दुनिया को ऑब्ज़र्व करें, जज नहीं

  • डॉ. आदित्य शर्मा 

भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में कभी कोई आदेश नहीं दिया बल्कि उन्होंने दुनिया के ताने-बाने को इस तरह समझाया कि समझने वाला खुद दुनिया को देखना सीख गया। जब आप अपने मस्तिष्क में दुनिया के प्रति खुद ही एक धारणा बनाते हैं तो आप समाज की वास्तविकता को कभी महसूस नहीं कर पाते हैं, क्योंकि आप मस्तिष्क की धारणाओं में ही फंसे रह जाते हैं। जब तक हम दुनिया को जज करना बंद नहीं करेंगे, हम दुनिया की वास्तविकता को नहीं समझ सकते हैं । हमें खुद की बनाई हुई सीमाओं से बाहर निकलना होगा, क्योंकि हम यह नहीं मान सकते कि जो हमने देखा और सुना, वह हमेशा सत्य ही होगा इसीलिए यदि आप दुनिया को समझना चाहते हैं तो दुनिया को जज करने की बजाए उसको ऑब्जर्व करना शुरु करें।

जो ज्ञान हम दुनिया के अवलोकन के माध्यम से हासिल करते हैं, वही ज्ञान मायने रखता है। हमें यह समझना जरूरी होगा कि प्रकृति ने हमें क्यों बनाया? यह दुनिया क्यों बनाई? हमें इसे कंट्रोल करना क्यों जरूरी है? हम चाहे कितनी भी कोशिश कर लें, हम सिस्टम को पूर्णतः नियंत्रण में नहीं रख सकते, क्योंकि हमारे साथ-साथ सिस्टम में मौजूद अन्य लोगों की भी अपनी एक भूमिका है, भले ही वह अस्थाई है । यह सत्य है कि हम जिन परिस्थितियों का सामना करते हैं, वह हमने खुद ही बनाई होती हैं लेकिन जो परिणाम सामने आएगा, वह हमारे कंट्रोल में नहीं होगा। जीवन का कोई आरंभ या अंत नहीं है। कोई सीमा नहीं है। श्रीमद् भागवत गीता में श्रीकृष्ण ने दुनिया को बदलने की बात नहीं कही है जबकि उन्होंने दुनिया में हो रहे बदलावों को स्वीकारने और उसके मुताबिक कार्य करने की वकालत की  है। किसी भी परिस्थिति या बदलाव से भागना कोई विकल्प नहीं है। नियति को नियंत्रण में रखना असंभव है।

हमें यह अपनाना और समझना होगा कि सब के जीवन के अनुभव अलग-अलग होते हैं। यह जरूरी नहीं, जो हमारे लिए वास्तविक है, वह दूसरों के लिए भी हो। या जो हमारे लिए काल्पनिक है, वह दूसरों के लिए भी काल्पनिक हो। हमारी दुनिया के प्रति समझ हमारी क्षमता के बराबर होती है। सृष्टि से मेरी जरूरतें आपकी जरूरतों से अलग हो सकती हैं। मेरे अनुभव भी आपके अनुभवों से अलग हो सकते हैं। हम अपने जीवन में अलग-अलग अनुभव करते हैं, इसीलिए हम अपनी विचारधारा और समझ दूसरों पर नहीं थोप सकते हैं। हमें समझने की जरूरत है कि हर एक का परिस्थिति और वास्तविकता को देखने का अपना दृष्टिकोण होता है, जिसे ध्यान में रखते हुए हमें बिना समझे निर्णय पर नहीं पहुंचना चाहिए।

श्री कृष्ण कर्म योग की बात करते हैं, जिसका अर्थ है, हमें बिना किसी अपेक्षा के कर्म करते रहना चाहिए। हमारे ज़हन में हमेशा एक सवाल उठता है कि हमारे कर्म के लिए हमें किस चीज से प्रोत्साहित होना चाहिए? कृष्ण कहते हैं कि धर्म के पद चिन्हों पर चलो। अगला प्रश्न उठता है, क्या यह धार्मिकता है? इसके उत्तर में श्री कृष्ण ने कहते हैं, नहीं, इसका मतलब समानुभूति है अर्थात, मनुष्य के पास दूसरों की जरूरतों को समझने की शक्ति है। वे चाहें तो अपने साथ-साथ दूसरों की भलाई के प्रति भी काम कर सकते हैं। जब हम अपनी खुशी से दूसरों की सहायता करते हैं तो हम धर्म का पालन करते हैं जो कि कर्म योग का सिद्धांत है। सहानुभूति विनिमय को समर्थ बनाती है अर्थात, एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति की भौतिक आवश्यकताओं के साथ-साथ आध्यात्मिक आवश्यकताओं को भी पूरा कर सकता है। इस प्रकार के विनिमय को यज्ञ कहते हैं, जो अंततः कर्म होता है क्योंकि कर्म आदान-प्रदान का ही एक हिस्सा है। जब हम इस तथ्य को समझ जाते हैं, कर्म योग प्रारंभ हो जाता है। मूल रूप से यज्ञ का तात्पर्य लेन-देन नहीं है बल्कि देना और पाना है। इस प्रकार के कर्म में हम कुछ पाने की उम्मीद से अपना योगदान देते हैं, लेकिन हमें समझने की जरूरत है कि हम उस यज्ञ में किस प्रकार की भूमिका निभा रहे हैं। यज्ञ एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें हम यजमान स्वरूप आराध्य को अर्पण करते हैं। यह अर्पण निमित्तमात्रा कहलाता है, जिसका अर्थ है एक ऐसा उपकरण जिसके पास फल देने के सिवाय कोई विकल्प ही नहीं है। इस पूरे सेटअप में हमें यह समझने की जरूरत है कि हम इस पूरी प्रक्रिया में कौन-सा रोल निभा रहे हैं। श्री कृष्ण ने अपने लक्ष्यों से जुड़े रहने का भी संदेश दिया है। धरती पर निवास के दौरान उनके तीन मुख्य लक्ष्य थे। परित्राणाय साधूनां,‌ जिसका अर्थ है अच्छाई के लिए काम करना। विनाशाय दुष्कृतां, अर्थात पापियों का अंत करना और धर्म संस्थापना, जिसका मतलब है सिद्धांत बनाना और उन्हें मजबूत करना, इसीलिए प्रोफेशनल या पर्सनल लाइफ में एक अच्छा प्रबंधक बनने के लिए आपके पास लक्ष्य होना जरूरी है। साथ ही, उनसे जुड़े रहना भी आवश्यक है। 

हमें हर किसी के भीतर छिपे पोटेंशियल को पहचानना होगा। कोई भी अजय नहीं होता है। गीता में श्रीकृष्ण ने बताया है कि वह हर जगह मौजूद हैं क्योंकि हर चीज में प्राण होते हैं। श्री कृष्ण ही प्रारंभ, मध्य और अंत हैं। उन्होंने अर्जुन को अपना विकराल रूप दिखाया और समझाने की कोशिश की कि कोई भी अलग नहीं है। सभी के पास एक क्षमता होती है। उसे पहचानना जरूरी होता है। अपनी क्षमता को पहचानने के लिए हमें अपनी बनाई हुई सीमाओं से बाहर निकलना होगा। अपने आसपास दूसरों की जरूरतों और कमजोरियों को सराहना होगा। हमें अपने दिमाग को विकराल अर्थ अर्थ बड़ा बनाना होगा। जब हम अपने दिमाग को बड़ा करेंगे तब हम दूसरों के दृष्टिकोण को भी अपने अंदर समा लेंगे। इस प्रकार हम अपने रिश्तों को भी आगे बढ़ा सकते हैं। इस प्रकार हम दूसरों से की हुई उम्मीदों को भी लगाम दे सकते हैं। हमारे पास नियंत्रण करने की काबिलियत होगी क्योंकि हमने अपनी और दूसरों की क्षमताओं और योग्यताओं को पहचान लिया होगा।

गीता में श्री कृष्ण ने अर्जुन को उत्तम बनने की तमन्ना नहीं जताई है। उन्होंने किसी भी नियम के बारे में नहीं बताया बल्कि उन्होंने 3 पथ दिखाए- कर्म योग, भक्ति योग और ज्ञान योग में लोगों के आचरण भावनाओं और पहचान से जुड़े हैं। कर्म योग के बिना आप कुछ भी दे या प्राप्त नहीं कर सकते हैं। भक्ति योग के बिना आप जीवन और कार्य में भावनात्मक नहीं बल्कि यांत्रिक महसूस करते हैं। ठीक इसी प्रकार, ज्ञान योग के बिना आपके जीवन का कोई उद्देश्य या अर्थ नहीं है। ये तीनों पथ एक दूसरे पर निर्भर हैं। मानव जाति के आध्यात्मिक और प्रगतिशील नियति को दूसरी आकृति में ढालने के लिए भगवान विष्णु के आठवें अवतार श्री कृष्ण ने 3228 ईसा पूर्व धरती पर जन्म लिया। धरती पर भगवान श्री कृष्ण ने अपने 126 साल के जीवन काल में जगत को परम सत्य,भक्ति और धर्म का पाठ पढ़ाया। उन्होंने एक ऐसा किरदार निभाया जो सिर्फ भूतकाल में ही नहीं आज के युग में भी जिंदा है। वे वाकई में एक महान मोटीवेटर होने के साथ-साथ एक महान रणनीतिज्ञ भी थे।

(लेखक मैनेजमेंट में डॉक्टरेट हैं। धर्म मार्ग के विशेषज्ञ हैं।)  

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