लेखक परिचय

शैलेन्द्र चौहान

शैलेन्द्र चौहान

कविता, कहानी, आलोचना के साथ पत्रकारिता भी। तीन कविता संग्रह ; 'नौ रुपये बीस पैसे के लिए'(1983), श्वेतपत्र (2002) एवं, 'ईश्वर की चौखट पर '(2004) में प्रकाशित। एक कहानी संग्रह; नहीं यह कोई कहानी नहीं (1996) तथा एक संस्मरणात्मक उपन्यास पाँव जमीन पर (2010) में प्रकाशित। धरती' नामक अनियतकालिक पत्रिका का संपादन। मूलतः इंजीनियर। फिलहाल जयपुर में स्थायी निवास एवं स्वतंत्र पत्रकार।

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शैलेंद्र चौहान
“अच्छे दिन आने वाले हैं” का सपना महंगाई, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार से जूझ रही जनता को बहुत विश्वास के साथ दिखाया गया था. आम आदमी की उम्मीदें थीं कि महंगाई से राहत मिलेगी लेकिन बात अब सिर्फ और सिर्फ विदेशी निवेश की हो रही है. निवेश कोई चैरिटी तो है नहीं वह तो एक बड़े मुनाफे के लिए होता है. सरकार सभी तरह की सुविधाएँ मुहैया कराये और टैक्स में छूट दे. यह सही है कि तकनोलॉजी के विशेष क्षेत्रों में निवेश चाहिए और आधारभूत ढांचे के विकास के लिए भी निवेश निवेश जरुरी है पर कितना निवेश वास्तव में आवश्यक है यह जानना भी जरुरी है. अंधाधुंध निवेश, आत्मनिर्भरता को समाप्त कर परनिर्भरता की ओर धकेलता है. एक बड़े कर्जे के तले दबना एक घातक परिणाम का भी द्योतक होता है. यह देश की आवश्यकताओं के लिए नहीं बल्कि भारत के बड़े पूंजीपतियों और विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के फायदे के लिए के लिए है. हमारा अपना आर्थिक ढांचा मजबूत करने की बजाय उसे खोखला करना बेहद खतरनाक है. निरंतर गति से बढ़ती महंगाई और शोषण के बीच चोली-दामन का संबंध है. सरकार ने बाजार की ताकतों को इतना प्रश्रय और समर्थन प्रदान कर दिया है कि घरेलू बाजार व्यवस्था नियंत्रण से बाहर होकर बेकाबू हो चुकी है. महंगाई वास्तव में ताकतवर अमीरों द्वारा गरीबों को लूटने का एक अस्त्र है. सटोरिए, दलाल और बिचौलिए इसमें सबसे अहम किरदार हो गए हैं. गत वर्षों के दौरान देश का किसान और अधिक गरीब हुआ fdiहै जबकि उसके द्वारा उत्पादित खाद्य पदार्थों के दामों में भारी इजाफा दर्ज किया गया. यह समूचा मुनाफा अमीरों की जेबों में चला गया। देश के अमीरों की अमीरी ने अद्भुत तेजी के साथ कुलांचें भरीं. दूसरी ओर साधारण किसानों में गरीबी का आलम है. आम आदमी की रोटी-दाल किसानों ने नहीं, वरन बड़ी तिजोरियों के मालिकों ने दूभर कर दी है. वस्तुतः समस्त देश में आर्थिक-सामाजिक हालात में सुधार का नाम ही वास्तविक विकास है. एक वर्ग के अमीर बनते चले जाने और किसान-मजदूरों के दरिद्र बनते जाने का नाम विकास नहीं बल्कि देश का विनाश है. अपना खून-पसीना एक करके उत्पादन करने वाले किसानों की कमर कर्ज से झुक चुकी है. रिटेल बाजार में खाद्य पदार्थों के दाम चाहे कुछ भी क्यों न बढ़ जाएँ, किसान को इसका फायदा कदाचित नहीं पहुंचता. इतना ही नहीं, धीरे-धीरे उनके हाथ से उनकी जमीन भी छिनती जा रही है. हिन्दुस्तान के आजाद होने के बाद कृषि और कृषक संबंधी ब्रिटिश राज की रीति-नीति में कोई बुनियादी बदलाव नहीं आया. आज भी लगभग वही कानून चल रहे हैं जो अंग्रेजों के शासनकाल में चल रहे थे. देश का 80 करोड़ किसान शासकीय नीति से बाकायदा उपेक्षित है। सबसिडी कम करना या समाप्त करना मौलिक सोच नहीं है. यह अंतर्राष्ट्रीय साजिश का हिस्सा है. विकसित देशों में खेती और निम्न आय वाले व्यक्तियों के लिये अनेकों प्रावधान हैं. वर्तमान राजनैतिक समीकरण ने संभवत: शासक वर्ग को कुछ अधिक ही आश्वस्त कर दिया है कि आम आदमी के रोष से निकट भविष्य में उसकी सत्ता को कोई खतरा नहीं है.
गत वर्ष चुनाव के पहले नरेन्द्र मोदी ने खाद्य सुरक्षा अध्यादेश पर तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को चिट्ठी लिखी था. इस चिट्ठी में मोदी ने दुख जताया था कि “खाद्य सुरक्षा का अध्यादेश एक आदमी को दो जून की रोटी भी नहीं देता.” खाद्य-सुरक्षा के मामले पर लोकसभा में 27 अगस्त 2013 को बहस हुई तो उसमें भी ऐसे ही उद्‌गार सामने आए. तब भारतीय जनता पार्टी के कई नेताओं ने इसको ऊँट के मुंह में ज़ीरा डालने की कसरत के माफिक कहा था. अब इन बातों के भुला दिए जाने की एक वजह है इनका सामाजिक नीति विषयक उस गल्प-कथा से मेल न खाना जिसे भारत के इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने गढ़ा था. भारत में कानून व्यवस्था की स्थिति बेहद खराब है, यहाँ बिना किसी प्रशासनिक और आर्थिक ढांचे में सुधार तथा बिना जवाबदेही के कानून लागू किये जाते है. ऐसे में यह सवाल कि व्यवस्था में वह बदलाव क्यों नहीं आ रहा है, जिससे लोगों की जिन्दगी और जीवन स्तर में असल बदलाव हो सके. पुलिसिया तंत्र में बदलाव और उनकी अच्छी आर्थिक स्थिति होने पर ही उनकी गुणवत्ता और कार्यशैली सुधर सकती है. उन्हें अच्छी सुविधाएं भी मिलनी चाहिये और आधुनिक उपकरण भी. यह राज्यों का विषय हो सकता है पर नीति निर्धारण और समयानुकूल आर्थिक ढांचा केन्द्र सरकर की ही जिम्मेदारी है. बजट में इसके आर्थिक पक्ष को लेकर महत्वपूर्ण प्रावधान आवश्यक है. इससे ही आम आदमी के जीवन में बेहतरी संभव है. मात्र रेवड़ियां बांट कर भारत की छवि नहीं चमक सकती. साथ ही लोक कल्याणकारी योजनाओं को अधिक सशक्त व युक्तिपूर्ण बनाने की अवश्यकता है. बीमा विधेयक और भूमि अधिग्रहण विधेयक इसके प्रत्यक्ष उदहारण हैं. राज्यसत्ता के रूप में भारत, राजनेताओं की “नानी-दादी का घर” बनता जा रहा है जो सभी पार्टियों के लिये सच है. इस वक़्त कॉँग्रेस सबसे खराब स्थिति में है. चुनावों के पहले बीजेपी नेताओं ने यह जमकर प्रचारित किया कि सामाजिक मद में कांग्रेस सरकार दोनों हाथ खोलकर धन लुटा रही है जो ज्यादा दिन नहीं चलने वाला, सामाजिक मद में होने वाला ख़र्च ज्यादातर बर्बाद जाता है – यह एक “भीख” की तरह है और भ्रष्टाचार तथा प्रशासनिक निकम्मेपन की वजह से ग़रीब तबक़े को हासिल नहीं होता. इस भारी-भरकम फिजूलख़र्ची के पीछे उन पुरातनपंथी नेहरूवादी समाजवादियों का हाथ है जिन्होंने यूपीए शासनकाल में देश को ग़लत राह पर धकेल दिया. मतदाताओं ने इस रवैए को स्वीकार कर लिया कि लोग विकास (ग्रोथ) चाहते हैं, अधिकार नहीं. और, भ्रांति यह कि भाजपा नेतृत्व वाली सरकार ने इन बेबकूफियों को दुरुस्त करने और लोक-कल्याणकारी राज्य के आभासी कारोबार को समेटने का मन बना लिया है. ये दावे बार-बार दोहराए जाने के कारण सच से जान पड़ते हैं लेकिन वे असल में निराधार हैं. इन दावों की एक-एक बात की जाँच की जाये तो लब्बोलुबाब यह कि- कहना कि भारत में सामाजिक मद में किया जाने वाला ख़र्चा बहुत ज़्यादा है तथ्यों से परे तो है ही हास्यास्पद भी है. यह गल्प-पुराण कई भ्रांतियों को समेटकर बना है. वर्ल्ड डेवलपमेंट इंडिकेटर्स (डब्ल्यूडीआई) के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, “सबसे कम विकसित देशों” के 6.4 प्रतिशत की तुलना में भारत में स्वास्थ्य और शिक्षा के मद में सरकारी ख़र्चा जीडीपी का महज़ 4.7 प्रतिशत, उप-सहारीय अफ्रीकी देशों में 7 प्रतिशत, पूर्वी एशिया के देशों में 7.2 प्रतिशत तथा आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन (ओईसीसीडी) के देशों में 13.3 प्रतिशत है. एशिया डेवलपमेंट बैंक की एशिया में सामाजिक-सुरक्षा पर केंद्रित एक रिपोर्ट के अनुसार भारत इस मामले में अभी भी बहुत पीछे है. रिपोर्ट के अनुसार भारत में सामाजिक सहायता के मद में जीडीपी का महज 1.7 फीसद हिस्सा ख़र्च होता है, जबकि एशिया के निम्न आय-वर्ग की श्रेणी में आने वाले देशों में यह आंकड़ा 3.4 प्रतिशत, चीन में 5.4 प्रतिशत और एशिया के उच्च आय-वर्ग वाले देशों में 10.2 प्रतिशत है. ‘सामाजिक मद में होनेवाला ख़र्च बर्बाद जाता है,’ इस विचार का भी कोई वस्तुगत आधार नहीं हैं. आर्थिक विकास के लिए लोगों के जीवन में बेहतरी और शिक्षा को जन-जन तक पहुंचाने की क्या अहमियत है ये आर्थिक शोधों में साबित हो चुका है. केरल से लेकर बांग्लादेश तक, सरकार ने जहां भी स्वास्थ्य के मद में हल्का सा ज़ोर लगाया है वहां मृत्यु-दर और जनन-दर में कमी आई है. भारत के मिड डे मील कार्यक्रम के बारे में दस्तावेजी साक्ष्य हैं कि इससे स्कूलों में बच्चों की उपस्थिति, उनके पोषण और तथा पढ़ाई-लिखाई की क्षमता पर सकारात्मक प्रभाव हुआ है. मात्रा में बहुत कम ही सही लेकिन सामाजिक सुरक्षा के मद में दिया जाने वाली पेंशन लाखों विधवाओं, बुज़ुर्गों और देह से लाचार लोगों की कठिन जिंदगी में मददगार साबित होती है. ग़रीब परिवारों के लिए सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) आर्थिक सुरक्षा का एक महत्वपूर्ण ज़रिया बन चला है. बिहार और झारखंड जैसे राज्यों जहां पीडीएस बड़ा खस्ताहाल हुआ करता था वहां भी इसका लाभ हुआ है. यह बात ठीक है कि सामाजिक सुरक्षा के मद में होने वाले ख़र्च में कुछ अपव्यय होता है जाहिरा तौर पर यह प्रशासनिक- राजनीतिक भ्रष्ट दर्शन है. लेकिन इन दोनों ही मामलों में समाधान पूरी व्यवस्था को खत्म करने में नहीं बल्कि उसे सुधारने में है, और ऐसा किया जा सकता है.

14 Responses to “निवेश की भ्रामक अवधारणा”

  1. Himwant

    1) दीनदयाल जी का चिंतन आधार है। उस विचार परम्परा के प्रयोग (application) एवं उसके आधार पर अनुभवजनित सिद्धांतो को लिपिबद्ध करने का संस्थागत प्रयास होना चाहिए। दीनदयाल रिसर्च इंस्टीट्यूट है यह जान कर खुशी हुई। मैं उनसे सम्पर्क करूँगा। मुझे डर है की कहि उनका महान चिंतन सिर्फ महिमामण्डन योग्य न रह जाए।
    2) कोई भी राजनेता जब कुछ करना चाहता है तो कुछ दर्जन लोग उसके पक्ष में तर्क देने लगते है, और कुछ दर्जन उसके विपक्ष में तर्क देने लगते है। इस तर्क-वितर्क के जाल में फंस कर राजनेता कुछ सार्थक नही कर पाता। सफल राजनेता सिर्फ एक धुन में लगे रहते है की मुझे देश और जनता को वह देना है जिसके लिए उन्होंने मुझे यहां बिठाया है। और नरेंद्र मोदी में यह धुन पक्की दिखती है।
    3) भारत के जीवन पद्धति और कार्यशैली में से इनोवेटीभनेस समाप्त हो गया है। हम तकनीकी विकास में पीछे रह गए। गांधी और स्वदेशी चिंतन से हम विश्व और हमारे बीच के गैप को नही पाट सकते है। पेट्रोलियम, ऊर्जा, डायमण्ड, खनिज, कृषि, प्रेशियस मेटल, इलेक्ट्रॉनिक्स, सेंसर एंड कण्ट्रोल डिवाइस आदि ऐसे कई क्षेत्र हो सकते है जिस में हमारी प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता के आधार पर बड़े शोध और इनोवेशन के प्रतिष्ठान खड़े होने चाहिए।

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    • डॉ. मधुसूदन

      डॉ. मधुसूदन

      हिमवंत जी-धन्यवाद।
      सही दिशा है आप की। दीन दयाल जी का चिन्तन १९५० के दशक का है। वे जीवित रहते तो और भी दिशाएं देकर जाते। काम अधूरा पडा है। पर चिन्तन को आज के परिवेश में भी अद्यतन होना होगा।

      (१) उस समय रूस और अमरिका ये विश्वशक्तियाँ थी। हम तीसरे (थर्ड वर्ल्ड)वर्ग में थे।(२) पेट्रोल की अंतर्राष्ट्रीय कीमते कूटनैतिक पैंतरें से मुक्त थीं। (३) भारत की वैश्विक पहचान एक अल्प विकसित देश की थी।

      इत्यादि और भी पहलु होंगे।
      –पर उसी समय विद्वान डॉ. वॉल्टर ऍन्डरसन ने दीनदयाल जी के एकात्म मानव दर्शन की पहुंच पहचान कर, उस पर स्वयं अध्ययन कर, और पी.एच.डी. के शोध विषय पर (?) छात्र तैयार किए। अमरिका में दीनदयाल जी के प्रवास में सुविधाएँ भी उपलब्ध करायी। {अप्रत्यक्ष जानकारी है मेरी)
      ———————————————————————-
      (४) आज भारत को गत डेढ वर्ष में ही प्रचण्ड विकास क्षमता की पहचान मिल रही है। संसार के सारे देश भारत की गुरूता स्वीकार कर रहे हैं। मोदी जी का, परदेशों का प्रवास हमें सर्वाधिक लाभ दे रहा है।
      (५)पर, आज (डिफेंस)भी, हम, सीमा रक्षा में मात्र स्वदेशी से टिक भी नहीं सकते।
      (६) हम क्या, अमरिका सहित अन्य कोई भी देश बिना आयात टिक नहीं सकता।
      (७) जब कोई भी देश और भारत भी, बिना आयात टिक नहीं सकता। तो हमें निर्यात भी करनी ही होंगी। यह निर्यात आप केवल कच्चे माल की माँग (कृषि की) पर निर्भर हो कर नहीं रह सकते। इसी लिए निवेश चाहिए। स्वदेशी या परदेशी।
      ————————————————————————————————-
      कृषि में हमे आत्मनिर्भर अवश्य होना चाहिए। पर उद्योग लगाए जाएँ। शुद्ध जल भी अगले एकाध दशक में *अति अति गम्भीर* समस्या से ग्रस्त होगा। आज भी जलाभाव के कारण हमारी जनता भयंकर रोगग्रस्त हो रही है।जल में हम बिलकुल निम्नतम (१२०/१२२) क्रम पर है। क्या हम जल समस्या को सुलझाए बिना ही आगे बढ जाएंगे?
      अगली पीढियों के लिए भी जल समस्या को सुलझाना होगा।
      —विचार पत्थर पर की लकीर नहीं है।
      धन्यवाद।

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  2. डॉ. मधुसूदन

    डॉ. मधुसूदन

    (१) स्वदेशी जागरण मंच, (२) भारतीय मज़दूर संघ, (३) भारतीय किसान संघ, (४) डॉ. महेशचंद्र शर्मा जिनकी पी.एच. डी का शोध प्रबंध था, *दीनदयाल उपाध्याय जी के कर्तृत्व एवं विचार* (५)और अन्य ७ चिन्तक लेखकोने एकात्ममानव दर्शन का पूरा विश्लेषण किया है, उनको पूछा जाए।—-ये लोग क्यों कुछ नहीं कहते? संघ का इस विषय पर क्या कहना है?
    डॉ. महेश चंन्द्र शर्मा से पूछो। गोविंदाचार्य से पूछो। दीनदयाल रिसर्च इन्स्टीट्यूट को क्या इस विषय पर मौन रहना है?
    पता करो, ये लोग मौन क्यों है?
    और एक कहानी लेखक और कवि से मैं विशेष अपेक्षा नहीं रखता। इस लेखक का मैं अवश्य सम्मान करता हूँ।

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    • आर. सिंह

      आर.सिंह

      डाक्टर साहब अन्य लोग क्यों मौन है,यह तो मैं नहीं बता सकता पर कम से कम गोविंदचर्य तो नहीं मौन हैं पंडित दीन दयाल उपाध्याय की एक अन्य पुस्तक भी विचारणीय है,”भारतीय अर्थ नीति: एक दिशा निर्देश”. पंडित जी यह पुस्तक एकात्म मानववाद के पहले लिखी थी.

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      • डॉ. मधुसूदन

        डॉ. मधुसूदन

        सिंह साहब–(१)आज युग बदला है। देश, काल, परिस्थिति के अनुसार चिन्तन भी बदलना चाहिए। (२) परम आदरणीय दीनदयाल जी भी आज के संगणक युगमें जैसे के वैसे स्वीकार करने में मुझे आपत्ति है। वैसे एकात्म मानव दर्शन का आधार अवश्य सही है। उसका *आर्थिक अनुप्रयोग* (ऍप्लिकेशन) सूक्ष्मताओ सहित किसी ने विश्लेषित किया नहीं है। (३) आज अतीव शीघ्रता का युग है। जनता शीघ्र हल चाहती है। (४) दत्तोपंत जी का Third Way भी प्रश्न उठाता है, उत्तर नहीं देता। —-मोदी को जनता समय नहीं देगी। (५) Make in India सही है। निवेश के साथ Know how भी आयेगा। (६) निवेश से रोजगार मिलेगा। (कोई भी हल १००% दोषरहित नहीं होता।)
        ———————————————————————-
        ७) भारत में ईमानदारी से काम करनेवालों की संख्या भी कम है। (८) पेय जल और सिंचाई और सहायक (इन्फ्रा स्ट्रक्चर, चाहिए। बेरोजगारी खत्म होनी चाहिए। (९)जब से निवेशक निर्माण प्रारंभ करता है; तभी से श्रमिक-अभियंता-प्रबंधक-और सहायक व्यावसायिक रोजगार पाते हैं।(१०) मैं सिंगूर गया था। और साणंद में समृद्धि की जानकारी है। अहमदाबाद में २४ घण्टे पानी मिलता है। चौडे चौडे मार्ग देख आइए। कभी जाइए। आप बदल जाएँगे।
        कभी आलेख बनाना चाहूंगा। सोचिए।
        (११) *मितव्ययिता का विचार* जो खर्च ही नहीं करता; वह कितनों को रोजी देगा? इस लिए पुनर्विचार चाहिए।
        ——————————————————————————-
        (१२) मेरा *सबका साथ सबका विनाश भा. १” पढनेका अनुरोध। टिप्पणी भी करें।
        ये सारे विचार पत्थर की लकीर नहीं है।
        धन्यवाद

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        • आर. सिंह

          आर.सिंह

          डाक्टर साहब,सबसे पहले मैं यह कहना चाहूँगा कि इस बार यह सम्पूर्ण आलेख वाला आदेश या अनुरोध मानने से मैं इंकार करता हूँ,क्योंकि यह विषय सतही या किसी सैद्धांतिक बहस की सीमा से परे है.मैं अपनी बात यहाँ बिन्दुवार कह चूका हूँ. और पहले भी विभिन्न टिप्पणियों द्वारा समझा चुंका हूँ.मैंने तो वर्तमान प्रधान मंत्री को उनके शासन ग्रहण के छः महीने के अंदर इन सभी विचारों को उनके उस पोर्टल पर डाल चुंका हूँ,जो जनता से सीधे संवाद के लिए आरम्भ किया गया था.अतः ,आप जो समझिए,पर मैं इस विषय पर मैं आलेख लिखने का कोई औचित्य नहीं समझता,पर साफ़ साफ़ यह कहता हूँ कि वर्तमान नीतियां भारत के सम्पूर्ण विकास में बाधक हैं,चूंकिपहले से नीतिगत कोई बदलाव अभी भी नहीं आया है. और यह पहले भी प्रमाणित हो चूका है.

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        • आर. सिंह

          आर.सिंह

          डाक्टर साहब,मैं यह आलेख पढ़ चूका हूँ.गुस्ताखी माफ़.मैंने इस आलेख को इस योग्य नहीं समझा था कि इस पर टिप्पणी की जा सके.भारत की जल समस्या इसकी अपनी है और भारतीयों को इसका समाधान भी अपने ढूंढना होगा.इसके लिए बहुत से अहम कदम उठाने होंगे.
          १ पहला कदम भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाना होगा,नीचे से ऊपर तक या ऊपर से नीचे तक यानि हर स्तरपर.
          २.गुणवत्ता युक्त बुनियादी यानि प्रारंभिक शिक्षा को सर्व सुलभ बनानी होगी.
          ३.हर स्तर पर प्रदूषण कम करना होगा,मूलतः जल और वायु प्रदूषण.
          ४.कृषि प्रणाली में आमूल परिवर्तन करना होगा.
          ५.बड़े बांध बनाने से परहेज करना होगा.जिन बड़े बांधों की उपयोगिता में संदेह हो,उन्हें तोड़ने की आवश्यकता तो वह भी करना होगा.
          ६.नदियों को जोड़ने का प्रस्ताव आज की हालात देखते हुए सबसे घातक है,उसे भूल जाना होगा.इसके बदले अगर नदियों की सफाई पर जोर दिया जाये,तो ज्यादा अच्छा हो.

          ७ जहाँ भी संभव हो,.जल संग्रह के पुरानी विधियों को भी अपनाना होगा.बहुत से पुराने जल संसाधन या तो उपेक्षित पड़े हुयें या विकास के बोझ से मिट गए है.जो मिट गए हैं,उनको पुनर्जीवित करना तो शायद सम्भव नहीं,पर उपेक्षित पड़े हुओं को जीवन दान देनी होगी.

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          • डॉ. मधुसूदन

            डॉ.मधुसूदन

            सिंह साहब धन्यवाद।
            (1) आप अभियन्ता भी है। अभियन्ता कहते हैं, Think it over and discard –Go to extreme level. Do not discard without thinking.(2) Think from whole to parts. (not reverse)
            (3) पहले स्वीकार हो, कि,– *पेय जल की गम्भीर समस्या*– है।
            (4) फिर स्थूलता से सूक्ष्मता की ओर चिन्तन करेंगे।
            (5)हर विचार का अपना अधिकार है।पहले *हाँ या ना* का पैंतरा त्यज कर सोचना चाहिए।
            (६) साथ साथ संवाद हो। भारत के हितैषी है आप/हम, विवाद नहीं करेंगे।
            (७) कोई भी हल १००% दोषरहित नहीं हुआ करता।
            (८)पेयजल समस्या का समाधान आप छुट्पुट नहीं, राष्ट्रीय स्तरपर कैसे करेंगे?
            आप अच्छासा आलेख डालिए। जिससे चर्चा हो।Think from outside the box,without any person.— “चौखट बाहर से सोचिए।*
            चीनी “थ्री गॉर्ज डॅम” का भी अध्ययन हो।
            आप अच्छासा आलेख डालिए। यह अनुरोध है।

  3. Himwant

    इतने सालो से बिगड़ी चीजे पलक झपकते बिल्कुल ठीक हो जाए ऐसी आशा करना ठीक नही। वो भी तब जब मोदी के पास राजसभा में बहुमत नही है एवं वे विधेयक पास नही करा पा रहे है। मोदी जी ने जिस प्रकार की सक्रियता दिखाई है उसके लिए मैं उन्हें शैलयूट करता हूँ। मेक इन इंडिया के लिए सिर्फ पूंजी का निवेश नही, तकनीकी की भी आवश्यकता है। हम उत्पादन तकनीकी रूप से थोड़ा पीछे रह गए है, तेजी से विकास करने की आवश्यकता है। लेकिन 2-4 वर्ष में बहुत आशा करना ठीक है। मार्ग ठीक है तो मंजिल अवश्य मिलेगी।

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    • आर. सिंह

      आर.सिंह

      मैं कहता हूँ कि मार्ग ही तो ठीक नहीं है.श्री शैलेन्द्र चौहान,डाक्टर राजेश कपूर और मै यही तो बताना चाह रहे हैं.श्री चौहान को लेखक या कवि का लेबल लगा कर या डाक्टर राजेश कपूर को एक पारम्परिक चिकत्सक कह कर भले ही उनके तर्कों को हलके से लेने का प्रयत्न किया जाये,पर मैं एक इंजिनियर पहले हूँ,अन्य कोई भी बाद में.एक इंजिनियर यदि संवेदनशील हो तो वह आंकड़ों के खेल से बहुत आगे बढ़ कर देखनेऔर सोचने की क्षमता रखता है.

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  4. आर. सिंह

    आर.सिंह

    मेरी टिप्पणी में गलती से ९८०००की जगह ९८०००० लिख गया है.कृपया भूल सुधर कर पढ़ें.

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  5. आर. सिंह

    आर.सिंह

    शाबासी के असली हक़दार तो शैलेन्द्र चौहान जी हैं,जिन्होंने ने भ्रष्टतंत्र को आइना दिखाया है,पर डाक्टर राजेश कपूर की टप्पणी को भी नजर अंदाज नहीं किया जा सकता,जिन्होंने आकड़ों से प्रमाणित किया है कि सत्ता का हस्तांतरण तो अवश्य हुआ है,पर बहुत शोर सराबे के बीच भी लूट बदस्तूर जारी है. आलेख और टिप्पणी दोनों में एक ही बात बताने का प्रयत्न किया गया है कि विकास की जो नीतियां अपनाई जा रही हैं ,वे भ्रामक हैं और इससे सर्वांगीण विकास संभव ही नहीं. ये नीतियां अमीर को और अमीर,गरीब को और गरीब बनाने वाली नीतियां हैं.हो सकता है कि विकास दर में वृद्धि दिखे और जी.डी.पी में भी बढ़ोतरी हो,पर इससे यह कैसे पता चलेगा कि सीढ़ी के आखिरी पायदान पर खड़े समूह का विकास हुआ या नहीं.हाल में जापान के साथ हुआ समझौता भी एक ऐसा उदाहरण है,जिसमे सबसे प्रमुख बुलेट ट्रेन दीखता है,जिसके मुंबई से अहमदाबाद तक लाने का खर्च ९८०००० करोड़ आँका गया है,जो योजना समाप्ति तक शायद उससे भी ज्यादा हो जाये.मुझे यह पूछना है कि इसे लाभकारी बनाने के लिए टिकट दर क्या होगा?
    डाक्टर साहब ने अपनी टिप्पणी में कुछ मूलभूत प्रश्न भी उठाये हैं.उसमे प्रमुख है,झारखण्ड में स्वर्ण भंडार.अगर यह आंकड़ा सही है,तो मैं इस निष्कर्ष पर क्यों न पहुँचू कि देश को लूटने और लुटाने के काम में तेजी से बढ़ोतरी आई है.

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  6. डॉ. राजेश कपूर

    Rajesh Kapoor

    सच को काफी प्रभावी ढंग से व इमानदारी से कहने का उत्तम प्रयास है यह लेख। देश को को विकास के नाम पर किस प्रकार बरबाद किया जा रहा है, उसकी कुछ कल्पना इस लेख से उभरती है।
    इस लॆख को और स्पष्ट व सारगर्भित बनाने के लिये कुछ प्रमाण चाहियें, उदहारण चाहियें। लेखक से अनुरोध है कि वे इसपर एक और लेख लिखें तो वह इस लेख का पूरक सिध होगा।
    निःसन्देह लेखक की दूरदृष्टी, भाषा पर पकड़ व विद्वत्ता प्रशंसनीय व अभीनन्दनीय है, साधूवाद।३५

    लेख केसमर्थन में ‘आजादी बचाओ आन्दोलन’ द्वारा भेजे, दो तथ्य प्रेषित हैं:
    झारखण्ड के वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के अनुसार (ग्री पीस नामक पुस्तक) झारखण्ड में सोने का भण्डार 72 मिलियन टन है। अर्थात 720 करोड़ किलाग्राम सोना। भारत की 120 करोड़ आबादी को 6 किलो सोना हर व्यक्ती के भाग में आता है। अर्थात 1,50,00000 से अधिक का सोना एक व्यक्ती का भाग बना।
    पर जानते हैं कि सरकार की कृपा से यह अकूत सम्पदा किसके कब्जे में है? न्यूजीलैण्ड की दो कम्पनियों को इसके खनन का काम दे दिया गया है।

    इसी प्रकार झारखण्ड में कोयले का भण्डार 6900 मिलियन टन है। 3000 रुपये प्रति टन बाजार भाव दर से 6900×3000= 20700000 मिलियन रुपया। इसी के लिये देश व विदेशों की कम्पनियाँ पीछे पड़ी हैं। इनके ठेके भी अनेक भ्रष्ट कम्पनियों को दिये गये हैं। इसप्रकार देश की अपार सम्पदा चन्द कम्पनियों के पास जा रही है और देश का आम अादमी और गरीब होता जा रहा है। किसान आत्महत्या को मजबूर हो रहे हैं र हमें कहा जा रहा है कि अच्छे दिन. रहे हैं।
    इसके इलावा अनगिनत सम्पदा भी विदेशी व देशी कम्पनियों को विकास के नाम पर लुटाई जा रही है।
    हो सकता है कि मोदी जी की नीयत तो सही हो पर शायद सच तो यह है कि मोदी और मोदी की टीम जानती व समझती ही नहीं कि देश को किस दिशा में ले जाना है। वे कार्पोरेशनों व मैगा कम्पनियों के विकास के झूठे व विनाशकारी माडल को ही सही समझ कर उसे लागू कर रहे हैं। पर यह इसके परिणाम यावह होंगे। विश्व के पास विकास का कोई प्रतिमान है नहीं। अतः वे केवल संसाधनों व न प्राप्ती को ही विकास मान कर समाज को निरन्तर विनाश, बरबादी की ओर ले जा रहे हैं। ारत के पास तो अनुभूत विकास प्रतिमान, दर्शन व दिशा है। पर हमारा एतृत्व उससे पूरी तरह कटा हुआ, असम्बद्ध है। यही हमारी दुर्दशा का मूल है।

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