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    Homeसाहित्‍यलेखसंकट ही नहीं, हर्ष भी देकर जा रहा है बीता साल

    संकट ही नहीं, हर्ष भी देकर जा रहा है बीता साल

    ललित गर्ग

    इक्कीसवीं सदी के इक्कीसवें वर्ष को अलविदा कहते हुए नए वर्ष का स्वागत हम इस सोच और संकल्प के साथ करें कि हमें कुछ नया करना है, नया बनना है, नये पदचिह्न स्थापित करने हैं। बीते वर्ष की कोरोना महामारी के अलावा मौसमी आपदाओं, आर्थिक असंतुलन, राजनीतिक उठापटक, बर्फीले तूफान, समुद्री चक्रावात, बाढ़ और जंगलों के राख होने एवं धरती के तापमान के बढ़ने की पीड़ाओं, दर्द एवं प्रकोप पर नजर रखते हुए उन पर नियंत्रण पाने का संकल्प लेना है। हमें यह संकल्प करना और शपथ लेनी है कि आने वाले वर्ष में हम ऐसा कुछ नहीं करेंगे जो हमारे उद्देश्यों, उम्मीदों, उमंगों और आदर्शों पर प्रश्नचिह्न टांग दे। कोरोना महामारी की तीसरी लहर यानी ओमीक्रोन की आहट के बीच हमें नये साल में अपनी जीवनशैली को नया रंग और आकार देना है।
    कोरोना महामारी ने हमारे जीने के तौर-तरीके को अस्तव्यस्त कर दिया है। नववर्ष का स्वागत करते हुए हमारे द्वारा यह कामना करना अस्वाभाविक नहीं थी कि हमारे नष्ट हो गये आदर्श एवं संतुलित जीवन के गौरव को हम फिर से प्राप्त करेंगे और फिर एक बार हमारी जीवन-शैली में पूर्ण भारतीयता का सामंजस्य एवं संतुलन स्थापित होगा। किंतु कोरोना के जटिल दौर के बीतने एवं नये साल की अगवानी पर हालात का जायजा लें, तो हमारे राष्ट्रीय, सामाजिक, पारिवारिक और वैयक्तिक जीवन में जीवन-मूल्य, आर्थिक स्थितियां, व्यापार, रोजगार एवं कार्यक्षमताएं खंड-खंड दृष्टिगोचर होते हैं। कोरोना ने इस दौरान समूची इंसानियत को घुटने के बल बैठने पर मजबूर कर दिया। पूरी दुनिया में अब तक 27 करोड़, 65 लाख से अधिक लोग इससे संक्रमित हो चुके हैं। इनमें से करीब 54 लाख को अपनी जान गंवानी पड़ी। भारत में भी यह आंकड़ा पांच लाख की ओर बढ़ चला है। भारत इस त्रासदी का शिकार होने वाले शीर्ष पांच देशों में गिना जाता है। कोरोना से न केवल लोगों की जान गई, बल्कि बड़ी संख्या में लोग बदहाली के शिकार भी हुए। हालांकि, इस दौरान सुकून की बात यह रही कि केंद्र और राज्य सरकारों ने महामारी से लड़ने में कोई कोताही नहीं बरती। भारत में बने दो टीकों ने लोगों को इस प्राणलेवा आपदा से निपटने का सामर्थ्य प्रदान किया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के संकल्प के कारण 16 जनवरी से अब तक एक अरब, 40 करोड़ से अधिक खुराक दी जा चुकी हैं। यही नहीं, आर्थिक विकास दर वापस लौटाने के लिए भी भगीरथ प्रयास हुए, पर महामारी के घाव को भरने में एवं ओमीक्रोन को परास्त करने में काफी समय लगेगा।
    बीते वर्ष में आर्थिक असंतुलन के कड़वे घूंट पीने को मजबूर होना पड़ा है। इस दौरान भारत में आर्थिक विषमता की खाई और चौड़ी होती चली गई। भारत में देश की कुल आमदनी का 57 फीसदी हिस्सा शीर्ष 10 फीसदी लोगों की जेबों में गया। आधी आबादी के हिस्से में सिर्फ 13 प्रतिशत कमाई आई। गरीबी की रेखा को मिटाने के जो प्रयत्न पूर्व में हुए, वे पुनः विपन्नता की अंधी खोह में समा गए हैं। दुनिया के गरीब मुल्कों को बहुत तेजी से आत्मनिर्भरता की लड़ाई लड़नी होगी। आने वाले साल यकीनी तौर आर्थिक राष्ट्रवाद के होने वालेे हैं।
    अब ओमीक्रोन के खतरे को नजरअंदाज न करते हुए सरकार और समाज, दोनों इससे जूझने के लिए कमर कस चुके हैं, पर परिणाम कब आएंगे, कितने आएंगे, इसकी गारंटी किसी के पास नहीं। अभी तो यह भी अज्ञात है कि ओमीक्रोन कितना घातक साबित होने वाला है। सावधानी एवं सतर्कता बहुत जरूरी है, सरकार हर व्यक्ति के जीवन को उन्नत, निरोगी एवं समृद्ध बनाना चाहती है, लेकिन उन्नति उस दिन अवरुद्ध होनी शुरु हो जाती है जिस दिन हम अपनी कमियों एवं त्रुटियों पर ध्यान देना बन्द कर देते हैं। यह स्थिति आदमी से ऐसे-ऐसे काम करवाती है, जो आगे चलकर उसी के लिए हानिकारक सिद्ध होते हैं। रही-सही कसर पूरी कर देती है हमारी त्रुटिपूर्ण जीवनशैली। असंतुलित जीवन है तो आदमी सकारात्मक चिंतन कर नहीं सकता। विचारणीय बात यह है कि किस उद्देश्य से जीवन जीया जाए? यह प्रश्न हर व्यक्ति के सामने होना चाहिए कि मैं क्यों जी रहा हूं? जीवन के उद्देश्य पर विचार करेंगे तो एक नई सचाई सामने आएगी और जीवन की शैली का प्रश्न भी सामने आएगा।
    संकट कोरोना महामारी का ही नहीं है, और भी संकट बहुत हैं। चीन एवं पाकिस्तान सीमाओं पर अशांति एवं युद्ध की स्थितियों को बनाये हुए हैं। भारत में सिर्फ चीन से आए कोरोना वायरस ने ही हमला नहीं किया, उसकी फौजों ने भी मर्यादा तोड़ने एवं सीमाएं लांघने की कोशिशें की। पिछले साल गलवान में एक लेफ्टिनेंट कर्नल सहित 21 सूरमा शहीद हुए थे। वर्ष 2021 में सीमा पर दोबारा खून तो नहीं बहा, लेकिन अभूतपूर्व एवं संकटपूर्ण तनातनी का सिलसिला जारी रहा। अपना दायरा लांघने की चीन की कोशिश पर क्या अगले साल लगाम लगाई जा सकेगी? यही नहीं, अफगानिस्तान की सत्ता में तालिबान की वापसी भी भारत के लिये एक संकट है। केन्द्र सरकार के मजबूत इरादों के चलते भले ही भारत और पाकिस्तान की तनातनी बडे़ संघर्ष का आकार न ले पाई हो, पर 2021 में सीमा पार से आए हुए गोले और गोलियां अब तक 35 से अधिक जवानों को निगल चुके हैं। इस साल पाकिस्तान से आने वाले ड्रोन भी चिंता का सबब बने। कश्मीर को एक बार फिर अशांत करने एवं वहां आतंकवादी गतिविधियां का बढ़ना चिन्ता का सबब बना है। देश के गृह मंत्रालय और कश्मीर की हुकूमत ने मिलकर लगभग 100 आतंकवादियों को मार गिराया।
    हिंसा, आतंक एवं युद्ध की स्थितियों के बीच भारत ने सांस्कृतिक एवं धार्मिक उत्थान एवं उन्नयन की अपूर्व परिवेश भी निर्मित किया गया, भारत के गौरव को पुनःस्थापित करने की अनूठी पहल हुई है। गत वर्ष अयोध्या में श्रीराम मंदिर के निर्माण की शुरुआत के साथ इसी माह वाराणसी में विश्वनाथ धाम परिसर का लोकार्पण भारत की राजनीतिक सोच को एक नया आयाम एवं दृष्टि देने का विशिष्ट उपक्रम कहा जा सकता है। हमारे देश की धार्मिक-सांस्कृतिक परंपराएँ और आदर्श जीवन-मूल्य समृद्ध एवं सुदृढ़ रहे हैं, लेकिन पूर्व सरकारों ने उनके गौरव को राजनीतिक नजरिया देते हुए धूमिल किया है। लेकिन नये राजनीतिक सोच एवं सत्ता ने भारत को अपने सांस्कृतिक एवं धार्मिक वैभव से दुनिया को आकर्षित किया है, जो बीत वर्ष की सुखद घटना कही जा सकती है। निश्चित रूप से काशी एवं अयोध्या राष्ट्रीयता का प्रतीक बनकर ये सशक्त भारत का आधार बनेगे। इससे न सिर्फ वहां जाने वाले श्रद्धालुओं को काफी सुविधा मिलेगी, बल्कि संकीर्ण दायरों में सिकुड़ते गए एक आस्था और सभ्यता के प्रतीक को भी गरिमा प्राप्त होगी। काशी परिसर के पहले चरण का उद्घाटन प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने भव्य एवं शालीन तरीके से करते हुए प्रत्येक भारत को स्व-आस्था, स्व-संस्कृति एवं स्व-अस्तित्व का अहसास कराया है। भारत का सांस्कृतिक वैभव दुनिया में बेजोड़ रहा है, लेकिन तथाकथित राजनीतिक स्वार्थों एवं संकीर्णताओं के चलते इस वैभव को दुनिया के सामने लाने की बजाय उसे विस्मृत करने की कुचेष्टाएं एवं षड़यंत्र लगातार होते रहे हैं। सुखद स्थिति है कि अब हमारी जागती आंखो से देखे गये स्वप्नों को आकार देने का विश्वास जागा है तो इससे जीवन मूल्यों एवं सांस्कृतिक धरोहरों को सुरक्षित करने एवं नया भारत निर्मित करने का माहौल एवं मंशा देखने को मिल रही है, जो नये वर्ष के लिये शुभ है, नये एवं समृद्ध भारत के अभ्युदय का द्योतक है।
    केन्द्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में महिलाओं के लिए विवाह की कानूनी आयु 18 से 21 वर्ष तक बढ़ाने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। इस नयी व्यवस्था के बनने से नारी जीवन में एक नया उजाला होगा। एक मंजिल, एक दिशा और एक रास्ता, फिर भी स्त्री और पुरुष के जीवन में अनेक असमानताएं रही हैं, समाज की दो शक्तियां आगे-पीछे चल रही थी। इस तरह की विसंगतियों एवं असमानताओं को दूर करने के लिये सोच के दरवाजे पर कई बार दस्तक हुई, लेकिन दरवाजा पहली बार खुला है। बीत वर्ष ने एक अकल्पनीय घाव भी दिया है, 8 दिसंबर को भारत के पहले चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल बिपिन रावत अपनी पत्नी और 12 सहयोगियों के साथ हेलीकॉप्टर दुर्घटना के शिकार हो गए। वह नई जरूरतों के मुताबिक भारतीय सेना को नया रूप-रंग देने की कोशिश कर रहे थे। उनकी दुखद मृत्यु इस महत्वाकांक्षी, लेकिन अनिवार्य आवश्यकता के लिए गहरा आघात है। इन हर्ष एवं विषाद की मिली-जुली स्थितियों के बीच बस, वही संवेदनात्मक क्षण जीवन का सार्थक है जिसे हम पूरी जागरूकता के साथ जीते हैं और वही जागती आंखांे का सच है जिसे पाना हमारा मकसद है। सच और संवेदना की यह संपत्ति ही नए वर्ष में हमारी सफलता को सुनिश्चित कर सकती है।
    प्रेषकः

    ललित गर्ग
    ललित गर्ग
    स्वतंत्र वेब लेखक

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