लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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प्रमोद भार्गव

मौसम विभाग की भविष्यवाणियों को ठेंगा दिखाते हुए देश बाढ़ और सूखे की चपेट में है। पूर्वोत्तर के असम और बिहार, उत्तर प्रदेश, पष्चिम बंगाल एवं ओड़िसा में बाढ़ ने हाहाकार मचाया हुआ है। करीब पांच सौ लोग प्राण गवां चुके हैं और अरबों की संपत्ति तथा खाद्य सामग्री नष्ट हो चुकी हैं। वहीं मध्य प्रदेश, तमिलनाडू, आंध्र प्रदेश और दिल्ली समेत उत्तरी भारत का बड़ा भू-भाग गर्मी और सूखे की त्रासदी झेलने को मजबूर हो गया है। इस क्षेत्र के किसान खेतों में दो मर्तबा बीच बोने के बावजूद वर्षा नहीं होने के कारण आजीविका के बड़े संकट से घिर गए हैं। जबकि मौसम विभाग ने वर्षा पूर्व औसत मानसून आने की भविष्यवाणी की थी। अब मौसम विभाग दावा कर रहा है कि मानसून के दूसरे चरण में बारिश का बंटवारा ठीक से होगा, इससे सूखे का संकट झेल रहे भू-क्षेत्रों में पानी की भरपाई हो जाएगी। मानसून की चाल में इस बदलाव को जलवायु परिवर्तन का कारण माना जा रहा है।

देश के ज्यादातर क्षेत्र में मानसून ने जोरदार दस्तक दे दी है। लेकिन ज्यादातर इलाके बाढ़ में डूबने की त्रासदी झेलने रहे हैं। इस कारण ऊँचे इलाकों में तो हरियाली दिख रही है, किंतु फसलें बोने के साथ ही चैपट हो गई हैं। असम के करीमगंज जिले में सुप्राकांधी गांव ने जल समाधि ले ली है। कजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान में 7 गैंडे समेत 90 वन्य प्राणी और 136 लोग अब तक मारे जा चुके हैं। राजस्थान और गुजरात का भी बुरा हाल है। जयपुर, जोधपुर एवं उदयपुर समेत 23 जिले बाढ़ग्रस्त घोषित किए गए हैं। 64 लोग अमर्यादित लहरों ने लील लिए हैं। जालौर जिले की पथमेड़ा गोशाला में पानी भर जाने से 536 गायों की मौत हो गई हैं। प्रधानमंत्री के गृह प्रदेश गुजरात में और भी बुरा हाल है। यहां अब तक 218 लोग मारे जा चुके हैं। बनासकांठा जिले में एक परिवार के 17 लोग काल के गाल में समा गए हैं। बेंगलुरु में बारिश ने 127 साल पुराना रिकार्ड तोड़ दिया है। जबकि मध्य प्रदेश के एक दर्जन जिले जल की द्रष्टि से अभावग्रस्त घोषित किए गए हैं।

बद्रीनाथ में भू-स्खलन जारी है। नदी-नाले उफान पर हैं। कई बड़े बांधों के भर जाने के बाद दरवाजे खोल देने से त्रासदी और भयावह हो गई है। घरों, सड़कों, बाजारों, खेतों और रेल पटरियों के डूब जाने से अरबों रुपए की संपत्ति नष्ट हो गई है। बाढ़ की त्रासदी अब देश में नियमित हो गई है। जो जल जीवन के लिए जीवनदायी वरदान है, वही अभिशाप साबित हो रहा है।  इन आपदाओं के बाद केंद्र और राज्य सरकारें आपदा प्रबंधन पर अरबों रुपए खर्च करती हैं। करोड़ों रुपए बतौर मुआवजा देती हैं, बाबजूद आदमी है कि आपदा का संकट झेलते रहने को मजबूर बना हुआ है। 2014 में जम्मू-कश्मीर में आई बाढ़ से निपटने में 15 अरब डाॅलर खर्च हुए। इसी साल हुदहुद चक्रवात से हुए नुकसान की भरपाई में 11 अरब डाॅलर खर्च हुए। इस बार बाढ़ और सूखे की त्रासदी देश एक साथ झेलने को विवश हुआ है, इसलिए इसी भरपाई में 25 अरब डाॅलर से भी ज्यादा खर्च होने का अनुमान है।

बारिश का 90 प्रतिशत पानी तबाही मचाता हुआ अपना खेल खेलता हुआ समुद्र में समा जाता है। यह संपत्ति की बरबादी तो करता ही है, खेतों की उपजाऊ मिट्टी भी बहाकर समुद्र में ले जाता है। देश हर तरह की तकनीक में पारंगत होने का दावा करता है, लेकिन जब हम बाढ़ की त्रासदी झेलते हैं तो ज्यादातर लोग अपने बूते ही पानी में  जान व सामान बचाते नजर आते हैं। आफत की बारिश के चलते डूब में आने वाले महानगर कुदरत के कठोर संकेत दे रहे हैं, लेकिन हमारे नीति-नियंता हकीकत से आंखें चुराए हुए हैं। बाढ़ की यह स्थिति असम व बिहार जैसे वे राज्य भी झेल रहे हैं, जहां बाढ़ दशकों से आफत का पानी लाकर हजारों ग्रामों को डूबो देती है। इस लिहाज से शहरों और ग्रामों को कथित रूप से स्मार्ट व आदर्श बनाने से पहले इनमें ढांचागत सुधार के साथ ऐसे उपायों को मूर्त रूप देने की जरूरत है, जिससे ग्रामों से पलायन रुके और शहरों पर आबादी का दबाव न बढ़े ?

आफत की यह बारिश इस बात की चेतावनी है कि हमारे नीति-नियंता, देश और समाज के जागरूक प्रतिनिधि के रूप में दूरद्रष्टि से काम नहीं ले रहे हैं। पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन के मसलों के परिप्रेक्ष्य में चिंतित नहीं हैं। कृषि एवं आपदा प्रबंधन से जुड़ी संसदीय समिति ने हाल ही में एक रिपोर्ट दी है। इसके मुतबक जलवायु परिवर्तन से कई फसलों की पैदावार में कमी आ सकती है, लेकिन सोयाबीन, चना, मूंगफली, नारियल और आलू की पैदावार में बढ़त हो सकती है। हालांकि कृषि मंत्रालय का मानना है कि जलवायु परिवर्तन को ध्यान में रखते हुए खेती की पद्धतियों को बदल दिया जाए तो 2021 के बाद अनेक फसलों की पैदावार में 10 से 40 फीसदी तक की बढ़ोतरी संभव है। बड़ते तापमान के चलते भारत ही नहीं दुनिया में वर्षाचक्र में बदलाव के संकेत 2008 में ही मिल गए थे, बावजूद इस चेतावनी को भारत सरकार ने गंभीरता से नहीं लिया। ध्यान रहे, 2031 तक भारत की शहरी आबादी 20 करोड़ से बढ़कर 60 करोड़ हो जाएगी। जो देश की कुल आबादी की 40 प्रतिशत होगी। ऐसे में शहरों की क्या नारकीय स्थिति बनेगी, इसकी कल्पना भी असंभव है ?

वैसे, धरती के गर्म और ठंडी होते रहने का क्रम उसकी प्रकृति का हिस्सा है। इसका प्रभाव पूरे जैवमंडल पर पड़ता है, जिससे जैविक विविधता का अस्तित्व बना रहता है। लेकिन कुछ वर्षों से पृथ्वी के तापमान में वृद्धि की रफ्तार बहुत तेज हुई है। इससे वायुमंडल का संतुलन बिगड़ रहा है। यह स्थिति प्रकृति में अतिरिक्त मानवीय दखल से पैदा हो रही है। इसलिए इस पर नियंत्रण संभव है। सयुक्त राष्ट्र की जलवायु परिवर्तन समिति के वैज्ञानिकों ने तो यहां तक कहा था कि ‘तापमान में वृद्धि न केवल मौसम का मिजाज बदल रही है, बल्कि कीटनाशक दवाओं से निष्प्रभावी रहने वाले बीशाणुओं-जीवाणुओं, गंभीर बीमारियों, सामाजिक संघर्षों और व्यक्तियों में मानसिक तनाव बढ़ाने का काम भी कर रही है।‘ साफ है, जो लोग बाढ़ और सूखे का संकट झेलने को अभिशप्त हैं, वह जरूर संभावित तनाव की त्रासदी  भोग रहे होगें ?

दरअसल, पर्यावरण के असंतुलन के कारण गर्मी, बारिश और ठंड का संतुलन भी बिगड़ता है। इसका सीधा असर मानव स्वास्थ्य और कृषि की पैदावर व फसल की पौष्टिकता पर पड़ता है। यदि मौसम में आ रहे बदलाव से पांच साल के भीतर घटी प्राकृतिक आपदाओं और संक्रामक रोगों की पड़ताल की जाए तो वे हैरानी में डालने वाले हैं। तापमान में उतार-चढ़ाव से ‘हिट स्ट्रेस हाइपरथर्मिया‘ जैसी समस्याएं दिल व सांस संबंधी रोगों से मृत्युदर में इजाफा हो सकता है। पष्चिमी यूरोप में 2003 में दर्ज रिकाॅर्ड उच्च तापमान से 70 हजार से अधिक मौतों का संबंध था। बढ़ते तापमान के कारण प्रदूषण में वृद्धि दमा का कारण है। दुनिया में करीब 30 करोड़ लोग इसी वजह से दमा के शिकार हैं। पूरे भारत में 5 करोड़ और अकेली दिल्ली में 9 लाख लोग दमा के मरीज हैं। बाढ़ के दूषित जल से डायरिया व आंख के संक्रमण का खतरा बढ़ता है। भारत में डायरिया से हर साल करीब 18 लाख लोगों की मौत हो रही है। बाढ़ के समय रुके दूशित जल से डेंगू और मलेरिया के मच्छर पनपकर कहर ढाते हैं। तय है, बाढ़ थमने के बाद, बाढ़ प्रभावित शहरों को बहुआयामी संकटों का सामना करना होगा। बहरहाल जलवायु में आ रहे बदलाव के चलते यह तो तय है कि प्राकृतिक आपदाओं की आवृत्ति बढ़ रही है। इस लिहाज से जरूरी है कि शहरों के पानी का ऐसा प्रबंध किया जाए कि उसका जल भराव नदियों और बांधों में हो, जिससे आफत की बरसात के पानी का उपयोग जल की कमी से जूझ रहे क्षेत्रों में किया जा सके। साथ ही शहरों की बढ़ती आबादी को नियंत्रित करने के लिए कृषि आधारित देशज ग्रामीण विकास पर ध्यान दिया जाए। क्योंकि ये आपदाएं स्पष्ट संकेत दे रही हैं कि अनियंत्रित शहरीकरण और कामचलाऊ तौर-तरीकों से समस्याएं घटने की बजाय बढ़ेंगी ही ?

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