लेखक परिचय

राकेश कुमार आर्य

राकेश कुमार आर्य

'उगता भारत' साप्ताहिक अखबार के संपादक; बी.ए.एल.एल.बी. तक की शिक्षा, पेशे से अधिवक्ता राकेश जी कई वर्षों से देश के विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। अब तक बीस से अधिक पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं। वर्तमान में 'मानवाधिकार दर्पण' पत्रिका के कार्यकारी संपादक व 'अखिल हिन्दू सभा वार्ता' के सह संपादक हैं। सामाजिक रूप से सक्रिय राकेश जी अखिल भारत हिन्दू महासभा के राष्ट्रीय प्रवक्ता व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और अखिल भारतीय मानवाधिकार निगरानी समिति के राष्ट्रीय सलाहकार भी हैं। दादरी, ऊ.प्र. के निवासी हैं।

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राकेश कुमार आर्य

‘कमीशन’ का घुन खा रहा है, राष्ट्र को किंतु हम सब इस व्यवस्था के प्रति अभ्यस्त होने का प्रदर्शन करते हैं, न कि आंदोलित होते हैं, ऐसा क्यों? क्योंकि हमारे नेतागण ‘कमीशन’ का विष हमारी नसों में चढ़ाने में सफल रहे हैं। देखिये-

जब कोई राष्ट्र अपने आदर्शों को भुलाकर उधारे आदर्शों का आश्रय लिया करता है तो ऐसे ही परिणाम हुआ करते हैं। साथ ही जब देश की जनता तटस्थ होकर सारे नाटक को देखती है, तो सत्ताधीश बेलगाम हो ही जाते हैं।

आज राष्ट्र की चिकित्सा नीति की तो समीक्षा होनी ही चाहिए, साथ ही उन राष्ट्रद्रोहियों के संदिग्ध आचरण की जांच भी होनी आवश्यक है-जिन्होंने सेवाभाव को प्रश्रय और प्रोत्साहन देने वाली भारतीय प्राचीन चिकित्सा पद्घति को स्वतंत्रता के उपरांत इस राष्ट्र में पनपने नहीं दिया। कौन से हाथ थे वे जो पर्दे के पीछे से उठे और हमें अपनी प्राचीन गौरवमयी परम्परा से काट गये?

आज वे हाथ बहुत लंबे हो गये हैं-बहुत विस्तार पा गये हैं, केवल अपने राजनैतिक आकाओं के संरक्षण के कारण। इन आकाओं की, इनके संरक्षण और इन दोनों तथ्यों के बीच झूलते ‘कमीशन’ के षडय़ंत्र की भी जांच यदि हुई तो इस देश में लाखों नही अपितु करोड़ों लोगों की बिना चिकित्सा हो रही मौतों के वास्तविक कारण पर से पर्दा सहज ही उठ जाएगा।

तब और अब

चपहले हमारे वैद्य लोग अपने रोगी को उसके रोग की भयंकरता को सदा हल्का अथवा न्यून करके बताया करते थे-आज पैसे बनाने के लिए रोगी के रोग को अधिक बढ़ा-चढ़ाकर बताया जाता है।

चहमारे वैद्य शल्य-चिकित्सा (आप्रेशन) की पहले बहुत उपेक्षा किया करते थे। दुर्लभ परिस्थितियों में ही शल्य चिकित्सा का आश्रय लिया जाता था। जबकि आज रोगी को जितना शीघ्र हो शल्य चिकित्सा पर चढ़ाने के लिए कहने की होड़ सी मच गयी है।

चपहले वैद्य लोग प्राकृतिक चिकित्सा, योगासन आदि से भी रोगी को ठीक करने पर बल दिया करते थे। आज केवल औषधियों से ही ठीक करने पर बल दिया जा रहा है, ऐसा क्यों?

पहले गर्भावस्था काल में हमारी गृहिणियां भरपूर कार्य करने के लिए वैद्यों के द्वारा प्रोत्साहित की जाया करती थीं। आज चिकित्सक उनहें पहले माह से ही अपना रोगी बना लेता है। उन्हें ‘फुल बैड रेस्ट’ का निर्देश दिया जाता है। जिससे चिकित्सक के बल्ले-बल्ले हो जाते हैं। जबकि मजदूर और किसान के घरों में संतानें आज भी बिना ऑप्रेशन के हो रही हैं। किंतु पढ़ी-लिखी लड़कियां चिकित्सकों के द्वारा अपने शिकंजे में कस ली गयी हैं। इसलिए उनमें कइयों में तो संतान पैदा करने के नाम से ही भय उत्पन्न हो रहा है। कौन सा षडय़ंत्र है इस स्थिति के लिए उत्तरदायी?

किसके हाथ लगे हैं भारत के भविष्य को उजाडऩे में कमीशन खोरों ने देश की जो दुर्दशा की है, उसके लिए उन्हें कौन दंडित करेगा? इन यक्ष प्रश्नों के उत्तर अब देश को खोजने चाहिएं।

एक समय था जब देश में वैद्य जीविकोपार्जन हेतु ही दवाई के पैसे लिया करते थे। जबकि आज स्थिति इसके सर्वथा विपरीत है। अब तिजौरियों को पैसों से भरना एक मात्र लक्ष्य है, हमारे चिकित्सकों का। देश में चिकित्सा कितनी सस्ती है? इस बात की जांच के लिए सरकार ने आज तक कोई आयोग नहीं बनाया। कमीशन की कृपा से ऐसा काम सरकार करेगी भी नहीं।

बिजली चोरी और कर्मचारी

बिजली की चोरी होती है-कर्मचारियों की कृपा से! सरकारी प्रयास होते हैं-मीटर लगाने के, जिससे इसे रोका जा सके। किंतु सारे प्रयास निरर्थक हो जाते हैं। कानून बनाये जाते हैं, मानव की दुष्प्रवृत्तियों को सद्प्रवृत्तियों में परिवर्तित करने के लिए। पर एक समय आता है कि कानून की तनी हुई चादर  में से भी छिद्र कर दिये जाते हैं और कानून की ओजोन की परत को तोडक़र मानवीय स्वभाव की पराबैंगनी किरणें सीधे पडक़र मानव को ही तंग व परेशान करती हैं। यह सांप छछूंदर का खेल है, जिसमें कानून व्यक्ति को गलत कार्यों को करने से रोकना चाहता है और व्यक्ति उल्टे कानून के बढ़ते हाथों को (अपनी ओर बढऩे से) रोकना चाहता है।

चालाक और दुष्ट प्रवृत्ति के लोग कानून को ठेंगा दिखाते रहते हैं और कानून सत्पुरूषों का रक्त चूसता रहता है। इस प्रकार चालाक व दुष्ट लोग कानून का रक्त पीकर और कानून सत्पुरूषों का रक्त पीकर जीवित बने रहते हैं। सरकारी पत्रावलियों में कार्य प्रगति की आख्याएं नीचे से ऊपर आती जाती रहती हैं। मंत्री महोदय आंकड़ों को संतोषजनक ढंग से राज्यविधानसभा अथवा देश की संसद में प्रस्तुत कर देते हैं। विपक्ष अपने विशेष पक्ष को प्रस्तुत करने के लिए ‘हो हल्ला’ करके कत्र्तव्य की इतिश्री कर लेता है।

सज्जन पर हो रहा अत्याचार एक षडय़ंत्र के अंतर्गत कहीं भी उद्घाटित नहीं होता। कानून से भले पुरूषों को दण्ड और दुष्टों को छूट मिलती रहती है। सबको नीचे से ऊपर तक सारी स्थिति और परिस्थिति का भली प्रकार ज्ञान होता है, किंतु कोई नहीं बोलता। कानून निन्यानवे निर्दोषों को बलि का बकरा बनाता रहता है और ऊपर से तुर्रा यह कि दोषियों को दोषमुक्त करता रहता है। क्या विधि का सिद्घांत यही है?

(लेखक की पुस्तक ‘वर्तमान भारत में भयानक राजनीतिक षडय़ंत्र : दोषी कौन?’ से)

 

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