More
    Homeसाहित्‍यदोहेखुले हैं मन भी कहाँ!

    खुले हैं मन भी कहाँ!

    खुले हैं मन भी कहाँ, गुणे हैं ग्रंथ कहाँ;

    हुआ अनुभव भी कहाँ, हुई अनुभूति कहाँ!

    पकड़े बस पथ हैं रहे, जकड़े कुछ कर्म रहे;

    बाल वत चल वे रहे, चोले में खुश हैं रहे!

    चराचर समझे कहाँ, प्राण को खोए कहाँ;

    ध्यान भी हुआ कहाँ, द्वैत भी गया कहाँ!

    गुरु को हैं जाने कहाँ, ग़ुरूर गया कहाँ;

    बोध है हुआ कहाँ, बुद्धि को तरे कहाँ!

    कर्त्तापन मुक्त कहाँ, भुक्ति है हुई कहाँ;

    मर्म ‘मधु’ समझे कहाँ, हं को सो किए कहाँ!

    ✍? गोपाल बघेल ‘मधु’

    गोपाल बघेल 'मधु'
    गोपाल बघेल 'मधु'
    गोपाल बघेल ‘मधु’ अध्यक्ष अखिल विश्व हिन्दी समिति आध्यात्मिक प्रबंध पीठ मधु प्रकाशन टोरोंटो, ओन्टारियो, कनाडा www.GopalBaghelMadhu.com

    LEAVE A REPLY

    Please enter your comment!
    Please enter your name here

    * Copy This Password *

    * Type Or Paste Password Here *

    11,682 Spam Comments Blocked so far by Spam Free Wordpress

    Captcha verification failed!
    CAPTCHA user score failed. Please contact us!

    Must Read