नेताजी सुभाषचन्द्र बोस ने महान बलिदान देकर देश को स्वतन्त्र कराया

नेताजी के आज 123वें जन्म दिवस पर

-मनमोहन कुमार आर्य

               देश को आजादी दिलानें में अगणित लोगों ने बलिदान दिये हैं। सबके बलिदान महान व नमन करने योग्य हैं। कुछ ऐसे नेता भी होते हैं  जिनका योगदान कम परन्तु प्रचार अधिक होता है। नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ऐसे नेता नहीं थे। उनका बलिदान भी महान था और उन्होंने देश को स्वतन्त्र कराने के लिये जो कार्य किये वह भी महान एवं नमन करने योग्य हैं। उन जैसे चरित्रवान देशभक्त नेता देश के इतिहस में बहुत कम हुए हैं जो प्रचार से महान नहीं बने अपितु अपने श्रेष्ठ कामों व देश के लिये बलिदान की भावना रखने से महान बने हैं। नेताजी सुभाषचन्द्र जी का जन्म 23 जनवरी सन् 1897 को कटक में हुआ था। इनके पिता श्री जानकीनाथ बोस एवं माता श्रीमती प्रभावती दत्त थी। नेता जी का विवाह आस्टिया मूल की नारी इमिल सेहनकी जी से 1934 में हुआ था। इन्होंने नवम्बर, 1942 में जर्मनी में एक पुत्री को जन्म दिया था जिसका नाम अनीता बोस है और जो वर्तमान में लगभग 77 की आयु में जर्मनी में ही निवास करती हैं।

               दिनांक 16 अगस्त सन् 1945 में ताइवान में एक वायुयान दुर्घटना में उनकी मृत्यु हुई, ऐसा कहा जाता है परन्तु बहुत से देशभक्तों का अनुमान है कि नेताजी इस वायुयान दुर्घटना में मरे नहीं थे। वह इसके बाद भी जीवित रहे और देश के किसी आश्रम में रहते हुए उच्चस्तरीय आध्यामिक महापुरुष का जीवन व्यतीत करते थे। जिस प्रकार से अरविन्द घोष क्रान्तिकारी होकर आध्यात्म के मार्ग पर चले थे उसी प्रकार से नेताजी भी ताइवान की घटना के बाद भारत में पहुंच कर किसी आश्रम में आध्यात्मिक योग ध्यान एवं समाधि की साधना करते हुए समाज से अपनी वास्तविकता को छिपाते हुए विलीन हो गये। सन् 1945 में उनकी आयु मात्र 48 वर्ष 5 माह की ही थी। देहरादून के राजपुर क्षेत्र में किशनपुर में एक स्थान पर एक महात्मा जी कई कई दिन की समाधि लगाते थे। जब उनकी मृत्यु हुई तो वहां नेताजी के एक मित्र श्री उत्तम चन्द मलहोत्रा भी विद्यमान थे। वह लोगों को बता रहे थे कि यह मृतक ईश्वर का उपासक कोई और नहीं अपितु नेताजी सुभाषचन्द्र बोस थे। हम भी उस दिन उस अवसर पर वहां उपस्थित थे। बाद में उस मृतक शव को हरिद्वार या ऋषिकेश में ले जाकर राजकीय सम्मान के साथ पंचतत्वों में विलीन कर दिया गया था।

               आज 23 जनवरी को नेताजी सुभाषचन्द्र बोस का 123 वां जन्म दिवस है। नेताजी जब तक भारत में रहे वह कांगे्रस के सबसे अधिक, शायद गांधी और नेहरु जी से भी अधिक, लोकप्रिय नेता थे। देश की आजादी के बाद की सरकारों ने उनके देश की आजादी में योगदान के अनुरूप उन्हें सम्मान नहीं दिया। ऐसा अनुभव सभी देश प्रेमी करते हैं। कांग्रेस दल के कुछ बड़े नेताओं के विरोध के कारण, जबकि वह कांग्रेस के अध्यक्ष थे, उन्होंने वीर सावरकर जी की प्रेरणा से विदेश में जाकर देश की आजादी के लिये कार्य करने का निर्णय किया था। जब वह देश से निकले उस समय वह अंग्रेजी द्वारा हाउस अरेस्ट किये हुए थे। वहां से चलकर वह जर्मनी पहुंच गये थे। जर्मनी पहुंच कर वह वहां अंग्रेजों के शत्रु एवं विश्व प्रसिद्ध शासक एडोल्फ हिटलर से मिले थे और उनसे भारत की आजादी में सहयोग करने का प्रस्ताव किया था। उनका नैतिक व आर्थिक समर्थन उनको प्राप्त हुआ था। उन्होंने भारत की आजादी के लिये आजाद हिन्द फौज (आई-एन-ए) का गठन किया था। इसमें जापान का सहयोग भी प्राप्त हुआ था। इस आजाद हिन्द फौज ने अंग्रेजों पर पूर्वी भारत की ओर से आक्रमण कर उनकी सत्ता को चुनौती दी थी। नेताजी के कार्यों में देश के राजनीतिक दल कांग्रेस पार्टी से जो सहयोग व समर्थन मिलना चाहिये था, वह उनको नहीं मिला। आजाद हिन्द फौज ने देश को आजाद कराने के लिये नेताजी के नेतृत्व में जो आन्दोलन, संघर्ष, युद्ध लड़ाई लड़ी, उसने नेताजी सुभाष चन्द्र बोस को भारत का सबसे अधिक लोकप्रिय नेता बना दिया था। आज भी उनकी प्रसिद्धि उनके समकालीन अनेक बड़े नेताओं से कहीं अधिक हैं। नेताजी देश की प्रबुद्ध जनता के हृदय में विराजमान हैं और उनका सम्मान पूजा करते हैं। हम यह भी अनुमान करते हैं कि यदि देश की आजादी के समय नेताजी राजनीति में सक्रिय होते और किसी प्रकार से नेताजी और सरदार पटेल सहित वीर सावरकर आदि में से किसी एक या तीनों को सामूहिक रूप से देश की सत्ता प्राप्त हुई होती तो भारत आज विश्व का सबसे उन्नत एवं सबसे बलशाली देश बनता। यह हमारे निजी विचार हैं। ऐसा होना सम्भव था क्योंकि इन नेताओं को देश को किस ओर ले जाना है, यह स्पष्ट था और यह लोग कभी भी वोट बैंक की राजनीति न करते जिससे देश में समरसता एवं एक देश, एक विधान एवं सबकों समान रूप से बिना भेदभाव के न्याय प्राप्त होता। ऐसा होने पर ऋषि दयानन्द सरस्वती को उनके देशहित के कार्यों व सर्वहितकारी वैदिक विचारधारा को भी उचित सम्मान प्राप्त हो सकता था। इतिहास में किन्तु परन्तु के लिये कोई स्थान नहीं होता। जो हुआ वह हमारे सामने हैं। आज देश का सौभाग्य है कि नेताजी सुभाष चन्द्र बोस का अनुयायी एवं उनको उचित सम्मान देने वाला प्रधान मन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी देश चला रहा है।

               नेताजी ने अंग्रेजों पर पूर्वी भारत की ओर से जो आक्रमण किया था, उसमें उन्हें सफलता प्राप्त नहीं हुई। इस पर भी वह रूस आदि के सहयोग से अपने काम को जारी रखे हुए थे। ताइवान की घटना के बाद वह लापता हो गये। सरकारी दृष्टि से उनको मृतक मान लिया गया था। देश के उनके भक्त उन्हें जीवित भी मानते रहे हैं। जो भी हो अब वह संसार में नहीं है। अब यदि वह होते तो 122 वर्ष के होते। हमारा अनुमान है कि नेताजी आजादी के बाद देहरादून के राजपुर क्षेत्र में किशनपुर में एक साधारण से निवास स्थान पर रहे थे। लगभग 50 वर्ष पूर्व वहां उनका निधन हुआ था। मृत्यु होने के बाद हम भी उस स्थान पर पहुंचे थे। उन दिनों अध्ययन के साथ हम समाचार पत्र के हाकर का काम भी करते थे। उस क्षेत्र के घरों व कोठियों में हम कई महीनों से समाचारपत्र दिया करते थे। वहां वृद्ध उत्तम चन्द मलहोत्रा आदि लोग, जो नेताजी से जुड़े रहे थे, उस स्थान पर एकत्र हुई जनता को बता रहे थे कि वह मृतक संन्यासी जो कई कई दिन की समाधि लगाता था, वह नेताजी सुभाषचन्द्र बोस जी ही थे। इस स्थान पर रहते हुए वह किसी से मिलते नहीं थे। भोजन कराने वाला व्यक्ति भोजन बना कर रख जाता था और कुछ घंटों बाद बर्तन उठा कर ले जाता था। जहां उनका निवास था उसके साथ ही जंगल व झाडियां थी। जो कभी किसी सम्भावित पुलिस कार्यवाही होने पर भागने व छुपने में सहायक थी। इस प्रकार की बातें हमें स्मरण हो रही हैं जो मलहोत्रा जी वहां कह रहे थे। बाद में हमने सुना था कि प्रशासन ने उन्हें ऋषिकेश या हरिद्वार ले जाकर पुलिस की बन्दूकों से सलामी देते हुए अन्त्येष्टि संस्कार कराया था। यह सब बातें हमारे निजी अनुभव की हैं। सत्य क्या था यह कहना सम्भव नहीं है परन्तु अनुमान तो यही था कि वह व्यक्ति नेताजी हो सकते थे।

               नेता जी सन् 1920 से 1930 के बीच भारत राष्ट्रीय कांग्रेस की युवा शाखा के नेता थे। वह सन् 1938 में कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने थे तथा सन् 1939 तक कांगे्रस के अध्यक्ष रहे। गांधी जी से मतभेतों के कारण उन्होंने सन् 1939 में कांग्रेस छोड़ दी थी। इसके बाद अंग्रेजों ने उनको घर पर नजरबन्द किया था जहां से वह सन् 1940 के अंग्रेजी अधिकार वाले भारत को छोड़कर विदेश चले गये थे और कुछ समय बाद जर्मनी पहुंच गये थे। नेताजी अप्रैल सन् 1941 में जर्मनी पहुंचे थे। वहां के नेताओं की ओर से भारत की आजादी के लिये उनको अप्रत्याशित सहानुभूति, समर्थन व सहयोग प्राप्त हुआ था। नवम्बर, 1941 में जर्मनी से प्राप्त आर्थिक सहायता से उन्होंने बर्लिन में आजाद भारत केन्द्र की स्थापना की थी। इसके साथ ही वहां आजाद भारत रेडियो भी स्थापित किया गया था जहां रात्रि समय में नेताजी का सम्बोधन प्रसारित हुआ करता था। जर्मनी में रहते हुए नेताजी को भारत की आजादी के लिये कार्य करने के लिये अनेक प्रकार से सहयोग मिला।

               आजाद हिन्द फौज के गठन में नेताजी को जापान का सहयोग प्राप्त हुआ था। नेताजी ने जापान के सहयोग से जापान के उपनिवेश अण्डमान एवं निकोबार में भारत की आजाद सरकार भी बनाई व चलाई थी। यह कोई कम बड़ी उपलब्धी नहीं थी। नेताजी देश के बहुप्रतिभासम्पन्न एवं करिश्माई व्यक्तित्व वाले नेता थे। नेताजी ने ही देश को ‘‘जयहिन्द तथा ‘‘तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूंगा का नारा वा स्लोगन दिया था जो आजादी के आन्दोलन में बहुत लोकप्रिय हुआ। आज नेताजी के 123 वें जन्मदिवस पर हम उन्हें अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। नेताजी अमर हैं और सदा अमर रहेंगे। ओ३म् शम्। 

मनमोहन कुमार आर्य

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