लेखक परिचय

विनायक शर्मा

विनायक शर्मा

संपादक, साप्ताहिक " अमर ज्वाला " परिचय : लेखन का शौक बचपन से ही था. बचपन से ही बहुत से समाचार पत्रों और पाक्षिक और मासिक पत्रिकाओं में लेख व कवितायेँ आदि प्रकाशित होते रहते थे. दिल्ली विश्वविद्यालय में शिक्षा के दौरान युववाणी और दूरदर्शन आदि के विभिन्न कार्यक्रमों और परिचर्चाओं में भाग लेने व बहुत कुछ सीखने का सुअवसर प्राप्त हुआ. विगत पांच वर्षों से पत्रकारिता और लेखन कार्यों के अतिरिक्त राष्ट्रीय स्तर के अनेक सामाजिक संगठनों में पदभार संभाल रहे हैं. वर्तमान में मंडी, हिमाचल प्रदेश से प्रकाशित होने वाले एक साप्ताहिक समाचार पत्र में संपादक का कार्यभार. ३० नवम्बर २०११ को हुए हिमाचल में रेणुका और नालागढ़ के उपचुनाव के नतीजों का स्पष्ट पूर्वानुमान १ दिसंबर को अपने सम्पादकीय में करने वाले हिमाचल के अकेले पत्रकार.

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 विनायक शर्मा

तीसरे मोर्चे की सम्भावना पर नेताजी के नाम से प्रसिद्द मुलायम सिंह के ताजातरीन बयान से राजनीतिक दलों में एक संम्राम सा छिड़ गया है. समाजवादी पार्टी के सुप्रीमों मुलायम सिंह ने तीसरे मोर्चे की सम्भावना जता अगली सरकार बनाने का वक्तव्य क्या दिया सभी तरफ से बयानों की बौछार लग गई. कोई मुंगेरी लाल की याद दिलाने लगा तो कोई दिन दिहाड़े सपने देखने की बात करने लगा. बात यहीं नहीं रुकी, सपनों पर टैक्स नहीं लगता के बयान देकर मुलायम के वक्तव्य का उपहास उड़ाने का प्रयत्न भी किया किया जा रहा है. इन सब के बीच चैनल वालों की तो बन आई और चर्चाओं का दौर शुरू हो गया. इसी विषय पर सर्वप्रथम अपने ब्लॉग में कांग्रेस और भाजपा को आम चुनावों में सरकार बनाने के लिए आवश्यक संख्या प्राप्त न होने की आशंका जतानेवाले भाजपा के नेता अडवानी को तो मानों भुला ही दिया गया. अभी कुछ दिनों पूर्व ही भाजपा के वरिष्ठ नेता अडवानी ने ही कांग्रेस व भाजपा को बहुमत न मिलने व एक नए गठबंधन के केंद्र की सत्ता पर काबिज होने की सम्भावना जतलाई थी परन्तु उनके उक्त लेख पर उनके अपने दल सहित सभी दलों के नेताओं ने उनका उपहास उड़ाया था.

देखा जाये तो देश में कुछ ऐसी ही परिस्थिति का निर्माण हो रहा है. मेरा भी यही मत है और मैंने अपने बहुत से लेखों में इसका भी वर्णन किया है २०१४ में चुनावों में नई सरकार बनने तक एनडीए और यूपीए के चबूतरों की बहुत सी ईंटें इधर से उधर और उधर से इधर खिसकेंगी और ममता, जया, बीजू, जगमोहन रेड्डी, तेलगूदेशम आदि दलों द्वारा एक नए गठबंधन बनाने की प्रबल सम्भावना बन रही है. प्रारम्भ में मैंने इस बननेवाले नए गठबंधन में मुलायम सिंह की समाजवादी पार्टी को भी रखा था. परन्तु राष्ट्रपति चुनाव के दौरान अतिमहत्वाकांक्षी मुलायम सिंह ने जिस प्रकार यूटर्न लेते हुए यूपीए के प्रत्याशी को समर्थन दिया उससे न केवल उनकी बल्कि उनकी पार्टी की भी विश्वसनीयता घटी है जिसके चलते भविष्य की राजनीति में उनका साथ देने व लेने दोनों ही परिस्थितियों में संशय की सम्भावना रहेगी. तीसरे मोर्चे या गठबंधन के निर्माण में वाम दलों व मुलायम की समाजवादी पार्टी के किसी प्रकार के सहयोग न होने की भी सम्भावना बनती नजर आती है क्यूंकि ममता की तृणमूल उस गठबंधन में कभी नहीं जायेगी जिसमें यह दोनों दल होंगे. वैसे भी एटमी मुद्दे पर मुलायम के सरकार को समर्थन देने के बाद से वामदलों और मुलायम के रिश्तों में कोई मधुरता नजर नहीं आती. ऐसी बदली हुई परिस्थिती में सांप्रदायिक शक्तियों को सत्ता में आने से रोकने वाला पुराना दावं कितना कारगर होगा इसपर भी संशय है.

२०१४ के चुनाव में कांग्रेस और उसके सहयोगियों को केद्र सरकार पर लगे भ्रष्टाचार और बड़ी संख्या के घपलों, महंगाई के साथ-साथ टीम अन्ना और रामदेव द्वारा किये जाने वाले हमलों के कारण नुक्सान उठाना पड़ सकता है. इसका कितना लाभ कांग्रेस के विरोद्धी दल संगठित होकर उठा सकेंगे यही देखने की बात होगी. कांग्रेस का विरोद्ध होने के बावजूद बड़ी संख्या में राजनीतिक दलों द्वारा चुनाव में उतरने के कारण मतों के बिखराव के चलते दो दलीय-राजनीतिक व्यवस्था कामयाब नहीं हो पाई और उसका स्थान गठबन्धनों या मोर्चों ने ले लिया. चुनाव पूर्व एनडीए गठबंधन बना सफलता से सरकार चलाने के प्रयोग ने ही कांग्रेस व उसके सहयोगियों को चुनाव हारने के बाद यूपीए बना सत्ता तक पहुँचने के लिए प्रेरित किया था. २०१४ के आम चुनावों में जहाँ कांग्रेस की अपनी सीटें घटेंगी वहीँ भाजपा के अपने दल की सीटें बढने की प्रबल सम्भावना बनती है. एक ओर जहाँ यूपीए के कुछ सहयोगी विरोद्ध या पराजय के चलते यूपीए से बाहर होंगे वहीँ एनडीए से जेडीयू का निकलना भी निश्चित लग रहा है. वैसे भी समाजवादी कब किसके साथ हो और कब विरोद्ध में, यह निश्चित नहीं है. दोहरी सदस्यता के नाम पर लोकनायक जयप्रकाश नारायण के सपनों को साकार करनेवाली जनता पार्टी को मात्र अढाई वर्षों के अन्तराल में ही विघटित करने का काम इन्हीं समाजवादियों ने ही तो किया था. पूर्व के जनसंघियों को जनता पार्टी से निकालने के बाद भी यह एक सूत्र में बन्ध कर कहाँ रह सके ? पारे की भांति बिखर कर कभी जनतापार्टी, कभी जनतादल, कभी जनमोर्चा एक-एक नेता के नाम पर जनता दल तो न जाने कितने बने और दूटे. समाजवाद और लोहिया के नाम पर गावं, किसान, गरीब और मजदूर की राजनीति करनेवालों के विषय में अधिक लिखना विषय से भटकना होगा. अधिक कहने की आवश्यकता भी नहीं है देश सब कुछ जानता है.

९० के दशक तक आते-आते देश के राजनीतिक घटनाक्रम ने १९७७ की ही भांति एक बार पुनः बड़ा पल्टा खाया. इंदिरा गांधी की हत्या के पश्चात् प्रचंड बहुमत लेकर प्रधान मंत्री बने राजीव गांधी के नेतृत्व में बनी कांग्रेस की सरकार को फेयर-फेक्स और बोफोर्स तोपों में कमीशन खाने के आरोपों के चलते १९८९ के चुनावों में मुहँ की खानी पडी. इस बार कांग्रेस के विरोद्ध की कमान संभाली थी राजीव गांधी की सरकार में सहयोगी रहे विश्वनाथ प्रताप सिंह ने. जनमोर्चा, जनतादल, जनतापार्टी, लोकदल और कांग्रेस( एस ) का विलय कर जनता दल बना और डीएमके, तेलगूदेशम व असमगण परिषद् आदि को साथ ले १९८९ में राष्ट्रीय मोर्चा की सरकार बनाई. १४३ सीटों पर विजय प्राप्त करने पर भी विश्वनाथ प्रताप सिंह के जनता दल के लिए सरकार बनाना संभव नहीं था यदि ८५ सीटों वाली भाजपा व ४५ सीटोंवाले वाम दलों का बाहर से समर्थन नहीं होता. परन्तु २ दिसंबर १०९० को सहयोगी दलों के समर्थन से बनी गैरकांग्रेस दलों की यह सरकार भी अंतर्द्वंद और मंडलआयोग की सिफारिशों को लागू करने जैसे कई विवादित निर्णयों के कारण अंततः १९ नवम्बर १९९० को धराशाही हो गई. राष्ट्रीय फ्रंट के नाम से तीसरे मोर्चे को खड़ा करनेवाले कई दलों के विलय कर बने जनता दल को जहाँ १९८९ के चुनाव में १४३ सीटें मिली थीं वहीँ १९९१ के मध्यावधि चुनावों में २३ राज्यों में मात्र ५९ सीटों पर ही संतोष करना पड़ा. कांग्रेस व भाजपा ने अवश्य ही इस चुनावों में क्रमश २३२ व १२० सीटें जीत कर अपनी स्थिति में सुधार किया.

देश में कांग्रेस की जनविरोद्दी नीतियों व विकास के विभिन्न मोर्चे पर विफल रहने पर ही दो-दलीय राजनीतिक व्यवस्था की सम्भावना की तलाश की जा रही थी और कांग्रेस के विपल्प के रूप में १९७७ में जनता पार्टी उभर कर आई और जनता ने उस पर विश्वास कर सत्ता के सिंहासन पर बैठाया भी. परन्तु विचारधारा के नाम पर महती महत्वाकांक्षा के चलते दलों के नेताओं ने ही दूसरे विपल्प की सम्भावना को अधर में लटकाए रखा. मतों के बड़े पैमाने पर होनेवाले बिखराव के कारण ही भाजपा ने दूसरे दल की अभिलाषा त्यागते हुए १९९९ में २२ दलों का एनडीए नामक गठबंधन बना केंद्र की राजनीति में सफल प्रयोग किया. गठबंधन की राजनीति में विश्वास न करनेवाली कांग्रेस भी सत्ता का लोभ त्याग न सकी और वह भी यूपीए गठबंधन बना केंद्र में २००४ से लगातार दूसरी सरकार चला रही है. भाजपा को सत्ता से बाहर रखने के लिए ही सोनिया का विरोद्द करनेवाले दल सरकार में सम्मिलित होकर या कठिन समय में बाहर से समर्थन देकर यूपीए सरकार को प्राणदान दे रहे हैं. कांग्रेस यह समझने में असफल है कि उसका जनाधार खिसकाने में उसकी अपनी विफलताओं के साथ-साथ इन्हीं दलों का बड़ा हाथ है जो साम्प्रदायिकता का विरोद्ध कर देश की राजनीति को जातिवाद व क्षेत्रवाद के कुओं में धकेलने के कार्य में लगे हुए हैं.

केंद्र व प्रदेशों में समान विचारधारा के नाम पर या फिर सेकुलर ब्लाक के नाम पर अनेकों मोर्चे व गठबंधन बनाये गए परन्तु चुनाव में जनता द्वारा मान्यता न देने पर नतीजों के बाद उनका अस्तित्व भी नहीं रहता. कौन सा दल किसमें विलय हो गया यह अगले चुनाव के आसपास जाकर ही पता चलता है. तीसरे मोर्चे की सम्भावना की तलाश देश की जनता नहीं कर रही है बल्कि यह सम्भावना एनडीए और यूपीए में होनेवाले बिखराव की आशंका के कारण बन रही है. कांग्रेस और भाजपा से उसके वर्तमान सहयोगियों द्वारा किनारा करने की स्थिति में अवश्य ही तीसरे मोर्चे की सम्भावना को बल मिलता है. लेकिन बड़ा सवाल यहाँ यह है कि उस तीसरे मोर्चे का नेतृत्व कौन करेगा ? मुलायम की ही भांति अन्य क्षेत्रीय क्षत्रप अभी से इस दिशा में कार्य कर रहे हैं. समाजवाद के नाम पर परिवारवाद चलानेवाले मुलायम सिंह की पल्टामारू राजनीति से सभी दल भली भांति परिचित हैं इसलिए उनको तीसरे मोर्चे का नेतृत्व मिलने की सम्भावना बहुत ही क्षीण लगती है. वैसे कांग्रेस और भाजपा जैसे बड़े दलों को भी क्या गरज पडी है कि वह मुलायम सिंह को समर्थन दें.

देश में चल रही राजनीति का गहन अध्ययन कर निष्पक्ष पूर्वानुमान यही निकलता है कि २०१४ के चुनावों में कांग्रेस को बहुत घाटा होगा और यदि भाजपा के एनडीए को अन्य दलों का समर्थन नहीं मिला तो वह भी सरकार बनाने के सपने को पूरा करने में असमर्थ रहेगी. ऐसे में तृणमूल कांग्रेस, एआइडीएमके, बीजू जनतादल, आंध्र के जगन रेड्डी की वाईएसआर कांग्रेस और नितीश कुमार आदि मिल कर केंद्र में सरकार बनाने का प्रयास कर सकते हैं और उन्हें भाजपा यानि बचा हुआ एनडीए बाहर से समर्थन देगा. इस संभावित राजनीतिक खेल में सपा के मुलायम सिंह कोई अहम् किरदार निभाने में सफल होंगे ऐसी किंचित भी सम्भावना मुझे नहीं लगती. क्यूँ कि अभी तक का अनुभव यही बताता है कि राजनीतिक दल मिलकर मोर्चे तो बना सकते हैं पर उन्हें वास्तविक रूप में मान्यता तो देश की जनता ही देती है और केंद्र सरकार का नेतृत्व देश की जनता किसी विश्वसनीय और विस्तृत नजरिये और विचारधारावाले वाले नेता के हाथ में ही देना पसंद करेगी जो देश के सर्वांगीण विकास के लिए काम करे. वैसे भी लोकसभा के अस्सी निर्वाचन क्षेत्रों वाले सपा शासित उत्तर प्रदेश की तुलना में नवीनपटनायक, ममता, जया और जगनरेड्डी के राज्यों की बात करें तो इन राज्यों की कुल १४२ सीटें बनती हैं. यदि मुलायम की ही भांति यह भी तीन चौथाई सीटें जीतने की सम्भावना व्यक्त करते हैं तो यह संख्या बनती है १०८. यदि ६० सीटें जीत कर मुलायम प्रधान मंत्री बनने का सपना देख सकते हैं तो १०८ सीटों पर विजय वालों का प्रधान मंत्री बनना निश्चित ही है. वैसे मुलायम ६० सीटें लेने में कामयाब हो जायेंगे मुझे तो इस पर भी शंका है. चिरंजीव अखिलेश के शासन के शुरुआती दिनों से ही जनता को विवादों की धूल के अतिरिक्त कुछ भी नहीं प्राप्त नहीं हुआ है. चाहे वह सरकार द्वारा विधायक निधि से गाडी खरीदने का फरमान हो जिसे विवाद उठाने पर वापिस ले लिया गया था. चचा शिवपाल सिंह यादव के विवादित बयान जिसमें वह अधिकारीयों को जनता का काम कर के चोरी करने का मशवरा देते हैं या फिर चाचा समान आजम खान जो कही भी कुछ भी कह कर सरकार और पार्टी को सांसत में डालने से गुरेज नहीं करते. शासन के इस प्रकार के आचरण के चलते बसपा, भाजपा और कांग्रेस मुलायम को उत्तर प्रदेश से ६० सीटें जीतने देंगी इसका सही-सही जवाब तो २०१४ में ही मिलेगा अभी कयास लगाने से कुछ लाभ नहीं होनेवाला.

4 Responses to “नेताजी, जनता की मान्यता के बिना मोर्चे सफल नहीं होते !”

  1. विनायक शर्मा

    vinayak sharma

    डॉ. पुरुषोत्तम मीणा जी मेरे लेख और लेखक के विषय में लिखे आपके शब्द अवश्य ही मुझे हिलोरें लेने को विवश कर रहे है. आप जैसे प्रबुद्धजनों से ही बहुत कुछ सीखने का प्रयत्न कर रहा हूँ और इसी काल में प्रोत्साहन के चंद शब्द अवश्य ही प्रेरणा देते हैं. आपने मेरा लेख बहुत ध्यान से पढ़ा है यह आप द्वारा उठाये गए प्रश्नों से ही प्रतीत होता है. मैं आप के प्रश्नों का उत्तर तो नहीं, हाँ इस पर बिन्दुवार अपने विचार रखने का प्रयत्न कर रहा हूँ. :
    # लोकतान्त्रिक शासन व्यवस्था में प्रधानमंत्री का पद सभी के लिए बहुत ही आकर्षण का कारण रहा है. भारतवर्ष का विभाजन भी इसी पद के लिए अंदरखाते चल रहे संघर्ष के कारण ही हुआ था. यदि एक नेता राष्ट्रपति पद के लिए मान जाता और प्रधानमंत्री का पद दूसरें के लिए छोड़ देता तो देश का विभाजन नहीं होता. इससे यह स्पष्ट है कि मोर्चा पहला हो या तीसरा, झगडा प्रधानमंत्री पद का ही रहा है.
    # मुलायम का ६० सीटों का दावा पुख्ता इसलिए नहीं है कि विधानसभा और लोकसभा के चुनाव के मुद्दे, परिस्थितियां और खेल के मैदान का साईज अलग-अलग होता है और मतदाता भी राष्ट्रीय परिपेक्ष में मतदान करता है (सही या गलत अलग विषय है). उत्तर प्रदेश के शहरी निकायों के चुनाव परिणाम सपा की वर्तमान स्थिति भी दर्शाती है. इन सब के ऊपर बसपा की मायावती भी २०१४ तक अपने खिसके जनाधार को पुनः समेटने में सफल हो जायेगी. सपा के शासन में समाज के नीचे के पायदान पर खड़ा विशाल वर्ग कितना सुरक्षित है यह समाचारों में हम सब देख ही रहे हैं. भारतीय जनमानस की एक विशेषता है कि जितनी शीघ्रता से हम द्रवित होते हैं उतनी ही शीघ्रता से क्रोधित भी. मतों बड़े पैमाने के बिखराव के चलते हुई विजय को जनाधार का बढ़ना नहीं माना जा सकता. और फिर महत्वाकांक्षी होने से लक्ष्य निकट नहीं आ जाता, यह सभी को समझना चाहिए.
    # यह सही है कि १०८ सीटों पर विजय की सम्भावना वाले क्षत्रप अभी एक नहीं हैं, परन्तु यदि इन सभी के व्यक्तित्व को देखें तो ऐसा प्रतीत होता है कि यह नेता किसी जातिविशेष के प्रतिनिधि न होकर अपने पूरे का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं. दुसरे, राष्ट्रपति चुनाव के दौरान इनमें बढ़ती नजदीकियों और देश के वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में एनडीऐ और यूपीए गठबंधन में चल रही खींचतान के चलते ही तीसरे मोर्चे या गठबंधन की संभावनां लगती है.
    # गठबंधन वैचारिक मतैक्य के साथ-साथ समान दुश्मन होने पर भी बनते देश ने देखें हैं. यह दीगर बात है कि ऐसे गठबंधन अधिक दिनों तक चलते नहीं. वैसे भी समानविचारधारा वाले कम्युनिष्टों और समाजवादियों के कितने दल हैं इस देश में ? राजनीति में तो अब एक ही विचारधारा काम कर रही है वह है स्वार्थ की विचारधारा. १०८ सीटों वालों का प्रधानमंत्री बनना इसलिए निश्चित कहा है मैंने क्यूंकि मुलायम सिंह को किसी का समर्थन मिले ऐसी सम्भावना मुझे नहीं लगती.
    # चूँकि मैं किसी भी राजनीतिक दल का सदस्य या व्यक्तित्व का पिछल्लगु नहीं हूँ इसलिए मैं यह दावे से कह सकता हूँ कि कम से कम भाजपा में मुझे प्रधानमंत्री पद की कोई लड़ाई दिखाई नहीं देती. मोदी बनाम अडवानी का दीखता संघर्ष मीडिया का खेल है. वैसे भी गठबंधन की सरकारों में सभी दल मिलकर ही प्रधानमंत्री का चयन करते हैं. एनडीए में आज के दिन मात्र चार ही दल बचे हैं और जेडीयू के नितीश व शरद यादव की छटपटाहट और शिवसेना की बेचैनी सभी देख रहे हैं. ऐसे में एनडीए का नहीं भाजपा का प्रधानमंत्री बन सकता यदि अकेले भाजपा को २०० के करीब सीटें मिल जाये, जो अभी तक किसी भी सूरत में तो लगता नहीं.
    २०१४ के आम चुनावों तक कुछ बड़े राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव होने हैं, तब तक कांग्रेस और भाजपा के साथ साथ क्षेत्रीय दलों की ताकत का भी पता चल जायेगा कि २००१४ में देश की राजनीति का ऊंट किस करवट बैठता है.

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  2. डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

    डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’/Dr. Purushottam Meena 'Nirankush'-Jaipur

    श्री विनायक शर्मा जी, आपका विश्लेष्ण तो काबिले तारीफ है! आपने जैसा लिखा है-“निष्पक्ष” वैसा प्रतीत भी हो रहा है! लगता है कि लेखन के समय आप अपनी कलम को संतुलित करने में माहिर हैं! जिसका उल्लेख आपने अपनी टिप्पणी में भी किया है! वास्तव में आप लेखकीय धर्म का निर्वाह करने में निपुण हैं!

    इसके साथ-साथ आपकी निम्न निष्कर्षात्मक टिप्पणी के बारे में विनम्रता पूर्वक मेरे कुछ सवाल हैं- (पहले आपके लेख का अंश)

    “………………वैसे भी लोकसभा के अस्सी निर्वाचन क्षेत्रों वाले सपा शासित उत्तर प्रदेश की तुलना में नवीनपटनायक, ममता, जया और जगनरेड्डी के राज्यों की बात करें तो इन राज्यों की कुल १४२ सीटें बनती हैं. यदि मुलायम की ही भांति यह भी तीन चौथाई सीटें जीतने की सम्भावना व्यक्त करते हैं तो यह संख्या बनती है १०८. यदि ६० सीटें जीत कर मुलायम प्रधान मंत्री बनने का सपना देख सकते हैं तो १०८ सीटों पर विजय वालों का प्रधान मंत्री बनना निश्चित ही है………….”

    हालाँकि अभी तो सभी के लिए खयाली पुलव ही है, लेकिन यदि इसे आधार मान लें तो सबसे बड़ा सवाल तीसरे मोर्चे या तीसरे फ्रंट का हमेशा से प्रधान मंत्री पद का रहा है!

    ———साठ सीटें मिलने पर (जो अभी केवल कल्पना है) मुलायम का दावा अधिक पुख्ता क्यों नहीं है, विशेषकर उस दशा में जबकि १०८ सीटें जीतने वालों में ही आपके अनुसार ही चार क्षेत्रीय छत्रप हैं?

    ———-उनमें से १०८ सीटों का सर्वेसर्वा तो कोई एक न तो है और न ही आसानी से हो सकता है?

    ———इन चारों में कोई वैचारिक मतैक्य भी नज़र नहीं आता! ऐसे में आपकी ये राय कि “यदि ६० सीटें जीत कर मुलायम प्रधान मंत्री बनने का सपना देख सकते हैं तो १०८ सीटों पर विजय वालों का प्रधान मंत्री बनना निश्चित ही है.” कुछ गले उतरने लायक निष्कर्ष प्रतीत नहीं होता?

    इसलिए मैं आपके शानदार लेख को केवल इतनी सी बात जोड़कर इसे आगे बढ़ाने की ध्रष्टता करना चाहता हूँ कि यदि किसी कारण से दोनों बड़े गठबंधन सत्ता से बाहर रहते हैं तो (जो भाजपा के अपरिपक्व राजनैतिक कारणों से ही संभव है, अन्यथा वर्तमान हालातों में अबकी बार भाजपा को मौका मिल सकता है! इसके विपरीत यदि भाजपा में कुर्सी की लड़ाई जारी रही और गडकरी के ही हाथ में भाजपा की सारी ताकत रही तो कांग्रेस (गठबंधन सहित) तीसरी बार सत्ता के करीब पहुँच सकती है) आपके अनुसार भाजपा के समर्थन से और मेरी राय में भाजपा या कांग्रेस या मुलायम या वामदलों या ममता के बाहरी समर्थन से यदि तीसरी ताकत सत्ता में आ भी जाती है तो उसका सर्वमान्य तथा कद्दावर नेता नहीं होने के कारण प्रधान मंत्री का चयन ही सर्वाधिक मुश्किल काम होगा और यही एक मात्र विवाद ऐसी किसी भी संभावित सरकार को किसी भी क्षण गिराने के लिए और 1977 तथा 1989 को दोहराने के लिए पर्याप्त होगा! आम जागरूक मतदाता चोपलों पर इस बारे में अभी से बात करता नज़र आने लगा है!

    ऐसे हालत में लगता नहीं कि तीसरे मोर्चे का ख्वाब सफलतापूर्वक पूरा होने वाला है! इस सबके बाद भी आपका विश्लेषण शानदार है!

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  3. विनायक शर्मा

    vinayak sharma

    अति आवश्यक : कृपया लेख के “९० के दशक……..” वाले चौथे पैरे की नौवीं पंक्ति के १०९० को १९८९ पढ़ें. त्रुटी के लिए खेद के साथ …….धन्यवाद……!
    विगत दो माह से अस्वस्थता के चलते और आंख की सर्जरी के कारण लेखन कार्य से दूरी बाध्य थी. कल ही यह लेख लिखा और भेज दिया. मधुसूदन जी की पहली और प्रेरणा दायक टिप्पणी के लिए उनको बहुत-बहुत धन्यवाद.
    यूँ तो हम सभी किसी न किसी राजनीतिक दल के खूंटे से बंधे हुए हैं और लाख चाहने पर भी कहीं न कहीं जाने अनजाने में अपने खूंटे के प्रति पक्षपात कर जाते हैं. लेखक के साथ भी ऐसा ही होता है परन्तु इमानदारी से निष्पक्ष रूप से पूर्वानुमान या स्थित का आंकलन करने के लिए दिल और दिमाग को पञ्च परमेश्वर बनाना पड़ता है जो कठिन तो है परन्तु असंभव कदाचित नहीं.
    हिसार ( हरियाणा) के उपचुनाव के नतीजों के बाद टीम अन्ना पर लिखा प्रवक्ता में मेरा प्रथम लेख ” हिसार में निशाना कांग्रेस तो अगले चुनाव में कौन ? ” प्रकाशित हुआ था. उसमें भी मैंने टीम अन्ना की भविष्य की रणनीति का पूर्वानुमान करते हुए अन्य दलों को सावधान किया था. हिमाचल के अभी हाल ही में संपन्न हुए दो उप चुनावों का पूर्वानुमान की ” हो सकती है सीटों की अदलाबदली ” और उत्तर प्रदेश, पंजाब आदि पांच राज्यों के चुनावों के नतीजों का पूर्वानुमान पर भी अक्षरशः सही साबित हुआ था.
    मेरा यह प्रयास रहता है की जिस प्रकार के भी कार्य को हाथ में लूँ, उसे इमानदारी और निष्पक्ष रूप से निभा सकूँ. मेरा यह लेख भी इमानदारी और निष्पक्ष रूप से लिखने का प्रयास है. लेखन शैली और भाषा में त्रुटी हो सकती है परन्तु मेरी मंशा में तो कतई नहीं.
    धन्यवाद….!

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  4. डॉ. मधुसूदन

    डॉ. मधुसूदन उवाच

    स्थूल रूपसे आपकी अच्छी पकड है, विश्लेषण पर.
    और सदा की भाँति आपका प्रमाण सहित तर्क भी देशकी राजनीति से अनजान मुझ जैसे को सही लगता है. पर मैं और अन्य मतवाली टिप्पणियाँ पढने के लिए उत्सुक हूँ.

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