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    हिमालय की विरासत पर प्रकृति का कहर

    • डॉ. ललित कुमार

             उत्तर भारत के हिमालय पर्वतों पर प्राकृतिक आपदाओं का कहर लगातार जारी है। बारिश के इस मौसम में प्राकृतिक आपदाओं का इतने बड़े पैमाने पर आना मौसम वैज्ञानिकों के लिए चिंता का विषय बना हुआ है। लगातार एक के बाद के एक प्राकृतिक आपदाओं में भूस्खलन, बादल फटने, मूसलाधार बारिश और बाढ़ के खतरों ने हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और उत्तराखंड की जनता के लिए परेशानी खड़ी कर दी है। लेकिन इन्हीं आपदाओं का रौद्र रूप मैदानी इलाकों में भारी तबाही लेकर आता है, जिस कारण ज्यादा से ज्यादा जानमाल का नुकसान होता है। हाल ही में हिमाचल के किन्नौर जिले में भूस्खलन के कारण चट्टान खिसकने से नीचे आते बड़े-बड़े पत्थरों की तेज रफ्तार ने जिस तरह से लोहे के ब्रिज को दो भागों में तोड़ा, उसे देखकर हर किसी के रोंगटे खड़े हो गए। हिमालय के ऊपरी हिस्से में प्राकृतिक आपदा की बढ़ती हलचलें कहीं न कहीं सोचने को मजबूर कर देने वाली है कि आखिर एकाएक ऐसी घटनाओं का होना हमारी पृथ्वी के लिए कितना सही है और पर्यावरण को लेकर हम कितने सजग है? ये कुछ ऐसे सवाल है, जिन्हें आम आदमी से लेकर खास व्यक्ति को सोचने की जरूरत है। 

    पूरी दुनिया प्राकृतिक आपदा से होने वाले खतरों को नजरअंदाज करके विकास के नाम पर जो कर रही है, वह किस हद तक सही है और कितना गलत यह सोचने वाली बात है। लेकिन क्या ये सब प्रकृति के अनुरूप है? इसलिए हमें पर्यावरण संरक्षण के बारे में गंभीरता से सोचने की ज़रूरत है। लगभग पिछले दो सदी के प्राकृतिक आपदा के  ऐतिहासिक पन्नों को उलटने की कोशिश करें, तो पाएंगे कि यूरोप और एशिया सहित तमाम देश औद्योगिकरण के नाम पर विकसित और विकासशील देशों की सूची में शामिल होने की होड़ लगाए हुए है। वह प्रकृति का दोहन करने के साथ साथ जंगलों को काटकर ग्रामीण क्षेत्र को शहरीकरण के भट्टी की आग में झोंकने का काम कर रहें हैं। साथ ही बड़े पहाड़ों को डायनामाइट से उड़ाकर उनके बीचोंबीच रेल मार्ग और सुरंगों के जरिए हाईवे बनाये जा रहे हैं। इतना जरूर है कि पर्यावरण और विकास एक सिक्के के दो पहलू हैं, लेकिन पर्यावरण के पैमानों को नजरअंदाज करके विकास के नाम पर हमारी सरकारें पहाड़ों पर औद्योगीकरण को बढ़ावा देने का काम कर रही है, जोकि एक अच्छा संकेत नहीं है। हिमालय की प्राकृतिक सौंदर्यता पृथ्वी का दिल होती है। जहां किसी भी तरह की कोई हलचल नहीं होनी चाहिए, लेकिन हम आंखों पर पट्टी बांधे हिमालय के सीने पर वार करके प्राकृतिक आपदा को बुलावा दे रहे हैं। इसलिए हम आज ऐसी आपदाओं का सामना कर रहे हैं। पिछले महीने कनाडा में “हीट वेव” ने 10 हज़ार साल का रिकॉर्ड तोड़ा, जहां बेहताशा गर्मी के कारण लाखों लोग घर से बेघर हो गए। एक ओर चीन में भारी तबाही मचाने वाली बाढ़ आ रही है, तो कहीं यूरोप में बाढ़ का विकराल रूप देखने को मिल रहा है। साथ ही ऊपर से कोरोना का कहर और प्रकृतिक आपदा का बढ़ता प्रभाव आम जनमानस को खतरे में डाल रहा है। कंक्रीट के महलों में बैठे सत्ताधारी लोग और उद्योगपतियों को ये बातें समझ में क्यों नहीं आ रही है कि इन सबके लिए वे खुद जिम्मेवार है। इस तरह की घटनाएं पिछले 50 से 100 सालों में पहले कभी नहीं देखी गयी। अमेरिका के कई हिस्सों में सूखा पड़ रहा है और जंगलों में खुद-ब-खुद आग लगने की घटनाएं सामने आ रही हैं, जिससे पर्यावरण के साथ- साथ ओजोन परत को भी भारी नुकसान पहुंच रहा है।

    पिछले एक दशक में भारत में भी ऐसी प्राकृतिक आपदाओं का लगातार बढ़ता प्रकोप सोचनीय विषय हो सकता है, जहां भारत के उत्तरी भाग हिमाचल प्रदेश, जम्मू कश्मीर और उत्तराखंड से भूस्खलन और बाढ़ की खबरें लगातार आती रहती है। वर्ष 2013 में उत्तराखंड की प्राकृतिक आपदा का कहर अभी भी लोगों के जेहन में जिंदा है, जिन्होंने प्राकृतिक आपदा को मीडिया के जरिए देखा होगा, वे आज भी बेचैन हो उठते होंगे। उत्तराखंड के चमोली, पिथौरागढ़ और जोशीमठ जिलों सहित अन्य पहाड़ी क्षेत्रों से बादल फटने की घटनाएं सामने आती है, जो हमारे लिए एक चेतावनी भर है, ताकि हम जल्दी से संभल जाए और पहाड़ी जंगलों का दोहन न  करें। अगर हम आज भी नहीं संंभले, तो हमारी आने वाली पीढ़ी का भविष्य जरूर संकट में पड़ेगा। जिस तरह से जलवायु परिवर्तन में एकाएक बदलाव हो रहे हैं, उससे साफ है कि आने वाला समय प्राकृतिक आपदाओं से भरा होगा। इसलिए हमारे पास एक ही पृथ्वी है, जिसे हमें रहने योग्य बनाना है। सत्ता में बैठी सरकारें हिमालय की विरासत पर जिस तरह से प्रहार कर रही हैं। आने वाले समय में हमारी पीढ़ी को ही उसका भुगतान करना पड़ेगा। हमारी सरकारें चाहे वह केंद्र या राज्य सरकार ही क्यों न हो। वे अभी भी इसी भ्रम में जी रही है कि जीडीपी ग्रोथ के जरिए ही देश का विकास तय होता है। विदेशी निवेश के कारण जितने बड़े-बड़े प्रोजेक्ट हमारे देश में आएंगे। हम उतना ही विकास करेंगे और सरकार विकास के नाम पर जंगली वनों और खेती की जमीन का अधिग्रहण करके विकास की दौड़ में आगे निकल जाएगी। यह सरकार की एक बड़ी भूल होगी। सरकार उपजाऊ भूमि के बीचोंबीच हाईवे मार्ग निकालकर सीधे उद्योगपतियों को फायदा पहुंचा रही है, जिन लाखों पेड़ों को काटकर खेतों के बीच से हाईवे बनाए जा रहे हैं क्या कभी सरकार ने सोचा है कि जिन पेड़ों को काटा जाता है, उनसे कितना ऑक्सीजन का उत्सर्जन होता है। अगर सरकार उसी तरह के पेड़ों को हाईवे के दोनों तरफ लगवा 

    दें ताकि मिट्टी का कटान भी कम हो और सड़क धंसने का खतरा भी कम हो जाए। जिससे चलते राहगीरों को शुद्ध हवा और छांव भी मिले, लेकिन सरकार ऐसा नहीं करती। हाईवे के मध्य भाग में पेड़ पौधों के नाम पर जो फुलवारी लगाई जाती है, उससे लोग खुश तो होते हैं। लेकिन इन फुलवारी से ऑक्सीजन का उत्सर्जन न के बराबर होता है। देश में जितने भी बड़े हाईवे मार्ग अभी तक बने हैं या बनाये जा रहे है। कहीं भी उसी तरह के पेड़ पौधों का वृक्षारोपण आज तक नहीं किया गया ताकि पेड़ों की अच्छी छांव और उत्सर्जित ऑक्सीजन का लाभ आसपास के ग्रामीणों और राहगीरों को मिल सके। मैंने अब तक देशभर के जितने भी नेशनल हाईवे पर यात्राएं की है, वहां कहीं भी बड़े पेड़ पौधे मुझे नहीं दिखे। सरकार को इस ओर ध्यान देने की भी बहुत जरूरत है तभी पर्यावरण संरक्षण को बचाया जा सकता है। साथ ही हमें वन्यजीवों और वनस्पतियों के संरक्षण की दिशा में भी कदम उठाने की जरूरत है। चाहे वह कोई भी प्रजाति, प्राणी या वनस्पति ही क्यों ना हो?

    हिमालय: छोटी हलचल से बड़ी बर्बादी

    इसी साल फरवरी 2021 के पहले सप्ताह में उत्तराखंड के चमोली जिले में ग्लेशियर टूटने के कारण ऋषि गंगा पावर प्रोजेक्ट पर काम करने वाले कई लोग इस हादसे की चपेट में आए। प्राकृतिक व मानव निर्मित आपदाओं को लेकर यह इलाका काफी संवेदनशील माना जाता है। इसके बाद भी यहां बड़े स्तर पर पावर प्रोजेक्ट निर्माण कार्य बदस्तूर जारी है, जो लगातार पहाड़ों को कमजोर कर रहे है।भूगर्भशास्त्री और फिजिकल रिसर्च लैब अहमदाबाद के रिटायर्ड वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. नवीन जुयाल का कहना है कि हिमालय सबसे नया पर्वत होने के नाते, यहां जो कुछ भी छोटी बड़ी हलचलें होती हैं, उसका परिणाम हमें तुरंत देखने को मिलता है। यहां की नदियों पर बनने वाले पावर प्रोजेक्ट और सड़क निर्माण कार्य जिस तेजी से किए जा रहे है, उससे पहाड़ों की स्थितियां और भी नाजुक होती जा रही है। जिसके कारण प्राकृतिक हलचलें एक बड़ी तबाही का न्योता देती है। वर्ष 2020 में काठमांडू स्थित इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट (ICIMOD) ने पर्वतीय क्षेत्र की करीब 800 किलोमीटर लंबी सीमा पर एक रिपोर्ट तैयार की। जिसमें बताया गया कि भारत-पाकिस्तान-अफगानिस्तान और तजाकिस्तान तक फैली हिमालय क्षेत्र को दुनिया भर में बढ़ रहे तापमान से एक बड़ा खतरा होने वाला है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया की 1970 से लेकर अभी तक हिमालय के 15 फ़ीसदी ग्लेशियर पिघल चुके हैं। जिस तरह से जलवायु परिवर्तन के खतरे लगातार बढ़ रहे हैं उससे आने वाले कुछ सालों में ग्लेशियर का 70 से 90 फ़ीसदी हिस्सा पिघल चुका होगा। पिघले ग्लेशियर गंगाा, ब्रह्मपुत्र और सिंधु जैसी 10 प्रमुख नदियों को अपनी चपेट में लेंगे और नदियोंं के किनारे बसे करोड़ोंं लोग इससे प्रभावित होंगे। ग्लेशियर टूटने, बादल फटने, भूस्खलन और बाढ़ की घटनाएं इन क्षेत्रों में सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाएंगी। दुनिया भर में पर्यावरण संरक्षण को लेकर जिन स्तरों पर काम किया जा रहा है। उनमें हमें कामयाबी नहीं मिल पा रही है। इन्हीं कारणों को सरकारें और अधिकारिक एजेंसियां भी समझने को यह तैयार नहीं है कि हम इस समय कितनी भीषण प्राकृतिक आपदाओं का सामना कर रहे हैं। सरकार अभी भी इस गलतफहमी में है कि हम पहले विकास कर ले, उसके बाद प्रकृति संरक्षण, जैव विविधता, नदियों, समुद्र और जल-जंगल पर काम करेंगे। यह भ्रम जब तक नहीं टूटेगा तब तक यह अंधेरे में तीर मारने जैसा होगा। इसलिए हम यह स्वीकार नहींं कर पा रहे है और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में हमारी जो भी कोशिशें है वह अभी तक नाकाफ़ी है। 

    ललित कुमार कुचालिया
    ललित कुमार कुचालिया
    लेखक युवा पत्रकार है. हाल ही में "माखनलाल चतुर्वेदी राष्टीय पत्रकारिता विश्विधालीय भोपाल", से प्रसारण पत्रकारिता की है और "हरिभूमि" पेपर रायपुर (छत्तीसगढ़) में रिपोर्टिंग भी की . अभी हाल ही में पत्रकारिता में सक्रीय रूप से काम कर है

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