज हमारी स्थिति भी बहुत कुछ इज़राइल के समान ही है क्योकि हमें भी दिनप्रतिदिन कही न कही जिहादियों से जूझना पड़ता है ।अतः राष्ट्रीय सुरक्षा की अवहेलना किसी भी दृष्टिकोण से उचित नही और उसको और अधिक प्रभावशाली बनाने के लिए अनेक देशो की भाँति देश के सामान्य नागरिको के लिए सैनिक शिक्षा अनिवार्य करनी चाहिये।

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