अपनेपन की छाप दिखती नई शिक्षा नीति में

   कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी। सदियों रहा है दुश्मन दौर ए जमाना हमारा।।मशहूर शायर इकबाल की ये पंक्तियां भारतीय परिवेश और हमारे गौरवशाली इतिहास पर एक दम सटीक बैठती है। यूं तो हमारी पुरातन संस्कृति को खण्ड-खण्ड करने की औछी राजनीति सदियों से ही चली आ रही है। फिर बात चाहे मुगलों की हो या फिर अंग्रेजों की ही क्यों न हो, लेकिन न तो कोई हमारी सांस्कृतिक विरासत को मिटा सका और न ही हमारी परम्पराओं को बदल सका है। वसुधैव कुटुम्बकम की भावना सदियों से हमारी रगों में बहती रही है। ये हमारे संस्कार ही है कि हमने दुनिया को बाजार की नजरों से नहीं बल्कि हमारे अपने परिवार की तरह ही देखा है। भारतीय शिक्षा प्रणाली ने ही चरक, सुश्रुत, आर्यभट्ट, भास्कराचार्य, चाणक्य, पतंजलि और पाणनी जैसे कई विद्वानों को पैदा किया है। जिन्होंने गणित, खगोल विज्ञान, धातु विज्ञान, चिकित्सा विज्ञान,सर्जरी और सिविल इंजीनियरिंग आदि क्षेत्रों में अपनी महती भूमिका निभाई है। उसी का परिणाम है कि वर्तमान समय में आधुनिक विश्व में जिस प्रकार का कोहराम मचा है उसमें भारत की प्राचीन संस्कृति संपदा का सिक्का बोलता है। 
       कहते है कि किसी देश की तरक्की सिर्फ़ उस देश के संसाधनों से नहीं होती है। बल्कि देश की तरक्की में शिक्षा बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है। शिक्षा मानव में सोचने समझने और निर्णय लेने की क्षमता विकसित करती है। हमारे वेदों और उपनिषदों में भी शिक्षा को परिभाषित करते हुए कहा गया है कि, “सा विद्या विमुक्तये।” विद्या वह है जो हमें बुद्धि प्रदान करें। किसी भी देश को बनाने और बिगाड़ने में शिक्षा बहुत अहम होती है। अंग्रेजों ने इस बात को बखूबी समझा। इसीलिए लार्ड मैकाले ने 1934 में भारत के लिए शिक्षा पद्धति बनाई। जिसके बारे में मैकाले ने कहा था कि वह जो शिक्षा पद्धति लागू कर रहे है उसका पाठ्यक्रम देखने में तो हिंदुस्तानी लगेगा लेकिन उनका मस्तिष्क अंग्रेजियत हो जाएगा। मैकाले अंग्रेजी शिक्षा का एक ऐसा जहरीला विष है जिसका जहर अब तक हमारी शिक्षा पद्धति में भरा हुआ है। अंग्रेजों ने भारतीय सामाजिक, आर्थिक परिदृश्य का विश्लेषण करके ही शिक्षा पद्धति बनाई थी। जिससे भारत को गुलाम बनाकर रखा जा सके। आज उसी का परिणाम है कि हमारी शिक्षा प्रणाली रोजगार सर्जन करने में नाकामयाब है। अब तक हम जो शिक्षा प्राप्त कर रहे है वह मात्र रटन्त विद्या पर ही आधारित रही है। 

          एएसईआर की एक रिपोर्ट में कहा गया की हमारे देश में पांचवी कक्षा में पढ़ने वाले 50 प्रतिशत बच्चे दूसरी कक्षा की पुस्तक भी नहीं पढ़ पाते है। रिपोर्ट बताती है कि 72 प्रतिशत बच्चे दूसरी कक्षा के सवाल भी हल नही कर पाते है। वही एम्प्लायमेंट सर्वे के अनुसार 80 फ़ीसदी इंजीनियर किसी नौकरी के योग्य नही है। ऐसे में कैसे मान ले कि छात्रों को डिग्री देने मात्र से ही शिक्षा के उद्देश्यों की प्राप्ति हो रही है। यही वजह है कि हमारी शिक्षा पद्धति हमेशा सवालों के घेरे में रही है। देश की आजादी के बाद से ही शिक्षा व्यवस्था में परिवर्तन का दौर शुरू हो गया था लेकिन ये परिवर्तन हमारी शिक्षा व्यवस्था में कोई खास बदलाव नही कर पाए। यही वजह है कि आज फिर करीब 34 साल के बाद पुनः एक नई शिक्षा नीति को लागू किया गया है। यूँ तो इस शिक्षा नीति में कई क्रांतिकारी परिवर्तन की बात की गई है। जिसकी शुरुआत ही मानव संसाधन विकास मंत्रालय का नाम परिवर्तित कर शिक्षा मंत्रालय कर दिया गया है। वैसे यह सही भी है क्योंकि मानव को किसी संसाधन के रुप में देखना गलत ही है। शिक्षा को रोजगार उन्मुखी बनाने के लिए नई शिक्षा नीति में किताबी ज्ञान के साथ साथ व्यवसायिक शिक्षा कौशल प्रशिक्षण दिए जाने की बात की गई है। साथ ही नई शिक्षा नीति में प्राथमिक स्तर की शिक्षा के लिए मातृभाषा में शिक्षा को बढ़ावा दिया गया है। भारतेंदु हरिश्चंद्र जी ने कहा भी है कि – निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति की मूल। बिन निज भाषा ज्ञान के मिटे न हिय के शूल।।नई शिक्षा नीति में यूं तो कई क्रांतिकारी परिवर्तनों की बात की गई है, लेकिन वास्तविक धरातल पर ये शिक्षा नीति क्या रंग लाएगी ये तो आने वाला वक्त ही बताएगा? हाँ एक बात तो है कि इस शिक्षा नीति को ऐसा तैयार किया गया है जिससे वह मैकाले की परिधि से बाहर आ सकें। देश के विकास में महत्वपूर्ण योगदान निभा सकें।।

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