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 के विक्रम राव

वैचारिक आवाजाही निर्मल-प्रवाह जैसी हो तो बौद्धिक विकास ही कहलाएगी। वरना सोच में कोई भी बदलाव अमूमन मौकापरस्ती का पर्याय बन जाता है। आज के कथित प्रगतिवादी इसी दोयम दर्जे में आते हैं। वे सब आत्ममुग्ध होकर भूल जाते हैं कि हर परिवर्तन प्रगति नहीं होता, हालांकि हर प्रगति परिवर्तन होती है। इन प्रगतिवादियों को सोवियत संघ की मृत्यु के बाद स्वयं गुम हो जाना चाहिए था। भारतीय समाज के साथ दशकों तक धोखाधड़ी करने के प्रायश्चित के तौर पर ही सही, जनवाद का चोला पहनने वालों को इतिहास के नेपथ्य में चला जाना चाहिए था। सोवियत लैंड और लेनिन पुरस्कार के रूप में वजीफा पाने वालों ने भारतीय साहित्य जगत में गुटबाजी और लामबंदी को पनपाया। वही बात जो जॉन फास्टर डल्लेस ने अमेरिका में और लेवरेंटी बेरिया ने सोवियत रूस में बेशर्मी और अमानवीय ढंग से बढ़ाई। दोनों का सूत्र था- ‘मेरे साथ हो या तुम मेरे शत्रु हो। तीसरा विकल्प नहीं है।’ बुद्ध का मध्यमार्ग निरर्थक था। इसीलिए प्रगतिशील और जनवादी किसी गिरोह की मानिंद निखालिस अवसरवादिता की पुंजीभूत अभिव्यक्ति बन गए। उनको गंगा से वोल्गा ज्यादा मीठी लगने लगी।

भारतीय मनीषा, साहित्य और लोकमानस से कैसी-कैसी जोर-जबरदस्ती इन कथित प्रगतिवादियों ने पिछली सदी में नहीं की? राष्ट्रीय प्रतीकों, विरासत और इतिहास को जानबूझ कर इतना विकृत कर दिया कि पूरी एक पीढ़ी अस्मिता के संकट से जूझती रही। राष्ट्रपिता का मखौल उड़ा कर उन्हें सामंतों का दलाल कहना या घोर वामपंथी जवाहरलाल नेहरू का कार्टून बना कर अमेरिकी साम्राज्यवाद का श्वान कहना, कोई कैसे बिसरा सकता है? बाबा नागार्जुन ने इन प्रगतिशीलों को चेतावनी भी दी थी कि भारतीय इतिहास और धरोहर से नाता नहीं जोड़ोगे तो देश की धरती से कट जाओगे। इन्हीं नागार्जुन को जब इंदिरा गांधी ने जेल में ठूंस दिया तब भी भारत की कम्युनिस्ट पार्टी और उसका पिछलग्गू लेखक संघ इमरजेंसी के आततायी राज का समर्थन करता रहा। पहली बार इतिहास में लेखकों और कवियों को लेखकों के संगठन ने ही बिकाऊ बना दिया, चंद रूबल्स की खातिर।

पत्रकार-कवि मंगलेश डबराल चर्चा में हैं। वे हमारी श्रमजीवी पत्रकार यूनियन के सदस्य थे। मंगलेश को दोषी करार देना उचित नहीं होगा। उनका मकसद हमेशा शुभ-लाभ पाने वाला रहा। जिससे मुफीद मदद मिली, उसी के हो लिए। वे आॅस्कर वाइल्ड के वैचारिक साथी लगते हैं। वाइल्ड ने कहा था- ‘मैं हर बात का निग्रह कर सकता हूं, सिवाय लालसा के।’ मंगलेश जानते तो होंगे कि वैचारिक दृढ़ता के लिए सैद्धांतिक स्थिरता आवश्यक होती है।

आई बात विष्णु खरे की। उन्होंने पत्र लिखा था टाइम्स आॅफ इंडिया के मालिकों को कि अगर वेतन बोर्ड द्वारा प्रस्तावित तनख्वाह दे दी तो अखबार बंद हो जाएंगे। तब वे लखनऊ में नवभारत टाइम्स के स्थानीय संपादक थे। संपादकीय विभाग के सारे पत्रकारों ने लिखित ज्ञापन देकर उनका विरोध किया था। मुझसे तो विष्णु खरे खार खाते थे, क्योंकि मेरे नाम से प्रबंधन को सांप सूंघ जाता था। आखिर उनके जैसा विचारवान, प्रगतिवादी मुझ श्रमजीवी का कुसंग क्यों करता? मोटी तनख्वाह मिल रही थी। विष्णु जी त्यागी नहीं हैं, खरे हैं, जिसका एक शब्दकोषीय अर्थ होता है, ‘करारा’ और दूसरा है ‘नकद’।

विद्यानिवास मिश्र संपादक हुए तो उन्हें औकात दिखा दी। तबसे विद्वान, भाषाविद और शैलीविज्ञान के पंडित विद्यानिवास, विष्णु खरे के लिए ‘विद्याविनाश’ हो गए- वे उन्हें इस नाम से पुकार कर खुश हो लेते हैं।

इंटरनेट पर अपने आलोचकों की ‘जहालत की ऊंचाइयां-नीचाइयां’ देखने वाले विष्णु खरे उन कवि और लेखकों से कैसे दूर हैं जो सुविधापसंद खोल में सिमटते जा रहे हैं। क्या विडंबना है कि प्रगतिवादिता का कॉलर लगाए विष्णु खरे उन्हीं प्रगतिवादियों ने बखिया उधेड़नी शुरू की तो तिलमिला गए।

ओम थानवी ने ठीक सुझाया है कि ‘असहिष्णुता की काट के लिए एक उदार और सहिष्णु रवैया असरदार होगा’। इस सोच को कवि राबर्ट ब्राउनिंग की उक्ति के आलोक में परखें। आंग्ल कवि ने कहा था, ‘कुछ लोग आस्था संजोते हैं और उसके प्रतिकूल कुछ भी गंवारा नहीं कर पाते। दूसरे वे लोग हैं जो हर बात को सहते हैं, क्योंकि उनकी कोई भी आस्था नहीं होती।’ मान भी लें कि सहिष्णुता में गुण नहीं होता, मगर असहिष्णुता तो अपराधी वृत्ति है। ये कथित प्रगतिवादी, जनवादी, अंध-मार्क्सवादी असहिष्णु हैं। बेचारे उदय प्रकाश इसी दुर्भावना के शिकार हो गए। गोरखपुरवासी महंत आदित्यनाथ के हाथों के स्पर्शमात्र से वे प्रतिगामी हिंदुवादी करार दे दिए गए। तो फिर स्टालिनवादी रूस के नायकों के करकमलों से सोवियत पुरस्कार पाने वाले भारत के प्रगतिशील लेखक संघ वाले पाक-साफ देशभक्त कैसे कहलाएंगे?

मुझे जानकारी है कि इमरजेंसी में इसी प्रलेस के वरिष्ठ नेताओं ने इंदिरा गांधी की तानाशाही का प्रतिरोध करने वालों के ठिकानों की सूचना नजदीकी थानों में पहुंचाई थी। तब भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव श्रीपाद अमृत डांगे का सभी विचारशील नागरिकों को फतवा था कि लोकनायक जयप्रकाश नारायण की क्रांति को कुचलने के लिए पुलिस की मदद करें। कुछ पुनरावृत्ति थी 1942 की, जब ब्रिटिश साम्राज्यवादी विश्वयुद्ध रातोंरात ‘‘जनयुद्ध’’ बन गया था और नेताजी सुभाषचंद्र बोस हिटलर के कुत्ते कहे गए थे। तिहाड़ जेल में नजरबंद हम लोग तब ज्यादा आजाद थे, बजाय भारतीय आम जन के, जो तानाशाही के बूट तले कराह रहा था और ये बुद्धिजीवी सिंहासन से बंधे थे। मैंने तब हमारे (टाइम्स आॅफ इंडिया) संस्थान की एक पत्रिका के संपादक (कमलेश्वर) से पूछा था कि जनवादी, प्रगतिवादी लोग संघर्ष कर जेल क्यों नहीं जा रहे हैं? पर कमलेश्वर की हमदर्दी सत्तापक्ष के साथ थी। इस निष्ठा का प्रमाण भी मिला, जब उन्हें इंदिरा गांधी ने दूरदर्शन का अतिरिक्त महानिदेशक नामित किया।

उदय प्रकाश के मसले पर फिर गौर कर लें। महंत आदित्यनाथ का सोच और चरित्र न तो प्रछन्न है और न भ्रामक। वे निखालिस हिंदूवादी हैं, जो मानते हैं कि नेपाल-भारत सीमा पर मस्जिदों का निर्माण कर पाकिस्तानी आइएसआइ पूर्वांचल में चीन की मदद कर रहा है। योगी मुसलिम विरोधी हैं, पर भारत-द्रोही नहीं हैं। क्या प्रगतिवादी सीना ठोंक कर कह सकते हैं कि वे हमेशा भारत हितकारी भावना संजोते रहे हैं? तो फिर बेचारी तसलीमा नसरीन पर कट््टरवादियों के हमले पर साजिशभरी खामोशी क्यों बनाए रहे? सलमान रुश्दी के वाणी स्वातंत्र्य के पक्षधर क्यों नहीं बने? देवबंद में कुलपति बस्तानवी सुधार लाना चाहते थे। धार्मिक सहिष्णुता के ये जेहादी इन सुधारवादी के साथ क्यों उठ नहीं खड़े हुए? फतवा आया था कि मुसलिम महिलाओं को ब्यूटी पार्लर नहीं जाना चाहिए। इ-मेल पर तलाक देना वाजिब है। इसका विरोध न करने वाले ये साहित्यकार किस तरह प्रगतिवादी हो गए? पाकिस्तान में अल्पसंख्यक युवतियों का जबरन निकाह हो रहा है। ये प्रगतिवादी साहित्यकार जो भारत के अल्पसंख्यकों के अलमबरदार हैं, उन्होंने क्यों सभा, रैली तो दूर, कोई बयान तक नहीं दिया? अल्पसंख्यक जिस देश में भी हो, क्या रक्षा का पात्र नहीं है?

इस जमीनी सच्चाई को स्वीकारना, दुहराना चाहिए कि भारतीय बहुसंख्यक सहिष्णु हैं। ऐसा न होता तो बजरंग दल का बहुमत संसद में होता। गांधीजी कहते थे, प्रतिरोध की हिम्मत को मजबूत करना चाहिए। यह हिम्मत हृदय से उपजती है। संख्या बल से नहीं। प्रगतिशीलों को हिम्मत जुटानी चाहिए। हो सके तो दिमागी ईमानदारी को भी संवारना चाहिए। (जनसत्ता से साभार)

One Response to “न प्रगति न जनवाद, निपट अवसरवाद / के विक्रम राव”

  1. Jeet Bhargava

    वामपंथी विचार घोर अमानवीयता, दोगलेपन और राष्ट्र विरोध का पर्याय बन गया है.

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