विपक्षी दल बताएं: पत्थरबाजों के साथ हैं या सेना के साथ

कश्मीर में पत्थरबाजी और सेना की जीप पर बंधे युवक विषय पर जहां दिग्विजय ने एक भड़काऊ बयान देकर सेना की पवित्रता को ललकारा है वहीँ दूसरी ओर कश्मीर के अब्दुल्ला परिवार के सदस्य व पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने भी अपनी अगली पिछली खुजली को एक ट्वीट के माध्यम से व्यक्त किया है व भारतीय सेना के विपरीत वातावरण बनाने का दुष्प्रयास किया है. दिग्विजय व उमर अब्दुल्ला सेना द्वारा जीप पर बांधकर घुमाए जा रहे जिस युवक का वितंडा खड़ा किया जा रहा है; उसके पीछे की परिस्थितियां भी देश के समक्ष स्पष्ट हो जानी चाहिए.

कश्मीर में भारतीय सेना पर पत्थर बरसाने और भारतीय सैनिकों को घायल करके उन्हें हानि पहुंचाने का यह दूसरा दौर चल रहा है. पत्थरबाजी का पहला दौर नोटबंदी के पहले चला करता था. नवम्बर में अचानक मोदी सरकार द्वारा देश भर लागू की नै नोटबंदी के कारण चार पांच माह तक पत्थरबाजी का यह देशद्रोही क्रम रूका रहा जो पिछले दो तीन सप्ताह से पुनः तेजी से चल पड़ा है.

हाल ही में कश्मीर में सेना पर हो रही सतत पत्थरबाजी के दौर कश्मीर की कुछ वीडियो क्लिपिंग्स ने पुरे देश की राजनीति को गरमा दिया है. देश भर तेजी से वायरल हुई इन क्लिपिंग्स में कुछ में कश्मीर के स्थानीय युवा सैनिकों से बदतमीजी पूर्ण व्यवहार करते, हिंसा करते, उन्हें अपमानित करते व उन्हें मारते पीटते नजर आ रहें हैं. इन वीडियो क्लिपिंग्स में स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है कि कश्मीर के अलगाववादी युवाओं की हिंसा झेलते ये भारतीय सैनिक AK 47 बन्दुक व अन्य अत्याधुनिक हथियारों से लेस हैं किन्तु तब भी ये सैनिक अत्यधिक संयम में नजर आते हैं व पत्थरबाज युवाओं की अपमान जनक भाषा व उनकी हिंसा को झेलते हुए आगे बढ़ते जाते हैं व रत्ती भर भी प्रतिकार नहीं करते. स्पष्ट है कि ये सैनिक देश के प्रति अपनें कर्तव्य से बंधकर सेना की निर्धारित रीति नीति के अनुरूप अपना व्यवहार हद दर्जे तक जाकर भी संयमित बनाये रखते हैं व नाम मात्र का प्रत्युत्तर नहीं दे रहे हैं. यहाँ पर उचित ही होगा कि पिछले वर्षों में कश्मीर में आई भीषण बाढ़ के समय को भी स्मरण कर लें जब भारतीय सेना ने बाढ़ पीड़ित क्षेत्रों में बड़ा ही विशाल, कौशल्यपूर्ण व संवेदनशील अभियान चलाकर हजारों कश्मीरियों के जान माल की रक्षा की थी. इस बाढ़ के पूर्व भी कश्मीरी अलगाववादी नागरिक सेना के प्रति दुश्मनी व असहयोग का रूख अपनाते चले आयें हैं किन्तु भारतीय सेना ने तमाम ऐसे विषयों को छोड़कर कश्मीरियों को शुद्धतम मानवीय दृष्टिकोण से बाढ़ से राहत दिलाई थी.

 

इस मुद्दे पर अब कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह ने बयान दिया है कि कश्मीरी लोगों को एक तरफ आतंकवादी मारते हैं तो दूसरी तरफ सेना के जवान. दिग्विजय सिंह कोई नए राजनेता तो हैं नहीं, एक राजनेता के रूप में वे एक लम्बी पारी खेल चुकें हैं, अनुभव का भण्डार उनके पास है. दिग्विजय सिंह का देश को दीर्घ अनुभव हो गया है, राष्ट्रीय मुद्दों पर अक्सर ही वे अपने विचार भड़काऊ ढंग से रखते रहते हैं, किन्तु इस बार कश्मीर के विषय में जो उन्होंने कहा है वह समय, काल, स्थान व परिस्थिति के कोण से अत्यधिक देशद्रोही प्रकार का बयान है. प्रायः यह होता आया है कि दिग्विजय सिंह या इस जैसे अन्य नेता जो राष्ट्रीय राजनीति में किसी न किसी राजनैतिक दल के महत्वपूर्ण पद पर बैठे होतें हैं राष्ट्रीय मीडिया की सुर्ख़ियों में स्थान पाने व चर्चित रहनें के लिए इस प्रकार के बयान दे देतें हैं व बाद में देश को उसकी बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है. इन विवादित बयान देनें वाले नेताओं के बयानों से उनके अपनें स्वयं के राजनैतिक दल का क्या रूख है ये कहनें की तब तक आवश्यकता नहीं रहती जब तक कि दल की ओर से विवादित बयान से अपनें आप को एक विज्ञप्ति के माध्यम से अलग नहीं कर लिया जाता. हाल ही के वर्षों में देखने में आया है कि राजनैतिक दलों में यह प्रवृत्ति कम हुई है. विवादित बयानों व राष्ट्रहित के विषयों पर राजनैतिक अपनें किसी कार्यकर्ता के बयान पर चुप्पी बनाये रखकर स्तरहीन राजनीति का वातावरण बनाये रखते हैं. अब आवश्यक है कि ये प्रवृत्ति आगे न बढ़े.

कश्मीर में पत्थरबाजी और सेना की जीप पर बंधे युवक विषय पर जहां दिग्विजय ने एक भड़काऊ बयान देकर सेना की पवित्रता को ललकारा है वहीँ दूसरी ओर कश्मीर के अब्दुल्ला परिवार के सदस्य व पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने भी अपनी अगली पिछली खुजली को एक ट्वीट के माध्यम से व्यक्त किया है व भारतीय सेना के विपरीत वातावरण बनाने का दुष्प्रयास किया है. दिग्विजय व उमर अब्दुल्ला सेना द्वारा जीप पर बांधकर घुमाए जा रहे जिस युवक का वितंडा खड़ा किया जा रहा है; उसके पीछे की परिस्थितियां भी देश के समक्ष स्पष्ट हो जानी चाहिए. उस पत्थरबाज युवक को  जीप पर इसलिए बांधा गया था ताकि चुनाव ड्यूटी में फंसे जवानों को पत्थर फेंकनेवाले कश्मीरी युवकों के बीच से निकाला जा सके. चुनाव ड्यूटी में फंसे सैनिकों को कश्मीरी पत्थरबाजों के दबाव वाले क्षेत्र से निकालने के बाद और ख़तरा टलने के बाद उस युवक को सुरक्षित छोड़ दिया गया था. सर्वाधिक आश्चर्य की बात ये है कि दिग्विजय सिंह ने अपने इस बयान में कहीं भी सीआरपीएफ जवान के साथ हुई उस घटना या उस वीडियो का जिक्र नहीं किया जिसमें कश्मीरी युवक चुनाव ड्यूटी से लौट रहे सीआरपीएफ जवान पर पत्थर और लात घूंसे बरसा रहे हैं. वीडियो क्लिपिंग्स में स्पष्ट दिख रहा है कि चुनाव ड्यूटी से लौट रहे सीआरपीएफ के उन जवानों के हेलमेट के उन युवकों ने पैरों से ठोकर मारी लेकिन इतना होने के बाद भी जवान धैर्य का परिचय देते दिखाई पड़ते हैं. कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह बताएं कि उन जवानों का वो धैर्य क्यों दिखाई नहीं दे रहा ? नेशनल कांफ्रेंस के नेता और जम्मू कश्मीर के पूर्व सीएम उमर अब्दुल्ला ने पत्थरबाजों के लिए दुख जताया है. यदि उमर ने जो कहा सब सच है तो भी सेना की गलती कहाँ है? क्या सेना को अपने विरोध में की जा रही हिंसात्मक कार्यवाहियों का कोई जवाब नहीं देना चाहिए और सब कुछ सहकर अपने जवानों के प्राणों को, उनके उत्साह व ईक्छाशक्ति को नष्ट होनें देना चाहिए?!  सेना के जवानों को हताहत होते हुए स्पष्ट देखते रहना चाहिए?! यही दिग्विजय, यही उमर व यही विपक्ष तब भी दहाड़े मार-मारकर मगरमच्छी आसूं बहाते यदि कश्मीर में कुछ सैनिक नागरिकों के हमलों में हताहत हो गए होते. कश्मीर में सेना पर पत्थरबाजी की आम होती जा रही व बढ़ती जा रही घटनाओं के लिए सेना को कुछ न कुछ पैतरा तो अपनाना ही था, जो उसने अपना लिया. अब देश की बारी है कि वह हर प्रकार से धोखे व अमानवीय रीति नीति पर चल रहे कश्मीरी पत्थरबाजों के विरुद्ध अपनी सेना को नैतिक समर्थन व बल देवे. यहस्पष्ट हो चुका है कि अलगाववादियों व आतंकवादियों द्वारा स्थानीय कश्मीरी नौजवानों को पत्थरबाजी करने के लिए पैसे दिए जाते हैं. पैसे व भड़काऊ प्रशिक्षण के कारण कश्मीरी युवा इन देशद्रोही घटनाओं को परिणाम दे रहे हैं. कुछ इलेक्ट्रानिक चैनलों ने अपनी खोजी पत्रकारिता के माध्यम से यह पता किया कि पाकिस्तान घाटी में पत्थरबाजों को कैशलेस फंडिंग कर रहा है. चैनलों ने यह दावा भी किया है कि पाकिस्तान इन पत्थरबाजों को पैसा देने के लिए वस्तु विनिमय प्रणाली का सहारा ले रहा है. इनके अनुसार पाक अधिकृत कश्मीर (PoK) से श्रीनगर सामान लेकर आनें जाने वाले ट्रकों के जरिए पत्थरबाजों को पैसा पहुंचाया जाता है. उदाहरणार्थ एक ट्रक पाकिस्तान के मुजफ्फराबाद से 5 लाख रुपए का सामान लेकर श्रीनगर के लिए निकलता है किन्तु लौटते समय  जब श्रीनगर से पाकिस्तान जाता है तो इस पर सिर्फ 2 लाख रुपए का सामान होता है, इस तरह से तीन लाख रुपए श्रीनगर में पत्थरबाजों तक पहुंच जाता है. कश्मीरी युवाओं को पत्थर मारने के लिए 500 से पांच हजार रुपये तक मिलते हैं.

स्पष्ट है कि भारत अपने अविभाज्य अंग कश्मीर को लेकर इन दिनों संकट व आपातकाल की स्थिति में है. ऐसे राष्ट्रीय संकट के समय कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों का यह स्पष्ट नैतिक कर्तव्य बनता है कि वे संकट की इस घड़ी में देश के समक्ष अपनी सोच को व्यक्त करें कि वे कश्मीर के भटके हुए युवाओं की पत्थरबाजी के साथ हैं या सेना के साथ और राष्ट्र के साथ?!

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