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    Homeसाहित्‍यव्यंग्यअब कुंआरों का ब्याह भी कराएंगे गुरुजन !

    अब कुंआरों का ब्याह भी कराएंगे गुरुजन !

    सुशील कुमार ‘नवीन’

    गांव में एक रांडे(कुंआरे)  का ब्याह नहीं हो पा रहा था। एक दिन सुबह-सुबह आत्महत्या की सोच रस्सी लेकर वह खेत की ओर निकल पड़ा। रास्ते में रिश्ते में भाभी लगने वाली महिला ने हंसी-ठिठोली के मूड में छेड़ दिया। बोलीं-देवर जी, रस्सी से फांसी खाने का इरादा है क्या। उसने तो मजाक में ही कहा था पर वह तो पहले ही भरा बैठा था। बोला-हां, तुम्हें खानी हो तो तुम भी साथ आ जाओ। भाभी ने फिर ठिठोली की। बोलीं-फांसी खानिये किसी को बताते थोड़े ही है, वो तो चुपचाप लटक जाते हैं। मजाक मत करो। युवक चलते हुए बोला-मजाक नहीं कर रहा, घन्टे बाद गांव के बाहर खेत में आकर देख लेना। मेरी आखरी राम-राम। 

    मामले की गम्भीरता को जान महिला दौड़ी-दौड़ी घर पहुंचीं और पति को सारी बात बताई। महिला के पति ने आस-पड़ोस के लोगों को इकठ्ठा किया और सरपंच के पास जा पहुंचा। सरपंच समेत सभी कुछ ही देर बाद गांव के बाहर खेत मे पहुंच गए। युवक एक पेड़ की डाली पर रस्सी बांध फांसी लेने की पूरी तैयारी में था। सरपंच ने रोका तो फूट पड़ा। बोला- क्या करूं ऐसी जिंदगी का। सब रांडा-रांडा कहकर चिढ़ाते हैं। सरपंच बोले- 15 दिन का समय दो। समझाने पर वह मान गया। 

    अगले दिन गांव में पंचायत हुई। गांव के एक बुजुर्ग ने सलाह दी कि यह जिम्म्मेदारी फत्ते मास्टर को दी जाए। कोई न कोई समाधान वो निकाल देगा। मास्टर को बुलाया गया। मामला जान मास्टर ने भी हाथ खड़े कर दिया और कहा यह कोई मेरी ड्यूटी थोड़े ही है। डीसी का आर्डर तो मास्टर को मानना ही पड़ेगा। यह सोचकर पंचायती डीसी दरबार पहुंच गए। इस तरह का मामला पहली बार आया था सो डीसी ने कमिश्नर को मार्गदर्शन के लिए लिख दिया। मामला एक युवक की जिंदगी से जुड़ा था इसलिए कमिश्नर ने भी फ़ौरन गृह मंत्री को इस बारे में अवगत करा दिया। गृह मंत्री से बात सीएम तक जा पहुंची। सीएम ने फौरन मीटिंग कॉल की। एक अफसर ने कहा-जी, यह मामला तो आपके लिए स्वर्णिम अवसर जैसा है। आप भूल गए गए क्या। चुनाव के दौरान आपने प्रदेश के सभी कुंआरों का ब्याह कराने का वादा किया था। इसी कारण तो सभी कुंआरों और उनके परिवार के वोट आपको मिले थे। सीएम बोले- वादा तो किया था पर इसका कोई समाधान तो नहीं निकला। अफसर बोला-समाधान तो अब आपके पास आ गया। प्रदेशहित में आवश्यक सेवा का हवाला देते हुए मास्टरों के नाम आर्डर निकलवा दो। वैसे भी अटके हुए काम वे ही करते हैं। हमने उनसे टिड्डियां उड़वाईं, सब तरह के सर्वे करवाए, वोट बनवाये, राशन बंटवाया, फैमिली आईडी बनवा ही रहे हैं। यह काम भी वे कर ही लेंगे। सीएम को बात सही लगी।फौरन चीफ सेक्रेटरी को बुला अति आवश्यक के नाम से आर्डर निकाल शिक्षा मंत्री को भिजवा दिया। शिक्षा मंत्री ने शिक्षा निदेशक को निर्देश जारी कर दिए। निदेशक से डीईओ, बीईओ होते हुए आदेश कुछ ही देर में सभी स्कूलों के हेडमास्टर-प्रिंसिपलों तक जा पहुंचा। सभी मास्टरों को ‘इसे अति आवश्यक समझें ,अन्यथा आप विभागीय कार्रवाई के हकदार होंगे’ के निर्देश नोट करा दिए गए। आदेश देखते ही फत्ते मास्टर ने पहले अपने बाल नोंचे फिर गाल पर चपेट लगाई। मन ही मन दो चार गालियां भी दी। पंचायत में तो ड्यूटी नहीं है कहकर पिंड छुड़वा लिया था,अब क्या होगा। रात भर नींद भी नहीं आई। सुबह तड़के एक बार आंख लगी तो आवाज सुनाई पड़ी। देखा तो वह युवक गांव के सरपंच और 10-15 अन्य ग्रामीणों को लिए खड़ा था। आने का कारण तो मास्टरजी को पता ही था फिर भी औपचारिकवश पूछ लिया। जवाब सरपंच साहब ने दिया। बोले- अब तो आपकी ड्यूटी आ गई है, गांव का यह काम करवाओ। मास्टरजी कहना तो बहुत चाह रहे थे पर सरकारी आदेश की अवहेलना के डर से चुप्पी साध गए। ग्रामीण और सरपंच अब इस बात से खुश थे कि गांव पर रांडे युवक की अकाल मौत का कलंक नहीं लगेगा। मास्टर जी को यह जिम्मेदारी मिलने से युवक भी अब जल्द ब्याह के सपने देखने लगा। उधर, इस बीमारी का किस तरह क्लेश काटूं ,मास्टरजी ध्यानमुद्रा में बैठ इस बारे में विचारमग्न हो गए। समाधान क्या निकाला और कैसे इस जिम्मेदारी से मास्टर जी ने पिंड छुड़वाया यह आपको फिर कभी बताऊंगा।

    सुशील कुमार नवीन
    सुशील कुमार नवीन
    लेखक दैनिक भास्कर के पूर्व मुख्य उप सम्पादक हैं। पत्रकारिता में 20वर्ष का अनुभव है। वर्तमान में स्वतन्त्र लेखन और शिक्षण कार्य में जुटे हुए हैं।

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