बृद्धावस्था बोझ नहीं, परिवार व समाज के उद्धारक बनें

दादा दादी , नाना नानी के संरक्षण में बच्चों में आत्मविश्वास और सुरक्षित होने की भावना बढ़ती है। जिन घरों में गृहणियां बाहर नहीं जातीं , वहां भी वरिष्ठ सदस्यों की प्रासंगिकता रहती है। पति पत्नी एक मर्यादा में रहते हैं। बात बात में आपे से बाहर नहीं होते।बुढ़ापे को बेकार मत समझिए। इसे सार्थक दिशा दीजिए। तन में बुढ़ापा भले ही आ जाए, पर मन में इसे मत आने दीजिए। आप जब 21 के हुए थे तब आपने शादी की तैयारी की थी, अब अगर आप 51 के हो गए हैं तो शान्ति की तैयारी करना शुरू कर दीजिए। सुखी बुढ़ापे का एक ही मन्त्र हैं। दादा बन जाओ तो दादागिरी छोड़ दो और परदादा बन जाओ तो दुनियादारी करना छोड़ दो।

डा. राधेश्याम द्विवेदी
पाश्चात्य संस्कृति का असर :- कहा जाता है कि माता पिता के चरणों में स्वर्ग एवं उनकी सेवा से साक्षात ईश्वर की प्राप्ति होती है। हमारे देश में जहाँ श्रवण कुमार, राम, भरत तथा प्रहलाद जैसे पुत्रों ने जन्म लिया है। यह देखकर हैरत होती है कि अत्यंत संपन्न व समृद्ध परिवार के महानुभाव भी अपने बुजुर्गों के साथ रहना पसन्द नहीं करते हुए उन्हें भगवान् के भरोसे “वृद्धाश्रम”में छोड़ देते हैं । शारीरिक रूप से सर्वथा अशक्त व असहाय हो चुके वृद्धों को जिस समय अपनों के अपनेपन की सर्वाधिक आवश्यकता होती है, उस समय वे निराश, हताश, अपनी प्रिय संतानों से दूर, वृद्धाश्रम में एकाकी जीवन व्यतीत करने को बाध्य होते दिखाई देते हैं। निसंदेह वृद्धाश्रम आधुनिक सुविधा संपन्न होते हैं तथा उन्हें सुरक्षा व सुविधा भी प्रदान की जाती है पर उम्र के इस पड़ाव पर हमारे वृद्धों को ये आश्रम क्या भावात्मक सुरक्षा, आत्मीयता स्नेह दे सकते हैं? जिसे इन्हें अपनी संतान से और पारिवारिक सदस्यों से प्राप्त हो सकता है ? यह चिंतनीय व विचारणीय प्रश्न है। लगता है कि हमारी भारतीय संस्कृति पाश्चात्य संस्कृति से प्रभावित हो रही है। जिसके चलते हमारे जीवन मूल्यों में लगातार गिरावट आती जा रही है, और वृद्धाश्रमों में शरणार्थियों की संख्या भी बढ़ती जा रही है। विदेशी भी जिस भारतीय परिवार व्यवस्था की प्रशंसा करते रहे हैं। आज वही तानाबाना विखर रहा है। मृतप्राय होती जा रहीं मानवीय संवेदनाओं व आत्मकेंद्रित मानसिकता ने संयुक्त परिवारों के विघटन और एकल परिवारों की बाहुल्यता को जन्म दिया है। परिवार का हर सदस्य अपनी गतिविधियों में इतना अधिक रम गया है कि कोई भी किसी तरह से कहीं भी प्रतिबंधित नहीं होना चाहता है। युवा पीढ़ी व वृद्ध पीढ़ी के बीच न तो सामंजस्य के लिए कोई स्थान शेष रहा है, और न बुजुर्गों के मार्गदर्शन की कोई आवश्यकता ही रह गयी है। लगता है कि आज का युवा वर्ग कुछ अधिक ही योग्य और बुद्धिमान हो गया है। उसे बुजुर्गों का मार्गदर्शन अपने कार्यों में अकारण का हस्तक्षेप लगता है। अतः केवल व्यवस्थित भोजन ,अच्छे कपड़े और रहने की सुविधा देकर इन्हें वृद्धाश्रम में रख कर ही वह अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ लेता है।
बुजुर्गों की मानसिक वेदना को ना समझना:- विदेशों में जा बसे बच्चे ही नहीं तो भारत में रहकर उच्च पदासीन अधिकारियों के मातापिता भी इन वृद्धाश्रमों में अपने अंतिम दिन गुजार रहे हैं । यह ठीक है कि वे इन आश्रमों को अनुदान राशि नियमित भेजते है, जिससे उनके बुजुर्गों को पूर्णरूपेण सुरक्षा मिलती रहे और ये वृद्धाश्रम भी पलते बढ़ते रहें । लेकिन क्या कभी किसीने इन बुजुर्गों की मानसिक वेदना को समझने का प्रयास किया ? उनके मन की गहराई में झांकने की कोशिश की ? शायद उनकी मानसिक वेदना, उनकी शारीरिक व्याधियों से कहीं अधिक पीडादाई व कष्टप्रद होती है। वृद्धावस्था में शरीर थकने के कारण हृदय संबंधी रोग, रक्तचाप, मधुमेह, जोड़ों के दर्द जैसी आम समस्याएँ तो होती हैं, लेकिन इससे बड़ी समस्या होती है भावनात्मक असुरक्षा की। भावनात्मक असुरक्षा के कारण ही उनमें तनाव, चिड़चिड़ाहट, उदासी, बेचैनी जैसी समस्याएँ उत्पन्न होती हैं। मानवीय संबंध परस्पर प्रेम और विश्वास पर आधारित होते हैं। जिंदगी की अंतिम दहलीज पर खड़ा व्यक्ति अपने जीवन के अनुभवों को अगली पीढ़ी के साथ बाँटना चाहता है, लेकिन उसकी दिक्कत यह होती है कि युवा पीढ़ी के पास उसकी बात सुनने के लिए पर्याप्त समय ही नहीं होता। मध्यम वर्ग में ज्यादातर बुजुर्गों की समस्या की शुरुआत यहीं से होती है।
बृद्धावस्था बेकार नहीं सक्रिय एवं जागरुक रहें :- दादा दादी , नाना नानी के संरक्षण में बच्चों में आत्मविश्वास और सुरक्षित होने की भावना बढ़ती है। जिन घरों में गृहणियां बाहर नहीं जातीं , वहां भी वरिष्ठ सदस्यों की प्रासंगिकता रहती है। पति पत्नी एक मर्यादा में रहते हैं। बात बात में आपे से बाहर नहीं होते।बुढ़ापे को बेकार मत समझिए। इसे सार्थक दिशा दीजिए। तन में बुढ़ापा भले ही आ जाए, पर मन में इसे मत आने दीजिए। आप जब 21 के हुए थे तब आपने शादी की तैयारी की थी, अब अगर आप 51 के हो गए हैं तो शान्ति की तैयारी करना शुरू कर दीजिए। सुखी बुढ़ापे का एक ही मन्त्र हैं। दादा बन जाओ तो दादागिरी छोड़ दो और परदादा बन जाओ तो दुनियादारी करना छोड़ दो। अगर आप जवान हैं तो गुस्से को मन्द रखो, नही तो केरियर बेकार हो जाएगा और बूढ़े हैं तो गुस्से को बंद रखो नहीं तो बुढ़ापा बिगड़ जाएगा। बुढ़ापे को स्वस्थ, सक्रिय और सुरक्षित रखिए। स्वस्थ बुढ़ापे के लिए खानपान को सात्त्विक और संयमित कीजिए। सक्रिय बुढ़ापे के लिए घर के छोटे-मोटे काम करते रहिए और सुरक्षित बुढ़ापे के लिए सारा धन बेटों में बाँटने के बजाय एक हिस्सा खुद व खुद की पत्नी के नाम भी रखिए। दवाओं पर ज्यादा भरोसा मत कीजिए। भोजन में हल्दी, मैथी और अजवायन का उचित मात्रा में सेवन करते रहिए। हल्के-फुल्के व्यायाम अवश्य कीजिए अथवा आधा घण्टा टहल लीजिए। घरवालों पर हम भार न लगे और शरीर भी भारी न लगे इसलिए कुछ-न-कुछ करते रहिए। समय-समय पर स्वास्थ्य की जाँच भी करवा लीजिए ताकि कोई बड़ी बीमारी हम पर अचानक हमला न कर बैठे और पचास की उम्र में ही शेष बुढ़ापे की आर्थिक व्यवस्था सुदृढ़ कर लीजिए, ताकि बच्चों के सामने हाथ फैलाने की नौबत न आए। घर में ज्यादा दखलंदाजी न करे क्योंकि बार-बार की गई टोकाटोकी बेटे-बहुओं को अलग घर बसाने के लिए मजबूर कर देगी।
अध्यात्मिक मानसिकता बनायें :- कमल के फूल की तरह घर में रहते हुए भी अनासक्त रहिए, थोड़ा समय प्रभु भक्ति, सत्संग, स्वाध्याय और ध्यान में बिताइये। हो सके तो साल में कम से कम एक बार संबोधि सक्रिय योग शिविर में अवश्य भाग लीजिए। इससे आपको मिलेगी जीवन की नई ऊर्जा, नया विश्वास और अद्भुत आनन्द। एक बनेंगें नेक बनेंगे, प्यार बढ़ाने आये हैं । पहले कर्म योग एवं भक्ति योग पर कार्य करें. यह योग तेज़ी के साथ अहम् पर कार्य करते हैं और गहन प्राप्ति के मार्ग में आने वाली बाधाओं को साफ़ कर देते हैं. हमारा मन बहुत ही चंचल है लेकिन आध्यात्म ही एक ऐसा मार्ग है जिसके द्वारा मन को नियंत्रण में किया जा सकता है। हम जीवन में एकरसता से उब जाते हैं , धीरे – धीरे तनाव और खालीपन फिर से हमारे मन पर छाने लगता है। यह तनाव और थकान असल में हमारी आत्मा का होता है, जिसे हम समझ ही नहीं पाते हैं। इसको दूर करने के लिए हमें अपने आप को आध्यात्म को समर्पण कर देना चाहिए।
आध्यात्म और कुछ भी नहीं, बल्कि आपका अपना ही आन्तरिक संतुलन है और इसे पूरी संवेदनशीलता के साथ बहुत गहराई से महसूस किया जाना चाहिए। एक बार यदि आपने आन्तरिक संतुलन कायम कर लिया तो जिन्दगी के प्रति आपका नज़रिया एकदम बदल जाता है। आपको जिन्दगी बहुत ही आसान और खुबसूरत नज़र आने लगेगी। बस जरूरत है अपने भीतर छुपे उस ज्ञान को पहचानने की।यदि आपके मन के भीतर ही शांति ही नहीं है, तो बाहर कितना भी ढूंढ लें आप कभी भी खुद को संतुष्ट नहीं कर पाएंगे।आपको आन्तरिक संतुलन की आवश्यकता है जो केवल ध्यान योग और आध्यात्म के द्वारा ही पाया जा सकता है। आप हर परेशानी का सामना आसानी के साथ कर लेंगे यदि आपका मन स्थिर और शांत है। केवल एक बार आध्यात्मिकता को जीवन में शामिल कर के देखें, आप आत्मिक ज्ञान का अनुभव करेंगे और हमेशा आनंदित रहेंगे। इन कुछ व्यवहारिक प्रयोगों के जरिये आप एक अलग पहचान बना सकते हैं। आपके परिवारी जन ही नहीं परिवेश के सारे लोग आपके अनुभवों और प्रयोगों के कायल बनते जायेंगे। आप एक सम्मानजनक स्थिति को प्राप्त कर सकेंगे और यह दुनिया आपको हाथोहाथ उठा लेगी। फिर आपको ना तो एकाकीपन लगेगा और नाही आप किसी पर आश्रित रहेंगे। अपने को अन्तिम समय तक आप दुनिया से जोड़ते हुए परमात्मा को प्राप्त कर सकोगे।

1 thought on “बृद्धावस्था बोझ नहीं, परिवार व समाज के उद्धारक बनें

  1. डॉ. राधेश्याम द्विवेदी जी के सरल संजीदा व सूचनात्मक लेख, “वृद्धावस्था बोझ नहीं, परिवार व समाज के उद्धारक बनें” अवश्य ही मध्यम वर्ग अथवा संपन्न परिवारों में वृद्ध अथवा सेवानिवृत्त व्यक्तियों के लिए समयोचित विषय को प्रस्तुत करता है|

    मुझे नहीं मालूम कि भारतीय संस्कृति पाश्चात्य संस्कृति से कैसे प्रभावित हो रही है लेकिन कई दशकों से संयुक्त राष्ट्र अमरीका में रहते मेरा अनुभव बताता है कि यहाँ भारतीय बच्चे अपना स्वर्ग माता पिता के चरणों में ही देखते हैं| यदि कहीं मर्यादा का उल्लंघन होते देखा गया है तो वह दुर्भाग्यपूर्ण परिस्थिति केवल प्राणियों में परस्पर उनके ग्रह दशा अथवा उनके कर्मों का फल मानता हूँ| संसार में कहीं भी हो वह जब एक बार भारतीय है, सदैव भारतीय ही रहेगा| अलौकिक भारतीयता को कभी आंच नहीं आएगी| जब स्वयं माता-पिता अधेड़ आयु में आर्थिक ढंग से स्वावलंबी होते हैं इस पर भी प्रायः भारतीय मूल के युवा आर्थिक व सामाजिक स्तर पर संपन्न होने के कारण माता-पिता की सेवा में तत्पर रहते हैं|

    भारतीय संस्कृति में परोपकार मंदिर में चढ़ावा अथवा गरीब की झोली में पैसा फेंकते पूर्ण हो जाता है लेकिन संगठन पर आधारित पाश्चात्य संस्कृति में समाज अपने बूढ़े नागरिकों की देखभाल करता है| भले ही अकेलापन व्यक्ति-विशेष की मनोवृति को क्षीण कर उसे विचलित कर दे, सच तो यह है कि पश्चिम समाज में जन्म से लेकर मृत्यु तक आप कभी अकेले नहीं हैं| जन्म पर जच्चा बच्चा की तीमारदारी और मृत्यु पश्चात देह संस्कार तक समाज का उपयुक्त वर्ग सदैव आपके साथ है|

    आधे-अधूरे विकसित भारत में संभवतः ऐसा नहीं है| माता-पिता संपन्न हैं तो बच्चों को उनसे कुछ पा लेने की लालसा बनी रहती है और वैश्विकता और उपभोक्तावाद की दौड़ा-दौड़ी में न चाहते हुए भी मर्यादा का उल्लंघन कर बैठते हैं| मेरे भारत-भ्रमण के समय मैंने कन्याकुमारी में और पुदुच्चेरी के ऑरोविल्ले में बहुत से सेवानिवृत्त उत्तरी-भारतीयों को वहां स्वेच्छापूर्ण काम करते जीवन का शेष समय बिताते देखा है| मैंने पाया है कि मध्यम वर्ग के वृद्ध लोगों में जागरूकता होने के कारण वे समाज में अपना स्थान बना लेते हैं परंतु मेरी चिंता उन बूढ़े माता-पिताओं से है जो गरीब और असहाय दर दर की ठोकरें खाने के लिए छोड़ दिए जाते हैं| क्यों न हम समाज में परोपकार के आचरण द्वारा पाश्चात्य संस्कृति से प्रभावित ऐसे ऐसे अच्छे उपक्रम करें कि बूढ़े माता पिता केवल बच्चों का ही नहीं बल्कि समाज का दायित्व हों| ऐसी सामाजिक पद्धति में कोई किसी पर बोझ न बनेगा| क्रमशः

Leave a Reply

%d bloggers like this: