लेखक परिचय

अरविंद जयतिलक

अरविंद जयतिलक

लेखक स्‍वतंत्र टिप्‍पणीकार हैं और देश के प्रतिष्ठित समाचार-पत्रों में समसामयिक मुद्दों पर इनके लेख प्रकाशित होते रहते हैं।

Posted On by &filed under विविधा.


-अरविंद जयतिलक-
china-india

अभी कुछ दिन पहले ही भारत यात्रा पर आए चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात कर सभी क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने और सीमा विवाद सुलझाने की अपनी सरकार की इच्छा प्रकट की। देश-दुनिया को लगा कि षायद चीन अपने पूर्वाग्रहों के केंचुल से बाहर निकल भारत के साथ बेहतर संबंध चाहता है। लेकिन जिस तरह उसने हालिया मानचित्र में अरुणाचल प्रदेश को अपना हिस्सा बता और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में रेललाइन बिछाने का संकेत दिया है कि उससे यही साबित होता है कि वह भरोसे के काबिल नहीं है। आश्चर्य लगता है कि ऐसे समय में जब भारत के उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी पंचशील के साठवीं वर्षगांठ में शामिल होने के लिए चीन में थे, उसे भारत से मित्रता का संदेश देना चाहिए इसके विपरीत वह भरोसे का कत्ल कर रहा है। यह उचित ही है कि भारत ने भी उसके रवैये का कड़ा प्रतिकार किया है और साफ संदेश दे दिया है कि अरुणाचल प्रदेश भारत का अभिन्न अंग है। गौर करें तो यह पहली बार नहीं है जब चीन अपने नक्शे में अरुणाचल प्रदेश को अपना हिस्सा बताया हो। नवंबर 2012 में भी उसने अपनी नई ई-पासपोर्ट व्यवस्था में अरुणाचल प्रदेश और अक्साई चिन के कुछ क्षेत्रों को अपना हिस्सा बताया था। यही नहीं उसने भारत के अलावा फिलीपींस, वियतनाम, जापान के कुछ क्षेत्रों को भी अपना हिस्सा बताया। जबकि सच्चाई यह है कि इन क्षेत्रों पर उसका कभी भी स्वाभाविक अधिकार नहीं रहा। संसार अच्छी तरह अवगत है कि ब्रिटिश भारत और तिब्बत ने 1913 में शिमला समझौते के तहत अंतर्राष्ट्रीय सीमा के रुप में मैकमोहन रेखा का निर्धारण किया। गौरतलब है कि इस सीमा रेखा का निर्धारण हिमालय के सर्वोच्च शिखर तक जाता है। जानना जरूरी है कि इस क्षेत्र में हिमालय प्राकृतिक सीमा का निर्धारण नहीं करता क्योंकि यहां से अनेक नदियां निकलती और सीमाओं को काटती हैं। वर्तमान स्थिति यह है कि दोनों देश एलसी पर निगरानी कर रहे हैं। वास्तविक नियंत्रण रेखा यानी एलसी की वास्तविक स्थिति भी कमोवेश यही है। हैं। ऐतिहासिक संदर्भों में जाए तो तिब्बत, भारत और बर्मा की सीमाओं का ठीक से रेखांकन नहीं होने से अक्टूबर, 1913 में शिमला में अंग्रेजी सरकार की देखरेख में चारो देशों के अधिकारियों की बैठक हुई। इस बैठक में तिब्बती प्रतिनिधि ने स्वतंत्र देश के रुप में प्रतिनिधित्व किया और भारत की अंग्रेजी सरकार ने उसे उसी रूप में मान्यता दिया। आधुनिक देश के रूप में भारत के पूर्वोत्तर हिस्से की सीमाएं रेखांकित न होने के कारण दिसंबर 1913 में दूसरी बैठक शिमला में हुई और अंग्रेज प्रतिनिधि जनरल मैक मोहन ने तिब्बत, भारत और बर्मा की सीमा को रेखांकित किया। लेकिन चीन मैकमोहन रेखा को नहीं मानता है। वह इसे अवैध बताता है। यह भी समझना जरूरी है कि आज के अरुणाचल का तवांग क्षेत्र मैकमोहन द्वारा खींची गयी रेखा के दक्षिण में होता था। इसलिए तिब्बती सरकार बार-बार उस पर अपना दावा करती रही।

तिब्बत का स्वतंत्र अस्तित्व स्वीकारने से उत्तर से पूर्वोत्तर तक कहीं भी भारत और चीन की सीमा नहीं मिलती थी। इस तरह उत्तरी-पूर्वी सीमा को एक प्राकृतिक सुरक्षा मिली हुई थी। लेकिन स्वतंत्र भारत की नेहरु सरकार की अदूरदर्शी नीति ने स्वतंत्र तिब्बत को बलिदान हो जाने दिया। पीकिंग पर साम्यवादियों का कब्जा होने के उपरांत 23 मई, 1951 को तिब्बत के दलाई लामा सरकार के प्रतिनिधियों और चीनी सरकार के अधिकारियों के बीच 17 सूत्रीय कार्यक्रम पर समझौता हुआ। नेहरु सरकार ने अंग्रेजी दस्तावेजों का हवाला देकर तिब्बत पर चीन की अधीनस्थता की बात स्वीकार ली। आज सिक्किम-तिब्बत सीमा को छोड़कर लगभग संपूर्ण भारत-चीन सीमा विवादित है। भारत और चीन के बीच विवाद की वजह अक्साई चिन और अरुणाचल प्रदेश की संप्रभुता भी है। पश्चिमी सेक्टर में अक्साई चीन का लगभग 3800 वर्ग किमी भू-भाग चीन के कब्जे में है। अक्साई चिन जम्मू-कश्मीर के उत्तर-पूर्व में विशाल निर्जन इलाका है। इस क्षेत्र पर भारत का अपना दावा है। लेकिन नियंत्रण चीन का है। दूसरी ओर पूर्वी सेक्टर में चीन अरुणाचल प्रदेश के 90 हजार वर्ग किमी पर अपना दावा कर उसे अपना मानता है। यही नहीं, वह अरुणाचल प्रदेश से चुने गए किसी भारतीय सांसद को वीजा भी नहीं देता है। उसकी ढि़ठाई ही कही जाएगी कि 2010 से लेकर अब तक 800 से अधिक बार उसके सैनिक सीमाओं का अतिक्रमण कर चुके हैं। 2009 में उसके सैनिकों ने दक्षिण-पूर्वी लद्दाख में प्रवेश कर सड़क निर्माण रुकवाया तो जुलाई 2012 में उसके कुछ सैनिकों ने भारतीय सीमा में घुसकर चट्टानों पर चीन-9 लिखा। भारत की मनाही के बावजूद भी वह कश्मीर के लोगों को स्टेपल वीजा जारी कर रहा है। सीमा विवाद के अलावा अन्य कई मसलें और भी हैं जिसपर चीन का रवैया हठधर्मिता वाला है। इन्हीं में से एक ब्रह्मपुत्र नदी जलविवाद भी है। चीन ब्रह्मपुत्र नदी की धारा को मोड़कर अपने उत्तर-पूर्व या उत्तर-पश्चिम में जिनजियांग राज्य तक ले जाना चाहता है। फिलहाल भारत के कड़े ऐतराज के बाद उसने अपनी योजना स्थगित कर ली है। लेकिन वह ब्रह्मपुत्र पर तीन बांध बनाने की योजना में लगा हुआ है। अब उसकी रणनीति पाकिस्तान से गलबहियां कर भारत को घेरना है। गुलाम कश्मीर में सामरिक रूप से महत्वपूर्ण गिलगित-बल्तिस्तान क्षेत्र पर अपना वर्चस्व बढ़ा रहा है। यहां तकरीबन 10000 से अधिक चीनी सैनिकों की मौजूदगी बनी हुई है। वह इन क्षेत्रों में निर्बाध रुप से हाईस्पीड सड़कें और रेल संपर्कों का जाल बिछा रहा है ताकि भारत तक उसकी पहुंच आसान हो सके। उसकी योजना पीओके में मिसाइल स्टोर करने के लिए 22 सुरंग बनाने के अलावा अंतर्राष्ट्रीय रेललाइन से अपने सीमावर्ती प्रांत शिनजिआंग को पाकिस्तान से जोड़ना भी है। उसकी मंशा अरबों रुपये खर्च करके कराकोरम पहाड़ को दो फाड़ करते हुए ग्वादर के बंदरगाह तक अपनी रेललाइन पहुंचानी है ताकि युद्धकाल में जरुरत पड़ने पर अपने सैनिकों तक आसानी से रसद पहुंचाया जा सके।

गत वर्ष पहले उसने पाकिस्तान अधिग्रहित कश्मीर (पीओके) के रास्ते व्यापार गलियारा बनाने की दिशा में पाकिस्तान से समझौता भी किया। यह समझौता सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण ग्वादर बंदरगाह पर हवाई अड्डा बनाने और कराकोरम राजमार्ग का विस्तार करने के लिए है। वह भारत को घेरने के लिए नेपाल, बांग्लादेश और म्यांमार में भी दखल बढ़ा रहा है। वह तेजी से श्रीलंका में भी बंदरगाह बना रहा है जो भारतीय सुरक्षा के लिए बेहद खतरनाक है। अफगानिस्तान में भारत की दखल कम करने के लिए अरबों डालर खर्च कर तांबे की खदानें चला रहा है। उसकी कोशिश म्यांमार की गैस संसाधनों पर कब्जा करने की भी है। कहा तो यह भी जा रहा है कि वह वह कोको द्वीप में भी नौसैनिक बंदरगाह बना रहा है। उचित होगा कि भारत की नई सरकार चीन नीति पर पुनर्विचार करे और तिब्बत के मसले पर कड़ा रुख अपनाए। तिब्बत का स्वतंत्र अस्तित्व ही भारत की सीमाओं की रक्षा की सबसे बड़ी गारंटी है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *