लेखक परिचय

वीरेन्द्र जैन

वीरेन्द्र जैन

सुप्रसिद्ध व्‍यंगकार। जनवादी लेखक संघ, भोपाल इकाई के अध्‍यक्ष।

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आदरणीय हजारे जी

सादर प्रणाम

दरअसल यह खत आपकी टीम के नाम है जिनकी सलाह से आपके वक्तव्य सामने आते हैं, किंतु किसी भी संस्था को जब कोई पत्र दिया जाता है तो वह संस्था के प्रमुख को सम्बोधित किया जाता है जैसे कि ठेकों के टेंडर तक सम्बन्धित बाबू को नहीं अपितु राष्ट्रपति भारत सरकार को सम्बोधित होते हैं। आपके अभियान के समांतर चलने वाले मायावान बाबा रामदेव के आचरण के विपरीत आपने अपने निश्चय और आचरण में जो दृड़ता दिखायी है उसके लिए देश में उन लोगों ने भी आपकी सराहना की है जो आपके जनलोकपाल से असहमत हैं। वैसे भी आपके जनलोकपाल से तो पूरी तरह कोई भी सहमत नहीं है, यहाँ तक कि इसे तैयार करने वालों ने भी इसे इसी तरह तैयार किया है ताकि सरकार से टकराव के अवसर आयें। वे इसमें सफल रहे हैं। इससे जनता के पास यह सन्देश पहुँचा है कि आपकी टीम देश को भ्रष्टाचार से मुक्ति दिलाना चाहती है और देश की चुनी हुयी सरकार ऐसा नहीं चाहती। देश के विपक्षी दल भी सरकार की विकृत छवि के और विकृत होने से प्रसन्न हैं और आपके जनलोकपाल बिल के समर्थन में न होते हुए भी वे सरकार की छवि बिगाड़ने के अभियान में समानधर्मी महसूस करते हैं। आपके समर्थन में जो भीड़ उमड़ती दिख रही है वह भी विपक्षी दलों को सम्भावनाओं से भरी हुयी दिख रही है क्योंकि वह सतारूढ दल के विरोध में खड़ी नजर आ रही है। इन्हीं दिनों उज्जैन में चल रही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ चिंतन व समंवय बैठक ने अपने संगठनों को सन्देश दिया है कि भले ही अन्ना हजारे भाजपा और संघ से दूरी बना कर चल रहे हैं, लेकिन उनकी गिरफ्तारी और आन्दोलन से बने माहौल का फायदा उठाया जाना चाहिए। भाजपा अध्यक्ष गडकरी को बैठक में आने के बजाय अन्ना की गिरफ्तारी के खिलाफ आन्दोलन आदि का नेतृत्व करने को कह दिया गया है। विद्यार्थी परिषद के राष्ट्रीय नेत्तृत्व ने भी यूथ अगैंस्ट करप्शन फोरम के आन्दोलन में कूदने को कहा है [दैनिक भास्कर भोपाल दिनांक 18 अगस्त 2011 में उज्जैन से मनोज जोशी की रिपोर्ट] टालस्टाय के एक उपन्यास में नायक कहता है कि- वो मुझे चाहती है या नहीं चाहती यह जरूरी नहीं पर मैं उसे चाहता हूं यह मेरे लिए काफी है। इसी तरह आप भले ही राजनीतिक दलों से दूरी बनाये रखने की बात करते हों पर राजनीतिक दल तो भीड़ पर भिनभिनाने से नहीं चूक सकते क्योंकि यह गुड़ और मक्खियों जैसा रिश्ता है। श्रीमती इन्दिरा गान्धी ने प्रेमधवन को दिये अपने आखिरी साक्षात्कार में विभिन्न धर्मस्थलों पर जाने का यही कारण बताया था कि वे जनता के आस्था स्थल हैं और बड़ी संख्या में जनता वहाँ पर जाती है।

राजनीतिक दलों ने आपकी बात का लिहाज रखा है इसलिए वे अपनी पार्टी के झंडे बैनर लेकर आपके आन्दोलन में सम्मलित नहीं हुए किंतु सब ने अपने अपने झंडे बैनरों के साथ आपकी गिरफ्तारी पर विरोध किया। रिन्द के रिन्द रहे हाथ से जन्नत न गयी।

आइए उस भीड़ का विश्लेषण करें जो 15 अगस्त को सड़कों पर नाबालिग बाल मजदूरों द्वारा बेचे गये झंडे लेकर आपके समर्थन में उतरी। इस भीड़ में बहुत बड़ी संख्या युवाओं की थी जो कालेजों में पढते हैं, या पढने के बाद नौकरी की तलाश में हैं। कुछ संख्या उन वकीलों की थी जो युवा हैं और जिनकी प्रैक्टिस नहीं चलती। आपकी टीम का आवाहन था कि पूरा देश 16 अगस्त से एक सप्ताह की छुट्टी ले और तिरंगा लेकर सड़कों गलियों में घूमे व अपने अपने मन से चयनित भ्रष्टाचारियों का विरोध करे। मुझे प्राप्त जानकारी के अनुसार 16 अगस्त को कहीं किसी ने छुट्टी नहीं ली, सारे दफ्तर सारे स्कूल भरे रहे यहाँ तक कि दुकानें भी खुली रहीं। जो युवा अलग अलग पार्कों, फास्ट फूड सेंटरों, या पिकनिक स्पाटों पर जेंडर मुक्त मित्रों के साथ मौसम का मजा लेते थे वे यही काम कुछ चौराहों या तयशुदा प्रदर्शन स्थलों पर कर रहे थे। उनके साथ कई जगह पैंट पर कुर्ता पहिनकर गान्धी थैला लटकाने वाले कुछ एनजियो नुमा लड़के और वैसी ही खिलखिलाती बिन्दास लड़कियां थीं। सारा माहौल एक उत्सव की तरह आल्हाद से भरा हुआ था, कहीं कोई गुस्सा नहीं था। कृप्या इसे अपने अहिंसा के सन्देश की शांति समझने की भूल न करें, क्योंकि इसमें एक रूमान छलक रहा था। हाथ उठा कर नारे लगाने में नृत्य था गीत था, आनन्द था।

इन लड़कों में से अधिकांश गरीब परिवारों से नहीं आये थे क्योंकि जो जितना गरीब है वह उतना ही प्रत्यक्ष भ्रष्टाचार से कम पीड़ित है। इनमें पिछड़े परिवारों के बच्चे भी नहीं थे क्योंकि वे बड़ी नौकरी न मिलने पर कोई छोटी नौकरी भी कर लेते हैं। इनमें अधिकांश उन परिवारों से आये बच्चे थे जिन परिवारों के मुखिया कहीं न कहीं स्वयं तो भ्रष्टाचार करते हैं किंतु उनके साथ दूसरे जो भ्रष्टाचार करते हैं उसको दूर करना चाहते हैं। इन्हें सत्ता पर बैठे व्यक्ति को गाली देने में और सरकार पलटने में अपनी भूमिका की कल्पना में एडवेंचर महसूस होता है। इनके पास भी आपकी टीम की तरह वैकल्पिक व्यवस्था का कोई ढांचा [विजन] नहीं है। ये कारों, मोटर साइकिलों वाले हैं, इनको पर्याप्त जेबखर्च मिलता है। आदरणीय, इसका मतलब यह नहीं कि मैं आपको अनशन न करने देने वाली और आपको गिरफ्तार करने वाली सरकार के पक्ष में हूं। मैं तो केवल यह बताना चाह रहा हूं कि आप जिनके सहारे बड़े परिवर्तन की उम्मीद कर रहे हैं वे वही लोग हैं जिनके खिलाफ लड़ाई लड़ी जानी है। आपसे उम्मीद पाले जो निरीह लोग आशा से तक रहे हैं उनके वोट लूटने के लिए स्थापित राजनीतिक दलों ने कमर कस ली है, इसलिए जरूरी है कि आप स्पष्ट करें कि भ्रष्टाचार के लिए आप जिस व्यवस्था को जिम्मेवार मानते हैं उसको हटाने के बाद नई व्यवस्था का आपका अगला खाका क्या है? क्या आपने अपने समर्थकों के लिए कुछ न्यूनतम पात्रताएं और आचार संहिताएं बनायी हैं, जिनके बिना किसी परिवर्तन की दशा में जार्ज की जगह जमुनाप्रसाद आ जायेंगे। यदि आप दल की सीमाओं में नहीं बँधना चाहते तो क्या उम्मीदवारों में कुछ न्यूनतम पात्रताएं, और कुछ न्यूनतम नकार बताना चाहेंगे, कि ये गुण होने चाहिए और ये अवगुण नहीं होने चाहिए। क्या आप चाहेंगे कि चयनित जन प्रतिनिधि पर लम्बित प्रकरणों की सुनवाई विशेष अदालतें दिन-प्रतिदिन के आधार पर करें और निश्चित समय में फैसला सुनाएं। क्या आप चाहेंगे कि एक बार चयनित होने के बाद विधायक, सांसद पेंशन पाकर सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित कर चुका जनप्रतिनिधि अपनी सारी चल अचल सम्पत्ति त्याग दे तब शपथ ग्रहण करे।

आदरणीय, भ्रष्टाचार दोषयुक्त व्यवस्था की पैदाइश होता है और इसे दूर करने के लिए व्यवस्था को बदलना ही होगा। कृपा करके इस सम्बन्ध में आपने जो सपना देखा होगा उससे देश को परिचित कराइए अन्यथा यह सब एक तमाशा होकर रह जायेगा।

आपका एक प्रशंसक

वीरेन्द्र जैन

9 Responses to “अन्ना हजारे के नाम खुला खत”

  1. Satyarthi

    पुनश्चः
    इसी प्रश्न का दूसरा पहलू है की क्या अन्ना वास्तव में भ्रष्टाचार मिटाना चाहते हैं या की वे कोई दूसरा खेल खेल रहे हैं. अन्ना पर सरकार द्वारा यह आक्षेप भी लगाया जाता रहा है की अन्ना संविधान की मर्यादा के विपरीत देश के कानून बनाने के अधिकार का अपहरण कर रहे हैं आश्चर्य है की यह आक्षेप लगाने वालों में देश के कुछ प्रतिष्ठित विचारक भी सम्मिलित हैं. इस में कोई विवाद नहीं हो सकता की देश के लिए कानून बनाने का अधिकार जनता के निर्वाचित प्रतिनिधिओं के पास है परन्तु इस का मतलब यह कदापि नहीं हो सकता की निर्वाचित प्रतिनिधिओं को अगले पांच वर्ष तक अपने पद का दुरुपयोग करने की स्वतंत्रता है और जनता को इस दुरुपयोग के विरुद्ध भाषण,प्रदर्शन ,अनशन आदि द्वारा जन प्रतिनिधिओं पर दबाव डालने की स्वतंत्रता नहीं दी ज़ा सकती. प्रतिनिधिओं को जनादेश केवल संविधान के अनुरूप कार्य करने के लिए मिलता है अर्थात जिन उद्देश्यों की पूर्ती के लिए संविधान प्रतिबद्ध है उनको जनता तक पहुँचाना है और यदि वे उसमे अक्षम रहें या विपरीत आचरण करें तो जनता को स्पष्ट अधिकार है की वे ऐसे दुराचारी प्रतिनिधियों की न केवल आलोचना करें बल्कि भर्त्सना करें.और यदि ऐसी स्थिति हो की संविधान पूरी तरह पंगु या विकृत हो जाये तो जनता को अधिकार है की एक नया संविधान बनाये. संविधान की प्रस्तावना से स्पष्ट है की संविधान भारत के लोगों द्वारा अंगीकृत, अधिनियमित तथा आत्मार्पित है अर्थात भारत के लोगों का स्थान सर्वोपरि है.और यदि संविधान अथवा उसके द्वारा गठित तंत्र लोकहित की रक्षा नहीं कर सकता तो वह सम्मान के योग्य नहीं है.
    अन्ना पर संदेह के कुछ कारण हैं. अन्ना के आन्दोलन का केंद्र उनकी जन लोकपाल बिल की मांग है .क्या जन लोकपाल बन जाने से ही भ्रष्टाचार समाप्त हो जायेगा ? स्वामी रामदेव ने तीन मुख्यमांगें रखी थी. १ भ्रष्टाचार समाप्त करना २ विदेश में जमा काले धन को राष्ट्रीय संपत्ति घोषित करना और देश में वापस मंगवाना ३ व्यवस्था परिवर्तन. अन्ना की इन सब मुद्दों पर चुप्पी उनके प्रति संदेह जगाती है. .दूसरा कारण है जन लोकपाल के पदाधिकारियो के चयन की प्रक्रिया. अन्ना ने बिल का प्रारूप तैयार करने की प्रक्रिया में अपने साथिओं को सरकारी अधिकारिओं के समकक्ष मनवा तो लिया पर इस से उनकी छवि धूमिल ही हुई. कुछ लोग संदेह करते हैं की अन्ना स्वयं या अपने साथिओं के लिए जन लोकपाल कार्यकारी दल के पद सुरक्षित करना चाह रहे हैं . यदि ऐसा हुआ तो शीघ्र ही वे जनता का विश्वास खो देंगे. तीसरा कारण है मीडिया द्वारा अन्ना आन्दोलन का व्यापक प्रदर्शन . सभी जानते हैं की हमारे देश का सूचना तंत्र ईसाईयों नेहरु छाप सेकुलरिस्टों तथा उनके सहयोगिओं की कठपुतली है और सूचना तंत्र के ऐसे व्यापक समर्थन और अन्ना की स्वामी रामदेव द्वारा उठाये गए मुद्दों की उपेक्षा का कुछ अशोभनीय निहितार्थ हो तो कोई आश्चर्य नहीं

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  2. डॉ. राजेश कपूर

    dr.rajesh kapoor

    वीरेंद्र जैन जी का उपरोक्त पूरा लेख दुर्भावना और पूर्वाग्रहों का शिकार है. जनमत को भ्रमित करने का एक चतुर प्रयास है. अन्ना के आन्दोलन से त्रस्त भ्रष्ट शक्तियों का प्रायोजित प्रयास लगता है.
    (१)आप कहते हैं की आना हजारे पहले विकल्प दें की व्यवस्था क्या होगी. तो क्या जब तक कोई विकल्प न मिले चुपचाप सब कुछ सहते रहें? अरे भाई विकल्प देकना है तो रालेगनसिंदी (अन्ना हजारे के गाँव) जाकर देखो. विकल्प सामने नज़र आ जाएगा.. वह पसंद नहीं तो आप विद्वान है, आप ही विकल्प दे दें ? केवल कमियाँ ही निकालेंगे ? या समाधान की बात भी करेंगे ?
    २. आप कहते हैं कि आन्ना की टीम ने जानबूझ कर टकराव पैदा करने वाला लोकपाल बिल बनाया है. ये आरोप तो सरासर झूठा और बदनीयती से भारा है. टकराव और भारी ऐतराज़ के काबिल बिल तो सरकार ने बनाया है. जिसमें शिकायत कर्ता को दो साल की सज़ा और अपराधी को 6 मास की सजा प्रस्तावित है. साफ़ है कि आपकी प्रिय ये सरकार लुटेरों के साथ है. इसीलिये कोई भी जायज़ व जन हित की बात ये सरकार मान ही नहीं सकती…. यदि आपको लगता है आन्ना टीम टकराव के मनोरंजन के लिए इतना कुछ कर रही है तो ज़रा जन लोकपाल और सरकारी लोकपाल की धाराओं का उइल्लेख करके प्रमाणिक बात करिए, झूठे और निराधार आरोप उछाल कर अन्ना और उनके साथियों की छवि पर दाग लगाने का अनैतिक प्रयास न करें. (३) आपके अनुसार देश के खिलिंदडे नौजवानों को पहली बार ही पिकनिक मानाने का अवसर मिला है ? इससे पहले भी तो अनेकों आन्दोलन हुए हैं. उनमें कितने लोग शामिल हुए ? लाखों लोग सड़क पर हैं पर एक भी तोड़-फोड़ की घटना हुई ? लोग जेब से खर्च करके, कष्ट उठा कर अन्ना के समर्थन में भूखे-प्यासे रात-रात भर धरने पर बैठ रहे हैं. अनेक दशकों बाद सारा देश इतना आंदोलित हुआ है और फिर भी कहीं कोई विध्वंस नहीं ? यह चमत्कार आपको तो देखना ही नहीं है, है न ? कोई अन्य ऐसा उदहारण आपकी नज़र में है ?
    (४) आपने सन्देश देने का प्रयास किया है कि यह आन्दोलन राजनैतिक स्वार्थों का शिकार बनने वाला है.यह सन्देश देकर आपने प्रयास किया है की लोग इससे न जुड़े. पर सच तो यह है की यह आन्दोलन महंगाई और भ्रष्टाचार से त्रस्त जनता से स्वस्फूर्त है. लोग सरकार के संरक्षण में चल रहे भ्रष्टाचार और सर्कार की करतूतों से बढ़ रही महंगाई से बहुत दुखी थी. उसे कोई एक भी विश्वास का नेता नज़र नहीं आ रहा था जिसपर वे भरोसा करें. अन्ना में उन्हें वह नेता नज़र आया और सारा देश उनके साथ जुड़ गया. (५) लाखों सड़क पर कष्ट उठाते, नारे लगते लोग आपकी नज़र में गंभीर लोग नहीं, मौज मस्ती के लिए एकत्रित भीड़ है ? महोदय इन्ही से घबरा कर जिद्दी और दुष्ट सरकार झुक रही है, घबरा रही है. ## अँधेरे में वर्षों बाद एक प्रकाश की किरण प्रकट हो रही है. माना की लोकपाल बिल देश की समस्याओं का समाधान नहीं हो सकता , पर देश के सोये हुए लोग जाग जाएँ तो हर समस्या का समाधान ये जागृत जनता कर सकती है.. जन मत के सुप्त रहने से ही तो देश लुट रहा है, तबाही हो रही है. इस आन्दोलन की सबसे बड़ी उपलब्धि है की सोई जनता जाग रही है. मजबूरी में सभी दलों को इसके समर्थन में आना ही होगा. …… (६) आपके अनुसार भ्रष्टाचार विरोधी इस आन्दोलन में सम्मिलित लोग स्वयं भ्रष्ट हैं. कमाल की खोज है आपकी. अन्ना के समर्थन में आये वे अपांग, भिखारी, मजदूर, सफाई कर्मचारी, विद्यार्थी सब भ्रष्ट हैं ? तो फिर तो शायद आप ही बचे होंगे जो आपकी नज़र में चरित्रवान हैं. आपकी नज़र ही किसी ख़ास प्रकार के चश्में से ढकी है, यह मानना पडेगा. वीरेंद्र जी आप सरीखे पढेलिखे व्यक्ति द्वारा इस आन्दोलन को बदनाम करने के प्रयास के अर्थ समझने के लिए सब स्वतंत्र हैं. जिसप्रकार आपको इस आन्दोलन से कष्ट है, उसी प्रकार आप द्वारा इसे पलीता लगाने के छद्म प्रयास से मुझ जैसों को कष्ट है. पर विश्वास रखे ये प्रयास सफल होने वाले नहीं हैं. विनम्र निवेदन है की व्यक्तिगत हितों से ऊपर उठ कर ‘ सर्वजन हिताय ‘ सोचें विचारे और कार्य करें. —–सादर आपका शुभाकांक्षी.

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  3. vivek

    आज के आन्दोलन क़ी, सरकार के आलावा, तो वे ही लोग आलोचना कर रहे है जो सत्ता कि मलाई खा रहें है(इसमें विपक्ष के तथाकथित चुने हुए जनप्रतिनिधि भी शामिल है ) या वे लोग जो इस आन्दोलन में,अपनी स्वयं रचित शेली के कारण, जुड नहीं पाए ! ये लोग बड़े मासूम से और अप्रासंगिक तर्कों के सहारे अपने आप को अलग रख रहें है ? कभी अन्ना क़ी टीम पर प्रश्न खड़े कर देतें हैं ,कभी इस आन्दोलन के मुद्दों में से किसी एक मुद्दे से असहमति जता देतें हैं ,कभी ऐसे आन्दोलनों से क्या होगा ये कह अपनी खाज मिटाते हैं !ये सब जाने अनजाने में आग लगने वालों में शामिल है न क़ी आग बुझाने वालों में !
    इन सभी के लिए इतना ही कहना है क़ी आपकी सारी बातें सही सिद्ध हो सकती हैं लेकिन क्या आप जन जाग्रति क़ी महत्ता से इंकार कर सकते हैं ?क्या ये जाग्रति किसी अच्छे परिवर्तन के लिए आवश्यक नहीं होती है ?क्या इस जाग्रति को सही दिशा देने के लिए अपने आप को विशेषज्ञ समझने वाले इस आन्दोलन में सक्रिय नहीं होना चाहिए ? १९७४ में भी सभी अच्छे बुरे नेता सक्रिय थे ,लेकिन कुछ अच्छे व दूरदर्शी नेताओं क़ी सक्रियता ने आन्दोलन को सफलता दिलाई !आज वो ताकत कहाँ है ?यदि दम नहीं है तो जेसा चल रहा है बहुत अच्छा चल रहा है आप घर या अपने घरोंदो में दुबके रहें ये ही देशहित में है ! १९७४ में भी लालू प्रसादजी जेसे नेता सक्रिय थे लेकिन उस समय वे हावी न थे !
    अन्ना जी का आन्दोलन क्या रुख लेगा ये आज नहीं कहा जा सकता ये सही है लेकिन इस जन जाग्रति को चिरस्थायी बनाने क़ी इच्छा भी एक अच्छा कारण निमित्त इस आन्दोलन में शामिल होने क़ी हो सकती है ! इस आन्दोलन क़ी जाग्रति आगे भी और भयंकर समस्याओ से निपटने के लिए काम आने वाली है !अत:कृपा कर सभी देश के झंडाबरदार सक्रिय हो जाएँ अन्यथा उन्हें उनकी आत्मा और नयी पीढ़ी माफ़ नहीं करेगी !
    आपातकाल के दोअरान स्व.दुष्यंत कुमार क़ी कविता ख़ूब प्रेरणा देती रही थी वो आज भी अन्ना आन्दोलन में गायी जा कर प्रेरणा दे रही है उसे सभी नवयुवक, यदि नहीं मालूम हो तो याद कर लें !दुष्यंत कुमार आपातकाल के बंदी भी रहे थे और शायद उसी कारण स्वर्गवासी भी हुए थे !आज भी कोई पोलिटिकल भाषण जिससे जोश भरने क़ी अपेक्षा हो ,स्व.दुष्यंत कुमार के शेर के बिना पूरा नहीं होता ? उसमें से एक ग़ज़ल का अविरल पाठ नवयुवकों के लिए नहीं वरन प्रथम पेरा में उल्लेखित लोगों के लिए याद सा दिला रहां हूं :-
    हो गयी है पीर पर्वत- सी पिघलनी चाहिए ,
    इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए !
    आज यह दीवार ,परदों क़ी तरह हिलने लगी ,
    शर्त लेकिन थी क़ी ये बुनियाद हिलनी चहिये !
    हर सड़क ,हर गलीं में ,हर नगर ,हर ग्राम में ,
    हाथ लहराते हुए,हर लाश चलनी चाहिए !
    सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं ,
    सारी कोशिश है क़ी ये सूरत बदलनी चाहिए !
    मेरे सीने में नहीं ,तो तेरे सीने में सही ,
    हो कहीं भी आग ,लेकिन आग जलनी चाहिए

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  4. RAJ

    सही बात कही आप ने वीरेंदर जी मैं कांग्रेस भक्त नहीं हूँ , पर आज के माहोल में अगर कोइ अन्ना का विरोध करता है तो उसे तुरंत देशद्रोही ककार दिया जाता है , आप ने बहुत बड़ी हिम्मत जुताई आप ने अन्ना के आन्दोलन का सच्चा स्वरुप सामने रखा है, वैसे भी जन्लोक्पल बिल आने से क्या होंगा ब्रिटिश सषित कायदों को बदलना पड़ेंगा यहाँ पर स्वामी रामदेव सही है अन्ना दोंग कर रहा है मैं भी युवा वर्गे से अत हूँ पर मैंने १६ अगस्त को छुट्टी नहीं ली और ९९ % लोगों ने नहीं ली , मैं आप का इस बात पर समर्थन करता हूँ , जय श्री राम

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  5. Satyarthi

    श्री वीरेन्द्र जैन ने कंग्रेसभक्ति से परिपूर्ण इस लेख में कुछ गंभीर प्रश्न उठाए हैं यथा ;-
    १.क्या सरकार देश को भ्रष्टाचार से मुक्ति दिलवाना चाहती है ?
    २.क्या बी जे पी, रा. स्व. संघ , ए बी वि पी तथा अन्य राजनितिक दल केवल अगले चुनाव में लाभ की आशा से ही अन्ना का समर्थन कर रहे हैं?
    ३. अन्ना के समर्थन में जुडी भीड़ किस कारण से आन्दोलन में भाग ले रही है? किसी मेले या पिकनिक जैसे वातावरण का आनंद लेने के लिए?
    ४ अन्ना के समर्थनकर्ता स्वयं भ्रष्ट परिवारों से हैं और उनके पास किसी वैकल्पिक व्यवस्था कोई खाका नहीं है
    ५. अन्ना ने अपने अनुयायियों के लिए कोई न्यूनतम योग्यताएं स्पष्ट नहीं की.

    स्वामी रामदेव पर किया गए कटाक्ष पर टिप्पणी करना आवश्यक नहीं.
    ऊपर लिखे गए पांचों प्रश्न महत्व पूर्ण हैं. संपादक जी से मेरा अनुरोध है की इन सब पश्नों को अलग अलग परिचर्चा का विषय बना कर पाठकों को अपने विचार व्यक्त करने का निमंत्रण दें.
    स्थानाभाव एवं समयाभाव के कारण में यह टिप्पणी केवल पहले प्रश्न तक सीमित रखूंगा
    मेरे विचार से ” सर्कार भी भ्रष्टाचार मिटाना चाहती है” कहने का साहस केवल कट्टर कांग्रेसी ही कर सकते है जो सोनिया गाँधी के बुराड़ी भाषण को दोहराते रहेगे. यु पी अ सर्कार के भ्रष्ट कार्यकलापों की सूची बहुत लम्बी है और उसे यहाँ दोहराने ki कोई आवश्यकता नहीं है. देश में जो स्थिति आज है वह स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् अपने स्वार्थ के लिए शासनतंत्र को (राष्ट्रपति, निर्वाचन आयोग ,सी वी सी तथा शासन के सभी अंग) अपने स्वमिभाक्तों द्वारा संचालित किये जाने का परिणाम है. वैसे तो इस परंपरा की नीव नेहरु जी ने ही रखी थी पर इसका प्रचंड रूप श्रीमती इंदिरा गाँधी ने विकसित किया और अब श्रीमती सोनिया गाँधी द्वारा शिखर पर पहुंचा दिया गया यदि सरकारें संविधान के आदर्शों के अनुरूप चलती तो आज जनता अपने आप को त्रस्त एवं असहाय नहीं पाती.

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  6. मुकेश चन्‍द्र मिश्र

    Mukesh Mishra

    भ्रटाचार आज व्यवस्था का हिस्सा बन गया है और ८०% लोग ऐसी व्यवस्था के कारन इसका इसका हिस्सा बने हुए हैं जो चाहते हैं की इसमें बदलाव हो

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  7. Anil Gupta,Meerut,India

    श्री विरेंद्रजी की बात काफी हद तक सही हैं. किसी भी स्थापित व्यवस्था का विरोध करने में युवा मानस को एक रूमानी संतुष्टि मिलती है. यदि देश से भ्रष्टाचार को उखड फेंकना है तो जहाँ नेताओं और उच्च पदों पर बैठे लोगों का भ्रष्टाचार समाप्त होना जरुरी है वहीँ निचले स्टार पर रोजमर्रा के काम में जो भ्रष्टाचार झेलना पड़ता है उससे कैसे निजात मिलेगी इस का भी उपचार सोचना होगा. १९७३-७४ में लोकनायक जयप्रकाश नारायण जी ने जब भ्रष्टाचार के विरुद्ध मोर्चा खोला था तब भी बातें व्यवस्था परिवर्तन की ही हुई थीं. समग्र क्रांति उस समय का नारा था.उस समय भी जे पी ने इंदिरा गाँधी से भेंट के बाद कहा था की प्रधान मंत्री भ्रष्टाचार की गंगोत्री है. इसकी पुष्टि हार्वर्ड की डॉ. याव्गेनिया अल्बतास की पुस्तक ” स्टेट विदीन ऐ स्टेट: के जी बी इन रशिया, पास्ट, प्रेजेंट एंड फ्यूचर” के प्रष्ट २२३ पर दी है जिसमे के जी बी के प्रमुख विक्टर चेर्निकोव ने स्वीकार किया है की ‘ भारत के प्रधान मंत्री (इंदिरा गाँधी) के बेटे राजीव गाँधी ने के जी बी का इस बात के लिए आभार जताया की उसके सहयोग से उनके परिवार को काफी आर्थिक लाभ मिला और उससे राजनीती के लिए भी धन मिला’. उस पुस्तक में तत्कालीन सोवियत सर्कार द्वारा १९७० के बाद भारत द्वारा सोवियत संघ से किये गए सभी सौदों पर राजीव गाँधी के परिवार के नंबर वाले स्विस खातों में निश्चित कमीशन डालर में जमा करने को मंजूरी दी जाने सम्बन्धी प्तास्तावों का तिथि व संख्या सहित पूरा ब्यौरा दिया गया है. डॉ अल्बतास कोई ऐरी गैरी लेखक नहीं हैं बल्कि वो रूस के राष्ट्रपति येल्तसिन द्वारा के जी बी की गतिविधियों की जांच के लिए बनाये गए आयोग की सदस्य भी थी. स्विट्जर्लैंड के सर्वाधिक प्रसार वाले जर्मन भाषा के अख़बार स्वेत्जर इलास्त्रेट के १८ नवम्बर १९९१ के अंक में दुनिया के १६ तानाशाहों के बारे में रिपोर्ट छाप गयी थी जिसमे एक तस्वीर स्वर्गीय राजीव गाँधी की भी थी जिसके नीचे लिखा था की देशवासियों की लूट का २.५ अरब स्विस फ्रेंक अर्थात लगभग २.२ अरब अमरीकी डालर स्विस बैंक में राजीव के नाम से जमा था. ये रकम आज की कीमतों में लगभग ८४००० करोड़ रुपये के बराबर बैठती है. विकिलेअक्स के द्वारा किये गए खुलासे के अनुसार सोनिया गाँधी के स्विस बैंक में लगभग १८ अरब डालर हैं.
    लेकिन इन सबसे आम आदमी को रोजमर्रा के कामों में जो घूस देनी पड़ती है उससे क्या कोई फर्क पड़ेगा. अन्नाजी के आन्दोलन का आज तीसरा दिन है लेकिन मेरे विचार में दिल्ली में भी किसी भी विभाग में शायद ही किसी ने रिश्वत लेनी या देनी बंद की होगी.
    जो लोग टीवी के चैनलों के कैमरों के सामने जोर जोर से भ्ताश्ताचार के खिलाफ हल्ला मचा रहे हैं उनके घरों में कितना भ्रष्टाचार कम हो रहा है?
    वस्तुतः भ्रष्टाचार समाप्त करने के लिए व्यवस्था का पूरा शुद्धिकरण करना होगा जो एक दो दिन महीने या साल का काम नहीं है इसके लिए कठोर कानून, उन्हें कडाई से लागू करने की इक्षाशक्ति, तथा लम्बे समय तक नेतिक पुनर्निर्माण करना होगा.जो असंभव नहीं तो अत्यधिक दुरूह अवश्य है.
    मैंने बात की थी जे पी के आन्दोलन की. उस समय भी सम्पूर्ण क्रांति बातें हुई थीं लेकिन जून १९७५ में इंदिराजी के चुनाव को भ्रष्टाचरण के आधार पर अवैध घोषित करने के इलाहाबाद उच्च न्यायलय के फेसले ने सारी फिजा बदल दी और मामला केवल सत्ता परिवर्तन पर जाकर रुक गया. जे पी की अधूरी समग्र क्रांति को आगे बढ़ाने व पूरा करने की आवश्यकता है.लेकिन ये काम कौन करेगा? क्या अन्ना ये कर सकेंगे? मेरे विचार में अकेले अन्ना ये काम नहीं कर पाएंगे. उत्तर शायद समाज ही देगा.

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  8. Dr. Kaushal Sharma

    आपने बिलकुल ठीक कहा है . भीड़ में से अधिकाँश स्वयं भ्रष्टाचार में लिप्त है पर एक पर्दे की आड़ चाहते है. इसलिए अन्ना के साथ है. मैं पूछना चाहता हूँ विरोध करने वालों से की क्या वे खुद इस धंदे में लिप्त नहीं? क्या उन्होंने कभी भी भ्रष्टाचार नहीं किया ? यदि हाँ तो वे किस मुंह से विरोध कर रहे है. ये हम है जो खुद भ्रष्टाचार कर रहे है. यदि सरकारी कर्मचारी रिश्वत मांगता है तो उसे देता कौन है हम ना.
    भाई विरोध करो पर व्यवस्था का. खुद का और कसम खाओ की ना तो रिश्वत दोगे और ना ही लोगे.
    यदि अन्ना की बात करें तो उनके अनुसार एक हफ्ते तक काम से अवकाश ले लेना चाहिए ठीक है पर ये भी कसम खाओ की उस अवधी की सेलरी नहीं लोगे…………..
    है दम तो आओ हम मिलकर विरोध करें.

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  9. GGShaikh

    यह लाभ उठाने वाला सिक्का इतना प्रचलित क्यूँ बना दिया गया है.
    जहाँ तक इस आन्दोलन का चरितार्थ है, अन्ना जी ने वर्तमान सरकार को गिराने की बात नहीं की है. रिजनेबल लोकपाल बिल पारित हो और उसका ईमानदारी से अमल हो…इतना ही हमारी समझ में अब तक तो आया है…

    वीरेंद्र जी आपकी चिंताएं जायज़ और सूचक है…कि इस आन्दोलन को फारस न बना दिया जाए…या कुछ भी काबू से बाहर न होने दिया जाए.

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