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    जंगलों में कम होती हाथियों की आबादी

    विश्व हाथी दिवस 12 अगस्त पर विशेष


                         प्रभुनाथ शुक्ल 

    हाथी मनुष्य का बेहद करीबी प्राणी है। भीमकाय हाथी इंसान के मामूली अंकुश के इशारे पर नाचता है। सरकस में रिंग मास्टर हाथी को एक इशारे पर नचाता है। गजराज हमारा पर्यावरण मित्र भी हैं। लेकिन जंगलों की घटती संख्या की वजह से हाथियों पर संकट गहराने लगा है। लेकिन हमारी फिल्में इसमें लाभदायक बन सकती हैं। इंसान और हाथियों के बीच लड़ाई में हर साल सैकड़ों की संख्या में हाथी और इंसान मारे जाते हैं। जंगलों के विनाश की वजह से हाथी इंसानों की बस्ती तक पहुँच रहें हैं।  जिसकी वजह से मानव और हाथियों में संघर्ष बढ़ रहा है। जबकि हिंदू- धर्म में हाथी को भगवान गणेश का स्वरूप मानकर पूजा- अर्चना भी की जाती है। लेकिन कुछ माह पूर्व केरल में एक गर्भवती हथिनी से जिस तरह सलूक हुआ उस घटना ने पूरी इंसानियत को शर्मशार कर दिया।  भारत के साथ पूरी दुनिया में इस घटना की बेहद आलोचना हुई। पर्यावरण हिमायतियों ने इस पर  गहरा विरोध भी जताया था। मीडिया में यह घटना खूब सुर्ख़ियां बनी थीं। लेकिन उस घटना के बाद केरल और राज्य सरकार ने क्या कदम उठाया कुछ पता नहीँ चल पाया। 

    भारत में पशुओं और जंगली जानवरों की सुरक्षा को लेकर बहुत पहले से कानून बना है। लेकिन यह जंगली जानवरों के हत्यारों को न्याय नहीँ दिला पाता है। क्योंकि इसमें पूरा तंत्र काम करता है। जंलगी जानवरों के साथ हाथियों की हत्या कर उसका व्यापार किया जाता है। हाथी दाँत और उसकी दूसरी वस्तुओं का मोटा व्यापार होता है। हम विश्व पर्यावरण दिवस पर पर्यावरण बचाने का दिखावा करते हैं। केरल की घटना के बाद केंद्र सरकार ने पूरे प्रकरण की रिपोर्ट माँगी थीं। घटना की जाँच के लिए एसआईटी गठित की गई थीं। पशुप्रेमी मेनका गाँधी ने इस पर आवाज़ उठाते हुए राहुल गाँधी पर बड़ा हमला बोला था। स्मृति ईरानी के साथ गोरखपुर से सांसद एवं फिल्म अभिनेता रवि किशन ने भी इस पर बयान भी दिया था। जिसके बाद हथिनी की मौत नीतिगत मुद्दा बनने के वजाय राजनीति का हिस्सा बन गई और हाथियों का संरक्षण का मसला गायब हो गया। 

    भारत में जंगली जानवरों के साथ इस तरह की अमानवीय हिंसा की घटनाएँ कोई नई नहीँ हैं। केरल की घटना के पूर्व भी बारूद भरे अनानस को निगलने से हाथियों की मौत हो चुकी हैं। पूरी दुनिया में 12 अगस्त को हाथी दिवस मनाया जाता है। भारत सरकार के वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के अनुसार भारत में इंसान और हाथियों के संघर्ष में हर साल तक़रीबन 100 से अधिक हाथियों और 500 इंसानों की मौत हो जाती है। केंद्रीय पर्यावरण मंत्री प्रकाश जवड़ेकर और राज्यमंत्री बाबुल सुप्रियो ने नई दिल्ली में 10 अगस्त को एक रिपोर्ट जारी करते हुए यह आंकड़ा जारी किया। वन निदेशक, वन्यजीव सौमित्र दासगुप्ता ने बताया कि हाथियों के संरक्षण के लिए कई गतिविधियां शुरू की गई  हैं। देश भर में उन वन इलाकों की पहचान कि जाएगी जहाँ काफी अधिक संख्या में हाथी पाए जाते हैं। इसके अलावा हाथियों के संरक्षण के लिए 30 फीसदी अधिक बजट की अतिरिक्त व्यवस्था की जाएगी। पर्यावरण मंत्री प्रकाश जवड़ेकर ने माना कि इंसान और हाथियों के बीच लड़ाई से हाथियों का संरक्षण बड़ी चुनौती है। जवड़ेकर ने कहा है कि मंत्रालय हाथियों की सुरक्षा और उनके संरक्षण के साथ खान- पान को लेकर विशेष योजना लाई जाएगी।  जंगलों में चारा और पानी की भरपूर व्यवस्था करने का पूरा प्रयास किया जाएगा। सकारात्मक पहल से हाथियों की संख्या बढ़ेगी। 

    भारत में हाथियों की गणना 2017 में अंतिम बार हुई थीं। जिसमें हाथियों की आबादी तकरीब 30 हजार बताई गई थीं। सर्वाधिक संख्या कर्नाटक में दर्ज की गई। जहां इनकी संख्‍या 6000 से अधिक थी। इसके बाद असम में 5719 और केरल में 3054 हाथी मिले थे। झारखण्ड में हाथी राजकीय पशु घोषित है। यहां पर भी हाल के कुछ समय में हाथियों की संख्या में कमी आई है। यहां पर पिछली गणना में जहां हाथियों की संख्या 688 थी, वहां यह अब घटकर 555 रह गई है। हाथियों के संरक्षण के लिए 2017 को विश्व हाथी दिवस के अवसर पर राष्ट्रव्यापी अभियान गज यात्रा की शुरुवात तत्कालीन केंद्रीय पर्यावरण मंत्री डॉ. हर्षवर्धन की थीं। केरल में बारूद भरे अनानस को निगलने के बाद उस बेजुबान की मौत हो गई थी। हथिनी के जबड़े फट गए थे। दांत टूट गए थे। उसके जिस्म में पीड़ा और जलन अधिक थीं। पोस्‍टमॉर्टम रिपोर्ट से पता चला था कि वह गर्भवती भी थी। इंसान प्रकृति पर नियंत्रण चाहता है जबकि वह सामंजस्य। यहीं कारण हैं कि हम प्राकृतिक आपदाओं का सामना कर रहें हैं। कभी बाढ़, सूखा, भूस्खलन, आँधी- तूफ़ान, अम्फन, निसर्ग, भूकम्प, टिड्डी दल और कोरोना जैसी महामारी इंसान को निगल रहीं है। 

    भारतीय वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 के अनुसार, किसी जंगली जानवर के खिलाफ़ किसी भी प्रकार की हिंसा दंडनीय अपराध है। बेजुबान जानवरों को कैद करना, हत्या करना, जहर देना, जाल में फंसाना। उसके शरीर के अंगों को चुराना या शिकार करना अपराध है। 2003 में इस अधिनियम में संशोधन कर इसे और कठोर बनाया गया। लेकिन बेजुबान जंगली जानवरों के खिलाफ़ हिंसा और अपराध की घटनाएं थमने का नाम नहीँ ले रहीं हैं। यह अहिंसा परमो धर्म: के मूलमंत्र के खिलाफ़ है। हमें इंसान और जानवर में फर्क से बचना होगा। केंद्र और राज्य सरकार को वन्यजीवों की रक्षा के लिए और कठोर क़दम उठाने चाहिए। समाज के लोगों को भी जंगली जानवरों के प्रति अपना नज़रिया बदलना होगा। अभियान चला कर समझाना होगा कि जंगल और जानवर हमारे लिए कितने खास हैं। पशु- प्रेमियों और अधिकारवादियों के साथ इस तरह की सामाजिक संस्था चलाने वालों को समाज में जागरूकता फैलानी होगी। 

    प्रभुनाथ शुक्ल
    प्रभुनाथ शुक्ल
    लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं

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