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    पृथ्वी से खिलवाड़ नहीं सामंजस्य की जरुरत

    अरविंद जयतिलक
    पृथ्वी दिवस 22 अप्रैल को दुनिया भर में पर्यावरण संरक्षण के प्रति समर्थन प्रदर्शित करने के लिए मनाया जाता है। इस दिवस का शुभारंभ अमेरिकी सीनेटर जेराल्ड नेल्सन के द्वारा 1970 में एक पर्यावरण शिक्षा के रुप में किया गया जो आज संसार के 192 देशों के करोड़ों लोगों द्वारा मनाया जाता है। सीनेटर जेराल्ड नेल्सन के मन में पृथ्वी दिवस का विचार तब आया जब उन्होंने देखा कि सेंट बारबरा तेल रिसाव, प्रदुषण उगलती फैक्ट्रियां, पावर प्लांटों से निकलते खतरनाक तत्व, नगरीय कचरे और मलबे से पर्यावरण बुरी तरह प्रदूषित हो रहा है। उन्होंने इस ओर अमेरिकी जनमानस का ध्यान आकर्षित करते हुए 22 अप्रैल 1970 को पृथ्वी दिवस आयोजित कर आधुनिक पर्यावरण आंदोलन की शुरुआत की। लाखों अमेरिकी नागरिकों ने इस आयोजन में सहभागिता कर एक स्वस्थ व स्थायी पर्यावरण के निर्माण के लिए अपनी प्रतिबद्धता जाहिर की। लेकिन यह त्रासदी है कि एक ओर दुनिया के सभी देश पृथ्वी दिवस के नाम पर पर्यावरण सुरक्षा को लेकर चिंता जताते हैं, नए-नए कानून गढ़ते हैं लेकिन दूसरी ओर पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने से भी बाज नहीं आते हैं। नतीजा सामने है। विकास के नाम पर प्रति वर्ष 7 करोड़ हेक्टेयर वनों का विनाश हो रहा है। आज की तारीख में प्रकृति की एक तिहाई से अधिक प्रजातियां नष्ट हो चुकी हैं। जंगली जीवों की संख्या में 50 फीसद की कमी आयी है। उदाहरण के तौर पर भारत में ही पिछले एक दशक में पर्यावरण को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले गिद्धों की संख्या में 97 फीसद की कमी आयी है। वनों के विनाश से वातारण जहरीला होता जा रहा है और प्रतिवर्ष 2 अरब टन अतिरिक्त कार्बन-डाइआक्साइड वायुमण्डल में घुल-मिल रहा है। इससे जीवन का सुरक्षा कवच मानी जाने वाली ओजोन परत को भारी नुकसान पहुंच रहा है। नेचर जिओसाइंस की मानें तो ओजोन परत को होने वाले नुकसान से कुछ खास किस्म के अत्यंत अल्प जीवी तत्वों (वीएसएलएस) की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई है जो मानव जाति के अस्तित्व के लिए खतरनाक है। इन खास किस्म के अत्यंत अल्प जीवी तत्वों (वीएसएलएस) का ओजोन को नुकसान पहुंचाने में भागीदारी 90 फीसद है। विडंबना यह है कि ओजोन परत की सुरक्षा से संबंधित संयुक्त राष्ट्र के मांट्रियाल प्रोटाकाल में इन तत्वों पर नियंत्रण की कोई अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था नहीं है। गौरतलब है कि दुनिया के 20 सबसे ज्यादा क्लोरोफ्लोरो कार्बन उत्सर्जित करने वाले देशों के बीच ओजोन परत के क्षरण को रोकने के लिए 16 सितंबर, 1987 को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर एक संधि हुई जिसे मांट्रियाल प्रोटाकाॅल नाम दिया गया। इसका मकसद ओजोन परत के क्षरण के लिए जिम्मेदार गैसों एवं तत्वों के इस्तेमाल पर रोक लगाना था। लेकिन इस दिशा में अभी तक अपेक्षित सफलता हासिल नहीं हुईे। एक आंकड़ें के मुताबिक अब तक वायुमण्डल में 36 लाख टन कार्बन डाइआक्साइड की वृद्धि हो चुकी है और वायुमण्डल से 24 लाख टन आक्सीजन समाप्त हो चुकी है। अगर यही स्थिति रही तो 2050 तक पृथ्वी के तापक्रम में लगभग 4 डिग्री सेल्सियस तक वृद्धि हो सकती है। वैज्ञानिकों का मानना है कि पृथ्वी का तापमान जिस तेजी से बढ़ रहा है अगर उस पर समय रहते काबू नहीं किया गया तो अगली सदी में तापमान 60 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाएगा। आज जब 48 डिग्री सेल्सियस की गर्मी मनुष्य सह नहीं पा रहा है तो 60 डिग्री सेल्सियस गर्मी वह कैसे बर्दाश्त करेगा? नतीजा यह होगा कि सूर्य की किरणें कैंसर जैसे भयंकर रोगों में वृद्धि करेगी। कहीं सूखा पड़ेगा, कहीं गरम हवाएं चलेंगी। कहीं भीषण तूफान होगा तो कहीं बाढ़ की विनाशलीला यदि पृथ्वी के तापमान में मात्र 3.6 डिग्री सेल्सियस तक वृद्धि हो जाए तो आर्कटिक एवं अण्टाकर्टिका के विशाल हिमखण्ड पिघल जाएंगे। इससे समुद्र के जल स्तर में 10 इंच से 5 फुट तक वृद्धि हो सकती है। इसका परिणाम यह होगा कि समुद्रतटीय नगर समुद्र में डूब जाएंगे। भारत के मुंबई, कोलकाता, चेन्नई, पणजी, विशाखापट्टनम कोचीन और त्रिवेंद्रम नगर समुद्र में होंगे। इसी तरह न्यूयाॅर्क, लाॅस एंजिल्स, पेरिस और लंदन आदि बड़े नगर भी जलमग्न हो जाएंगे। याद होगा पर्यावरण के संरक्षण के लिए 5 जून 2007 का सबसे ज्वलंत वियाय ‘पिघलती बर्फ’ था। इस पर मुख्य अंतर्राष्ट्रीय आयोजन नाॅर्वे के ट्रामसे में संपन्न हुआ और दुनिया भर में ‘ग्लोबल आउटलुक फॅार आइस एंड स्नो’ की शुरुआत हुई। पर्यावरण के साथ खिलवाड़ का सबसे घातक असर ध्रवीय क्षेत्रों पर पड़ रहा है। अंतर्राष्ट्रीय अनुपात को देखते हुए उत्तरी ध्रुव क्षेत्र दोहरी तेजी से गरम हो रहा है। उत्तरी ध्रुव समुद्र में फैली स्थायी बर्फ की मोटी परत कम हो रही है। सदियों से बर्फ के मजबूत चादर में ढके क्षेत्र पिघल रहे हैं। इंटरगवर्नमेंटल पैनल की रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया भर के करीब 30 पर्वतीय ग्लेशियरों की मोटाई वर्ष 2005 में आधे मीटर से ज्यादा कम हो गयी। वैज्ञानिकों को मानना है कि इसके लिए मुख्य रुप से ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन जिम्मेदार है। हिमालय क्षेत्र में पिछले पांच दशकों में माउंट एवरेस्ट के ग्लेशियर 2 से 5 किलोमीटर सिकुड़ गए हैं। इसके अलावा हिमालय के 76 फीसद ग्लेशियर चिंताजनक गति से सिकुड़ रहे हैं। कश्मीर और नेपाल के बीच गंगोत्री ग्लेशियर तेजी से सिकुड़ते ग्लेशियर का एक अन्य उदाहरण है। अनुमानित भूमंडलीय तापन से जीवों का भौगोलिक वितरण भी प्रभावित हो सकता है। कई जातियां धीरे-धीरे ध्रुवीय दिशा या उच्च पर्वतों की ओर विस्थापित हो जाएंगी। जातियों के वितरण में इन परिवर्तनों का जाति विविधता तथा पारिस्थितिकी अभिक्रियाओं इत्यादि पर असर पड़ेगा। पृथ्वी पर करीब 12 करोड़ वर्षों तक राज करने वाले डायनासोर नामक दैत्याकार जीवों के समाप्त होने का कारण संभवतः ग्रीन हाउस प्रभाव ही था। निश्चित रुप से मनुष्य के विकास के लिए प्रकृति प्रदत्त संसाधनों का दोहन आवश्यक है। पर उसकी सीमा निर्धारित होनी चाहिए। लेकिन उसका पालन नहीं हो रहा है। विकास के लिए बिजली आवश्यक है। लेकिन जिस तरह बिजली उत्पादन के लिए नदियों के सतत प्रवाह को रोककर बांध बनाया जा रहा है उससे खतरनाक पारिस्थितिकीय संकट उत्पन हो गया है। जल का दोहन स्रोत सालाना रिचार्ज से कई गुना बढ़ गया है। पेयजल और कृषि जल का संकट गहराने लगा है। आज भारत की 33 फीसद जनता प्यासी है। महाराष्ट्र समेत देश के एक दर्जन से अधिक राज्य सूखाग्रस्त हैं। भारत की गंगा और यमुना जैसी अनगिनत नदियां सूखने के कगार पर हैं। सीवर का गंदा पानी और औद्योगिक कचरा बहाने के कारण क्रोमियम और मरकरी जैसे घातक रसायनों से नदियों का पानी जहर बनता जा रहा है। वैज्ञानिकों की मानें तो जल संरक्षण और प्रदुषण पर ध्यान नहीं दिया गया तो आने वाले 200 सालों में भूजल स्रोत सूख जाएगा। नतीजतन मानव को मौसमी परिवर्तनों मसलन ग्लोबल वार्मिंग, ओजोन क्षरण, ग्रीन हाउस प्रभाव, भूकंप, भारी वर्षा, बाढ़ और सूखा जैसी विपदाओं से जुझना होगा। गौरतलब है कि जलवायु परिवर्तन को लेकर 1972 में स्टाकहोम से लेकर अब तक कई सम्मेलन हो चुके हैं लेकिन त्रासदी है कि जलवायु परिवर्तन से निपटने की पहल पर ईमानदारी से अमल नहीं हुआ। लेक सेक्स सम्मेलन 1949 में इस बात पर बल दिया गया था कि प्रकृति के उपकरण एक नैसर्गिक बपौती के रुप में है जिन्हें शीध्रता से नष्ट नहीं करना चाहिए। इसी तरह स्टाकहोम सम्मेलन 1972 में मानवीय पर्यावरण पर घोषणा हुई। सैद्धांतिक रुप से पृथ्वी के प्राकृतिक द्रव्यों जिनमें वायु, पानी, भूमि तथा पेड़-पौधे शामिल हैं, को वर्तमान तथा भावी पीढ़ियों के लिए सावधानीपूर्ण तथा उपयुक्त योजना तथा प्रबंध द्वारा सुरक्षित रखने पर बल दिया गया। 1992 के रियो शिखर सम्मेलन में कहा गया कि स्थायी विकास के सभी सरोकारों का केंद्र-बिंदु मानव जाति ही है और उसे प्रकृति के साथ पूर्ण समरसता रखते हुए स्वस्थ एवं उत्पादनशील जीवन जीना चाहिए। लेकिन ये सभी सिद्धांत कागजों तक सीमित हैं। मानव आज भी अपने दुराग्रहों के साथ है। प्रकृति से उसका खिलवाड़ का तरीका पहले से भी जघन्य होता जा रहा है। नतीजा सामने है। मानव को समझना होगा कि पृथ्वी दिवस मनाने मात्र से पर्यावरण की सुरक्षा नहीं की जा सकती। इसके लिए संवेदनशील होना ज्यादा जरुरी है।

    अरविंद जयतिलक
    अरविंद जयतिलकhttps://www.pravakta.com/author/arvindjaiteelak
    लेखक स्‍वतंत्र टिप्‍पणीकार हैं और देश के प्रतिष्ठित समाचार-पत्रों में समसामयिक मुद्दों पर इनके लेख प्रकाशित होते रहते हैं।

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