लेखक परिचय

संजय द्विवेदी

संजय द्विवेदी

लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विवि, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं। संपर्कः अध्यक्ष, जनसंचार विभाग, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, प्रेस काम्पलेक्स, एमपी नगर, भोपाल (मप्र) मोबाइलः 098935-98888

Posted On by &filed under प्रवक्ता न्यूज़.


जन्मशताब्दी वर्ष पर विशेष

संजय द्विवेदी

यह हिंदी पत्रकारिता का सौभाग्य ही है कि देश के युगपुरूषों ने अपना महत्वपूर्ण समय और योगदान इसे दिया है। आजादी के आंदोलन के लगभग सभी महत्वपूर्ण नेताओं ने पत्रकारिता के माध्यम से अपना संदेश लोगों तक पहुंचाया और अंग्रेजी दासता के विरूद्ध एक कारगर हथियार के रूप में पत्रकारिता का इस्तेमाल किया। इसीलिए इस दौर की पत्रकारिता सत्ता और व्यवस्था की चारण न बनकर उसपर हल्ला बोलने वाली और सामाजिक जागृति का वाहक बनी। लोकमान्य बालगंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय से लेकर महात्मा गांधी, पं. जवाहरलाल नेहरू, गणेशशंकर विद्यार्थी, अजीमुल्ला खान, पं. माखनलाल चतुर्वेदी, माधवराव सप्रे सबने पत्रकारिता के माध्यम से अपनी आवाज को लोगों तक पहुंचाने का काम किया। ऐसे ही नायकों में एक बड़ा नाम है पं. मदनमोहन मालवीय का, जिन्होंने अपनी पत्रकारिता के माध्यम से जो मूल्य स्थापित किए वे आज भी हमें राह दिखाते हैं। उस दौर की पत्रकारिता का मूल स्वर राष्ट्रवाद ही था। जिसमें भारतीय समाज को जगाने और झकझोरने की शक्ति निहित थी। इस दौर के संपादकों ने अपनी लेखनी से जो इतिहास रचा वह एक ऐसी प्रेरणा के रूप में सामने है कि आज की पत्रकारिता बहुत बौनी नजर आती है। उस दौर के संपादक सिर्फ कलम धिसने वाले कलमकार नहीं, अपने समय के नायक और प्रवक्ता भी थे। समाज जीवन में उनकी उपस्थिति एक सार्थक हस्तक्षेप करती थी। मालवीय जी इसी दौर के नायक हैं। वे शिक्षाविद् हैं,सामाजिक कार्यकर्ता हैं, स्वतंत्रता सेनानी हैं, श्रेष्ठ वक्ता हैं, लेखक हैं, कुशल पत्रकार और संपादक भी हैं। ऐसे बहुविध प्रतिभा सम्पन्न व्यक्ति को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने यूं ही महामना की संज्ञा नहीं दी। मालवीय जी की पत्रकारिता उनके जीवन का एक ऐसा उजला पक्ष है जिसकी चर्चा प्रायः नहीं हो पाती क्योंकि उनके जीवन के अन्य स्वरूप इतने विराट हैं कि इस ओर आलोचकों का ध्यान ही नहीं जाता। किंतु उनकी यह संपादकीय प्रतिभा भी साधारण नहीं थी।

देश के अत्यंत महत्वपूर्ण अखबार हिंदोस्थान का संपादक होने के नाते उन्होंने जो काम किए वे आज भी प्रेरणा का कारण हैं। हिंदोस्थान एक ऐसा पत्र था जिसकी शुरूआत लंदन से राजा रामपाल सिंह ने की थी। वे बेहद स्वतंत्रचेता और अपनी ही तरह के इंसान थे। लंदन में रहते हुए उन्होंने भारतीयों की समस्याओं की ओर अंग्रेजी सरकार का ध्यानाकर्षण करने लिए इस पत्र की शुरूआत की। साथ ही यह पत्र प्रवासी भारतीयों में राष्ट्रीय चेतना भरने का काम भी कर रहा था। कुछ समय बाद राजा रामपाल सिंह स्वयं कालाकांकर आकर रहने लगे और हिंदोस्थान का प्रकाशन भी कालाकांकर से होने लगा। कालाकांकर, उप्र के प्रतापगढ़ जिले में स्थित एक रियासत है। यहां हनुमत प्रेस की स्थापना करके राजा साहब ने इस पत्र का प्रकाशन जारी रखा। कालाकांकर एक गांव सरीखा ही था और यहां सुविधाएं बहुत कम थीं। ऐसे स्थान से अखबार का प्रकाशन एक मुश्किल काम था। बावजूद इसके अनेक महत्वपूर्ण संपादक इस अखबार से जुड़े। जिनमें मालवीय जी का नाम बहुत खास है। राजा साहब की संपादकों को तलाश करने की शैली अद्भुत थी। पं. मदनमोहन मालवीय का सन 1886 की कोलकाता कांग्रेस में एक बहुत ही ओजस्वी व्याख्यान हुआ। इसमें उन्होंने अपने अंग्रेजी भाषा में दिए व्याख्यान में कहा- “ एक राष्ट्र की आत्मा का हनन और उसके जीवन को नष्ट करने से अधिक और कोई अपराध नहीं हो सकता। हमारा देश इसके लिए ब्रिटिश सरकार को कभी क्षमा नहीं कर सकता कि उसने एक वीर जाति को भेड़-बकरियों की तरह डरपोक बना दिया है।” इस व्याख्यान से राजा रामपाल सिंह बहुत प्रभावित हुए और उन्होंने मालवीय जी से आग्रह किया कि वे उनके अखबार का संपादन स्वीकार करें। मालवीय जी ने उनकी बात तो मान ली किंतु उनसे दो शर्तें भी रखीं। पहला यह कि राजा साहब कभी भी नशे की हालत में उनको नहीं बुलाएंगें और दूसरा संपादन कार्य में हस्तक्षेप नहीं करेंगें। यह दरअसल एक स्वाभिमानी संपादक ही कर सकता है। पत्रकारिता की आजादी पर आज जिस तरह के हस्तक्षेप हो रहे है और संपादक की सत्ता और महत्ता दोनों खतरे में हैं, मालवीय जी की ये शर्तें हमें संपादक का असली कद बताती हैं। राजा साहब ने दोनों शर्तें स्वीकार कर लीं। मालवीय जी के कुशल संपादन में हिंदोस्थान राष्ट्र की वाणी बन गया। उसे उनकी प्रखर लेखनी ने एक राष्ट्रवादी पत्र के रूप में देश में स्थापित कर दिया।

हिंदी पत्रकारिता का यह समय एक उज्जवल अतीत है। मालवीय जी ने ही पहली बार इस पत्र के माध्यम से लेखकों के पारिश्रमिक के सवाल को उठाया। उनके नेतृत्व में ही पहली बार विकास और गांवों की खबरों को देने का सिलसिला प्रारंभ हुआ। गांवों की खबरों और विकास के सवालों पर मालवीय जी स्वयं सप्ताह में एक लेख जरूर लिखते थे। जिसमें ग्राम्य जीवन की समस्याओं का उल्लेख होता था। गांवों के माध्यम से ही राष्ट्र को खड़ा किया जा सकता है इस सिद्धांत में उनकी आस्था थी। वे पत्रकारिता के सब प्रकार के कामों में दक्ष थे। मालवीय जी की संपादकीय नीति का मूल लक्ष्य उस दौर के तमाम राष्ट्रवादी नेताओं की तरह भारत मां को अंग्रेजों की दासता से मुक्त कराना ही था। उनकी नजर में स्वराज्य और राष्ट्रभाषा के सवाल सबसे ऊपर थे। भाषा के सवाल पर वे हमेशा हिंदी के साथ खड़े दिखते हैं और स्वभाषा के माध्यम से ही देश की उन्नति देखते थे। भाषा के सवाल पर वे दुरूह भाषा के पक्ष में न थे। अंग्रेजी और संस्कृत पर अधिकार होने के बावजूद वे हिंदी को संस्कृतनिष्ट बनाए जाने को गलत मानते थे।मालवीय जी स्वयं लिखते हैं- “ भाषा की उन्नति करने में हमारा सर्वप्रथम कर्तव्य यह है कि हम स्वच्छ भाषा लिखें।पुस्तकें भी ऐसी ही भाषा में लिखी जाएं। ऐसा यत्न हो कि जिससे जो कुछ लिखा जाए, वह हिंदी भाषा में लिखा जाए। जब भाषा में शब्द न मिलें तब संस्कृत से लीजिए या बनाइए। ” अपनी सहज भाषा और उसके प्रयोगों के कारण हिंदोस्थान जनप्रिय पत्र बन गया जिसका श्रेय उसके संपादक मालवीय जी को जाता है।

अपनी संपादकीय नीति के मामले में उन्हें समझौते स्वीकार नहीं थे। वे इस हद तक आग्रही थे कि अपनी नौकरी भी उन्होंने राजा रामपाल सिंह द्वारा उन्हें नशे की हालत में बुलाने के कारण छोड़ दी । संपादक के स्वाभिमान का यह उदाहरण आज के दौर में दुर्लभ है। वे सही मायने में एक ऐसे नायक हैं, जो अपनी इन्हीं स्वाभिमानी प्रवृत्तियों के चलते प्रेरित करता है। एक बार किसी संपादकीय सहयोगी ने संपादकीय नीति के विरूद्ध अखबार में कुछ लिख दिया। मालवीय जी उस समय मिर्जापुर में थे। जब वह टिप्पणी मालवीय जी ने पढ़ी तो संबंधित सहयोगी को लिखा- “ हमें खेद है कि हमारी अनुपस्थिति में ऐसी टिप्पणी छापी गयी। कोई चिंता नहीं, हम अपनी टिप्पणी कर दोष मिटा देंगें।” अपने तीन सालों के संपादन काल में उन्होंने जिस तरह की मिसाल कायम की वह एक इतिहास है। जिस पर हिंदी पत्रकारिता गर्व कर सकती है। आज जबकि हिंदी पत्रकारिता पर संपादक नाम की संस्था के प्रभावहीन हो जाने का खतरा मंडरा रहा है, स्वभाषा के स्थान पर हिंग्लिश को स्थापित करने की कोशिशों पर जोर है, संपादक स्वयं का स्वाभिमान भूलकर बाजार और कारपोरेट के पुरजे की तरह संचालित हो रहे हैं- ऐसे कठिन समय में मालवीय जी की स्मृति बहुत स्वाभाविक और मार्मिक हो उठती है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *