शिव शरण त्रिपाठी
आखिरकार राहुल गांधी निर्विरोध कांग्रेस अध्यक्ष चुन लिये गये। वह नेहरू खानदान की वंश परम्परा के छठे राजनीतिक उत्तराधिकारी होगें। वैसे भी वंशवाद में विरोध की परम्परा होती ही नहीं। हालांकि लोकतंत्र के नाम पर जब भी किसी कांग्रेसी ने पं० नेहरू से लेकर राहुल तक विरोध की आवाज बुलंद की या तो उस आवाज की अनसुनी कर दी गई यह फि र उसे पार्टी से ही अलग का रास्ता दिखा दिया गया।
राजनीतिक परिस्थितिवश कांग्रेस नीत गठबंधन सम्प्रग को केन्द्र में १० वर्षो तक सत्ता भले ही मिली हो और भले ही सोनिया गांधी ने अपनी मनमर्जी के मुताबिक सरकार को हंाका हो पर निर्विरोध कांग्रेस अध्यक्ष चुने जाने वाले राहुल गांधी का भविष्य में पार्टी में विरोध होगा या नहीं यह देखना दिलचस्प होगा।
यह देखना भी कम महत्वपूर्ण नहीं होगा कि अब तक राजनीतिक असफ लता के पर्याय सिद्ध हो चुके राहुल गांधी बतौर अध्यक्ष कांग्रेस का कितना कल्याण कर पाते है।
१३२ साला उम्र दराज कांग्रेंस के बतौर ८७वें अध्यक्ष ४७ साला श्री राहुल गांधी चुन लिये गये है। सोमवार को नामाकंन वापस लेने का समय समाप्त होने के बाद केन्द्रीय चुनाव समिति के अध्यक्ष श्री एम. राम चन्द्रन ने श्री गांधी के निर्विरोध अध्यक्ष चुने जाने की घोषणा कर दी। श्री गांधी १६ दिसम्बर यानी जुमे के दिन शुक्रवार को अध्यक्षी का पद ग्रहण करेंगे। नेहरू की खानदानी राजनीतिक विरासत संभालने वाले श्री गांधी छठे सदस्य बन गये है। सबसे पहले १९१९ में पं० मोती लाल नेहरू कांग्रेस के अध्यक्ष बने थे। उसके बाद १९२९ में उनके सुपुत्र पं० जवाहर लाल नेहरू को अध्यक्षी का पद मिला था। १९४७ में देश आजाद होने के बाद १९५१ में पं० नेहरू पुन: अध्यक्ष बनाये गये और सन् १९५४ तक लगातार इस पद को सुशोभित करते रहे।
सन् १९५९ में पं० नेहरू की छांव में उनकी बेटी श्रीमती इन्दिरा गांधी ने अध्यक्ष पद का कार्यभार ग्रहण किया। १९७८ में वह पुन: कांग्रेस अध्यक्ष बनी और मृत्युपर्यंत १९८४ तक इस पद पर निर्विरोध बनी रही।
उनकी मृत्यु के परचात् १९८५ में उनके ज्येष्ठ पुत्र श्री राजीव गांधी उनके उत्तराधिकारी के रूप में कांग्रेस के निर्विरोध अध्यक्ष निर्वाचित हुये और मृत्युपर्यंत  यानी १९९१ तक वह इस पद पर विराजमान रहे।
१९९८ में बेहद रोचक परिस्थितियों में तत्कालीन अध्यक्ष श्री सीताराम केसरी को अपदस्थ कर श्रीमती सोनिया गांधी अध्यक्ष चुनी गई और तब से अब तक वह इस पद पर निर्विरोध विराजमान हैं। वह १६दिसम्बर को अपने सुपुत्र श्री राहुल गांधी को अपने उत्तराधिकारी के रूप में कांग्रेस अध्यक्ष पद का ताज सौपकर पदच्युत होगी ।
राजनीतिक सूत्रों के अनुसार भले ही श्री राहुल गांधी की ताजपोशी निर्विरोध रूप में हो रही है पर उनकी यह ताजपोशी सबसे कठिन राजनीतिक परिस्थितियों में हो रही है। आज की तारीख में कांग्रेस सबसे बुरे दौर से गुजर रही है। उसकी जहां देश के सिर्फ  छ: राज्यों में सत्ता शेष बची है वहीं लोकसभा में उसके सिर्फ  ४६ सांसद रह गये है। राज्यसभा में भी उसका बहुमत क्षीण हो चुका है और वह लगातार क्षरित होने की ओर अग्रसर है। ऐसे में श्री गांधी के लिये कांग्रेस को पुन: खड़ा कर पाना आसान नहीं है। उन्हे नि:संदेह भविष्य में जहां पार्टी में अंतर्विरोधों से जूझना होगा व चुनौतियों से पार पाना होगा वहीं उन्हे अपनी सबसे बड़ी चुनौती बन चुकी भाजपा से निपटना होगा।
सूत्रों ने स्मरण कराया कि यदि पं० जवाहर लाल नेहरू, श्रीमती इन्दिरा गांधी व राजीव गांधी के दौर को छोड़ दिया जाय तो १९९८ में श्रीमती सोनिया गांधी का कांग्रेस अध्यक्ष बनना व अब तक निर्विरोध बने रहना राजनीतिक परिस्थितियों की देन रही है। यदि २००४ में उनकी अध्यक्षी में कांग्रेस की अगुवाई में सम्प्रग की सरकार बनी थी तो यह भी कोई उनकी राजनीतिक क्षमता का परिणाम नहीं था वरन् तत्कालीन भाजपा नीत राजग सरकार की नाकामियों का प्रतिफल था। नि:संदेह २००९ में यदि कांग्रेस नीति सम्प्रग दुबारा सत्ता में लौटी तो यह प्रधानमंत्री डॉ० मनमोहन सिंह की ईमानदारी, कर्मठता व राजग की कमजोर चुनौतियों का परिणाम थी।
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि यदि दो बार सम्प्रग का सत्ता में बने रहना श्रीमती सोनिया गांधी का ही राजनीतिक चमत्कार व राजनीतिक प्रबन्धन होता तो २०१४ के चुनाव में भी वो डॉ० मनमोहन सिंह को आगे कर लड़े गये चुनाव में मुंह की क्यों खा जाती। वो भी इतनी दयनीय पराजय कि कांग्रेस लोकसभा में मुख्य विपक्षीदल का दर्जा तक न हासिल कर सकी।
राजनीतिक सूत्रों का कहना है कि जहां तक श्री राहुल गांधी की राजनीतिक क्षमता, कौशल व निर्णयों का सवाल है तो अब तक वो हर मोर्चेे पर बुरी तरह असफ ल ही रहे हैं। जब बिहार विधान सभा चुनाव में उनकी पहल पर कांग्रेस ने राजद व जदयू के साथ गठबंधन कर चुनाव लड़ा और कांग्रेस को भी सत्ता में भागीदारी मिली तो कांग्रेसियों ने एक स्वर से श्री गांधी की राजनीतिक सूझ-बूझ की इस कदर दाद दी कि मानो श्री गांधी राजनीति में ‘चाणक्यÓ से भी आगे निकल गये हों।
बिहार परिणामों का संदेश साफ  था कि विपक्षी दलों की एकजुटता से वोटों का विभाजन थमा और परस्पर विरोधी दलों जदयू व राजद के वोट एक दूसरे को मिलने से गठबंधन को सत्ता मिलने में आसानी हुई थी।
बिहार के बाद उत्तर प्रदेश के हुये विधान सभा चुनाव में एक बार पुन: सारे निर्णय बतौर उपाध्यक्ष श्री गांधी द्वारा ही लिये गये थे। उनकी पहल पर ही कांग्रेस ने उस सपा से समझौता कर लिया जिसके धुरविरोधी स्वयं राहुल गांधी के साथ वरिष्ठ कांग्रेसी ही रहे हंै।
उधर श्री मुलायम सिंह यादव भी इस गठबंधन के पक्ष में नहीं थे पर जबरिया पार्टी पर कब्जा जमा चुके श्री अखिलेश यादव ने कांग्रेस से समझौता कर चुनाव लड़ा। युवाओं की इस जोड़ी ने जमकर चुनावी धमाल मचाया व ३०० से अधिक सीटे जीतने का बार-बार दावा किया पर जब परिणाम निकले तो सारे दावे हवाहवाई ही साबित हुये और सपा के हाथ से सत्ता तो गई ही कांग्रेस तलहटी पर जा पहुंची।
श्री राहुल गांधी की ताजी राजनीतिक असफ लता उत्तर प्रदेश के निकाय चुनाव में भी सामने आई। इस चुनाव में कांग्रेस को बुरी तरह मुंह की खानी पड़ी। अब पूरे देश की निगाहे उनके नेतृत्व में लड़े जा रहे गुजरात विधान सभा चुनाव पर लगी है। भले ही कांग्रेस गुजरात में अपनी सरकार बनने के दावे कर रही है पर जैसी रपटे आ रही है इस चुनाव में भाजपा की जीत सौ फ ीसदी तय है। यदि ऐसा होता है जो लगभग तय है तो यह श्री गांधी की लगातार तीसरी राजनीतिक असफ लता होगी।
राजनीतिक विश£ेषकों का कहना है कि भले ही गुजरात चुनाव में कांग्रेस की हार के बाद श्री गांधी के नेतृत्व पर सवाल न उठे पर यदि साल डेढ़ साल के भीतर देश के कई राज्यों में होने वाले विधान सभा चुनाव में कांग्रेस न संभल सकी तो श्री राहुल को अपनी अध्यक्षी बचाना आसान नहीं होगा। फि र २०१९ के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की क्या हालत होगी आसानी से कल्पना की जा सकती है।
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मादाम के दिखाये मार्ग पर ही तो चल रहे है सिपहसालार 
नि:संदेह अतीत में यदि कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी ने नरेन्द्र मोदी के विरूद्ध गाली-गलौज की भाषा के प्रयोग की शुरूआत न की होती तो शायद आज उसकी मार पार्टी के प्रमुख पद के ताज पहनने वाले उनके सुपुत्र राहुल गांधी को न ही झेलनी पड़ती।
संयोग देखिये कि २०१७ में जिस गुजरात चुनाव में गुजरात को फ तह करने के लिये राहुल गांधी ऐड़ी चोटी का जोर लगाये पड़े है २००७ में इसी चुनाव को फ तह करने के लिये चुनाव के दौरान कांग्रेस आला कमान श्रीमति सोनिया गांधी ने नरेन्द्र मोदी को ‘मौत का सौदागरÓ बता डाला था। तब नरेन्द्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे और आज जब श्री मोदी देश के प्रधानमंत्री है और कांग्रेस गुजरात चुनाव लड़ रही है तो उन्ही की पार्टी के वरिष्ठ नेता मणिशंकर अय्यर ने उन्हे ‘नीचÓ बता डाला।
श्री मोदी के मुकाबले में बढ़त हासिल करने में हर चाल चलने वाले श्री गांधी ने नुकसान की भरपाई के मद्देनजर श्री अय्यर को तत्काल पार्टी से निलम्बित कर दिया। कदाचित सुपर डैमेज कंट्रोल की पॉलिसी के तहत श्री राहुल ने ट्वीट कर कहा कि कांग्रेस की एक अलग संस्कृति और विरासत है। मैं मणिशंकर अय्यर द्वारा इस्तेमाल की गई भाषा का समर्थन नहीं करता हूँ। अय्यर ने जो कहा उसके लिये      माफ ी मांगेगें।
कोई यह नहीं समझ पा रहा हैँ कि आखिर यही सजा श्रीमति सोनिया गांधी को तब क्यों नहीं दी गई जब उन्होने श्री मोदी को मौत का सौदागर बता दिया था। श्रीमति गाधी को माफ ी मांगने के लिये भी क्यों नहीं बाध्य किया गया था।
श्री राहुल को यह भी स्मरण होगा कि श्री मोदी के लिये ‘नीचÓ शब्द का सबसे पहले प्रयोग उनकी बहन प्रियंका वडेरा ने २०१४ के लोकसभा चुनाव में रायबरेली की एक चुनावी सभा में किया था। तब भी उन्हे न तो दण्डित किया गया था और न ही उन्होने माफ ी ही मांगी थी। चलिये श्रीमती सोनिया गांधी व श्रीमती प्रियंका वडेरा उनकी माता व भगिनी थी इसलिये न तो उन्हे माफ ी मांगने को कहे सके और दण्डित करने का तो सवाल ही कहां उठता है।
मां-बेटी के बाद तो श्री मोदी को अपमानित करने की वरिष्ठ कांग्रेसियों ने झड़ी सी लगा दी। किसी ने उन्हे रावण, किसी ने उन्हे भष्मासुर, किसी ने यमराज, किसी ने गंगू तेली, किसी ने चाय वाला और किसी ने गुंडा तक की संज्ञा दे डाली।
श्री गांधी क्या बता सकते हंै कि इन सिपहसालारों ने किस संस्कृति के तहत श्री मोदी के खिलाफ  अपशब्दों का प्रयोग किया था। मां-बहिन की छोडि़ए क्या श्री गांधी ने अय्यर की तरह इन सबको भी दण्डित करने का प्रयास किया था। दण्डित न भी सही क्या उन्हे माफ ी मांगने को विवश किया गया था।
बेहतर होता श्री गांधी ऐसी गंदी भाषा बोलने वालों की ओर से क्षमा मांगते और हिदायत देते कि आइंदा कांग्रेसजन राजनीति में श्री मोदी तो क्या किसी भी विरोधी के लिये अपशब्दों का प्रयोग नहीं करेंगे।
खैर देखना है कि भविष्य में कांग्रेसी उनकी हिदायतों का किस हद तक पालन करते है और कांग्रेसी राहुल अनुमोदित संस्कृति का किस हद तक अनुशरण।
मादाम के दिखाये मार्ग पर ही तो चल रहे है सिपहसालार

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