लेखक परिचय

प्रवक्‍ता ब्यूरो

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प्रो. भीमसिंह

गृहयुध्द के मुहाने पर खड़ा है 65 लाख लोगों का देश लीबिया। जन-विद्रोह का सामना कर रहे लीबिया के सुप्रीमो गद्दाफी की समर्थक सेनाएं विद्रोहियों के कब्जे वाले क्षेत्रों पर जोरदार हमले कर रही हैं और दूसरी ओर से एंग्लो-अमेरिकन नेतृत्व ने लीबिया के तेल भंडार वाले शहरों पर नाटो के आक्रमण से लीबिया की सार्वभौमिकता पर गहरा आघात हुआ हैं। उनके देश में मंत्री या राष्ट्रपति के पद की कोई मौजूदगी नहीं है। गद्दाफी और विद्रोह-समर्थक लोगों के बीच घमासान युध्द चल रहा है। ऐसा लगता है कि पश्चिमी और उत्तरी लीबिया का विभाजन रोकना आज की परिस्थिति में नामुमकिन हो गया है। अनेक कबीलों पर आधारित लीबिया देश बेनगाज़ी और त्रिपोली के बीच दो खेमों में बंटकर रह गया है। जहां तक आज की स्थिति का सम्बंध है, लगभग 80 कबीलों के समर्थन से तवारिग़ समूह का नेतृत्व भूतभूर्व न्याय मंत्री मुस्तफा अब्दल जलील और राष्ट्रसंघ में लीबिया के भूतपूर्व राजदूत अली औजाली कर रहे हैं, जिन्हें गद्दाफी की बनायी हुई तथाकथित जनरल कांग्रेस का भी पूरा समर्थन प्राप्त है। यहां तक कि इन दोनों के नेतृत्व में बेनगाज़ी और उसके आसपास के कस्बों में एक आरजी सरकार भी स्थापित कर दी है, जिसे ‘लीबिया कौंसिल’ का नाम दिया गया है।

नाटो सैनिकों के जमीनी और हवाई हमले की मदद से विपक्षी समूह ने जाविया कस्बे पर, जो राजधानी त्रिपोली से लगभग 50 किलोमीटर की दूरी पर है, कब्जा कर लिया है। नवीनतम सूचनाओं के अनुसार गद्दाफी की सेनाओं ने इस शहर को लीबियन नेशनल कौंसिल से खाली करवा लिया था। परन्तु हाल ही के भयानक द्रोण जंगी हवाई जहाजों से मिसराता और अन्य ठिकानों से गद्दाफी की सेनाओं को वापसी पर मजबूर कर दिया है।

अमेरिका ने बारबार अरबों और अफ्रीकी देशों के विषय में अपनी नीति स्पष्ट शब्दों में दोहरायी है कि उसकी दिलचस्पी भूमध्यसागर में समुद्री व्यापार और जमीनी कच्चे तेल में है। चूंकि तेल पैदा करने वाले देशों में लीबिया का स्थान नौवें नम्बर पर है। वहां लगभग 40 मिलियन कच्चे तेल का भंडार छिपा हुआ है और अमेरिका अरबों की तेल की खपत तक अपने घर का तेल 21वीं शताब्दी तक इस्तेमाल नहीं करना चाहता। यहां इस बात का उल्लेख करना जरूरी है कि दुनिया में कच्चा तेल पैदा करने वालों में लीबिया नौवें स्थान पर है। लीबिया के पास 39.1 बिलियन बैरल कच्चे तेल का भंडार है और विश्व में यूरोप को सप्लाई होने वाले तेल का 3.7 प्रतिशत तेल लीबिया से किया जाता है।

कर्नल गद्दाफी के नेतृत्व में लीबिया की सरकार ने यूरोप के कई देशों से सस्ते दामों पर तेल सप्लाई करने का ठेका भी कर रखा है। यही वजह थी कि नाटो देश लीबिया में विद्रोहियों की सहायता के लिए अभी तक फौजें भेजने का फैसला करने में असमर्थ रहे थे। ईराक में एंग्लो-अमेरिकन फौजें 2003 में तुरन्त घुस गयी थीं, क्योंकि वहां तमाम यूरोपीय देशों के साझे सरोकार थे और लीबिया में इटली, फ्रांस, इंग्लैंड और अमेरिका के अलग-अलग सरोकार हैं। यह भी एक दिलचस्प बात हैं कि तेल पैदा करने वाले 20 देशों में लीबिया ही एक ऐसा देश है, जहां एक बैरल तेल निकालने पर एक डालर खर्च आता है, जबकि अन्य देशों में तेल निकालने का खर्च 15 से 20 डालर से कम नहीं है।

यूरोपीय देशों के लिए भूमध्यसागर रणनीतिक दृष्टि से बहुत ही महत्वपूर्ण है। लीबिया में अशांति होने से पूरे यूरोप की आमदोरत, तिजारत और जलवायु प्रभावित हो सकती है। इसलिए यूरोपीय देश बड़े असमंजस में पड़े हुए हैं। फ्रांस के राष्ट्रपति सरकोजी ने लीबिया के विद्रोही धड़े यानि लीबियन नेशनल कौंसिल, जिसकी अगुआई अब्दल जलील कर रहे हैं, को मान्यता देकर एक नया विवाद खड़ा कर दिया है।

लीबिया का झगड़ा कोई शिया-सुन्नी का नहीं है और न ही कोई नस्ली झगड़ा है। जिस कबीले गद्दाफा का नेतृत्व लीबिया के तानाशाह गद्दाफी कर रहे हैं, वह भी अल्पसंख्या में है। सबसे पुराना कबीला तो बर्बर नस्ल से सम्बंध रखता है जो अपने आपको हज़रत मोहम्मद की नस्ल से सम्बंधित बताता है। यह बर्बर कबीला मौरितानिया से लीबिया तक फैला हुआ है और राजनीतिक रूप से भी यह बड़ा प्रभावशाली है। इस बर्बर नस्ल के कबीले के तहत अन्य 30 कबीले हैं। यहां हर कबीले की भाषा, संस्कृति, बोली और रहन-सहन का ढंग भी अलग-अलग है। इनकी परिभाषा समझना किसी यूरोपीय देश के लिए अभी 100 साल तक मुमकिन नहीं होगा।

लीबिया की क्रांति की वजह क्या है? आखिर वह क्रांति, जिसे अरबी भाषा में ‘सौरा’ कहते हैं, उसकी ज्वाला कहां से आयी? इसमें कोई संदेह नहीं कि बहुत से इंजीनियरों और डाक्टरों की शिक्षा विदेशों में हुई है और उसमें अधिकतर भारत से पढ़कर गये हैं। परन्तु आम नागरिक जो आज भी विश्व के इतिहास से नावाकिफ रहा है वह क्रांति अथवा परिवर्तन, न्याय और अधिकार की बात कहां से सीखा, इसके बारे में इस लेखक ने पिछले दिनों लीबिया के तानाशाह गद्दाफी को एक पत्र लिखा, जिसमें उन्होंने गद्दाफी की किताब ‘ग्रीन बुक’ का हवाला दिया है, जिसे गद्दाफी सरकार ने तमाम स्कूल-कालेजों में पढ़ना अनिवार्य कर दिया था।लोकतंत्र की समस्याओं के समाधान के लिए सुप्रीमो गद्दाफी ने ‘ग्रीन बुक’ में जनता और शासक के बीच उठने वाली समस्याओं पर धार्मिक उपदेशों और प्रवचनों के द्वारा उन्हें हल करने का रास्ता बताया है। उन्होंने स्वयं यह स्वीकार किया है कि इस ‘ग्रीन बुक’ में जिसे वे मुस्लिम सम्प्रदाय के लिए पाक कुरान के बाद दूसरी अहम पुस्तक मानते हैं, स्वयं भविष्यवाणी की है कि शोषण और अत्याचार के विरुध्द किया जाने वाला जन-विद्रोह एक दिन समूल क्रांति के रूप में बदल जाएगा।

इस लेखक को सन् 1993 में लीबिया दौरे के समय स्वयं सुप्रीमो गद्दाफी ने यह किताब भेंट की थी, जिसमें बताया गया है कि लोगों, खासकर लीबियनों की किस्मत बदलने के लिए सुप्रीमो गद्दाफी ने अपनी ‘ग्रीन बुक’ में बहुत-कुछ कहा है। जब उन्होंने सत्ता सम्भाली थी, जिसे उन्होंने खुद एक क्रांति बताया, उस समय लीबिया के लोगों में मात्र 10 प्रतिशत साक्षरता थी और आज से आबादी भी आधी थी और अब जहां आबादी 60-70 लाख हो गयी है वहीं साक्षरता का प्रतिशत 70 हो गया है। लीबिया के करीब 90 प्रतिशत लोग गद्दाफी की ‘ग्रीन बुक’ के उपदेश पढ़ते रहे है, जिसमें उन्होंने बड़े जोरदार शब्दों में हिंसा का पक्ष लिया है और जुल्म और शोषण को खत्म करने के लिए बगावत को जरूरी बताया है।

लीबिया के लोग कल का इन्तजार नहीं कर सकते और उनका आज गद्दाफी की मुट्ठी में बंद है। अब यह गद्दाफी का नाम और शान है कि वह अपने को इस बनावटी सत्ता से दूर कर लें, क्योंकि वैसे भी वो अब किसी भी समय वे सत्ता से हटाए जा सकते हैं। ‘कुल्लूनफासीन जायकैतुल मौत’ (हर आदमी को एक दिन मरना ही है)। जो आदमी महात्मा बुध्द, ईसा मसीह, हजरत इमाम हुसैन, महात्मा गांधी और मार्टिन लूथर किंग की तरह सच्चाई और अपने लोगों के लिए कुर्बान होता है, वह कभी नहीं मरता और हमेशा-हमेशा के लिए अपने संदेश के साथ जीवित रहता है।

लीबिया का भविष्य क्या है? यह लेखक सबसे पहले 1968 में मोटरसाइकिल पर वहां पहुंचे थे और उसके बाद 1992 और 1995 में कर्नल गद्दाफी के आमंत्रण पर अपनी टीम के साथ कितनी ही बार लीबिया के दौरे पर गये थे और सबसे पहले लीबिया में ‘ग्रीन बुक’ पर बहस करने पर जोर दिया था। आज लीबिया की जनता क्रांति के दरवाजे पर खड़ी है। कर्नल गद्दाफी अब इस सुनामी की होड़ को जरा भी रोक नहीं सकेंगे। हो सकता है कि लीबिया दो हिस्सों में बंटकर रह जाय–‘पूर्वी और पश्चिमी’। और यही रणनीति अमेरिका और यूरोप के माफिक है कि वे विद्रोहियों को लिबरेशन कौंसिल के नाम पर पूर्वी लीबिया में अपनी सत्ता स्थापित करने में कामयाब हो सकते हैं। गृहयुध्द को आगे लेजाने में यूरोप गद्दाफी के खिलाफ विद्रोहियों को समर्थन देता रहेगा। इसका एक यह भी विकल्प है कि कर्नल गद्दाफी मिस्र के राष्ट्रपति की तरह लोकप्रिय चुनावों द्वारा वहां की संसद और नेतृत्व का गठन कराएं। हो सकता है कि गद्दाफी ससम्मान लीबिया से निकलकर किसी अफ्रीकी देश में शरण ले लें। भारतीय चुनाव पध्दति तमाम अरब और अफ्रीकी देशों के लिए एक आइना बन सकती है, जिस तरह मिस्र ने कुछ दिन पहले भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त को इस विषय में चर्चा करने के लिए मिस्र में बुलाया था।

लीबिया के हालात दिन-ब-दिन बदल रहे हैं। ओबामा प्रशासन ने भयानक द्रोण जंगी हवाई जहाजों से लीबिया और पाकिस्तान की जनता पर आसमानी हमले किये हैं, जो न सिर्फ मानवता के खिलाफ हैं, बल्कि उनसे राष्ट्रसंघ के संविधान की अवहेलना भी हुई है। जार्ज बुश, टोनी ब्लेयर ने ऐसे ही भयंकर युध्द थोपा था ईरान की जनता पर 2003 में और पूरा विश्व खामोश रहा। 1999 में अमेरिका ने नाटो के नाम पर यूगोस्लाविया में मानवता का ह्नास किया था और यूगोस्लाविया के टुकड़े-टुकड़े कर दिये थे। सर्विया को तोड़कर कोसावो में आतंकवादियों की सरकार बना दी थी। पाकिस्तान और लीबिया पर द्रोण आक्रमण विश्व-शांति के लिए और छोटे-छोटे अफ्रीकी देशों की सार्वभौमिकता के लिए एक खतरे की घंटी हैं। गद्दाफी को लोकतंत्रवाद अपनाने के लिए कोई और रास्ता भी अपनाया जा सकता है, जो राष्ट्रसंघ के संविधान में भी शामिल हो। नाटो देशों या अमेरिका को द्रोण या दूसरे आक्रमण करने का कोई अधिकार नहीं है। आज विश्व की स्थिति ऐसे चरण में पहुंच चुकी है, जहां भारत फिर से विश्व-शांति की मशाल लेकर छोटे-छोटे देशों की एकता, अखंडता की रक्षा कर सकता है। भारत के प्रधानमंत्री डा. मनमोहनसिंह के लिए आज विश्व-शांति का नेतृत्व करने का एक बहुत बड़ा मौका है, जो शायद जवाहरलाल नेहरू, नासिर और टीटो को भी नसीब नहीं हुआ था।

* लेखक बैरिस्टर-एट-ला हैं, लन्दन विश्वविद्यालय से स्‍नातकोत्तर डिग्री प्राप्त हैं, अरब मामलों के विशेषज्ञ हैं और वर्तमान में वे जम्मू-कश्मीर नेशनल पैंथर्स पार्टी के चेयरमैन और राष्ट्रीय एकता परिषद के सदस्य हैं।

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